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सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 190 में से

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पृष्ठ 133

मन्त्रदेवता और चित्त १२३
अर्थात् आत्मा की अनुभूति प्राप्त करना ऐसी स्थिति को कहते हैं जब मन्त्र का उच्चारणमात्र
करने से ही मन्त्रस्वरूप में अवस्थिति अर्थात् मन्त्रदेवता के साथ स्वरूपतादात्म्य की स्थिति
प्राप्त होती है, क्योंकि :-
'दीक्षा के समय गुरु आत्मा का ग्रहण करे अर्थात् अन्तर्विमर्श के द्वारा, शिष्य
को दिये जाने वाले मन्त्र की देवता के स्वरूप में स्वयं अवस्थित रहे।' ऐसा कहा
गया है।
निराकार आत्मा को मिट्टी के ढेले या दूसरे किसी स्थूल पदार्थ की तरह (हाथ से)
पकड़ा नहीं जाता है। इस कारण से यह आत्म-अनुभूति ही वास्तविक 'निर्वाण-दीक्षा'
होती है जो कि (साधक के अन्तर में ही) अनुत्तर शिवभाव को अभिव्यक्त कर
देती है ॥३२॥
विवरण
प्रस्तुत सूत्रों का भाव अच्छी प्रकार समझने के लिये निम्नलिखित बातें ध्यान में
रखना परम आवश्यक है—
सूत्र संख्या ३१ में मन्त्र देवता का ध्यान करने वाले साधक के चित्त में उस देवता
के उदय होने की अथवा दूसरे शब्दों में उसका साक्षात्कार होने की चर्चा की गई है। इस
सम्बन्ध में यह बात उल्लेखनीय है कि विकल्प-संस्कार के उपाय से योगी के संवेदन की
विशुद्धता और एकाग्रता इतनी तीव्र हो जाती है कि वह इन्द्रियों के द्वारों से बाहर की ओर
स्पन्दित होती हुई संवित् की धारा को पूर्वोक्त अलंग्रास की युक्ति से अन्तर्हृदय के अवकाश
में केन्द्रित कर सकता है। ऐसी अवस्था में उसको किसी भी मन्त्र का विमर्श करने के बाद
तत्काल ही उस मन्त्रदेवता के साथ चित्त की एकाकारता हो जाती है। साधना के क्षेत्र में
इसी को मन्त्रदेवता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार होना कहा जाता है। यह साक्षात्कार बिल्कुल
संवेदनात्मक होता है क्योंकि देवता, स्वरूप से व्यतिरिक्त और किसी विशेष कायिक आकार-
प्रकार को धारण करके सामने नहीं आता है। स्मरण रहे कि यह शाक्त-उपाय की उच्चतर
भूमिका है और इसपर परमेश्वर के तीव्र शक्तिपात से पवित्र बने हुए अन्तःकरणों वाले कुछ
इने गिने व्यक्ति ही पहुँच सकते हैं। भगवान् अभिनवगुप्त ने ऐसे सौभाग्यशाली साधकों की
महत्ता का वर्णन करते हुए कहा है कि—"जिस प्रकार १केतकीपुष्प के सौरभ का रसिक
भौंरा ही होता है, मक्खी नहीं, उसी प्रकार किसी विरले ही व्यक्ति के मन में भैरवीय
अभेदभूमिका को प्राप्त करने के प्रति अतिशय रुचि होती है। ऐसे रुचिसम्पन्न योगी के लिये
२संसार का आडम्बर स्वयं ही उसी प्रकार गलता जाता है जिस प्रकार ग्रीष्म की चिलचिलाती
धूप में सुदृढ़ हिमानियां स्वयं ही गलकर बह जाती हैं।
१. केतकीकुसुमसौरभे भृशं भृङ्ग एव रसिको न मक्षिका ।
भैरवीयपरमाद्वयार्चने कोऽपि रज्यति महेशचोदितः ।। (तं०, ४. २७६)
२. अस्मिंश्च यागे विश्रान्तिं कुर्वतां भवडम्बरः ।
हिमानीव महाग्रीष्मे स्वयमेव विलीयते ।। (तत्रैव, ४.२७७)