स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
प्रकाश डाला जा चुका है अतः यहाँ पर फिर से उन्हीं बातों को दोहराना पिष्टपेषण ही
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रालवर्ती अवकाश अपरिमित चैतन्यरूप होने के कारण 'चिदाकाश' कहलाता है। इसी महान्
व्योम से १प्राणशक्ति का निकास होता रहता है और प्राणशक्ति पर ही विश्व के सारे चेतन
पदार्थों का जीवन निर्भर रहता है। फलतः मध्यनाडी ही शरीर की प्रधान नाडी है जहां से
शरीर के रोम रोम को चेतना वितीर्ण होती है; २जहाँ से सारी मानसिक वृत्तियां उदित होती
हैं और जिसमें अन्ततोगत्वा लय भी होती हैं।
साधारण जीवभाव की अवस्था में किसी भी जीवधारी को इस नाडी की वर्तमानता
अथवा इसकी मौलिक स्पन्दना का आभास नहीं मिल सकता है। केवल योगीजनो को ही
प्राणाभ्यास की प्रक्रिया के द्वारा इसके महत्त्व की अनुभूति हो पाती है।
ऊर्ध्वं मार्गं—साधारण रूप में इस शब्द का अर्थ उत्कृष्ट-मार्ग है और आगमशास्त्रों
में उत्कृष्ट मार्ग से उदान वायु के मध्यनाडी रूप मार्ग का अभिप्राय लिया जाता है। साधारण
जीवधारियों में, प्राण एवं अपान की प्रवहमानता का मार्ग, मध्यनाडी के बायें और दायें पाश्र्वों
में अवस्थित दो अन्य नाडियां हैं। इस अवस्था में प्राणापान की प्रवहमानता के लिये सुषुम्ना
का मार्ग बिल्कुल बन्द रहता है। योग की प्रक्रिया के द्वारा प्राण एवं अपान का छेदन करने से
अर्थात् दोनों के बहिर्मुखीन संचार को रोक कर दोनों को हृत्-मंडल में ही अवस्थित करने से, ये
उदानवायु का रूप धारण करके, सुषुम्नामार्ग अर्थात् ऊर्ध्वमार्ग से ३ऊर्ध्वसंचार करने लगते हैं।
प्राणापान के ऊर्ध्वसंचार की अवस्था पर पहुँचे हुये योगी के अन्तस् में विद्यमान भेद-भावना
स्वयं ही पिघल कर अभेद-भावना के रूप में उदित हो जाती है क्योंकि प्राणापान का ऊर्ध्व-
संचार तुर्यरूप शाक्तभूमिका का समावेश हो जाने पर ही होने लगता है।
सूत्र २५ में मूढ़ और प्रबुद्ध व्यक्तियों की समाधिकालीन अनुभूति के अन्तर को स्पष्ट
किया गया है। इस सम्बन्ध में पहले ही सूत्र १२ से सूत्र २० तक के विवरणों में पर्याप्त
प्रकाश डाला जा चुका है अतः यहाँ पर फिर से उन्हीं बातों को दोहराना पिष्टपेषण ही
होगा ॥ २३, २४, २५ ॥
इति श्रीकल्लटाचार्यविरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'स्वरूपस्पन्दः'
नाम प्रथमो निःष्यन्दः ॥ १ ॥
श्रीकल्लटाचार्य के द्वारा विरचित स्पन्दकारिका वृत्ति का 'स्वरूपस्पन्द'
नामक पहला निःष्यन्द समाप्त हुआ ॥ १ ॥
१. तस्मात् (शून्यात्) प्राणशक्तिर्निःसरति । (प्र० हृ०, १७)
२. तत एव सर्ववृत्तीनामुदयात् तत्रैव च विश्रामात् । (प्र० हृ०, १७)
३. द्रष्टव्य—ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (३.२.१९-२०)
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal
दूसरा निःष्यन्द
'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द
यहाँ तक के प्रकरण में ग्रन्थकार ने अनेक युक्तियों और उपपत्तियों के द्वारा यह तथ्य
निर्धारित किया कि विश्व के कण कण में चैतन्यमयी स्पन्दशक्ति सामान्यरूप में अनुस्यूत है।
योगी लोग पूर्वोक्त विकल्पसंस्कार की प्रक्रिया के द्वारा अपने संवेदन को निर्मल बना कर,
अपने ही हृदयमण्डल में इस शाक्त-भूमिका की अनुभूति प्राप्त करते हैं। फलस्वरूप वे पशुभाव
की संकुचित सीमाओं को लांघ कर असीम विश्वात्मभाव में लय हो जाते हैं।
अब प्रस्तुत प्रकरण के सूत्रों में आध्यात्मिक उपलब्धियों के आधार पर इस रहस्य का
उद्घाटन किया जा रहा है कि विकल्प-संस्कार की प्रक्रिया का निरन्तर अभ्यास करने से प्रबुद्ध
योगियों के हृदयों में 'सहजविद्या' का उदय हो जाता है। शुद्ध विकल्प अथवा अहंविमर्शात्मक
स्वरूप की यथार्थ अनुभूति ही इस 'सहजविद्या' का स्वरूप होता है। निर्मल हृदय में शुद्धविद्या
का प्रकाश फैल जाने से ही योगी को वास्तविक स्वरूप का परिचय प्राप्त होता है। उसको
मन्त्रवीर्य का अनुभव हो जाता है ओर वह प्रबुद्ध अवस्था से निकल कर सुप्रबुद्ध अवस्था में
प्रविष्ट हो जाता है।
[ मन्त्र और मन्त्रवीर्य ]
इस सम्बन्ध में अब सूत्रकार अगले दो सूत्रों में इस तथ्य का प्रतिपादन करते हैं कि
सिद्ध योगियों की वाणी में ऐसे आत्मबल का संचार हो जाता है कि उनके द्वारा उच्चारे गये
मन्त्र कागज के पत्रों पर लिखे हुए साधारण वर्णमात्र न रह कर अमोघ वीर्य बन जाते हैं।
उनमें, योगी की रुचि के अनुसार भोगरूप या मोक्षरूप फलों को प्राप्त करवाने की क्षमता
निश्चित बन जाती है :-
तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ॥ २६ ॥
तत् बलं निरावरणचिद्रूपमधिष्ठाय, मन्त्राः सर्वज्ञत्वादिना बलेन श्लाघायुक्ताः
प्रवर्तन्ते अनुग्रहादौ स्वाधिकारे। करणानि यथा देहिनाम्, नान्येन आकारादि-
विशेषेण ॥ २६ ॥
तत्रैव संप्रलीयन्ते शान्तरूपा निरञ्जनाः ।
सहाराधकचित्तेन तेन ते शिवधर्मिणः ॥ २७ ॥
तत्रैव स्वस्वभावव्योम्नि निवृत्ताधिकाराः प्रलीयन्ते, शान्तरूपाः, मायाकालुष्य-
रहिताः, सह साधकचित्तेन; अनेन कारणेन शिवसंयोजनास्वभावेन इति शिवात्मका
उच्यन्ते ॥ २७ ॥