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स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)

Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary

महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished190 पृष्ठ

प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४७
ब्राह्मी इत्यादि आठ प्रकार के विकल्परूप शक्ति-परिवार का रूप धारण करके, प्रत्येक वर्ग की
एक एक अधिष्ठात्री देवी के रूप में अवस्थित रहती है। इन शक्तियों का प्रधान काम यह है
कि ये अपने वास्तविक चित्-रूप को चारों ओर से घेरकर उसको आड़ में रखती हैं। परिवार
वही होता है जो अपने जन्मदाता को चारों ओर से घेरकर बैठता हो। १ब्राह्मी इत्यादि
शक्तियों का परिवार भी पशुभूमिका पर अपनी ही जन्मदात्री चित्-शक्ति को घेरकर इस
प्रकार बैठा रहता है कि सर्वसाधारण जीवों को उसका (चित्-शक्ति का) आभास भी नहीं
मिलता है। फलतः आठ शक्तियों के परिवार को 'मातृका' कहते हैं।
मातृका शक्ति के उपर्निर्दिष्ट बहिर्मुखीन प्रसार की प्रक्रिया का लेखा-जोखा भगवान्
शङ्कर ने स्वयं प्रस्तुत किया है।
प्रकाशरूप शिव और विमर्शरूपा शक्ति की सामरस्य अवस्था ही सारे विश्व की
आत्मभूत और आधारभूत सत्ता है। इस सत्ता का स्वरूप केवल महामन्त्ररूप 'अहं-विमर्श' ही
है। 'अ' २अर्थात् अनुत्तर-तत्त्व और 'ह' अर्थात् अनाहत-शक्तितत्त्व की संपुट-दशा अर्थात्
प्रत्याहार-दशा ही 'अहंता' है। उसके गर्भ में सारी शब्दराशि, मोर के अण्डरस के न्याय से,
भेदरहित अहंवरूप में ही अवस्थित है। पारिभाषिक शब्दों में इसी को 'परा वाणी' कहते हैं।
स्थूल वाच्यवाचकमय विश्व का अवभासन करने की ओर उन्मुख होने की दशा में यह अहंवरूपा
विमर्शशक्ति 'इच्छाशक्ति' का रूप धारण कर लेती है। अनन्तर ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति—
इन दो रूपों में अङ्कुरित हो जाती है। इन दो रूपों में अङ्कुरित होते ही वह मायापदवी
पर उतरकर स्वयं उत्पादित अनन्त उपाधियों के रंगों से, अपने को ही रंगकर, न जाने कितने
अतर्क्य रूपों में प्रसूत होती है। इसी बहिर्मुखीन प्रसार प्रक्रिया में वह मातृका का रूप धारण
करके दो ३प्रकार, नव प्रकार और पचास प्रकार के भेदों में विभक्त हो जाती है। इन भेदों
का लेखा-जोखा इस प्रकार है।
दो प्रकार के भेद ४बीज और योनि—'अ' से 'अः' तक के सारे स्वरसमुदाय को 'बीज'
और 'क' से 'क्ष' तक के सारे व्यंजन-समुदाय को 'योनि' कहते हैं। ५बीज से शिवभाग और
१. एतदेव च ब्राह्म्यादिमातृणां मातृत्वं यत्तस्य परिवारभावेन तिष्ठन्ति, विकल्पा हि
चिद्रूपस्य जीवस्य परितो वारणात् परिवार एव, मातृशब्दो ह्यत्र परिवारवाच्येव न
जननीवाचकः। (ई० प्र० भा०, २.१.१)
२. अत एव प्रत्याहारयुक्त्या अनुत्तरानाहताभ्यामेव शिवशक्तिभ्यां गर्भीकृतम्, एतदात्मकमेव
