स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
सूत्र—'अभाव' कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। ऐसी समाधि में अमू-
अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यवाद की निःसारता ७१
रूपसाक्षात्कार की दशा सर्वभाव या सर्वशून्यता की ही दशा है क्योंकि इस दशा पर पहुँची
हुई आत्मा अभाव में ही लीन हो जाती है।
अगले सूत्र में ऐसे मतवादियों का मुखमुद्रण किया जा रहा है :-
नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता ।
यतोऽभियोगसंस्पर्शात्तदासीदिति निश्चयः ॥१२॥
न तु अभावो भावनीयो, यथा अन्यैर्योगिभिः उपदिश्यते,
‘अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत्,
इति। न चैतत् युक्तम्, यस्मात् नाभावे भावना युज्यते मूढावस्थैव सा यस्मात्
उत्तरकालम् अभियोगसंस्पर्शात् अभिलापसंयोगात्-‘सा शून्यावस्था अतीता मम’
इति स्मर्यते, न च आत्मस्वभाव एषः, यस्मात् न त्वेवं चिद्रूपत्वं मूढावस्थावत् स्मर्यते,
तस्य सर्वकालमनुभवितृत्वेनाननुभवो नित्योदितत्वात् ॥१२॥
अनुवाद
सूत्र—'अभाव' कभी भी भावना का विषय नहीं बन सकता है। ऐसी समाधि में अमू-
ढ़ता (जड़ता का अभाव) भी नहीं है (अर्थात् अभाव-भावना की अवस्था जड़ता की ही अवस्था
है)। इसका कारण यह कि (अभाव समाधि से उठने के अनन्तर योगी को) अभिलाप अर्थात्
भाषण के साथ सम्बन्ध हो जाने पर—'वह मेरी शून्य अवस्था थी' ऐसा निश्चय हो
जाता है ॥१२॥
वृत्ति—जैसा कि दूसरे योगी उपदेश देते हैं—
'तब तक अभाव की भावना करते रहना चाहिये जब तक आत्मा अभाव में ही लीन
हो जाए'—युक्तिसङ्गत नहीं है क्योंकि 'अभाव' तो कभी भी भावना का विषय नहीं बन
सकता है।
वास्तव में यह विचार युक्तियुक्त भी नहीं है क्योंकि 'अभाव' तो निश्चय से जड़ता
की ही अवस्था है अतः उसका, भावना का विषय होने का मन्तव्य प्रस्तुत करना असङ्गत
है। वह अभाव-भावना मूढ़ता की अवस्था है क्योंकि समाधि-काल के अनन्तर जब ऐसे योगी
को अभियोग अर्थात् भाषण के साथ सम्बन्ध हो जाता है तब वह उस समाधि की अवस्था
को 'वह मेरी शून्य अवस्था थी' इसप्रकार स्मर्यमाणरूप में अनुभव करता है। आत्मा का
स्वभाव ऐसा नहीं है क्योंकि चित्-स्वरूपता (सतत उदीयमान होने के कारण) मूढ़ता की
अवस्था की तरह स्मरण नहीं की जाती है। वह तो शाश्वत-उदीयमान-सत्ता है अतः उसका
अनुभव प्रतिसमय (वर्तमानकालिक) अनुभवविता (स्वतन्त्र ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य प्रमाता) के
रूप में होता है ॥१२॥
विवरण
अभावब्रह्मवादी श्रुत्यन्तविदों से प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा का और शून्य-
वादियों से बौद्ध दार्शनिकों की माध्यमिक शाखा के अनुयायियों का अभिप्राय है। विषय को
७२ स्पन्दकारिका
