श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
श्रीत्रिलोचनजी) (५३
श्रीत्रिलोचनजी
भयें उभै शिष्य नामदेव श्री तिलोचनजू, सूर शशि नाईं कियो जग में प्रकास है।
नामा की तो बात कहि आये सुनो दूसरे की, सुनेई बनत भक्त कथा रसरास है॥
उपजे बनिककुल सेवें कुल अच्युत कौं, ऐपै नहिं बनै एक तिया रहे पास है।
टहलुवा न कोई 'साधु मन ही की जानि लेत', यही अभिलाष सदा दासनि को दास है॥१८०॥
आये प्रभु टहलुवा रूप धरि द्वार पर, फटी एक कामरी पन्हैयाँ टूटी पाँय हैं।
निकसत पूछैं 'अहो! कहाँ ते पधारे आप? 'बाप महतारी और देखिये न' गाय हैं॥
'बाप महतारी मेरे कोऊ नाहिं साँची कहौं गहौं मैं टहल जोपै मिलत सुभाय हैं'।
'अनमिल बात कौन? दीजिये जनाय वहू' 'पाऊँ पाँच सात सेर उठत रिसाय हैं'॥१८१॥
चारि हू बरन की जु रीति सब मेरे हाथ, साथ हू न चाहौं करौं नीके मन लाइकै।
भक्तन की सेवा सो तौ करत जनम गयो, नयो कछु नाहिं डारे बरस बिताइकै॥
अन्तरयामी नाम नेरो चेरो भयो तेरे! हौं तो, बोल्यो 'भक्तभाव खावौ निशंक अघाइकें'।
कामरी पन्हैयाँ सब नई करि दई और, मीड़िकै, न्हवायो तन मैल कौं छुटाइकै॥ १८२॥
बोल्यो घरदासी सौं 'तूँ रहै याकी दासी होइ, देखियो उदासी देत ऐसो नहीं पावनौ।
खाय सो खवावो सुख पावो नित-नित हिये, जियैं जग माहि जौलौं मिलि गुन गावनौ॥
आवत अनेक साधु भावत टहल हिये, लिये चाव दाबें पाँव सबनि लड़ावनौ।
ऐसे ही करत मास तेरह व्यतीत भये, गये उठि आपु नेकु बात को चलावनौ॥ १८३॥
एक दिन गई ही परोसिन कैं भक्तबधू, पूछि लई बात 'अहो! काहे कौं मलीन है'।
बोली मुसुकाय वे टहलुवा लिवाय ल्याये, क्योंहू न अघाय खोट पीसि तन छीन है॥
काहू सौं न कहौ यह गहौ मन माँझ एरी, 'तेरी सौं सुनैगो जोपै जात रहै भीन है'।
सुनि लई यही नेकु गये उठि हुती टेक, दुखहूँ अनेक जैसे जल बिन मीन है॥ १८४॥
बीते दिन तीनि अन्न-जल करि हीन भये, “ऐसो सो प्रवीन अहो! फेरि कहाँ पाइयें”।
बड़ी तू अभागी ! बात काहे कौं कहन लागी? रागी साधुसेवा में जु कैसे करि ल्याइयें॥
भई नभ वानी तुम खावो पीवो पानी यह, मैं ही मति ठानी मोकौं प्रीति रीति भाइयें।
मैं तो हौं अधीन तेरे घर ही में रहौं लीन, जोपै कहौ सदा सेवा करिवे कौं आइयें॥ १८५॥
कीने हरिदास मैं तौ दासहू न भयौं नेकु, बड़ो उपहास मुख जग में दिखाइयै।
कहैं जन भक्त कहा भक्ति हम करी कहो? अहो ! अज्ञताई रीति मन में न आइयै॥
५४) (श्री भक्तमाल
उनकी तो बात बनि आवै सब उनही सौं, गुन ही कौं लेत मेरे औगुन छिपाइये।
आये घर माँझ तऊ मूढ़ मैं न जानि सक्यौ, आवैं अब क्योंहूँ धाय पाँय लपटाइये ॥१८६॥
श्रीवल्लभाचार्यजी
हिये में सरूप सेवा करि अनुराग भरे, ढरे और जीवन की जीवनि कौं दीजिये।
सोई लै प्रकास घर-घर में विलास कियो, अति ही हुलास फल नैननि कौं लीजिये ॥
चातुरी अवधि नेकु आतुरी न होति किहूँ, चहुँ दिसि नाना राजभोग सुख कीजिये।
वल्लभ जू नाम लियो पृथु अभिराम रीति, गोकुल में धाम पानि सुनि मन रीझिये ॥१८७॥
गोकुल के देखिवे कौं गयौ एक साधु सूधो, गोकुल मगन भयो रीति कछु न्यारिये।
छोंकर के वृक्ष पर बटुवा झुलाय दियो, कियो जाय दरसन सुख भयो भारिये ॥
देखै आइ नाहीं प्रभु फेरि आप पास आयो, चिन्ता सौं मलीन देखि कही जा निहारिये।
वैसेई सरूप कई गई सुधि बोल्यो आनि, लीजिये पिछानि कह्यो सेवा नित धारिये ॥१८८॥
खुलि गईं आखें अभिलाखैं पहिचानि कीजै, दीजै जू बताइ मोहिं पाऊँ निज रूप है।
कही जावो वाही ठौर देखौ प्रेम लेखौ हिये, लिये भाव सेवा करौ मारग अनूप है॥
देखिके मगन भयो लयो उर धारि हरि, नैन भरि आये जान्यो भक्ति को स्वरूप है।
निसिदिन लग्यौ पग्यौ जग्यौ भाग पूरन हो पूरन चमत्कार कृपा अनुरूप है॥ १८६॥
मास परायण आठवां विश्राम
श्रीकुलशेखरजी
सन्त साखि जानें सबै, प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥
भक्तदास इक भूप, श्रवन सीताहर कीनों।
मार मार कर खड्ग, बाजि सागर में दीनौ॥
नरसिंह कौ अनुकरण, होइ हिरनाकुश मार्यो।
व्है भयौ दसरत्थ, राम बिछुरत तन डार्यो॥
कृष्ण दाम बाँधे सुने, तिहिं छन दीनो प्रान।
सन्त साखि जानें सबै, प्रगट प्रेम कलियुग प्रधान ॥४६॥
सन्त साखि जानें कलिकाल में प्रगट प्रेम, बड़ोई असत जाके भक्ति में अभाव है।
हुतो एक भूप रामरूप ततपर महा, राम ही की लीला गुन सुनैं करि भाव है॥
विप्र सौं सुनावै सीता चोरी कौ न गावै, हियो खरो भरि आवै वह जानत सुभाव है।
पर्यो द्विज दुखी निज सुवन पठाइ दियो, जानै न सुनायो भरमायो कियो घाव है ॥ १६०॥
प्रसादानिष्ठ श्रीपुरुषोत्तमजी नृपति) (५५
मार मार करि कर खड्ग निकासि लियौ, दियौ घोरौ सागर में सो आवेस आयो है।
'मारौं याहि काल दुष्ट रावन विहाल करौं, पाँवन को देखौं सीता' भाव दृग छायो है।।
जानकीरवन दोऊ दरसन दियो आनि, बोले 'बिन प्रान कियौ नीच फल पायो है'।
सुनि सुख भयो गयौ शोक हृदै दारुन जो, रूप की निहारनि यों फेरिकै जिवायो है।। १६१।।
श्रीलीलानुकरणजी, श्रीरतिवन्तीबाईजी
नीलाचल धाम तहाँ लीला अनुकर्न भयो, नरसिंह रूप धारि साँचै मारि डार्यो है।
कोऊ कहै द्वेष कोऊ कहत आवेस तोपै, करौ दसरथ कियो भाव पूरो पार्यो है।।
हुती एक बाई कृष्ण रूप सौं लगाई मति कथा में न आई सुत सुनी कह्यो धार्यो है।
'बाँधे जसुमति' सुनि औरै भई गति करि दई साँची रति तन तज्यो मानौ वार्यो है।। १६२।
सप्ताह परायण दूसरा विश्राम
प्रसाद अवज्ञा जानिकैं, पाणि तज्यौ एकै नृपति।।
हौं कहा कहौं बनाइ, बात सबही जग जानैं।
कर तैं दौना भयो, स्याम सौरभ मन मानैं।।
छपन भोग तैं पहिल, खीच करमा कौ भावैं।
सिलपिल्ले के कहत, कुँअरि पै हरि चलि आवैं।।
भक्तन हित सुत विष दियौ, भूप नारि प्रभु राखि पति।
प्रसाद अवज्ञा जानिकैं, पाणि तज्यौ एकै नृपति।। ५०।।
प्रसादानिष्ठ श्रीपुरुषोत्तमजी नृपति
प्रसाद की अवज्ञा तैं तज्यो नृप कर एक, करिकैं विवेक सुनौ जैसें बात भई है।
खेलै भूप चौपरि कौं आयो प्रभु-भुक्त-शेष, दाहिने में पासे बाँये छुयौ मति गई है।।
लै गये रिसायकैं फिराय महा दुख पाय, उठ्यो नरदेव गृह गयो सुनी नई है।
लियो अनसन 'हाथ तजौं याही छन तब, साँचौ मेरौ पन' बोलि विप्र पूछि लई है।। १६३।।
काटै हाथ कौन मेरो? रह्यो गहि मौन यातैं, पूछत सचिव कही विथा सो विचारियै।
आवै एक प्रेत मो दिखाई नित देत, निसि डारिकैं झरोखा कर शोर करै भारियै।।
'सोऊँ ढिंग आइ रहौं आपुकौं छिपाइ जब, डारैं पानि आनि तबही सुकाटि डारियै'।
कही नृप भलैं चौकी देत में घुमायो भूप, डार्यो उठि आइ छेद न्यारो कियौ वारियै।। १६४।।
५६) (श्री भक्तमाल
देखिकैं लजानौं 'कहा कियौं मैं अजानौं' ! नृप कही 'प्रेत मानौं यही हरि सौं बिगारियै' ।
कही जगन्नाथदेव 'लै प्रसाद जावो उहाँ, ल्यावो हाथ बोवै बाग' सोई उर धारियै ।।
चले तहाँ धाइ भूप आगे मिल्यो आइ हाथ, निकस्यो लगाइ हियै भयौ सुख भारियै।
ल्याये कर फूल ताके भये फूल दौना के जु, नितहीं चढ़त अंग गन्ध हरि प्यारियै ।। १६५ ।।
श्रीकर्माबाईजी
हुती एक बाई ताको करमा सुनाम जानि, बिना रीति भाँति भोग खिचरी लगावहीं।
जगन्नाथदेव आपु भोजन करत नीकैं, जिते लगैं भोग तामें यह अति भावहीं ।।
गयो तहाँ साधु मानि बड़ो अपराध करै, भरै बहु स्वांस सदाचार लै सिखावहीं।
भई यों अवार देखें खोलिकै किवार जोपै, जूठनि लगी है मुख धोये बिनु आवही ।। १६६ ।।
पूछी 'प्रभु! भयो कहा? कहिये प्रगट खोलि, बोलिहू न आवै हमें देखि नई रीति है।
'करमा सुनाम एक खिचरी खवावै मोहिं, मैं हूँ नित पाऊँ जाइ जानि साँचि प्रीति है ।।
गयो मेरो सन्त रीति भाँति सो सिखाइ आयो, मत मो अनन्त बिनु जाने यों अनीति है।
कही वही साधु सौं 'जु! साधि आवौ वही बात' जाइकै सिखाई हिय आई बड़ी भीति है ।। १६७ ।।
सिलपिल्ले भक्त उभयबाईजी
सिलपिल्ले भक्त उभै बाई सोई कथा सुनौ, एक नृपसुता एक सुता जिमींदार की।
आये गुरु घर देखि सेवा ढिंग बैठी जाइ, कही ललचाइ पूजा कीजै सुकुमार की ।।
दियो शिलाटूक लैके नाम कहि दियो वही, कीजिये लगाइ मन मति भवपार की।
करत-करत अनुराग बढ़ि गयो भारी, बड़ी ये विचित्र रीति यही सोभा सार की ।। १६८ ।।
पाछिले कवित्त माँझ दुहुँन की एकै रीति, अब सुनौ न्यारी-न्यारी नीके मन दीजिये ।
जिमींदार सुता ताके भये उभै भाई रहैं, आपुस में बैर गाँव मार्यो सब छीजिये ।।
तामें गई सेवा इन बड़ोई कलेस कियौ, जियो नाहिं जात खान-पान कैसें कीजिये।
रहे समुझाय याहि कछु न सुहाय तब, कही जाय ल्यावै तेरे दोऊ सम धीजिये ।। १६६ ।।
गई वाही गाँव जहाँ दूसरो जू भाई रहै, बैठ्यौ हो अथाई माँझ कही वही बात है।
'लेवो जू पिछानि तहँ बैठे एक ठौर प्रभु, बोलि उठ्यो कोऊ 'बोलि लीजैं प्रीति गात है' ।।
भई आँखि राती लागी फाटिवे कौं छाती, सो पुकारी सुत आरत सौं मानौं तन पात है।
हिये आइ लागे सब दुख दूर भागे कोऊ बड़े भाग जागे घर आई न समात है ।। २०० ।।
सुनौ नृपसुता बात भक्ति गात-गात पगी, भगी सब विषैवृत्ति सेवा अनुरागी है।
ब्याही ही विमुख घर आयो लैन वहै वर, खरी अरबरी कोऊ चित चिन्ता लागी है ।।
श्रीसुतों को विष दिया दो बाई) (५७
करि दई संग भरी अपने ही रंग चली, अलीहूँ न कोई एक वही जासौँ रागी है।
आयो ढिंग पति बोलि कियो चाहै रति वाकी, और भई गति मति आवै विथा पागी है।।२०१।।
‘कौन वह विथा? ताकौ कीजियै जतन वेगि, बड़ो उदवेग नेकु बोलि सुख दीजियै।
‘बोलिवो जौ चाहौ तौपै करौ हरिभक्ति हिये, बिन हरिभक्ति मेरो अंग जिन छीजियै।।
आयो रोष भारी तब मन में विचारी वा ‘पिटारी में जु कछु सोई लैकेँ न्यारो कीजियै’।
करी वही बात मूसि जल माँझ डारि दई, नई भई ज्वाला जियो जात नहीं खीजियै।।२०२।।
तज्यो जल-अन्न अब चाहत प्रसन्न कियो, होत क्यौँ प्रसन्न जाको सबरस लियो है।
पहुँचे भवन आइ दई सो जताइ बात, गात अति छीन देखि कहा हठ कियो है।।
सासु समुझावै कछु हाथ सौं खवावै याकौँ, बोलिहू न भावै तब धरकत हियो है।
‘कहै सोई करें अब पाँय तेरे परैं हम’, बोली ‘जब वेई आवैं तौही जात जियो है’।।२०३।।
आये वाही ठौर भौर आई तनु भूमि गिरयो, ढरयो जल नैन सुर आरत पुकारी है।
भक्तिवश श्याम जैसे कामवश कामी नर, धाइ लागे छाती सो जु संग सो पिटारी है।।
देखि पति सासु आदि जगत विवाद मिट्यो, वाद ही जनम गयो नेकु न सँभारी है।
किये सब भक्त हरि साधुसेवा माँझ पगे, जगे कोउ भाग घर बधू योँ पधारी है।।२०४।।
भक्तों के हित सुतों को विष दिया, दो बाईजी
भक्तन के हित सुत विष दियौ उभै बाई, कथा सरसाई बात खोलिकै बताइयै।
भयो एक भूप ताके भक्त हूँ अनेक आवैं, आयो भक्तभूप तासौँ लगन लगाइयै।।
नितहीँ चलत ऐपै चलन न देत राजा, बितयो बरष मास कहै भोर जाइयै।
गई आस टूटि तन छूटिवे की रीति भई, लई बात पूछि रानी सबै लै जनाइयै।।२०५।।
दियो सुत विष रानी जानी नृप जीवै नाहिं, सन्त हैं स्वतन्त्र सो इन्हेंहि कैसैं राखियै।
भये बिन भोर बधू शोर करि रोय उठी, भोय गई रावले में सुनी साधु भाषियै।।
खोलि डारी कटि पट भवन प्रवेस कियो, लियो देखि बालक कौँ नील तनु साषियै।
पूछ्यौ भूप तिया सौं ‘जू साँचे कहि कियो कहा?’ कही ‘तुम चाल्यौ चाहौ नैन अभिलाषियै’।।२०६।।
छाती खोलि रोये सन्त बोलिहूँ न आवै मुख, सुख भयो भारी भक्ति रीति कछु न्यारियै!
