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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

[शीर्षक] सातवी पुतली ७. (५५)

[शीर्षक] सातवी पुतली ७. (५५)

डीसी बात है इसके वास्ते तू क्या रोतीहै ? उससे जवाब दिय
कि, मुझे यह थोडी बहुतही है. तब राजा बोला-मेरे कांधेपर
चढ उसे खिलादे. तब वह कंकालिन राजाके कांधेपर चढी,
उस शूलीपर चढ जो टेंगाथा उसे खवाने लगी. तब रक्त
राजाके बदनपर गिरन लगा. राजाने मनमें सोचा कि, यह कोई
और है। यह मनुष्य नहीं इसने मुझे धोखा दिया. तब अपने जीमें
राजाने सोचकर पूंछा कि, कह सुंदरी ! तेरा पिया भोजन करता
है कि नहीं ? तब कंकालिन बोली-रुचिसे खा चुका, अब
इसका पेट भरगया. इसवास्ते मुझे कांधसे उतार. जब हेठ
उतरी तब राजाने कहा उसने चाहसे खाया ? तब कंकालिन हंस-
कर बोली-तू मांग जो मुझे चाहिये होय ? मैं तुझसे बहुत खुश
हुई. मैं कंकालिन हूं अपने जीमें मुझसे मत डर. तब वह बोला-
मैं तुझसे क्या डरूंगा और क्या मागूंगा ? तैंने तो मईको मेरे
कांधपर चढ खवाया सो तू मुझे क्या देगी ? वह फिर बोली
कि-राजा ! तू इसके ख्यालमें मत पड़ कि, मैंने क्या किया और
क्या न किया ? जो तुझे इच्छा होय सो मांगले. राजाने
हंसकर कहा कि-अन्नपूर्णा मुझे दो और जगत्में यश लो. वह
बोली-अन्नपूर्णा मेरी छोटी बहन है. तू मेरे साथ चल मैं तुझे
दूंगी. इस तरह आपसमें दोनो वहांसे बचन कर चले. आगे २
कंकालिन पीछे पीछे राजा नदीके किनारे जा पहुंचे वहां
एक मंदिर था, उसके द्वारे कंकालिनने ताली मारी और अन्नपू-

र्गाने प्रकट होके उससे कहा कि-यह भूपाल कौन है? वह
बोली कि-यह राजा विक्रम है इसने मेरी सेवा की है. और
मैंने इससे वचन हारा है अगर मेरी मोहब्बत तेरे दिलमें हो
तो अन्नपूर्णा इसे दे. तब हंसकर उसने राजाको एक थैली दी.
और कहा कि-इसमेंसे जितनी खानेकी चीज तुम मागोगे उतनी
पाओगे. तब राजाने हाथ फैला लेली. और वहांसे खग हो
नदीके किनारे आन स्नान ध्यान कर निश्चिन्त हुआ कि इतनेमें
एक ब्राह्मण वहां आन पहुंचा. उसको राजाने पास बुलाया
और कहा कि-कुछ भोजन करोगे? उसने कहा-मुझे भूख लगी
है, जो आप देओगे तो मैं खाऊंगा! राजा बोला-क्या खाओगे?
किस चीजपर तुम्हारी रूरत है? तब ब्राह्मण बोला-इस वखत
मिले तो पकवान खाऊंगा. राजा अपने मनमें सोचने लगा:-
जो इसदम पकवान न पहुँचेगा तो मैं ब्राह्मणसे झूठा हूगा.
इतनी बात मनमें बिचार थैलीमें हाथ डालकर जो निकाला
तो देखा कि पकवानही निकला. ब्राह्मणने पेट भरकर खाया
और बोला-महाराज! भोजन तो मैं किया, अब इसकी दक्षि-
णाभी दीजिये. तब राजाने कहा-महाराज! आप जो दक्षिणा
मांगोगे सो मैं दूंगा, ब्राह्मण बोला-यह थैली मैं दक्षिणा पाऊ
तो आनंदसे अपने घर जाऊं थैली ब्राह्मणको देकर राजा
अपने महलमें आया. इतनी कथा कहकर वह राजा भोजसे