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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

सूत्र—(जिस प्रकार) दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी, किसी अशक्य कार्य को (आवेश

१३४ स्पन्दकारिका
अनुवाद
सूत्र—(जिस प्रकार) दुर्बल शरीर वाला व्यक्ति भी, किसी अशक्य कार्य को (आवेश
के द्वारा कर डालने की परिस्थिति में) अलक्ष्य आत्मबल की प्रेरणा से निष्पन्न कर लेता है,
साथ ही अत्यन्त क्षुधित होने पर (परिस्थिति वश) अपनी क्षुधा को दबा भी लेता है। (उसी
प्रकार) परिपक्व योगी शरीर के अत्यन्त निबंल होने पर भी, स्पन्दात्मक आत्मबल पर आरूढ़
होकर बड़े बड़े दुष्कर काम सहज ही में कर लेता है और अत्यन्त भूखा होने पर अपनी
१क्षुधा को (अभिलषित अवधि तक) नियन्त्रण में भी रख लेता है ॥३८॥
वृत्ति—जिस प्रकार कोई निर्बल व्यक्ति अपने उद्योग-बल का आश्रय लेकर लगातार
व्यायाम करने से महान् शारीरिक बल को (दुबले पतले शरीर के द्वारा भी भारी कामों को
करने की शक्ति) प्राप्त कर लेता है ।
उसी प्रकार योगी २क्षीणधातु होने पर भी, उत्साह के रूप में अभिव्यक्त होने वाले
आत्मबल को वश में लाकर, दुष्कर कामों को करने की ओर प्रवृत्त हो जाता है। इसके
अतिरिक्त वह इसी स्वभाव का निरन्तर अनुशीलन करने से, अत्यन्त क्षुधित होने की अवस्था
में, अपनी क्षुधा को (स्वतन्त्रता से) दबा भी लेता है। इन सारी बातों का मात्र कारण यही
है कि स्वरूप में सर्वत्र कार्यों और उनके कारणों को सत्ता प्रदान करने का सामर्थ्य प्रकट
होने में देर नहीं लगती है ॥३८॥
सूत्र—जहाँ यह एक तथ्य है कि जिस किसी भी सर्वसाधारण शरीर में (जड़ पाञ्च-
भौतिक काया में) यह चेतयिता स्पन्दतत्त्व अधिष्ठित हो, उसमें (तदनुकूल देश, काल और
आकार की परिधि में) सर्वज्ञता इत्यादि धर्म अभिव्यक्त होते हैं, वहाँ यह बात भी
३सुनिश्चित है कि (देहाभिमान से हटकर) सीधा उस आत्म-तत्त्व को ही अहंरूप में अनुभव
करने वाले योगी में, सार्वत्रिक सर्वज्ञता इत्यादि धर्म अवश्य अभिव्यक्त हो जाते हैं ॥३९॥
वृत्ति—जहाँ यह एक तथ्य है कि इस चेतयिता स्वभाव के द्वारा अधिष्ठित सर्व-
साधारण जड़ शरीर में भी (तदनुकूल देश, काल और आकार की सीमा में) सर्वज्ञता इत्यादि
धर्म विद्यमान होते हैं जिनसे वह (जड़ शरीर) एक छोटी सी जूँ के दंश को भी तत्काल ही
अनुभव कर लेता है, वहां यह भी निश्चित है कि उस स्वरूप में ही अवहित अर्थात् पूर्णतया
अधिष्ठित रहने वाले योगी में सार्वत्रिक (सारे भुवनों में समान रूप से कार्यक्षम) सर्वज्ञता
अवश्य अभिव्यक्त हो जाती है ॥३९॥
१. यहाँ पर 'क्षुधा' शब्द सारे देहधर्मों का प्रतीक है अतः सूत्र का तात्पर्य यह है कि योगी
को क्षुधा, निद्रा, स्त्रीचिन्ता इत्यादि देहधर्म विचलित नहीं कर सकते हैं ।
२. बुढ़ापा अथवा रोग जैसे कारणों से जिसके शरीर में धातुओं की कमी हो गई हो ।
३. सूत्र में उल्लिखित 'भविष्यति' क्रिया में प्रयुक्त लुट् लकार निश्चय को ध्वनित
करता है ।