जानीऊँ न जाति जाति-पाँति को विचार कहा, अहो! रससागर सो सदा उर धारिये।।
हरिगुन गाय साखी सन्तन बताय दिये, बालक जिवाय लागी ठौर वह प्यारियै।
संग के पठाय दिये रहे वे जे भींजे हिये, बोले आप ‘जाऊँ जौ न मारिकेँ बिडारियै’।।२०७।।
५८) (श्री भक्तमाल
दूसरी बाईजी
सुनौ चित्तलाई बात दूसरी सुहाई हिये,जिये जग मांहि जौलौं सन्त संग कीजियै।
भक्त नृप एक सुता ब्याही सो अभक्त महा, जाके घर माँझ जन नाम नहीं लीजियै।।
पल्यो साधु सीथ सौं सरीर दृग रूप पले, जीभ चरनामृत के स्वाद ही सौं भीजियै।
रह्यौ कैसैं जाय अकुलाय न बसाय कछु, आवैं पुर प्यारे तब विष सुत दीजियै।। २०८ ।।
आये पुर सन्त आइ दासी ने जनाइ कही, कही कैसे जाइ सुत विष लैकेँ दियो है।
गये वाके प्रान रोय उठी किलकानि सब, भूमि गिरे आनि टूक भयो जात हियो है।।
बोली अकुलाय 'एक जीवै कौ उपाय जोपै, कियो जाय पिता मेरे कैयो बार कियो है'।
'कहै साईं करें' दृग भरैं 'ल्यावौ सन्तनि कौ कैसे होत सन्त?' पूछयो चेरी नाम लियो है।।२७९।।
चली लै लिवाय चेरी बोलिवौ सिखाय दियो, देखिकै धरनि परि पाँय गहि लीजियै।
कीनी वही रीति दृगधारा मानौ प्रीति सन्त, करी यों प्रतीति गृह पावन कौ कीजियै।।
चले सुख पाय दासी आगे ही जनाय जाय, आय ठाड़ी पौरि पाँय गहे मति भीजियै।
कही हरे बात 'मेरे जानौ पिता मात मैं तो, अंग में न माति आज प्रान वारि दीजियै।। २१०।।
रीझि गये सन्त प्रीति देखिकैं अनन्त कह्यो, 'होइगी जु वही सो प्रतिज्ञा तैं जो करी है।
बालक निहारि जानी विष निरधार दियो, दियो चरनामृत कौं प्रानसंज्ञा धरी है।।
देखत विमुख जाय पाँय ततकाल लिये, किये तब शिष्य साधुसेवा मति हरी है।
ऐसें भूप नारि पति राखी सब साखी जन, रहै अभिलाखी जोपै देखौ याही घरी है।। २११।।
मास परायणं नवाँ विश्राम
आशै अगाध दुहुँ भक्त को, हरितोषण अतिशै कियौ।।
रंगनाथ को सदन करन बहु बुद्धि विचारी।
कपट धर्म रचि जैन, द्रव्यहित देह बिसारी।।
हंस पकरनैं काज, बधिक बानौं धरि आये।
तिलक दाम की सकुच, जानि तिन आप बँधाये।।
सुत बध हरिजन देखिकै, दै कन्या आदर दियौ।
आशै अगाध दुहुँ भक्त को, हरितोषण अतिशै कियौ।।५१।।
मामा-भानजा
आशय अगाध दोऊ भक्त मामा-भानजे कौं, दियौ प्रभु तोष ताकी बात चित धारियै।
घर तें निकसि चले वन कौं विवेक रूप, मूरति अनूप बिन मन्दिर निहारियै।।
हंस भक्त) (५६
दक्षिण में रंगनाथ नाम अभिराम जाकौ, ताकौ ले बनावैं धाम काम सब टारियै।
धन के जतन फिरे भूमि पै न पायो कहूँ, चहुँ दिसि हेर देख्यो भयो सुख भारियै।। २१२।।
मन्दिर सराबगी कौं प्रतिमा सौं पारस की, आरस न कियो वेद न्यून हूँ बतायो है।
'पावैं प्रभु सुख हम नर्कहूँ गये तौ कहा?' धरक न आई तब कान लै फुकायो है।।
ऐसी करी सेवा जासौँ हरी मति केवरा ज्यौं, सेवरा समाज सबै नीके कैं रिझायो है।
दियो सौंपि भार तब लैवे को विचार करैं, हरैं कौन राह? भेद राजनि पैं पायो है।। २१३।।
मामा रह्यो भीतर औ ऊपर सो भानजो हो, कलस भँवरकली हाथ सौं फिरायो है।
जेबरी लै फाँसि दियो मूरति सो खैंचि लई, और बार बहु आप नीकैं चढ़ि आयो है।।
कियो हो जो द्वार तामें फूलि तन फँसि बैठ्यो, अति सुख पाय तब बोलिकै सुनायो है।
'काटि लेवौ सीस ईश भेष की न निन्दा करैं,' भरैं अँकवारि मन कीजियै सवायो है।। २१४।।
काटि लियो सीस ईश इच्छा कौ विचार कियो, जियौ नहीं जाय तऊ चाह मति पागी है।
जोपै तन त्याग करौं कैसें आस सिन्धु तरौं?, ढरौं वाही और आयो नींव खुदै लागी है।।
भयो शोक भारी हमें ह्वै गई अबारी काहू, और नै विचारी देखें वही बड़भागी है।
भरि अकँवारि मिले मन्दिर सँवारि झिले, खिले सुख पाइ नैन जानै जोई रागी है।। २१५।।
रां हंस भक्त रां
कोढ़ी भयो राजा, किये जतन अनेक ऐपैं, एकहूँ न लागै, कह्यो हँसनि मँगाइयै।
बधिक बुलाय कही, वेगि ही उपाय करौ, जहाँ-तहाँ ढूँढ़ि अहो, इहाँ लगि ल्याइयै।।
कैसे करि ल्यावै? वेतौ रहैं मानसर माँझ, ल्यावोगे छुटौगे तब जनैं चारि जाइयै।
देखत ही उड़ि जात, जाति को पिछानि लेत, साधु सौं न डरैं, जानि भेष लै बनाइयै।। २१६।।
गये जहाँ हँस, सन्त बानौ सो प्रशंस, देखि, जानिके बँधाये राजा पास लैके आये हैं।
मानि मत सार, प्रभु वैद को स्वरूप धारि, पूछिकें बजार लोग, भूप ढिंग ल्याये हैं।।
काहे कौ मँगाये पच्छी? आछी हम करैं देह, छोड़ि दीजै इन्हें, कही नीठ करि पाये हैं।
औषधि पिसाये, अँग-अंगनि मलाये, किये नीके, सुख पाये, कहि उनको छुटाये हैं।।२१७।।
लेवो भूमि गाऊँ, बलि जाऊँ या दयालुता की, भाल भाग ताकैं जाकौं दरसन दीजियै।
पायो हम सब, अब करौ हरि साधुसेवा, मानुष जनम ताकी सफलता कीजियै।।
करी लै निदेस, देशभक्ति विसतार भयो, हंस हितसार जानि, हिये धरि लीजियै।
बधिकनि जानी, जासौँ खगनि प्रतीति कीनी, ऐसो भेष छोड़िये न राख्योँ मति भीजियै।। २१८।।
६०) (श्री भक्तमाल
श्रीसदाव्रतीजी महाजन
महाजन सुनो सदाव्रती ताको भक्तपन, मन में विचार सेवा कीजै चित लायकै।
आवत अनेक साधु, निपट अगाध मति, साधि लेत जैसी आवै सुबुधि मिलायकै।।
सन्त सुख मानि, रहि गयो घर माँझ सदा, सुत सौं सनेह नित खेलै संग जायकै।
इच्छा भगवान मुख्य, गौन लोभ जानि मारि, डार्यो, धूरि गाड़ि, गृह आयो पछितायकै ।।२१६.।।
देखै महतारी, मग बेटा कहाँ पगि रह्यौ? बीते चारि जाम, तऊ धाम में न आयौ है।
फेरी पुर दौंड़ी, ताके संग सन्त लौंड़ी आय, कह्यौ यों पुकारि, सुत कौने बिरमायौ है।।
वेगि दै बताय दीजै, आभरन दिये लीजै, कही सो संन्यासी, एही मार्यौ मन लायौ है।