विश्वम्, इति महामन्त्रवीर्यात्मनोऽहंविमर्शस्य तत्त्वम् । (शिवसूत्रवि०, २.७)
३. तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते ।
द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ॥ (मा० वि०, ३. ९-१०)
४. बीजयोन्यात्मकाद् भेदाद् द्विधा बीजं स्वरा मताः ।
कादिभिश्च स्मृता योनिः........................... ॥ (मा० वि० ३. १०-११)
५. यद् बीजं तत्र शिवः शक्तियोंनिरित्यभिधीयते ॥ (तत्रैव, ३. १२)

१४८ स्पन्दकारिका
योनि से शक्तिभाग का अभिप्राय है। व्याकरण में वर्णित संस्थानता के नियम से दोनों एक
दूसरे में अन्तर्निहित हैं।
नव¹ प्रकार के भेद
१. अवर्ग 'अ' से 'अः' तक (अमा)
२. कवर्ग 'क' से 'ङ' तक (कामा)
३. चवर्ग 'च' से 'ञ' तक (चार्वङ्गी)
४. टवर्ग 'ट' से 'ण' तक (टङ्कधारिणी)
५. तवर्ग 'त' से 'न' तक (तारा)
६. पवर्ग 'प' से 'म' तक (पार्वती)
७. यवर्ग 'य' से 'व' तक (यक्षिणी)
८. शवर्ग 'श' से 'ह' तक (शारिका)
९. क्षवर्ग 'क्ष' (अनुत्तर एवं अनाहत के संघट्ट को
अभिव्यक्त करनेवाला कूटबीज)
वर्गभेद के विषय में यह बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वास्तव में वर्णसमाम्नाय
के १ से ८ तक के ही वर्ग मुख्य हैं। 'क्ष' को मात्र औपचारिकता से ही एक पृथक् वर्ग में
रखा गया है, क्योंकि इसका अन्तर्भाव 'क' और 'स' के रूप में पहले ही आठ वर्गों में हो
जाता है। इन दो वर्णों का संयुक्त-रूप होने के कारण यह स्वयं कोई स्वतन्त्र वर्ण नहीं है।
इसको अलग वर्गरूप में रखने का कारण केवल इतना है कि यह अनुत्तर वाचक 'ककार' और
विसर्गवाचक 'सकार' का संयुक्तरूप एक ²कूटबीज है जो कि इस बात को अभिव्यक्त करता
है कि मातृका का प्रत्येक वर्ण, शिवभाग और शक्तिभाग का संघट्टरूप है। यही कारण है कि
इसको शब्दराशि के अन्त में रखा गया है।
पचास प्रकार के भेद—शब्दराशि के ³प्रत्येक अक्षर को अलग-अलग शक्तिरूप मानकर
सोलह स्वरों और चौंतीस व्यंजनों के रूप में पचास भेदों की कल्पना की गई है।
वर्णसमाम्नाय के आठ वर्ग वास्तव में भेदभूमिका पर अवतीर्ण विमर्शशक्ति के ही आठ⁴
रूप हैं। इनके नाम इस प्रकार हैं—'माहेशी, ब्राह्मी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री, याम्या,
चामुण्डा और योगेशी'।
इन आठ शक्तियों को पारिभाषिक शब्दों में 'पीठेश्वरियाँ' कहते हैं। इनकी क्रिया
द्विमुखी है। साधारण पशुओं के लिए ये प्रतिक्षण अधिकाधिक विकल्प-परम्पराओं को जन्म
१. नवधा वर्गभेदतः ॥ (तत्रैव)
२. तदियत्पर्यन्तं यन्मातृकायास्तत्त्वं तदेव ककार-सकारप्रत्याहारेण, अनुत्तरविसर्गसंघट्टसारेण
कूटबीजेन प्रदर्शितमन्ते। (शिवसूत्रवि०, २.७)
३. प्रतिवर्णविभेदेन शतार्धकिरणोज्ज्वला। रणोज्ज्वला। (मा० वि०, ३. ११)
४. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम्। (मा० वि०, ३. १२)

