सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 190 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 135

मन्त्रदेवता और चित्त १२५
सौभाग्यशाली को यह मिले, उसके मन में, युगयुगों से संचित और पिंड न छोड़ने वाली
वासनायें, क्षणभर में विगलित हो जाती हैं और वह सहसा पुर्यष्टक के बन्धन से मुक्त होकर
स्वरूप में अवस्थित हो जाता है।
अब प्रश्न यह है कि क्या आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये 'निर्वाण-दीक्षा' संस्कार का
और उसके शास्त्रीय विधि-विधानों का पूरा किया जाना एक अनिवार्य आवश्यकता है ?
सूत्रकार ने इस शङ्का का समाधान मूलसूत्र में शब्दों को एक विशेष ढंग में रखने से ही किया
है। उसने सूत्र के पहले और दूसरे चरण में जहाँ 'अमृतप्राप्तिः' और 'आत्मनो ग्रहः' इन दो
शब्दों के साथ निश्चित रूप से 'एव' शब्द का प्रयोग किया है वहाँ तीसरे चरण में 'निर्वाण
दीक्षा' शब्द के साथ जानबूझ कर 'एव' के बदले 'च' का प्रयोग किया है। ऐसा किये जाने
का विशेष अभिप्राय यह है कि 'निर्वाण-दीक्षा' नामक संस्कार के आश्चर्यजनक महत्त्व की
उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती है परन्तु ईश्वरीय अनुग्रह के लोकोत्तर तौरतरीके मात्र
शास्त्रीय विधि-विधानों के वशवर्ती भी नहीं हैं। जिन महान् आत्माओं पर परमेश्वर का दृढ़
शक्तिपात हो उनको १देवियों ने अर्थात् पारमेश्वरी शक्तियों ने स्वयं अज्ञातरूप में दीक्षित
किया होता है जिसके फलस्वरूप उनके मन में सांसिद्धिक रूप में सत्-तर्क (शुद्धविद्या) का
उदय होता है। फलतः जिन व्यक्तियों को किसी भी अचिन्त्य या अज्ञात प्रकार से मन्त्रवीर्य
की अनुभूति हो जाये तो वही उनके लिये निर्वाण-दीक्षा होती है, भले ही २घी के दीये
जलाकर और सामग्री के भण्डार जला कर संस्कार के शास्त्रीय विधि-विधानों को पूरा करने
का आडम्बर न भी रचाया गया हो।
श्रीमत् सोमानन्दाचार्य, श्रीमद् उत्पलाचार्य या श्रीमद् अभिनवगुप्ताचार्य जैसे शैवदर्शन
के उद्भट और वरिष्ठ सिद्धों का इस बात पर मतैक्य है कि आत्मशक्ति का प्रत्यभिज्ञान चाहे
किसी भी ३प्रमाण से, शास्त्रों के अध्ययन, गुरुओं के उपदेश से या अन्य किसी अदृश्य प्रकार
से यदि हो गया तो हो गया, फिर सारे उपायजालों या निर्वाणदीक्षा जैसे संस्कारों के शास्त्रीय
विधि-विधानों का काई प्रयोजन अवशिष्ट नहीं रहता है। एक बार यह ज्ञान हो गया कि
अमुक पदार्थ खरा सोना है तो उसको परखने के लिये कसौटियों पर घिसने की आवश्यकता
नहीं रहती है ॥३१-३२॥
इति श्रीकल्लटाचार्यविरचितायां स्पन्दकारिकावृत्तौ 'सहजविद्योदयो'
नाम द्वितीयो निःष्यन्दः ॥२॥
श्रीमान् कल्लटाचार्य के द्वारा विरचित 'स्पन्दकारिकावृत्ति' का
'सहजविद्योदय' नामक दूसरा निःष्यन्द समाप्त हुआ ॥
१. तत्र आयातदृढशक्तिपाताविद्धस्य स्वयमेव सांसिद्धिकतया सत्तर्क उदेति,
योऽसौ देवीभिः दीक्षित इति उच्यते। (तं० सा०, २३ पृष्ठ)
२. एवं यो वेद तत्त्वेन तस्य निर्वाणदायिनी ।
दीक्षा भवत्यसंदिग्धा तिलाज्याहुतिवर्जिता ॥ (प० त्रि०, २५)
३. द्रष्टव्य शिवदृष्टि आह्निक ७ और तंत्रालोक आह्निक २.