दई लै दिखाय देह, बोल्यो याको गहि लेहु, याही ने हमारौ पुत्र मार्यो नीके पायौ है ।। २२० ।।
बोल्यो अकुलाय, मैं तौ दियो है बताय मोंको, देहु जु छुटाय, नहीं झूठ कछु भाषियै।
लेवौ मति नाम साधु, जो उपाधि मेट्यौ चाहौ, जावौ उठि और कहूँ, मानी छोरि नाषियै।।
आयकै विचार कियौ, जानी सकुचायो सन्त, बोलि उठी तिया, सुता दै कैं नीके राखियै।
पर्यो बधू पाँय, तेरी लीजिये बलाय, पुत्र शोक को मिटाय, और खरी अभिलाषियै ।।२२१।।
बोलि लियौ सन्त, सुता कीजियै जू अंगीकार, दुख सो अपार, काहू विमुख कौं दीजियै।
बोल्यौ मुरझाय, मैं तौ मार्यौ सुत हाय ! मौपै जियौहू न जाय, मेरो नाम नहीं लीजियै।।
देखौ साधुताई, धरी सीस पै बुराई, जहाँ राईहूँ न दोष, कियौ मेरु सम रीझियै।
दई बेटी ब्याहि, कहि मेरो उर दाह मिटै, कीजियै निबाह जग माहिं जौलौं जीजियै ।। २२२ ।।
आये गुरु घर, सुनि दीजै कौन सर, बड़े सिद्ध सुखदाई, साधुसेवा लै बताई है।
कह्यो सुत कहाँ?, आजू ! पायौ कही कैसी भाँति, कैसे कैं बखानै, जग मीचु लपटाई है।।
प्रभु ने परीक्ष्या लई, सोई हमें आज्ञा दई, चलियै दिखावौं जहाँ देह कौं जराई है।
गये वाही ठौर, सिरमौर हरि ध्यान कियो, जियो चल्यो आयो दास कीरति बढ़ाई है ।। २२३ ।।
चारौ युग चतुर्भुज सदा, भक्त गिरा साँची करन।।
दारुमई तरवार, सारमय रची 'भुवन' की।
'देवा' हित सितकेश, प्रतिज्ञा राखी जन की।।
कमधुज के कपि चारु, चिता पर काष्ठ जु ल्याये।
जैमल के जुधि माँहि, अश्व चढ़ि आपुन धाये।
पण्डा देवाजी) (६१
घृत सहित भैंस चौगुनी, श्रीधर संग सायक धरन।
चारौ युग चतुर्भुज सदा, भक्त गिरा साँची करन।। ५२।।
श्रीभुवनसिंहजी चौहान
सुनौ कलिकाल बात, और है पुरान ख्यात, भुवन चौहान, जहाँ राना की दुहाई है।
पट्टा युगलाख खात, सेवा अभिलाष साधु, चल्यो सो सिकार नृप संग भीर धाई है।।
मृगी पाछे परे, करे टूक, हुती गाभिन यों आइ गई दया, कही 'काहे को लगाई है'।
कहैं मोकौं भक्त, क्रिया करौं मैं अभक्तन की, दारु तरवार धरौं, यहै मनभाई है।। २२४।।
और एक भाई, तानै देखी तरवार दारु, सक्यो न सँभार, जाय राना कौं जनाई है।
नृप न प्रतीति करै, करै यह सौंह नाना, बानो प्रभु देखि, तेज बात न चलाई है।।
ऐसे ही बरस एक, कहत वितीत भयो, कह्यो मोहि मारि डारौ, जोपै मैं बनाई है।
करी गोठ कुण्ड जाय, पायकै प्रसाद बैठे, प्रथम निकासि आप सबनि दिखाई है।। २२५।।
क्रम सौं निहारि कही, भुवन विचार कहा? कहौ चाहें दार, मुख निकसत सार है।
काढ़िकै दिखाई, मानौं बिजुरी चमचमाई, आई मन माँझ, बोल्यौ याकौं मारौ भार है।।
भक्त कर जोरिकै बचायौ, अजू ! मारियै क्यो? कही बात झूठ, नहीं करी करतार है।
पट्टा दूनादून पावै, आवै मत मुजरा कौं, मैं ही घर आऊ, होय मेरौ निसतार है।। २२६।।
श्रीचतुर्भुजजी के पण्डा श्रीदेवीजी
दरसन आयो राना, रूप चतुर्भुज जू कैं, रहे प्रभु पौढ़ि हार सीस लपटाये हैं।
वेगि दै उतारि कर, लैकैं गरे डारि दियो, देखि धौरौ बार, कही धौरे आये? आये हैं।।
कहत तो कही गई, सही नहीं जात अब, महीपति डारै मारि, हरिपद ध्याये हैं।
अहो हृषीकेश ! करौ मेरे लिये सेतकेश, लेशहूँ न भक्ति, कही किये देखौ छाये हैं।। २२७।।
मानि राजा त्रास, दुखरासि सिन्धु बूड्यो हुतो, सुनिकै मिठास वानी मानौ फेरि जियो है।
देखे सेत बार, जानी कृपा मो अपार करी, भरी आँखै नीर, सेवा लेश मैं न कियो है।।
बड़ेई दयाल, सदा भक्त प्रतिपाल करें, मैं तो हौं अभक्त, ऐपै सकुचायो हियो है।
झूठे समबन्धहू तैं, नाम लाजै मेरोई जु, तातैं सुख साजै, यह दरसाय दियो है।। २२८।।
आयो भोर राना, सेत बार सो निहारि रह्यो, कह्यो केश काहू के, लै पण्डा ने लगाये हैं।
ऐंचि लियौ एक तामें, खैंचिकै चढ़ाई नाक, रुधिर की धार नृप अंग छिरकाये हैं।।
गिर्यो भूमि मुरछा हवै, तन की न सुधि कछू, जाग्यौ जाम बीते अपराध कोटि गाये है।
यही अब दण्ड, राज बैठे सो न आवै इहाँ, अबलौंहूँ आनि मानि करै, जो सिखाये हैं।। २२६।।
६२) (श्री भक्तमाल
श्रीकामध्वजजी
भये चारि भाई, करैं चाकरी वै राना जू की, तामें एक भक्त, करै वन में बसेरो है।
आयकै प्रसाद पावै, फेरि उठि जाय तहीं, कहैं नेकु चलौ, तौ महीना लीजै तेरो है।।
जाके हम चाकर हैं, रहत हजूर सदा, मरै तौ जरावै कौन?, वही जाको चेरो है।
छूट्यो तन वन, राम आज्ञा हनुमान आये, कियो दाह, धुँआ लगे, प्रेत पार नेरो है।।२३०।।
नवाह परायण तृतीय विश्राम
श्रीजयमलजी
मेरतै प्रथम वास, जैमल नृपति ताकौं, सेवा अनुराग, नेकु खटकौ न भावहीं।
करै घरी दस, तामें कोऊ जो खबरि देत, लेत नहीं कान, और ठौर मरवावहीं।।
हुतो एक भाई बैरी, भेद यह पाइ लियो, कियो आनि घेरौ माता, जाइकैं सुनावहीं।
करैं हरि भली, प्रभु घोरा असवार भये, मारी फौज सब, कहैं लोग सचु पावहीं।।२३१।।
देखै हाँफै घोरो, अहो ! कौन असवार भयौ? गयो आगे जबै, देख्यो वही बैरी पर्यो है।
बोल्यो सुखपाय, 'अजू ! साँवरो सिपाही को हैं?' एकले ही फौज मारी मेरो मन हर्यो है।।
तोही को दिखाई दई, मेरे तरसत नैन, ! बैनन सौं जानी वही स्याम प्रभु ढर्यो है।
पूछिकै पठाय दियौ, वानै पन यहै लियौ, कियौ इन दुख करै भली बुरो कर्यो है।।२३२।।
श्रीग्वाल भक्तजी
भयो एक ग्वाल, साधुसेवा सो रँसाल करैं, परै जोई हाथ, लैकै सन्तन खवावहीं।
पायो पकवान, वन मध्य गयो खाइवे कौं, आइवे की ढील, चोर भैंस सो चुरावही।।
जानिकै छिपाई, बात, माता सौं बनाइ कही, दई विप्र भूखौ घृत संग फेरि आवही।