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थोड़ा स्पष्ट करने के लिए यहाँ पर इन दोनों मतवादियों के सिद्धान्त का संक्षिप्त पर्यालोचन
करना आवश्यक है।
अभावब्रह्मवाद—इस वाद के अनुसार अभाव रूप अथवा असत्-रूप कारण से भावरूप
या सद्रूप कार्य की उत्पत्ति मानी गई है। इसका तात्पर्य यह है कि इस भावरूप में दिखाई
देने वाले स्थूल-जगत् की सृष्टि से पहले किसी पदार्थ की सत्ता भावरूप में न होने के कारण
चारों ओर अभाव का ही साम्राज्य था। इस अभाव से ही भावरूप में दिखाई देने वाले जगत्
की सृष्टि स्वयं हो गई है। ये लोग अपने मत की पुष्टि में निम्नलिखित उपनिषद्वाक्य को
प्रमाणरूप में प्रस्तुत करते हैं—
'असदेवेदमग्र आसीत्.........'॥ (छान्दोग्य० ३.१९.१)
कहने का तात्पर्य यह है कि सृष्टि से पहले असत् ही असत् था अर्थात् प्रत्येक पदार्थ
का अभाव था। प्रलय के पश्चात् भी सारा जगत् अभाव में ही लय होगा अतः वास्तव में
अभाव ही यथार्थ-सत्ता है। ब्रह्म का वास्तविक रूप भी अभाव ही है। इस अभाव की निरन्तर
भावना करने से सारी सांसारिक उथल-पुथल का उच्छेद हो जाता है क्योंकि वेदकसत्ता और
वेद्यसत्ता दोनों अभाव में ही लय हो जाती हैं। अभाव में लय होना ही जीवात्मा की
वास्तविक मुक्ति है। फलतः अभावसमाधि की परिपक्वता प्राप्त करके आत्मा का अभावरूप
परब्रह्म में लीन होना ही सारी साधना का चरमलक्ष्य है।
शून्यवाद—बौद्धों की १माध्यमिक शाखा के प्रसिद्ध एवं उद्भट विद्वान् नागार्जुन और
उसके समकक्ष कई अन्य विद्वानों ने बौद्ध-दर्शन में 'सर्वशून्यवाद' की स्थापना की है। ये लोग
इस वाद को 'सर्ववैनाशिकवाद' भी कहते थे। यह एक ऐसा वाद था जिसके अनुसार किसी
भी प्रकार के पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं स्वीकारा गया था। भगवान् अभिनवगुप्त ने अपने
तन्त्रालोक में इन लोगों को २'सर्वापह्नवहेवाकधर्मा' के नाम से पुकारा है। उनके विचारानुसार
इन लोगों ने प्रत्येक प्रकार के ज्ञातृरूप, ज्ञानरूप और ज्ञेयरूप पदार्थों के अनस्तित्व पर दुराग्रह
करने का ठेका ले रखा था।
इनके मत का संक्षिप्त निष्कर्ष यह है कि यह सारा दृश्यमान स्थूल जगत् वास्तव में
शून्य का ३विवर्तमात्र है। शून्य के अतिरिक्त किसी बाह्य पदार्थ अथवा ज्ञान की निजी कोई
सत्ता नहीं है। शून्य का स्वरूप न ४सत्, न असत्, न सदसत् और न सदसत् से भिन्न है।
यथार्थ शून्य वही है जहाँ इन चारों में से कुछ भी न हो। यह शून्य ही ५पारमार्थिक सत्य है
१. द्रष्टव्य, भारतीय दर्शन, डा० बलदेव उपाध्याय, पृ० १५२-६१।
२. 'सर्वेषां ज्ञातृज्ञानज्ञेयानाम् 'अपह्नवों' निराकरणं तत्र 'हेवाक' एव 'धर्म:' स्वभावो
यस्यासौ बौद्ध:।' (तं० वि०, १.५६)
३. मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्। (भा० द० पृष्ठ १३२)
४. न सन् नासन् न सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम्।
चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥(मा०का०) भा०द० पृष्ठ ५६३ पर उदाहृत
५. अन्यथा न होने वाली, वास्तविक और प्रमाणों से परिपुष्ट यथार्थ।
अभावब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ७३
जबकि शेष जगत् संवृत्तिसत्य१ है। प्रत्येक प्रकार के स्वभाव अथवा लक्षण इत्यादि से परे होने
के कारण शून्यदशा अनिर्वाच्य है परन्तु इस पर पहुँचना ही सारी साधना का अन्तिम लक्ष्य
है। इस सर्वशून्य भाव की अनुभूति को ही बौद्ध शब्दों में 'निर्वाण' की संज्ञा मिली है। महाप्रज्ञा
से ऐसे निर्वाण की प्राप्ति सम्भव हो सकती है और उसके प्राप्त करने से ही पूर्णतया क्लेशों
का क्षय हो जाता है। प्रसिद्ध बौद्धदार्शनिक और कवि अश्वघोष ने इस सर्वशून्यरूप निर्वाण को
शान्ति का नाम दिया है। उसके मन्तव्यानुसार, जिस प्रकार २दीये की लौ बुझ जाने पर न
भूमि में, न आकाश में, न किसी दिशा में और न किसी विदिशा में चली जाती है प्रत्युत तेल
का क्षय हो जाने पर केवल शान्त हो जाती है, उसी प्रकार योगी की आत्मा निर्वृति पर
पहुँच कर न भूमि में, न आकाश में, न किसी दिशा में और न किसी विदिशा में चली जाती
है प्रत्युत क्लेशों का क्षय हो जाने से केवल शान्ति की अवस्था में लय हो जाती है।
यदि शैव सिद्धान्त को मन में रखकर इन दोनों मतावलम्बियों के विचारों का अनु-
शीलन किया जाये तो मस्तिष्क में कई बातें सहज ही में उभर आती हैं—
अभावब्रह्मवाद के अनुसार यदि आत्मा का वास्तविक 'स्वरूप' अभाव मान कर उससे
किसी भी प्रकार की सत्ता के अनस्तित्व का सिद्धान्त स्वीकारा जाये तो एक बाधा उपस्थित
होती है। वह यह कि अभावदशा में किसी भी वेदकसत्ता ( ज्ञान-क्रियात्मक अनुभवित्ता ) का
अस्तित्व शेष न रहने के कारण उस अभाव दशा का अनुभव कौन कर सकता है ? साथ ही
'अभाव' से यदि पदार्थों की असत्ता का अभिप्राय है तो ऐसे अभाव से भावरूप जगत् कैसे उदय
में आ सकता है ? क्योंकि असत से सत् की उत्पत्ति होना न तो सम्भव है और न ऐसी कल्पना
करना ही तर्क-संगत है। यदि यह माना जाये कि भावरूपता को जन्म देना और फिर उसको
अभावरूपता में लय करना ही 'अभाव' का स्वभाव है तो ऐसे ३स्वभाव की विद्यमानता में
उसको सर्वाभाव कैसे माना जा सकता है ? फलतः पहले अभाव का स्वरूप ही स्पष्ट नहीं हो
जाता है।
अभावसमाधि का उपदेश देनेवाले गुरुओं का कथन है कि तब तक अभाव की भावना
अर्थात् 'मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ' इस प्रकार की भावना का अभ्यास करते रहना चाहिये जब तक
आत्मा स्वयं भी अभावरूप ही बन जाये। इस विषय में यह बात विचारणीय है कि भावना
का विषय वही वस्तु बन सकती है जिसकी स्वतः अखण्डित सत्ता विद्यमान हो। जब अभाव
प्रत्येक भाव अर्थात् सत्ता का अनस्तित्व है तो वह भावना का विषय क्यों कर बन सकता है ?
