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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व मंगलाचरण

समर्पण
आदरणीय सद्-गुरु
भगवत्पाद श्री स्वामी ईश्वर-स्वरूप को,
जिनकी पवित्र प्रेरणा से प्रस्तुत आंतरिक संकल्प
बाह्य साकारता को प्राप्त कर सका है।

भगवत्पाद ईश्वरस्वरूप जी महाराज
(लक्ष्मण जी ब्रह्मचारी)

प्रात: स्मरणीय ईश्वर-स्वरूप जी महाराज का आशीर्वाद
श्री वसुगुप्ताचार्य के प्रधान शिष्य श्री भट्ट-कल्लट की स्पन्द-वृत्ति का हिन्दी
अनुवाद, जिसे श्री गुरुटू जी ने अति प्रयास से किया है, देखकर हमारा मन अति
प्रसन्न हुआ। स्पन्द-शास्त्र का विषय स्वभावतः अति गहन है। स्पन्द उस निर्विकल्प
स्थिति को कहते हैं, जिसमें सारा विश्व त्वरितगति से चलायमान होने पर भी
सामान्य अस्पन्दरूपता में ही अवस्थित है। विशेष-स्पन्द तो भेददृष्टि से देखने में
आता है किन्तु सामान्य-स्पन्द की भित्ति पर ही वह विशेष-स्पन्द की स्थिति आधारित
है। यह सामान्य-स्पन्द अन्तरातमा की वह दशा है जिसमें सभी गति, स्वरूप में
ही होती रहती है, अतः इसे अस्पन्द-रूप स्पन्द यदि कहें तो अत्युक्ति न होगी।
श्री गुरुटू जी ने हमें अपना अनूदित ग्रन्थ दिखाया। इन्होंने अपने गहन
शैव-संप्रदाय के ग्रन्थों का अध्ययन करने के उपरान्त यह अनुवाद किया है। इसमें
सभी शैवी गुत्थियों को सुलझाया गया है। शैव सिद्धान्त के प्रेमियों के सम्मुख यह
नवीन ग्रन्थ उनकी बरसों की पिपासा को शान्त करेगा—ऐसी धारणा है। ऐसा
सुन्दर ग्रन्थ हिन्दी भाषा प्रेमियों के लिए अति उपयोगी सिद्ध होगा। हमारा
हार्दिक आशीर्वाद है कि श्री गुरुटू जी आगे भी शैवी ग्रन्थों का इसी प्रकार का
अनुवाद करके संस्कृत से अनभिज्ञ हिन्दी-प्रेमियों को लाभान्वित करेंगे। ऐसा
यदि होगा तो उनका प्रयास सफल सिद्ध होगा।
लक्ष्मण जी ब्रह्मचारी,
गुप्त गंगा, काश्मीर
२१ अक्तूबर १९७६

CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
स्वामी मुक्तानन्द
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal