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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

सूत्र—यह (मातृका) वास्तव में शिव की वह क्रियाशक्ति ही है जो कि (बहिर्विमर्श की

१५२ स्पन्दकारिका
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
की सहकारिता के बिना किसी भी 'प्रत्यय' अर्थात् विकल्प ज्ञान का उत्पन्न होना संभव ही
नहीं है ॥४७॥
सूत्र—यह (मातृका) वास्तव में शिव की वह क्रियाशक्ति ही है जो कि (बहिर्विमर्श की
अवस्था में) पशुवर्तिनी (पशु में विद्यमान स्थूल क्रिया) बन जाने के कारण बन्धन में डाल देने-
वाली है, परन्तु (इसके प्रतिकूल) अपने मार्ग पर (शिवमार्ग पर) अवस्थित होती हुई, वास्त-
विक रूप में ज्ञात होनेपर, सिद्धियाँ प्रदान करती है ॥४८॥
वृत्ति—यह (मातृका) वास्तव में भगवान् की क्रियात्मक स्वभाववाली शक्ति ही है जो
पशुवर्तिनी बन गई है। जैसा कहा गया है—
'दो १सन्तानों के रूप में चलने वाली ऐसी कोई भी 'जीवकला' नहीं है जिसमें 'शिव-
कला' अधिष्ठात्री बनकर व्याप्त न हो ॥'
अतः वही (ईश्वरीय क्रियाशक्ति ही) अज्ञात होने की दशा में बन्धन का कारण है।
परन्तु वास्तविक रूप में ज्ञात होने की दशा में मनुष्यों को पररूप और अपररूप सिद्धियाँ
प्रदान कर देती है ॥४८॥
विवरण
प्रस्तुत तीन सूत्रों में विमर्शरूपा स्पन्दशक्ति के बहिर्मुखीन प्रसार की क्रीडा का
सूत्रात्मक रूप में वर्णन किया गया है। यह शाक्त-प्रसार तीन रूपों में प्रसृत होकर स्वतन्त्र को
अस्वतन्त्र बना देता है। वे तीन रूप इस प्रकार हैं—
१. प्रत्ययोद्भव, २. स्वरूप आवरण, ३. पशुवर्तिनी स्थूलक्रिया के रूप का ग्रहण।
इन तीन रूपों को शास्त्रीय शब्दों में क्रमशः पूर्वोक्त आणवमल, मायीयमल और कार्म-
मल कहते हैं।
शाक्त-प्रसर की क्रीडा बराबर चैतन्य की अनुत्तर कोटि 'शिवभाव' से लेकर जड़भाव
की निम्नतमकोटि 'पृथिवीतत्त्व' तक चलती रहती है। शिव से लेकर पृथिवी तक छत्तीस तत्त्व हैं।
इनमें सारा जड़चेतनात्मक विश्व अन्तर्भूत है। अतः प्रस्तुत सूत्रों में से पहले सूत्र के शब्दों से
छत्तीस तत्त्वों का अभिप्राय भी निकलता है।
इन सारी बातों को स्पष्टरूप में समझने के लिये प्रत्येक सूत्र पर अलग-अलग प्रकाश
डालना आवश्यक प्रतीत होता है।
सूत्र ४६—
इस सूत्र में यह समझाया गया है कि बाह्य प्रसार की ओर उन्मुख होते ही शक्ति
'प्रत्ययोद्भव' के रूप में विकसित हो जाती है। विकल्पपरम्परा ही 'प्रत्ययोद्भव' का रूप होता
है। इसका अभिप्राय यह कि शिव की निजी अभिन्न स्वातन्त्र्यशक्ति ज्यों ही मायाशक्ति का
१. जीवकला दो संतानों के रूप में चलती है—१. ज्ञानसन्तान और २. क्रियासंतान।
ज्ञानसंतान में मनस्, बुद्धि और अहंकार ये तीन अन्तःकरण और क्रियासंतान में पांच
ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ और प्राणशक्ति अन्तर्भूत हैं। फलतः 'ज्ञानसंतान' तीन
प्रकार का और 'क्रियासंतान' ग्यारह प्रकार का है। (द्रष्टव्य तन्त्रालोक, ४.१८)

शक्ति और क्रियाशक्ति १५३
रूप धारण कर लेती है त्यों ही उसमें (शिव में) अपनी पूर्णता और स्वतन्त्रता के विषय में
शङ्का उत्पन्न हो जाती है। अपनी स्वतन्त्रता को अन्यथा रूप में समझना ही सबसे पहला
'प्रत्ययोद्भव' है। स्वतन्त्रता की डाँवाडोल परिस्थिति दो रूपों में स्फुरित होती है—(१) स्वतन्त्र
ज्ञातृता की हानि, (२) स्वतन्त्रकर्तृता का अबोध। दूसरे शब्दों में इस प्रकार भी कहा
जा सकता है कि स्वरूप से भिन्न ग्राह्यविषयों की उपलब्धि होते ही स्वतन्त्र आत्मा को अपने
अनात्मविश्वास और अनात्मभूत शरीरादि पर आत्मविश्वास हो जाता है। यही तो सबसे
बड़ा 'प्रत्ययोद्भव' है और यही मौलिक स्वातन्त्र्यहानि है। यही 'आणवमल' कहा जाता है।
प्रत्ययोद्भव के द्वारा स्वातन्त्र्य के संदेह में पड़ने के साथ ही आत्मा की सर्वतोमुखी
अवरोहण-प्रक्रिया का उद्भव हो जाता है। चेतन ही जड़ बन जाता है; परा वाणी ही स्थूल
वैखरी-वाणी का रूप धारण कर लेती है। स्वतन्त्रज्ञातृता और कर्तृता ही संकुचित ज्ञान और
क्रिया बन जाते हैं, इत्यादि। फलतः छत्तीस तत्त्वों का बहिर्मुखीन अवभासन सम्पन्न हो जाता
है। इस सारी प्रक्रिया को सूत्रकार ने 'परामृतरसापाय' की संज्ञा दी है।
अभी ऊपर कहा गया है कि प्रस्तुत सूत्र के शब्दों में, छत्तीस तत्त्वों का अर्थ भी
व्यंग्यरूप में अन्तर्निहित है। संक्षेप में वह इस प्रकार है :—
परामृत—१. अनुत्तर, अविनाशी, सर्वस्वतन्त्र, प्रकाशरूप शिव।
रस—२. शिव की अभिन्न अहंविमर्शमयी स्पन्दशक्ति। (इन दो तत्त्वों में द्वित्व
औपचारिक है। वास्तव में यह एक ही शिवशक्ति-सामरस्य की अवस्था है। इसी को प्रकाश
की प्रधानता से शिव और विमर्श की प्रधानता से शक्ति कहा गया है)।
परामृत—३. सदाशिव-तत्त्व।
४. ईश्वर-तत्त्व।
५. शुद्धविद्या-तत्त्व।
(ये तीन तत्त्व भी 'परामृत' शब्द से ही वाच्य हैं क्योंकि यहाँ तक भी अभेद प्रथा
उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का उल्लास नहीं हुआ होता है। हाँ इन तत्त्वों में पूर्वोक्त उन्मेष-
निमेषात्मक उतार-चढ़ाव से ही पारस्परिक भेद माना जाता है)।
प्रत्ययोद्भव—६. माया-तत्त्व। ९. राग-तत्त्व।
७. कला-तत्त्व। १०. नियति-तत्त्व।
८. विद्या-तत्त्व। ११. काल-तत्त्व।
(ये छः तत्त्व भेदप्रथा को उपजानेवाली तत्त्वरूपा माया का प्रसार-रूप हैं। शास्त्रीय
शब्दों में इनको 'षट्-कञ्चुक' भी कहा जाता है)।
अस्वतन्त्र—१२. पुरुष-तत्त्व।
(षट्-कञ्चुक में फँसा हुआ जीव अथवा शास्त्रीय शब्दों में 'पशु') अब आगे
प्रत्ययोद्भव के विषयभूत तन्मात्रप्रपञ्च अर्थात् जड़ ग्राह्यवर्ग का उल्लेख एक ही शब्द के
द्वारा किया गया है :—