ब्राह्मी आदि शक्तियाँ १४९
देती रहती हैं। ये अतीव भयानक हैं और ब्रह्मरंध्र में वर्तमान चित्-शक्ति को आड़ में
रखकर, अनन्त प्रकार के स्थूल, अर्थात् वाणी के द्वारा अभिलापात्मक और सूक्ष्म, अर्थात्
मानसिक संकल्प-विकल्पात्मक वाचकों और वाच्यों के इशारों पर, अज्ञानी जीवों को न जाने
कितने और कैसे नाच नचती¹ रहती हैं।
दूसरी ओर जिन भाग्यशाली पुरुषों में ईश्वरीय अनुग्रह से सद्विवेक का उदय हुआ हो
उनको ये इसी शब्दराशि में अन्तर्निहित शाक्तबल की अनुभूति करवा कर शिवभाव पर
पहुँचाने में पथप्रदर्शन भी करती हैं। आखिरकार वाणी ही मनुष्य को मार भी लेती है और
तार भी लेती है।
मातृका-शक्ति के ये उपर्युक्त आठ भेद केवल विषय को सुगम बनाने के लिये
प्रधानरूप में स्वीकारे गये हैं। वस्तुस्थिति तो यह है कि संसार में प्रतिक्षण वाच्यवाचकात्मक
विकल्प-परम्पराओं की जितनी भी अगणित श्रृंखलाओं की अनन्त कड़ियाँ प्रसर में आती हैं,
वे तो शक्ति के ही अनन्त रूप हैं। अतः उनको यथावत् रूप में गिना नहीं जा सकता है।
यह अनन्त प्रकार का शक्तिवर्ग भिन्न-भिन्न प्रकृतिवाले प्रमाताओं को भिन्न-भिन्न
प्रकार की प्रतिक्रियाओं का विषय बना लेता है। साधारणतया तीन गुणों के आधार पर प्रकृति
तीन प्रकार की हैं अतः शास्त्रकारों ने तदनुकूल ²कार्यभेद के अनुसार इस शक्तिवर्ग के भी
तीन रूप स्वीकार किये हैं। इनका विवरण इस प्रकार है :—
१. ³घोरतरा (अपरा)—प्रधानतया तामसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तिवर्ग
का रूप महान् भयानक है। यह उनको प्रतिसमय केवल कनक-कामिनी अथवा दूसरे प्रकार
के सांसारिक विषयोपभोग की वारुणी पिला-पिला कर अचेत बना देता है और निरन्तर
अधोगति की निचली सीढ़ी की ओर लुढ़काता रहता है।
२. ⁴घोरा (परापरा)—प्रधानतया राजसिक प्रकृतिवाले पशुवर्ग के लिये शक्तियों का
रूप घोर अर्थात् भयानक ही है परन्तु घोरतर रूप जैसा भयंकर नहीं है। अभिप्राय यह कि
इस स्तर पर अवस्थित व्यक्ति पर, यदि ईश्वरीय अनुग्रह हो तो वह अपना उद्धार भी कर
सकता है। घोरा शक्तियाँ पशुओं के मन में मिश्रित (शुभ एवं अशुभ) कर्मफलों के प्रति आसक्ति
उत्पन्न करती हैं और साधारणतया उनके लिये मुक्ति का द्वार बन्द ही रखती हैं।
१. करन्ध्रचितिमध्यस्था ब्रह्मपाशावलम्बिकाः।
पीठेश्वर्यो महाघोरा नर्तयन्ति मुहुर्मुहुः ॥ (तिमिरोद्घाट, शिवसूत्र, १.१४ में उदाहृत)
२. अनन्तस्यापि भेदस्य शिवशक्तेर्महात्मनः।
कार्यभेदान्महादेवि ! त्रैविध्यं समुदाहृतम् ॥ (मा० वि०, ३.३०)
३. विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् ।
रुद्राणून् या समालिङ्ग्य घोरतर्योऽपराः स्मृताः ॥ (मा० वि०, ३.३१)
४. मिश्रकर्मफलासक्तिं पूर्ववज्जनयन्ति याः ।
मुक्तिमार्गनिरोधिन्यास्ताः स्युर्घोराः परापराः ॥ (तत्रैव, ३.३२)

१५० स्पन्दकारिका