दिन हो दिवारी कौ सु, उन्हि पहिरायौ हाँस, आईं घर दाम लिये राँभ कैं सुनावहीं।।।२३३।।
श्रीश्रीधरस्वामीजी
भागवत टीका करी श्रीधर सुजानि लेहु, गेह में रहत करैं जगत् व्यवहार हैं।
चले जात मग, ठग लगे कहैं कौन संग? संग रघुनाथ मेरो जीवन अधार है।।
जानी इन कोऊ, नाहिं मारिवो उपाय करे, धरे चाप बान, आवैं वही सुकुमार है।
आये घर ल्याये पूछैं, श्याम सो सरूप कँहा? जाने वे तौ पार किये आपु डार्यो भार है।।२३४।।
मास परायण दसवा विश्राम
भक्तनि संग भगवान् नित ज्यौं गऊबच्छ गोहन फिरैं।।
निहकिंचन इक दास तासु के हरिजन आये।
विदित बटोही रूप भये हरि आपु लुटाये।।
श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त) (६३
साषि देन कौ स्याम, खुरदहा प्रभुहिं पधारे।
रामदास के सदन, राय रनछोर सिधारे॥
आयुध छत तन अनुग के, बलि बन्धन अपु वपु धरैं।
भक्तनि संग भगवान् नित, ज्यौं गऊबच्छ गोहन फिरैं।। ५३ ।।
श्रीहरिपालजी
भक्तनि के संग, भगवान् ऐसे फिरयो करैं, जैसे बच्छ संग फिरै नेहवती गाइ है।
हरिपाल नाम विप्र, धाम में जनम लियो, कियो अनुराग, साधु दई श्री लुटाइ है।।
केतिक हजार लै बजार के करज ख्वाये, गरज न सरै कियौ चोरी को उपाइ है।
विमुख कौं लेत, हरिदास कौं न दुख देत, आये सन्त द्वार, तिया संग बतराइ है।। २३५।।
बैठे कृष्ण रुक्मिनी, महल तहाँ सोच पर्यो, हर्यो मन साधुसेवा साहूरूप कियौ है।
पूछी चले कहाँ? कही भक्त है हमारो एक मैं हूँ आऊँ? आओ आये जहाँ पूछि लियौ है।।
अजू मग चल्यो जात बड़ो उतपात मधि, कोऊ पहुँचावै देवौ, लै रुपैया दियौ है।
करो समाधान, सन्त मैं लिवाइ जाऊँ इन्हें, लाइ वन माँझ देखि, बहु धन जियौ है।। २३६।।
देखें जो निहार माला-तिलक न सदाचार, होयँगे भण्डार जोपै, इतो धन लायो है।
लीजियै छिनाइ, 'यही वारि' कहै डारि देवौ, दियौ सब डारि दला छिगुनी में छायो है।।
अँगुरी मरोरि, कही, 'बड़ो तूँ कठोर अहो', तोकौं कैसे छोड़ौ, सन्त जेवैं मोको भायो है।
प्रगट दिखायो रूप, सुन्दर अनूप वह, मेरौ भक्तभूप, लैके छाती सौं लगायो है।। २३७।।
श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त
गौड़देसवासी उभै विप्र ताकी कथा सुनौ, एक वयस वृद्ध जाति वृद्ध छोटो संग है।
और-और ठौरि, फिरि आये फिरि आये वन, तन भयो दुखी कीनी टहल अभंग है।।
रीझो बड़ो द्विज निज सुता तोको दई अहो, रहो, नहीं चाह मेरे लई बिनै रंग है।
साखी दै गोपाल, अब बात प्रतिपाल करो, ढरो कुल ग्राम भाग पूछ्यो सो प्रसंग है।। २३८ ।।
बोल्यो छोटो विप्र, छिप्र दीजियै कही जो बात, तिया सुत कहैं, अहो सुता याके जोग है?।
द्विज कहै नाहीं कैसे करौं?, मैं तो दैन कही, कही कहो भूलि भयो, विथा कौ प्रयोग है।।
भई सभा भारी, पूछ्यो साखी नर-नारी? श्रीगोपाल वनवारी, और कौन तुच्छ लोग है।
लेवौ जू लिखाइ जोपै साखी भरैं आइए तोपै ब्याहि बेटी दीजै लीजै करौ सुख भोग है।। २३६ ।।
६४) (श्री भक्तमाल
आयौ वृन्दावन, वनवासी श्रीगोपाल जू सौं बोल्यो चलौ साखी देवौ, लई है लिखाइकै।
बीते कैयौ याम, तब बोले स्यामसुन्दर जू, प्रतिमा न चलै, तोपै बोले क्यौं जू भायकै॥
लागे जब संग, युग सेर भोग धरौ रंग, आधे-आध पावैं, चलौं नूपुर बजायकै।
धुनि तेरे कान परै, पाँछै जिनि दीठि करै, करैं रहौं वाहि ठौर कही मैं सुनायकै॥ २४०॥
गये ढिंग गाँव, कही नेकु तौ चितॉव रहे, चितये तें ठाढ़े, दियो मृदु मुसकायकै।
ल्यावौ जू बुलाय कह्यो, आय देखौ, आये आप, सुनतहिं चौंकि सब ग्राम आयो धायकै॥
बोलिकै सुनाई साष, पूजी हिये अभिलाष, लाख लाख भाँति रंग भर्यो उर भायकै।
आयो न सरूप फेरि, विनै करि राख्यो घेरि, भूप सुख ढेरि दियो, अबलौं बजायकै॥ २४१॥
श्रीरामदासजी
द्वारका के ढिंग ही डाकौर एक गाँव रहे रहै, रामदास भक्त-भक्ति जाकौं प्यारियै।
जागरण एकादशी करे रनछोर जू के, भयौ तन वृद्ध, आज्ञा दई नहिं धारियै॥
बोले भरि भाय, तेरौ आयवौ सह्यौ न जाय, चलौं घर धाय तेरे, ल्यावौ गाड़ी भारियै।
खिरकी जु मन्दिर के पाछे, तहाँ ठाढ़ी करौ, भरौ अँकवारी मोकौं, वेगि ही पधारिये॥ २४२॥
करी वाही भाँति, आयौ जागरण गाड़ी चढ़ि, जानी सब वृद्ध भयो, थकी पाँव गति है।
द्वादशी की आधी रात, लैंके चल्यो मोद गात, भूषण उतारि धरे, जाकी साँची रति है॥
मन्दिर उघारि देखें, परो है उजारि तहाँ, दौरे पाछे जानि, देखि कही कौन मति है।
बापी पधराय हाँकि जाय सुख पाय रह्यो, गह्यो चल्यो जात आनि मार्यो घाव अति है॥२४३॥
देखे चहुँदिसि गाड़ी, कहुँ पै न पाये हरि, करि पछतावो कहैं, भक्त कै लगाई है।
बोलि उठ्यो एक, एहि ओर यह गयो हुतौ, जाय देखें बावरी कौं, लोहू लपटाई है॥
दास कौं जु डारी चोट, ओट लई अंग में ही, नहीं मै तो जाऊँ, बिजै मूरति बताई है।
मेरी सम सोनो लेहु, कही जन तोलि देहु, मेरे कहाँ? बोल्यो बारी तिया कै जताई है॥२४४॥
लगे जब तौलिवे कौं, बारी पाछे डारि दई, नई गति भई, पल उठै नहीं बारी कौ।
तबतौ खिसाने भये, सबै उठि घर गये, कैसें सुख पावैं, फिर्यो मत ही मुरारी कौ॥
घर ही विराजे आप, कह्यो भक्ति कौ प्रताप, जाप करैं जोपै, फुरैं रूप लाल प्यारी कौ।
बलिबन्ध नाम प्रभु, बाँधे बलि भयो तब आयुध को छत सुनि, आये चोट मारी कौ॥ २४५॥
बच्छ हरन पाछैं विदित, सुनौ सन्त अचरज भयो॥
जसू स्वामि के वृषभ, चोरि ब्रजवासी ल्याये।
तैसेई दिये स्याम, वरष दिन खेत जुताये॥
भक्ता बारमुखीजी) (६५
नामा ज्यौं नँददास, मुई इक बच्छि जिवाई।
अंब अल्ह कौं नये, प्रसिद्ध जग गाथा गाई॥
बारमुखी के मुकुट कौं, श्रीरंगनाथ को सिर नयो।
बच्छ हरन पाछैं विदित सुनौ सन्त अचरज भयो॥५४॥
श्रीजसूसूवामीजी
जसू नाम स्वामी, गंगा जमना के मध्य रहें, गहैं साधुसेवा ताको खेती उपजावहीं।
चोरी गये बैल, ताकी इनकौं न सुधि कछू, तैसे दिये स्याम, हल जुटै, मन भावहीं॥
आये ब्रजवासी पैंठ, वृषभ निहारि कही, इन्हें कौन ल्यायो? घर जाय देखि आवहीं।
ऐसे बार दोय चारि, फिरेउ न ठीक होत, पूछी पुनि ल्याये आये उन्हें पै न पावहीं॥२४६॥
बड़ोई प्रभाव देख्यो, तैसे प्रभु बैल दिये भयो हिये भाय, जाय पाँयनि में परे हैं।
निपट अधीन दीन, भाषि अभिलाष जानि, दया के निधान स्वामी, शिष्य लै कै करे हैं॥
चोरी त्यागि दई, अति शुद्ध बुद्धि भई, नई रीति गहि लई, साधु पन्थ अनुसरे है।
अन्न पहुँचावैं, दूध दही दै लड़ावैं आवैं, सन्त गुन गावैं, वे अनन्त सुख भरे हैं॥२४७॥
श्रीनन्ददासजी वैष्णवसेवी
निकट बरेली गाँव, तामें सो हवेली रहें, नन्ददास विप्र, भक्त, साधुसेवा रागी है।
करै द्विज द्वेष, तासौं मुई एक बछिया लै, डारि दई खेत माँझ, गारी जक लागी है॥
हत्या कौं प्रसंग करें, सन्तजन हूँ सौं लरैं, हिन्दू सो न मारै, यह बड़ोई अभागी है।
खेत पर जाय वाही लियो है जिवाय, देखि द्वेषी परे पाँय, भक्ति भाय मति पागी है॥२४८॥
श्रीअल्हजी अर्चवतारनैष्ठिक
चले जात अल्ह, मग लगि बाग दीठि पर्यो, करि अनुराग हरिसेवा विस्तारियै।
वाकि रहे आँव माँगे, माली पास भोग लिये, कह्यो ‘लीजै’ कही, झुकि आई सब डारियै॥
चल्यौ दौरि राजा जहाँ, जायकै सुनाई बात, गात भई प्रीति आप तट पाँय धारियै।
आवत ही लोटि गयो, मैं तो जू सनाथ भयो, देवो लै प्रसाद भक्तिभाव ही सँभारियै॥२४६॥
भक्ता वारमुखीजी
वेश्या को प्रसंग सुनौ, अति रस संग भर्यो, भर्यो घर धन अहो ऐपै कौन काम कौ।
चले मग जात, जन ठौर स्वच्छ आई मन, छाई भूमि आसन सो, लोभ नाहीं दाम कौ॥
६६) (श्री भक्तमाल
निकसी झमकि द्वार, हंस, निहारि सब, कौन भाग जागे, भेद नहीं मेरे नाम कौ।
मुहरनि पात्र भरि, लै महन्त आगे धर्यो, ढर्यो दृग नीर कही भोग करौ स्याम कौ।।२५०।।
पूछी तुम कौन? काके भौन में जनम लियो? कियो सुनि मौन महाचिन्ता चित्त धरी है।
खोलिकै निशंक कहौ, शंका जनि आनो मन, कहि बारमुखी, ऐपै पाँय आय परी है।।
भरो है भण्डार धन, करो अंगीकार अजू ! करिये विचार जोपे, तोपैं यह मरी है।
एक है उपाय, हाथ रंगनाथ जू को अहो, कीजिये मुकुट जामें, जाति गति हरी है।।२५१।।
विप्रहू न छुवें जाको, रंगनाथ कैसे लेत? देत हम हाथ तोकौं, रहें इहाँ कीजिये।
कियोई बनाय सब, घर कौ लगाय धन, बनि ठनि चली, थार मधि धरि लीजिये।।
ऐसें आज्ञा पाइकै, निशंक गई मन्दिर में, फिरी यों सशंक, धिक् तियाधर्म भीजिये।
बोले आप याको ल्याय, आप पहिराय जाय, दियो पहिराय, नयो सीस मति रीझियै।।२५२।।
ब्राह्मण-दम्पत्ति
और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।।
बीच दिये रघुनाथ, भक्त संग ठगिया लागे।
निर्जन वन में जाय, दुष्ट कर्म कियो अभागे।।
बीच दियो सो कहाँ? राम ! कहि नारि पुकारी।
आये सारंगपाणि, शोकसागर ते तारी।।
दुष्ट किये निर्जीव सब, दास प्राण संज्ञा धरी।
और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।।५५।।
विप्र हरिभक्त करि गौनो चल्यो तिया संग, जाके दूनौ रंग, ताकी बात लै जनाइयै।
मग ठग मिले, द्विज पूछैं अहो ! कहाँ जात? जहाँ तुम जात, यामें मन न पत्याइयै।।
पन्थ को छुटाय चाहैं, वन में लिवाय जायँ, कहैं अति सूधो पैंड़ो, उर में न आइयै।
बोले बीच राम, तऊ हिये नेकु धकधकी, कहै वह भाम, श्याम नाम कहाँ पाइयै।।२५३।।
चले लागि संग, अब रंग कै कुरंग करौ, तिया पर रीझे, भक्ति साँची इन जानी है।
गये वन मध्य, ठग लोभ लगि मार्यो विप्र, छिप्र लै कै चले, बधू अति बिलखानी है।।
देखै फिरि-फिरि पाछैं, कहैं कहा देखै? मार्यो तबतौ उचार्यौ देखौं वाही बीच प्रानी है।
आये राम प्यारे, सब दुष्ट मारि डारे, साधु प्रान दै उवारे, हित रीति यों बखानी है।।२५४।।
मास परायण ग्यारहवाँ विश्राम
अन्तर्निष्ठ राजा) (६७
भेषनिष्ठ एक राजा
एक भूप भागौत की, कथा सुनत हरि होय रति।।
तिलक दाम धरि कोइ, ताहि गुरु गोविन्द जानै।
षट्दर्शनी अभाव, सर्वथा घट करि मानै॥
भाँड़ भक्त कौ भेष, हाँसि हित, भँड़कुट ल्याये।
नरपति कै दृढ़ नेम, ताहि ये पाँव धुवाये॥
भाँड़ भेष गाढ़ो गह्यो, दरस परस उपजी भगति।
एक भूप भागौत की कथा सुनत हरि होय रति।। ५६।।
राजा भक्तराज, डोम, भाँड़ कौ न काज होय भोय गई, याके धन हरी कौ न दीजियै।
आये भेष धारि, लै पुजाये, नाचैं दैकेँ तारि, नृपति निहारि कही यों निहाल कीजियै।।
भोजन कराये, भरि मुहरनि थार ल्याये, आगे धरि विनय करी, अजू यह लीजियै।
भई भक्तिरासि बोले, आवै बास भावै नाहिं, बाहिं गहि रहे, कैसैं चले मति भीजियै।। २५५।।
अन्तर्निष्ठ राजा
अन्तरनिष्ठ नृपाल इक, परम धरम, नाहिन धुजी।।
हरि सुमिरण हरि ध्यान, आन काहू न जनावै।
अलग न इहि विधि रहै, अँगना मरम न पावै।।
निद्रावश सो भूप, वदन ते नाम उच्चार्यो।
रानी पति पर रीझि, बहुत वसु ता पर वार्यो।।
ऋषिराज सोचि कह्यो नारि सौं, आज भक्ति मेरी कुजी।
अन्तरनिष्ठ नृपाल इक परम धरम नाहिन धुजी।। ५७।।
तिया हरिभक्त कहै, पति पै न भक्त पायौँ ! रहै मुरझायो मन, सोच बढ़यो भारी है।
मरम न जान्यो, निसि सोवत पिछान्यो भाव,-विरह प्रभाव नाम निकस्यौ, विहारी है।।
सुनत ही रानी, प्रेमसागर सभानी, भोर सम्पत्ति लुटाई मानो, नृपति जियारी है।
देखि उत्साह भूप पूछ्यो सो निवाह कह्यो रह्यो तन ठौर नाम जीव यों विचारी है।। २५६।।
६८) (श्री भक्तमाल
देखि तन त्याग पति, भई और गति याकी, ऐसो रतिवान् मैं न भेद कछू पायो है।
भयो दुख भारी, सुधि-बुधि सब तब टारी, नेकु न विचारी, भावरासि हियो छायो है।।
निसिदिन ध्यान तजे, विरह प्रबल प्रान, भक्ति रस खान, रूप कापै जात गायो है।
जाके यह होय, सोई जानै रस भोय सब, डारै मति खोय, यामें प्रगट दिखायो है।। २५७ ।।
श्री गुरुनिष्ठ भक्त
गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।।
अनुचर आज्ञा माँगि, कह्यो कारज कौं जैहों।
आचारज इक बात, तोहिं आये तें कहिहौं ।।
स्वामी रह्यो समाय, दास दरसन कौं आयो।
गुरु की गिरा विश्वास, फेरि शव घर में ल्यायो ।।
शिषपन साँचो करन कौं, विभु सबै सुनत सोई कह्यो।
गुरु गदित वचन शिष सत्य अति, दृढ़ प्रतीति गाढ़ो गह्यो ।। ५८ ।।
बड़ो गुरुनिष्ठ, कछु घटी साधु, इष्ट जानै, स्वामी, सन्त पूज्य मानैं कैसैं समझाइयै।
नित्यहिं विचारे, पुनि टारे, पै उचारे नाहिं, चल्यो जब रामत कौं, कही फिरि आइयै ।।
सपथ दिवाई न जराइवे कौं दियो तन, ल्यायो यों फिराइ वही बात जू जनाइयै।
साँचो भाव जानि, प्रान आये सो बखान कियो, करो भक्त सेवा, करी वर्ष लौं दिखाइये ।। २५८ ।।
श्रीरैदासजी
सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।।
सदाचार श्रुति शास्त्र, वचन अविरुद्ध उचार्यौ।
नीर खीर विवरण, परम हंसनि उर धार्यौ ।।
भगवत् कृपा प्रसाद, परमगति इहि तन पाई।
राजसिंहासन बैठि, ज्ञाति परतीति दिखाई ।।
वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज वन्दहिं जासु की।
सन्देह ग्रन्थि खण्डन निपुन, वानी विमल रैदास की ।। ५६ ।।
श्रीरैदासजी) (६६
रामानन्द जू कौ शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक, गहे वृत्ति छूटकी की कहे तासौं बानिये।
करो अंगीकार सीधो कहि दस बीस बार, बरषे प्रबल धार तामें वापै आनिये।।
भोग कौं लगावैं प्रभु ध्यान नहिं आवैं, अरे कैसें करि ल्यावैं जाइ पूछि नीच मानिये।
दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि, कुल में उतारी देह सोई याकों जानिये।।२५९।।
माता दूध प्यावे याकों छुयोऊ न भावे सुधि, आवे सब पाछिलि सो सेवा को प्रताप है।
भई नभ वानी रामानन्द मन जानी बड़ो, दण्ड दियो मानी वेगि आये चले आप है।।
दुखी माता-पिता देखि धाय लपटाय पाँय, कीजिये उपाय कियो शिष्य गयो पाप है।
स्तनपान कियो जियो लियो उन्हें ईश जानि, निपट अजानि फेरि भूले भयो ताप है।।२६०।।
बड़ेई रैदास हरिदासनि सौं प्रीति बढ़ी, पिता न सुहाई दई ठौर पिछवारहीं।
हुतो धन माल कन दियो हू न हाल तिया, पति सुख जाल अहो! किये जब न्यारहीं।।
गाँठैं पगदासी क हूँ बात न प्रकासी ल्यावैं, खाल करें जूती साधु-सन्त कौं सँभारही।
डारी एक छानि कियो सेवा को अस्थान रहे, चौड़े आप जानि बाँटि पावै यहि धारहीं।।२६१।।
सहे अति कष्ट अंग हिये सुखसील रंग, आये हरिप्यारे लियो भक्त भेष धारिकैं।
कियो बहु मान खान-पान सो प्रसन्न ह्वै कै दीनों कह्यो पारस हैं राखियो सँभारिकै।।
मेरे धन राम कछु पाथर न सरै काम, दाम मैं न चाहौं, चाहौं डारौं तन वारिकैं।
राँपी एक सोनों कियो दियो करि कृपा राखो, राखो यहु छानि माँझ लैहौं जु निकारिकैं।।२६२।।
आये फिरि श्याम मास तेरह वितीत भये प्रीति करि बोले 'कहो पारस की रीति कौं'।
वाही ठौर लीजै मेरो मन न पतीजै अब, चाहौ सोई कीजै मैं तो पावत हौं भीति कौं।।
लैंके उठि गये नये कौतुक सो सुनो पावैं सेवत मुहर पाँच नित ही प्रतीति कौं।
सेवा हू करत डर लाग्यो निसि कह्यो हरि, छोड़ो अर आपनी ओ राखो मेरी जीतिकौं।।२६३।।
मानि लई बात नई ठौर लै बनाय चाय, सन्तनि बसाय हरि मन्दिर चिनायो है।
विविध वितान तान गनौँ जो प्रमान होइ, भोय गई भक्तिपुरी जग जस गायो है।।
दरसन आवैं लोग नाना विधि रागभोग, रोग भयो विप्रनि कौं तन सब छायो है।
बड़ेई खिलारी वे रहे हैं छान डारि करी, घर पै अँटारी फेरि द्विजन सिखायो है।। २६४।।
प्रीति रसरासि सौं रैदास हरि सेवत हैं, घर में दुराय लोक रंजनादि टारी है।
प्रेरि दिये ह्रदै जाय द्विजानि पुकारि करी, भरी सभा नृप आगे कह्यो मुख गारी है।।
जन कौं बुलाय समझाय न्याय प्रभु सौंपि, कीनौ जग जस साधु लीला मनुहारी है।
जिते प्रतिकूल मैं तो माने अनुकूल, 'यातें सन्तनि प्रभाव मनि कोठरी की तारी है'।।२६५।।
७०) (श्री भक्तमाल
बसत चित्तौर माँझ रानी एक झाली नाम, नाम बिन कान खाली आनि शिष्य भई है।
संगहु तैं विप्र सुनि छिप्र तन आँच लागी, भागी मति नृप आगे भीर सब गई है।।
वैसेहिं सिंहासन पै आयकै विराजे प्रभु, पढ़े वेद वानी पै न आये यह नई है।
पतितपावन नाम कीजिये प्रगट आजु, गायो पद गोद आय बैठे भक्ति लई है।। २६६।।
गई घर झाली पुनि बोलिकै पठाये 'अहो! जैसे प्रतिपाली अब तैसें प्रतिपारिये'।
आपुहू पधारे उन बहु धन पट वारे विप्र सुनि पाँव धारे सीधौ दै निवारिये।।
करिकै रसोई द्विज भोजन करन बैठे द्वै-द्वै मधि एक यों रैदास कौं निहारिये।
देखि भई आँखै दीन भाषैं शिष्य भये लाखैं स्वर्ण को जनेऊ काढ़्यो त्वचा कीनी न्यारिये।।२६७।।
श्रीकबीरजी
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।।
भक्ति विमुख जो धर्म सो अधरम करि गायो।
जोग जग्य व्रत दान भजन बिनु तुच्छ दिखायो।।
हिन्दू तुरक प्रमान रमैनी शबदी साखी।
पक्षपात नहिं वचन सबही के हित की भाखी।।
