सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
Singhasan Battisi (Dvatrimshat Puttalika)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३५ )
इक्कीसवीं पुतली २१. ( १३५ )
राजा बीरविक्रमादित्यका यह नियम था कि, अन्नदुःखी, वस्त्र-
दुःखी द्रव्यदुःखी, भूमिदुःखी, विरहदुःखी, और किसी
तरहका दुःखी नगरमें आवे तो राजा सुनकर जबतक उसका
दुःख न मिटा देता तबतक जलका तो क्या जिक्र है ! पर त-
म्बूनभी न चीरताथा. सबेरे गजा महादेवजीके दर्शनको गया
तो दर्शन कर परिक्रमा करने लगा. जब राजा ऊंची दृष्टि
करके देखे तो कोई दुःखी अपने दुखकी अवस्था लिख गया
है राजाने सब बाँच महादेवजीको दंडवत् कर मंदिरमें आया
और सेवकको आज्ञा की कि, माधवनाम ब्राह्मण हमारे नगरमें
आया है इसवास्ते जो कोई उसे ढूँढ लावे तो मुंहमांगा द्रव्य
पावेगा ऐसा कहा. यह सुन लोग नगरमें ढूँढनेको
निकले. घाट घाट टोला महल्ला, बा बगीचे सब नगर ढूँढ
फिरे कहीं ठिकाना उसका न पाया. तब राजाने एक दूतीको
बुलाकर आज्ञा की कि, जो तू उसे ढूँढ लावे तो मुंहमांगा द्रव्य
पावे. उसने कहा महाराज ! यह क्या कठिन बात है अभी
जाकर ढूँढ लाती हूं यह कह उसने लिखाथा वहां जाकर मंदि-
रके पास बैठ रही सांझसमय वह भी भटकता हुआ आन पहुँचा.
उसने उसे देख मनमें विचारा कि, हो नहो यह सच विरही
है किसलिये कि, मुंह पीला आसूं जारी तन क्षीण मन मलीन
हो रहा है. यह तो यही विचार कर रहीथी कि, वह ब्राह्मण
( १३६ ) सिंहासनबत्तीसी.
जहां आय और एक बार हाय कामकंदला, हाय कामकंदला !
पुकार उठा. चट उसने जा उसका हाथ पकड लिया और
कहा मै तेरे ढूंढनेके लिये राजाकी आज्ञा पायके आयी तू
उठ मेरे साथ जल्दी चल तेरा मनोरथ होगा. तेरे दुःखसे
राजा निपट निपट दुःखी है यह सुनतेही उसके साथ वह
होलिया. उसे ले यह दूती राजाके सम्मुख आई और कहने
लगी कि, हे महाराज ! यह वही वियोगी है जिसके लिये
आपने यह दुःख पाया है. तब राजाने उस ब्राह्मणसे पूंछा
कि, महाराज ! आप वियोगसे किससे व्याकुल हो रहे हो
सो सब बात मेरे आगे कहो तब उसने एक आह भरकर
कहा-महाराज कामकंदला वियोगसे मेरी यह गती
हुई हे वह राजा कामसेन पास है तू धर्मात्मा है और
मैं तेरे पास आया हूं. तू मुझे उसको दिला दे तो मेरी जान
बचेगी. यह बात सुनतेही राजा हँसकर बोला-सुन विप्र !
वह तो वेश्या है तूने उसके प्रेममें अपना सब धर्म कर्म छोड़
दिया यह तुझे उचित नहीं है. तब माधवने कहा महाराज !
प्रेमका पंथ न्यारा है जो नर प्रेम करते है सो अपना तन मन
धर्म कर्म सब समर्पण करते है, प्रेमकी कहानी तो अकथनीय है यह
मुझसे नहीं कही जाती. राजाने ये बाते सुनी और उसे अपने
साथ ले मदिरमें गया और सब रानियोंके आज्ञा की कि, तुम