CC-0.In Public Domain. Digitization by eGangotri
३. १अघोरा (परा)—अनुभूतिशील एवं सात्त्विक प्रकृतिवाले योगियों के लिये शक्तिवर्ग
का रूप अघोर अर्थात् अतीव सौम्य एवं कल्याणकारी है। जिस प्रकार यह राजसिक या
तामसिक प्रकृतिवाले व्यक्तियों को तदनुकूल कर्मफलों की ओर प्रेरित करती हैं उसी प्रकार
योगियों को शिवभाव पर पहुँचा देती हैं।
अब सूत्र में उल्लिखित 'कलासमूह' के विषय में भी दो शब्द कह देना आवश्यक है।
अन्तर्विमर्श की अवस्था में अ, इ, उ, ऋ, लृ—ये पाँच मूल-स्वर क्रमशः चित्, निर्वृत्ति, इच्छा,
ज्ञान और क्रिया—इन पाँच माहेश्वर शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। २बहिर्विमर्श की
अवस्था में इन्हीं पाँच मूल स्वरों की अवतारणा क्रमशः कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग
के रूप में होती है। इन्हीं ककार आदि अक्षरों को पारिभाषिक शब्दों में 'कलासमूह' कहते हैं
क्योंकि ये कलातत्त्व, विद्यातत्त्व इत्यादि मायीय प्रपञ्च का प्रतिनिधित्व करते हैं।
शास्त्रों में कलासमूह की परिगणना स्वरवर्ग को अलग छोड़कर 'क' वर्ण से आरम्भ
करने का अभिप्राय यह है कि जब स्वर और व्यंजन पारस्परिक संमिश्रण की अवस्था में पड़
जाते हैं तभी विकल्प परम्पराओं का क्षोभ उत्पन्न हो जाता है, अन्यथा केवल स्वर या केवल
व्यंजन अलग अलग किसी क्षोभ को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं। इन दोनों के पारस्परिक
संमिश्रण को शास्त्रीय शब्दों में बीजयोनि-संक्षोभ कहते हैं।
इस सारे प्रसङ्ग का निष्कर्ष यही निकलता है कि प्रत्येक शब्द केवल एक जड़ ध्वनि-
मात्र ही नहीं, अपितु स्पन्दमयी चेतना शक्ति है। प्रत्येक जीव तबतक इस शक्ति का दास है
जबतक उसे अपने भोक्तृभाव की अनुभूति प्राप्त न हो ।।४५।।
[ शक्ति का अवरोह और आवरणात्मक स्वभाव और क्रियाशक्ति के दो रूप ]
अगले तीन सूत्रों में इस तथ्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है कि स्वतन्त्र आत्मा में
पूर्वोक्त स्वशक्ति-अज्ञान 'प्रत्ययोद्भव' के रूप में प्रकट हो जाता है। 'प्रत्ययोद्भव' ही त्रिविध
मल है। इसी से शिव, शिवभाव से अवतीर्ण होकर, जड़ भाव की अन्तिम कोटि पृथिवीतत्त्व
तक पहुँच जाता है—
परामृतरसापायस्तस्य यः प्रत्ययोद्भवः ।
तेनास्वतन्त्रतामेति स च तन्मात्रगोचरः ॥४६॥
परामृतरसात् स्वरूपात् अपायः प्रच्युतिः, तस्य यः प्रत्ययोद्भवो विषयदर्शने
स्मरणोदयो यतः, तेन पुरुषोऽस्वतन्त्रताम् असर्वगत्वं च प्राप्नोति, स च प्रत्ययः तन्मात्र-
गोचरो रूपाद्यभिलाषात्मकः ॥४६॥
१. पूर्ववज्जन्तुजातस्य शिवधामफलप्रदाः ।
पराः प्रकथितास्तज्जैरघोराः शिवशक्तयः ।। (तत्रैव, ३.३३)
२. बहिर्विमर्शेन तु कादिमान्तं पञ्चपञ्चकं अ, इ, उ, ऋ, लृ
शक्तिभ्यः पुरुषतत्त्वं समस्तं प्रपञ्चयति । (शिवसूत्रवि०, ३.७)