CC-0. Pगलानि और उसका निवारण by eGangotri १३५
विवरण
बहुधा ऐसा देखने में आता है कि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में अत्यन्त निर्बल शरीर
वाले व्यक्ति भी अल्पकालावस्थायी आवेशों के बल से ऐसे दुष्कर काम कर डालते हैं जो
सर्वथा उनकी शक्ति से बाहर होते हैं । उदाहरण के तोर पर जहाजों पर काम करनेवाले
और साधारण मानव शरीरों को ही धारण करनेवाले नाविक अकस्मात् उठनेवाले प्रलयंकर
सामुद्रिक तूफानों में, अथवा रणभूमि में लड़नेवाले साधारण सिपाही प्रबल शत्रुओं के प्रचण्ड
एवं आकस्मिक आक्रमणों में, कभी कभी ऐसे अभूतपूर्व कार्य कर डालते हैं कि बुद्धि चक्कर
में पड़ जाती है । आमतौर पर ऐसी अवस्थाओं को 'आवेश' का नाम देकर ही संतोष किया
जाता है परन्तु यह देखना है कि 'आवेश' क्या वस्तु है ? आवेश, किसी भी जीवित प्राणी
में, किसी विशेष क्षण पर अकस्मात् प्रकट होने वाली एक ऐसी दुर्दान्त और प्रवलवेगी वृत्ति
होती है जिससे कि उसके मानसिक क्षेत्र में और उसके द्वारा शरीर के प्रत्येक
भाग में भी किसी अलक्ष्य शाक्त-प्रेरणा का तीव्र संचार हो जाता है । शाक्त-प्रेरणा कहीं
बाहर से नहीं आती है अपितु यह प्रत्येक प्राणी के अन्तर्हृदय में विद्यमान असाम आत्मशक्ति
के स्पर्शमात्र का परिणाम होती है। इस सम्बन्ध में यह बात बिल्कुल अनुभव सिद्ध है कि
आवेशात्मक क्षणों पर प्रत्येक प्राणी तत्काल पर्यन्त अपने देहाभिमान को पूर्णतया भूल कर
विशुद्ध शाक्त-स्वरूप पर अवस्थित होता है। यही कारण है कि वह शरीर के क्षीण होने
पर भी दुष्कर कार्यों को झोंक में निष्पन्न कर लेता है।
साधारण प्राणिवर्ग में पाया जाने वाला आवेश पूर्ण-आवेश नहीं कहा जा सकता क्योंकि
यह मौलिक आत्मबल का नगण्य स्पर्शमात्र होता है। यही कारण है कि साधारण जीवभाव
में ऐसी आवेशात्मक अवस्थायें क्षणपर्यवसायी होती हैं ।
योगियों के विषय में बात कुछ भिन्न होती है। उनका 'अहं' अभिमान शरीर,
प्राण इत्यादि पर नहीं प्रत्युत सीधा आत्मा पर ही होता है। अतः उनको शाक्त-बल का
स्पर्शमात्र ही नहीं अपितु पूर्ण-समावेश ही हुआ होता है। ऐसी परिस्थिति में यदि उनकी
सर्वज्ञता और सर्वकर्तृता इत्यादि सार्वत्रिक और सार्वकालिक हो तो इसमें आश्चर्य की कोई
बात नहीं है । भगवान् रामचन्द्र के प्रिय दूत मारुति का समुद्रलंघन भी तो एक ऐसा ही
शाक्त-समावेश था ।
फलतः साधारण प्राणियों में विद्यमान ज्ञान-क्रियात्मक स्पन्दना उनके शरीरों के
अनुकूल देश, काल एवं आकार की परिधि तक ही सीमित रहती है जबकि परिपक्व योगियों
की स्पन्दना देश, काल आदि के प्राचीरों को तोड़कर विश्वव्यापिनी हुआ करती है ॥३८-३९॥
[ ग्लानि और उसका निवारण ]
अगले दो सूत्रों में यह बात समझाई जा रही है कि ग्लानि अर्थात् मानसिक शिथिलता
या उदासीनता ही आधि-व्याधियों की जन्मदात्री है । वह स्वयं अज्ञान से उत्पन्न हो जाती
है । उन्मेष से अर्थात् अज्ञान का समूल उच्छेद हो जाने से वह और तज्जन्य आधि-व्याधियाँ
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal