सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
सत्रहवीं पुतली १७. (१११)
सत्रहवीं पुतली १७. (१११)
इसतरहसे पांच, सात दिन राजा विक्रमादित्य वहां रहा. बाद
उसके एक दिन हाथ जोडकर कहा कि-पृथोनाथ ! मुझे बिदा
कीजिये. अब मै अपने नगरमें जाउं और वहां बैठ आपका
गुण गाउं तब शेषजीने हँसकर कहा कि-राजा ! अब तुम्हे घर
जानेकी इच्छ हुई है सो तुम्हारे वास्ते कुछ प्रसाद हम
देतेहैं तुम लेते जाओ. यह कह चार लाल मंगवाकर राजा
विक्रमको दिये और उनका गुण कहनेको लगे कि-इस
एक रत्नका यह स्वभाव है कि, जितना गहना तुम चाहोगे सो
यह तुम्हें देगा. और क्षणभर देते विलंब न करेगा. और दुसरे
लालका ऐसा स्वभाव है कि, हाथी, घोडे, पालकिया जितनी
तुम मागोगे उतनी इसके पाओगे. और तीसरे लालका यह
स्वभाव है कि, तुम जितनी लक्ष्मी चोहो तुमको उतनीही हय
देगा. और चौथे रत्नका यह प्रभाव है कि, हरीभजन और सत्कर्म
करनेकी जितनी मनमें इच्छा रखोगे उतनी यह पुरी करेगा-
इस तरह चारों लालोके गुण राजाको समझाकर कहे और
बिदा किया. राजा हाथ जोडकर खडा हो कहने लगा-महाराज !
मैं आपके गुणको उपमा नहीं दे सकता हूं पर आप मुझे दास
समझकर कृपा रखियेगा. यह कहकर राजा वहांसे रुखसत
हुआ. और अपने बैतालोंको बुलाकर उनपर सवार हो अपने
घरको आया. जब कोश एक चार रहा तो बैतालोंको
( ११२ ) सिंहासनबत्तीसी.
छाड राजा पाओं पाओं शहरको चला तो देखता क्या है कि
एक दुर्बल भूखा ब्राह्मण चला आता है. जब वह पास आया
तब उनसे कहा कि-राजा ! मैं भूखा ब्राह्मण हूं कुछ मुझे
भिक्षा दो तो मैं जाकर अपने कुटुंबको पालूं. यह सुनते राजा
चिंता कर अपने मनमें कहने लगा कि-इस ब्राह्मणको इसमेंसे
एक लाल दूं यह विचार कर ब्राह्मणसे कहा कि-देवता ! इस
बखत मेरे पास चार रत्न हैं और उन चारोका एक एक गुण
है इस वास्ते जो तुम इनमेंसे चाहो वह मैं तुम्हें दूंगा, तब
ब्राह्मणने कहा-पहले अपने घर हो आऊं तब तुमसे कहूं यह
कहकर ब्राह्मण अपने घर गया और राजा वहां खडा रहा
वह घरपे जाकर अपनी स्त्री पुत्र और पुत्रकी स्त्रीसे कहने
लगा कि, उन चारों लालोका यह ब्यौरा है. तब उन
तीनोंसे ब्राह्मणी बोली कि-स्वामी ! तुम वह लाल लो कि,
जो लक्ष्मी देता है सो, और ख्याल मनमेंसे उठादो; क्योंकि
लक्ष्मीसे मिलते हैं सहाय और लक्ष्मीसे होते हैं सब उपाय.
धर्म, ज्ञान, नेम पुण्य. दान यह सब लक्ष्मीसेही होते हैं. इससे
तुम और तरफ चित्त मत डुलाओ और जाकर लक्ष्मी लेआओ.
फिर उसका पुत्र बोला-लक्ष्मी किस कामकी है ? जो साथ
सामान न हो और जो सामान हो तो राजा कहावे, और
सब कोई शीर नवावे. सामान हो तो दुर्जन डरे और संसारमें