१. व्यवहार मात्र से कहा सुना जाने वाला यथार्थ।
२. दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम्।
दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥
योगी तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् ।
दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित् क्लेशक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥
(सौन्दरनन्द, १६.२८-२९)
३. नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ॥ ( भ० गी०, २.१७ )
७४ स्पन्दकारिका
'दूसरे पक्ष में यदि अभाव वास्तव में कोई भाव्य वस्तु ही है तो वह अभाव का भी अभाव होने
के कारण स्वयं एक सत्ता ही बन जाता है। विशेष बात तो यह है कि अभावभावना का उप-
देश देने वाला गुरु और उसको ग्रहण करने वाला शिष्य दोनों को इस बात की पूर्णचेतना
होती है कि हमारी सत्ता विद्यमान है, हम चेतन हैं; हममें ज्ञान क्रिया रूप वेदकताभाव
विद्यमान है परन्तु उनको 'मैं नहीं हूँ' की भावना करके अपने ही अस्तित्व का स्वयं अपलाप
करना पड़ता है। फलतः उनके लिए 'अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः' वाली बात चरितार्थ हो
जाती है। उनसे न तो अपनी सत्ता का अपलाप करते और न उसको स्वीकारते ही बनता है।
अभाववादी दावा करते हैं कि अभावसमाधि में सर्वाभावरूप विश्वोच्छेद ही
भावना का विषय बन जाता है। इस विषय में विचारणीय बात यह है कि यदि
'२विश्वोच्छेद' का अर्थ प्रत्येक सत्ता का अभाव है तो अनुभवित्ता का भी स्वतः उच्छेद
होने के कारण उस विश्वोच्छेद का अनुभव ही कौन करेगा ? विश्वोच्छेद दशा का अनुभव
करने के तत्काल ही अनुभवित्ता का भी उच्छेद होगा क्योंकि विश्वोच्छेद (होने की निश्चित
प्रक्रिया) में वह कोई अपवाद नहीं होगा। अब यदि यह माना जाये कि विश्व का उच्छेद होने
पर भी अनुभवित्ता का उच्छेद नहीं होगा तो विश्वोच्छेद की कल्पना वन्ध्यापुत्र की कल्पना
के समान ही होगी। साथ ही इस में एक और कठिनाई उपस्थित हो जाती है। वह यह कि
विश्वोच्छेद की कल्पना करने में भावना का भी उच्छेद होना आवश्यक मानना पड़ेगा।
भावना का उच्छेद मानने पर भी विश्वोच्छेद की कल्पना पूरी नहीं हो सकती है क्योंकि स्वतः
उच्छेद की कल्पना तो अवशिष्ट रहेगी ही। फिर यदि उच्छेद के उच्छेद की कल्पना की जाये
तो उस उच्छेद के उच्छेद की कल्पनाओं का गोरखधन्धा कभी समाप्त ही नहीं होगा और
परिणाम यही होगा कि सर्वाभाव कभी भी सिद्ध ही नहीं होगा। अनुभवित्ता की सत्ता तो
किसी न किसी रूप में अवशिष्ट रहेगी ही।
प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने अभाव-समाधि के विषय में एक विशेष प्रकार के दोष
का उल्लेख किया है। वह यह कि अभावसमाधि, जिस रूप में अभावब्रह्मवादी इसको
स्वीकारते हैं, वास्तव में मूढता, अर्थात् विशेष प्रकार की जड़ता, जिसमें किसी प्रकार की
संवेदना नहीं रहती है, की अवस्था है क्योंकि इस समाधि का अभ्यास करने वाला योगी
समाधि से उठने के अनन्तर उस समाधिकालीन दशा का स्मरण जैसा करता हुआ कहने
लगता है—'मैं प्रगाढ़ मूढ़ता की अवस्था में पड़ा हुआ था और अब मेरी वह अवस्था बीत
गई है।' जिस समाधि में अपने आप में अपने ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य का आभास न रहे वह
समाधि यथार्थ समाधि की अवस्था नहीं, प्रत्युत मादक द्रव्यों का सेवन करने वाले व्यक्ति के
१. भावनाया भाव्यवस्तुविषयत्वादभावस्य न किञ्चित्त्वाद् भाव्यमानतायां वा किञ्चित्त्वे
सत्यभावत्वाभावात् । (स्प० नि०, १.१२)
२. किञ्च भावकस्यापि यत्राभावः स विश्वोच्छेदः कथं भावनीयः, भावकाभ्युपगमे तु न
विश्वोच्छेदो भावकस्यावशिष्यमाणत्वात् । (स्प० नि०, १.१२)
असद्ब्रह्मवाद, सर्वशून्यत्ववाद की निःसारता ७५
नशे की जैसी मोहात्मक (तामसिक अचेतना) अवस्था ही कही जा सकती है। फिर ऐसी
दशा में, साधारण प्राणियों में पायी जाने वाली तामसिक सुषुप्ति और योगी की समाधि में
अन्तर ही क्या है ?
माध्यमिक लोगों के शून्यवाद के सम्बन्ध में भी लगभग ऐसी ही बाधायें उपस्थित
हो जाती हैं। उनके 'शून्य' का स्वरूप भी कुछ स्पष्ट नहीं है। वे लोग एक ओर किसी
वेदक आत्मसत्ता को स्वीकारने के पक्ष में नहीं हैं परन्तु दूसरी ओर ज़ोर-ज़ोर से निर्वाण
का ढोल पीटते रहते हैं। यदि आत्मा का कहीं अस्तित्व ही नहीं है तो निर्वाण किसका ?
शरीर आदि जड पदार्थ तो निर्वाण का विषय नहीं बन सकते हैं। किसी आत्मरूप वेदकसत्ता
के अनस्तित्व की दशा में क्लेश किसका और उसके क्षय के लिये संघर्ष करने का प्रयोजन ही
क्या ? आखिर 'शून्य' कौन सी और कैसी वस्तु है ? यदि उसका रूप सर्वाभाव जैसा
ही है तो उसकी अनुभूति और नामकरण किसके द्वारा और कैसे सम्भव हो सकता है ?
इन लोगों के द्वारा बतलाई गई निर्वाण की परिभाषा भी कुछ स्पष्ट नहीं है। इन्होंने
निर्वाण को शान्ति का नाम दिया है परन्तु इन्हीं के मन्तव्यानुसार उसका रूप भी शून्य ही
है। फिर यदि निर्वाण भी कोई ऐसी अवस्था है जिसमें ज्ञातृता और कर्तृता का सर्वथा लोप
हो जाता है तो वह शैवों को मान्य नहीं क्योंकि वे लोग ऐसी अवस्था को जड़ता के अतिरिक्त
और कुछ मानने के पक्ष में नहीं हैं। शैव दार्शनिकों के अनुसार¹ मोक्ष कोई अलग अवस्था
नहीं प्रत्युत 'स्वरूपख्याति' ही मोक्ष है। जब आत्मा अख्याति की सीमाओं से निकलकर
अपनी असीम ज्ञातृता और असीम कर्तृता की अनुभूति प्राप्त कर लेती है तब वह मुक्तात्मा
कही जाती है। स्पष्ट है कि मुक्तात्मा का रूप जड़ नहीं, प्रत्युत ज्ञान-क्रिया पर स्वतन्त्र
अधिकार रखने वाला 'पूर्णचैतन्य' है। ²शून्यवादी दार्शनिक प्रत्येक प्रकार के ज्ञान, ज्ञाता
और ज्ञेय पदार्थों की निःस्वभावता अथवा शून्यता को स्वीकारते हुए ज्ञातृ-कर्तृरूप संवित् को
भी निःस्वभाव ही मानते हैं। फलतः इनके मतानुसार संवित् की शून्यता ही निर्वाण है।
शैव दार्शनिकों का इस सम्बन्ध में एक भिन्न दृष्टिकोण है। इनका विश्वास है कि वास्तव में
संवित् का स्वरूप पूर्णज्ञातृता और पूर्णकर्तृतारूप स्पन्द है। इस स्पन्द या स्फुरणा से ही सारे
नील, पीत इत्यादि भावों का अवभासन और स्थिति सम्भव हो सकती है। यदि इस
विश्वात्मक स्फुरणा को ही नकारा जाये तो सारा विश्व प्रत्यक्षरूप में संज्ञी होने पर भी
एकदम संज्ञाहीन मानना आवश्यक है। विश्व की संज्ञाहीनता तो कदापि देखने में नहीं आती
है अतः इस ³स्फुरत्तारूप संवित् का अपलाप कदापि नहीं किया जा सकता है।
१. मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः।
स्वरूपं चात्मनः संविन्नान्यत्..................॥ (तं०, १.१५६)
२. ते खलु सर्वभावानैः स्वाभाव्यवादिनः संविदोऽपि नैःस्वाभाव्यान्मिथ्यात्वमभिदधतस्तच्छू-
न्यतायामेव मोक्षमाचक्षीरन्। (तं० वि०, १.३३)
३. संविदि तु स्फुरतामात्रसारायां मिथ्यात्वादसत्त्वमेव स्यात्, इति न किञ्चित्स्फुरेत्, इति
मूर्च्छव स्यात् इति। न च संविदः स्फुरतामात्रसाररूपाया अपह्नवः शक्यक्रिय इति।
