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सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

बीसवीं पुतली २० (१२५)

बीसवीं पुतली २० (१२५)
तरह चंद्र सूर्य आते जाते हैं उसी तरह मनुष्यका जीना मरना
है. जैसे कोई सपनेमें कौतुक देखता है वैसा ही जगका रूप
नजर आता है. और मनुष्यदेह धरके अनेक दुःख भोग करते हैं.
पर सुख यह है कि, जो हरीभजन हो. इतना ज्ञान राजा अपने
जीमें विचार वहाँसे उठ अपने मंदिरमें गया. रात जैसी तैसी
काटी, प्रभात होते ही फिर वहां आन मौजूद हुआ और पुत-
लियोंसे पूंछा कि अब मैं क्या करूं ? तुम मुझे कहो. तब. चंद्र
ज्योति नामवाली-
बीसवीं पुतली-
कहने लगी-महाराज ! मै समझाकर कथा आपके आगे कहता हूं.
एक दिन राजा बीर विक्रमादित्यने खुश होकर रासमंडलीके प्रधानको
आज्ञा दी कि यह कार्तिकमहीना धर्मका महीना है. इसमें कुछ हरिका
भजन मन लगाकर करना चाहिये शरदपूनो ठाकुरकी रास
लीला करो. प्रधानने राजाकी आज्ञा पाय देश देखके राजा
और पंडितोंको न्योता भेज बुलाया और जितने नगरके योगी थे उन
कोभी खबर दे तलब किया. और जितने देवता थे उनकोभी मंत्रोंसे
आवाहन करके बिठलाया, रास होने लगा. चारों ओरसे जगजय
कार शब्द होने लगा. और राजा एक एकका शिष्टाचार मनुहार
करकर फूलमाल ठाकुरका प्रसाद देने लगा. राजाने देखा सब देवता

( १२६ ) सिंहासनबत्तीसी.

आये. पर चंद्रमा नहीं आये. अपने जीमें विचार बैतालपर सवार
हो चंद्रलोकको गया. वहां जा सन्मुख हो दंडवत् की और हाथ
जोड़ कर कहा-स्वामी ! मेरा क्या अपराध है ? जो अपने कृपा
न की और सबने मेरेपर कृपा की है. बिना तुम्हारे मेरा
काम आधा है अब काम मेरा सुधारिये. आपको धर्म
होगा. तुम्हें संसारमें यश और कीर्ति मिलेगी. जो कदाचित्
आप इसमें विलंब कीजियेगा तो मैं हत्या दूंगा. तब
चंद्रमाने हँसकर कोमल मधुर बचनसे कहा-राजा ! मैं तुझसे
सत्यकर कहताहूं तू अपने जीमें उदास न हो. मेरे आनेसे संसारमें
अंधकार होजायगा. इस लिये मेरा आना नहीं बनता. तुझे
अभिलाषा थी मेरे दर्शनकी सो तेरी इच्छा पूरी होगई. और तेरा
काम सुफल होगा. तू अपने नगरमें जा. जो काम तूने आरंभ किया
है सो पूर्ण कर. इस तरहसे राजाको समझा अमृत दे विदा किया.
राजाने शिर चढ़ाले लिया, और दंडवत् कर अपने नगरको चला
रास्तेमें देखा कि यमराजके दो दूत एक ब्राह्मणका जीव लिये जाते
हैं. राजाने वह देवदृष्टिसे जाना और उस ब्राह्मणके जीवने राजा-
को देख दूतसे कहा कि-इस राजाको भेटना है. राजाने उस ब्राह्म-
णकी आवाज सुनकर कहा कि-भाई तुम कौन हो ? तब उन
दोनोंने समझाकर राजासे कहा कि-हम यमके भेजेसे उज्जैन
नगरीको गये थे. ब्राह्मणका जीव लेकर अपने स्वामीके पास जाते