सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
छठी पुतली ६. ( ४९
छठी पुतली ६. ( ४९
राजा भोज ! यह अहवाल मैंने तुझसे इस लिये कहा है कि, तू
समझकरके यह खयाल अपने जीसे उठावेगा. इसवास्ते कि, जो
ये लियाक़त रक्खे वह सिंहासनपर बैठे. वहभी जोग राजाका बीत-
गया. फिर उसके दूसरे दिन भोर होतेही सिंहासनपर बैठनेको
तैयार हुवा कि, इतनेमें कामकंदला—
छठी पुतली—
हँसी और कहने लगी, कि-जिस आसनपर राजा विक्रमने
पाँव धरा है तू उसपर बैठनेके लायक कहाँ है? ऐ पापी ! तू अपने
होशको गुम न कर और पांव खाली रक्खे; क्योंकि तुझे देख मेरा मन
मलीन होजाताहै. इस सिंहासनपर वही बैठे जो विक्रमसा राजा हो.
तब राजा बोला-तू अपने मुँहसे कह कि, विक्रम राजाने क्या क्या
कर्म किये है ? वह बोली-तू सूचित होकर बैठ. मैं नृपतिकी कथा कह-
तीहूं. एकदिन नृपती अपनी सभामें बैठाथा. वहां एक ब्राह्मणने
आकर एक अचरजकी बात कही कि, उत्तर दिशामें एक बड़ा
बन है और उस वनमें एक पर्वत और उसके आगे एक तालाव
है, और उस तालाबमें एक खंभ स्फटिकका है. जब सूर्य निक-
लताहै तब उस सरोवरमेंसे वह खंभभी निकलता है और ज्यों
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( ५० ) सिंहासनबत्तीसी.
ज्यों सूरज चढताहै त्यो त्यों खम्भभी बढताहै. जब ठीक दो
पहर होतीहै तब वह खंभ सूर्यके रथके बराबर जाकर पहुँचता है.
तब उस जगह रथभी खडा रहता है. वहां सूर्य जब कुछ
भोजन कर लेतेहैं तब रथ फेर आगे ले चलतेहैं. और खंभभी
घटता जाताहै. निदान सामके वख्त पानीमें लोप हो जाता है.
इसको देवता या देव कोई नहीं जानता. यह बात ब्राह्मणके
मुँहसे सुनकर राजाने अपने मनमें रक्खी, जाहीर न की और
उसके तंई कई रुपये दे बिदा किया और अगिया कोयला बेता-
लोंको याद किया वे दोनों वीर वहा आकर हाजिर हुए. और
उन्होने कहा कि, हमें जो इस वख्त आपने याद किया है सो आज्ञा
कीजिये. कहिये स्वर्गको जावें ? कहिये पातालका ? या कहिये
समुद्रपार ? इन तीनों लोकोंमें जहां आपकी मर्जी हो तहां लेचलें.
तब हँसकर राजाने कहा-एक कौतुक देखने हम जाया चाहते हैं
सो वह उत्तरखंडमें है तहा तुम लेचलो. यह सुनकर वीर
कांधेपर चढा, राजाको लेउडे और उस जगह तुर्त जा पहुँचे.
तब राजाने वह तालाब देखा कि, चारों घाट उसके पक्के हैं.
हंस बगुले उसमें फिरतेहैं. और मुरगावियां चकोर पनडुब्बियां
कलोल करतीहैं. कमलके फूलोपर भौरे गूँज रहे हैं. मोर बोल
रहे हैं. कोयल कूक रही है, और तरह तरहके पछी हुलराने हैं.
फूलोंकी सुगंधोंके साथ पौन चली आती है. और मेवेदार दर-
ख्तकी डालियां तो लचके खाती हैं. राजा यह सामा देखकर मनमें