(तं० वि०, १.३३)
७६ स्पन्दकारिका
शून्यवादी बौद्धों ने प्रसिद्ध माध्यमिक आचार्य नागार्जुन की यह उक्ति—
सर्वलम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः ।
सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥
प्रस्तुत करके इस बात का दावा किया है कि हमारे शून्य से ऐसी किसी दशा का अभिप्राय
नहीं जिसको अन्य दार्शनिकों ने सर्वाभाव का नाम देकर कटु आलोचना का विषय
बनाया है। वास्तव में हमारे शून्य से एक ऐसे निरपेक्ष परम-तत्त्व का अभिप्राय है जिसमें
कल्पित आलम्बनधर्मों, सम्पूर्ण तत्त्वों और सारी क्लेशात्मक वासनाओं की शून्यता हो।
वास्तव में उस शून्यतत्त्व का स्वरूप सर्वाभाव नहीं है। वह शून्यतत्त्व एक ऐसी अवस्था है जो
१चतुष्कोटियों की अविषय, मन और वाणी से अगोचर और अनिर्वचनीय है।
इस विषय में यह बात विचारणीय है कि यदि नागार्जुन की उक्ति के अनुसार 'शून्य'
में केवल कल्पित ग्राह्य, ग्राहक आदि भावों की ही शून्यता है और ज्ञानरूपता की स्थिरता
अटल रहती है तो फिर शून्यवाद में, बौद्धों की दूसरी शाखा २विज्ञानवाद के सिद्धान्त से
बढ़कर और कौन सी नई बात कही गई है ? विज्ञानवादियों का मन्तव्य भी यही है कि यह
३सारा कल्पित जगत्-प्रपञ्च, वास्तव में, अन्तःकरणों का धर्म बने हुए ज्ञान, जिसको उनकी
शब्दावली में 'विज्ञप्ति' कहते हैं, का विकासमात्र है। यह ज्ञान ही विचित्र रूपों को अवभा-
सित करने वाला है परन्तु स्वयं, कल्पित तत्त्वादि का रूप धारण नहीं करता है। यह चेतन-
क्रिया के साथ सम्बन्धित होने के कारण 'चित्त' कहलाता है और यही एक पारमार्थिक सत्य
है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि शून्यवादियों के 'शून्य' और विज्ञानवादियों के
'चित्त' में शाब्दिक भेद के अतिरिक्त कोई सैद्धान्तिक भेद नहीं है।
जहाँ तक शैवों का सम्बन्ध है वे तो ज्ञान को चित्तरूप या अन्तःकरणरूप मानने के
पक्ष में नहीं हैं। अन्तःकरण इन्द्रिय होने के कारण स्वतः जड़ हैं। ज्ञान सर्वस्वतन्त्र और
चैतन्य होने के कारण उनका धर्म कैसे बन सकता है ?
'शून्य' की कल्पना के विषय में भी शैवों का दृष्टिकोण अन्य दार्शनिकों से नितरां
भिन्न है। इनके कथनानुसार 'शून्य' शब्द से वास्तव में ४अशून्य अर्थात् चिदानन्दघन और
१. द्रष्टव्य, भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १५४-६२ ।
२. अथ 'सर्वलम्बनधमैश्च....................' इत्याद्युक्तयुक्त्या ग्राह्यग्राहकभावादिना कल्पितेन
रूपेण शून्यं न तु संविदापि इति चेत्, एवं ह्युच्यमाने विज्ञानवादे एवाभ्युपगमः स्यात्' ।
(तं० वि०. १.३३)
३. इत्यन्तःकरणस्यैव विचित्रात्मावभासिनः ।
अविभाविततत्त्वस्य विस्फूर्जितमिदं जगत् ॥ (तं० १.३३ में उदाहृत)
४. अशून्यं शून्यमित्युक्तं शून्यं चाभाव उच्यते ।
अभावः स समुद्दिष्टो यत्र भावाः क्षयं गताः ।
सत्तामात्रं परं शान्तं तत्पदं किमपि स्थितम् ॥ (स्व० तं० ४.२९२-९३)