आरूढ़ दसा ह्वै जगत् पर मुखदेखी नाहिन भनी।
कबीर कानि राखी नहीं वर्णाश्रम षट्दरसनी।। ६०।।
अति ही गम्भीर मति सरस कबीर हियो, लियो भक्तिभाव जाति-पाँति सब टारियै।
भई नभ वानी देह तिलक रमानी करौ, करौ गुरु रामानन्द गरैं माल धारियै।।
देखें नहिं मुख मेरो मानिकैं मलेछ मोकौं जात न्हान गंगा कही मग तन डारियै।
रजनी के शेष में आवेस सौं चलत आप परै पग राम कहै मन्त्र सो विचारिये।। २६८।।
कीनी वही बात माला-तिलक बनाय गात मानि उतपात मात शोर कियो भारियै।
पहुँची पुकार रामानन्द जू कैं पास आनि कही कोऊ पूछे तुम नाम लै उचारिये।
ल्यावौ जू पकरि वाको कब हम शिष्य कियो? ल्याये करि परदा में पूछी कहि डारिये।
राम-नाम मन्त्र यही लिख्यो सब तन्त्रनि में खोलि पट मिले साँचौ मत उर धारियै।। २६६।।
बुनैनं तानों-बानों हिये राम मँडरानौं कहि कैसे कै बखानौं वह रीति कछु न्यारिये।
उतरनोई करैं जामें तन निरवाह होय भोय गई औरै बात भक्ति लागी प्यारियै।।
३. कृष्ण-भक्त एवं अष्टछाप संत (सूरदास, मीराबाई, रसखान, हित हरिवंश)
श्रीकबीरजी) (७१
ठाढ़े मण्डी माँझ पट बेचन लै जन कोऊ, आयो मोकों देहु देह मेरी है उघारियै।
लग्यौ देन आधौ फारि आधे सौं न काम होत, दियो सब लियौ जोपै यहै उर धारियै॥२७०॥
तिया सुत मात मग देखें भूखे आवैं कब? दबि रहे हाटनि में ल्यावैं कहा धाम कौं।
साँचो भक्तिभाव जानि निपट सुजान वे तौ, कृपा के निधान गृह सोच पर्यो श्याम कौं॥
बालद लै धाये दिन तीनि यों बिताये जब, आये घर डारि दई, दई हौ आराम कौं।
माता करै शोर कोऊ हाकिम मरोरि बाँधै, डारौ बिन जानें सुत लेत नहीं दाम कौं॥२७१॥
गये जन दोय चार ढूँढ़िकै लिवाय ल्याये, आये घर सुनी बात जानी प्रभु पीर कौं।
रहे सुख पाय कृपा करी रघुराय दई, छिन में लुटाय सब बोलि भक्त भीर कौं॥
दियौ छोड़ि तानौं-बानौ सुख सरसानौं हिये, किये रोष धाये सुनि विप्र तजि धीर कौं।
क्यों रे तूं जुलाहे ! धन पाये न बुलाये हमें? शूद्रनि कौं दियो जावौ कहैं यों कबीर कौं॥२७२॥
क्यों जू उठि जाऊँ? कछु चोरी धन ल्याऊँ नित, हरिगुन गाऊँ कोऊ राह मैं न मारी है।
उनकौं लै मान कियो याही में अमान भयौ, दयो जोपै जाय हमें तौही तो जियारी है॥
‘घर में तौ नाहीं मण्डी जाहिं तुम रहौ बैठें’, नीठिकै छुटायौ पैडौ छिपे ब्याधि टारी है।
आये प्रभु आप द्रव्य ल्याये समाधान कियो, लियो सुख होय भक्त कीरति उजारी है॥२७३॥
ब्राह्मन कौ रूप धरि आये छिपि बैठे जहाँ, ‘काहे कौं मरत भौन जावौ जू कबीर के।
कोऊ जाय द्वार ताहि देत है अढ़ाई सेर, बेर जिनि लावो चले जावौ यों बहीर के’॥
आये घर माँझ देखि निपट मगन भये, नये-नये कौतुक ये कैसें रहै धीर के।
वारमुखी लई संग मानौ वाही रंग रँगे, जानौ यह बात करी डर अति भीर के॥२७४॥
सन्त देखि डरे सुख भयौई असन्तनि कें, तब तौ विचार मन माँझ और आयो है।
बैठी नृप सभा जहाँ गये पै न मान कियौ, कियौ एक चोज उठि जल ढरकायो है॥
राजा जिय सोच पर्यो कर्यो कहा? कह्यो तब, जगन्नाथ पण्डा पाँव जरत बचायो है।
सुनि अचरज भरे नृप ने पठाये नर ल्याये सुधि कही ‘अजू साँच ही सुनायो है’॥२७५॥
कही राजा रानी सौं ‘जु बात वह साँची भई, आँच लागी हिये अब कहो कहा कीजियै?’।
‘चले ही बनत चले’ सीस तृण बोझ भारी, गरे सो कुल्हारी बाँधि तिया संग भीजियै॥
निकसे बजार ह्वैकै डारि दई लोकलाज, कियौ मैं अकाज छिन-छिन तन छीजियै।
दूर ते कबीर देखि ह्वै गये अधीर महा, आये उठि आगे कह्यौ डारि मति रीझियै॥२७६॥
देखिकै प्रभाव फेरि उपज्यूँ अभाव द्विज, आयौ पादसाह सो सिकन्दर सुनावै है।
विमुख समूह संग माता हूँ मिलाय लई, जायकै पुकारे ‘जू दुखायौ सब गाँव है’॥
७२) (श्री भक्तमाल
ल्यावौ रे ! पकरि वाको देखौं ये मकर कैसो, अकर मिटाऊँ गाढ़े जकर तनाव है।
आनि ठाढ़े किये काजी कहत 'सलाम करौ', जानै न सलाम जानै राम गाढ़े पाँव है।। २७७ ।।
बाँधिकै जंजीर गंगा नीर माँझ वोरि दिये, जिये तीर ठाढ़े कहै 'जन्त्र-मन्त्र आवंही'।
लकरीन माँझ डारि अगिनि प्रजारि दई, नई मानो भई देह कंचन लजावही।।
विफल उपाय भये तऊ नहीं आय नये, तब मतवारो हाथी आनिकै झुकावही।
आवत न ढिंग औ चिघारि हारि भाजि जाय, आप आगे सिंह रूप बैठे सो भगावहीँ।। २७८ ।।
देख्यो बादसाह भाव कूदि परे गहे पाँव, देखि करामात मात भये सब लोग हैं।
'प्रभु पै बचाय लीजै हमें न गजब कीजै, दीजै जोई चाहो गाँव देश नाना भोग हैं'।
'चाहैं एक राम जाकौं जपैं आठो याम और, दाम सौं न काम जामें भरे कोटि रोग हैं'।
आये घर जीति साधु मिले करि प्रीति जिन्हें, हरि की प्रतीति वेई गायवे के जोग है।। २७९ ।।
होय के खिसाने द्विज निज चारि विप्रन के, मूँडनि मुड़ायो भेष सुन्दर बनाये है।
दूर-दूर गाँवनि में नावनि को पूँछि-पूँछि, नाम लै कबीर जू कौ झूठैं न्योति आये है।
आये सब साधु सुनि एतो दुरि गये कहूँ, चहुँ दिसि सन्तनि के फिरैं हरि धाये हैं।
उनहीं को रूप धरि न्यारी-न्यारी ठौर बैठे, एकु मिलि गये नीके पोषिकै रिझाये हैं।। २८० ।।
आई अपछरा छारिवे के लिये भेष किये, हिये देखि गाढ़ो फिरि गई नहीं लागी है।
चतुर्भुजरूप प्रभु आनिकैं प्रगट कियो, लियो फल नैननि कौ बड़ौ बड़भागी है।।
सीस धरै हाथ तन साथ मेरे धाम आवौ, गावौ गुन रहौ जौलौं तेरी मति पागी हैं।
मगह में जाय भक्तिभाव को दिखाय बहु, फूलनि मँगाय पौढ़ि मिल्यौ हरि रागी है।। २८१।।
मास परायण बाहरवाँ विश्राम
श्रीपीपाजी की कथा
पीपा प्रताप जग वासना, नाहर कौं उपदेश दियौ ।।
प्रथम भवानी भक्त, मुक्ति माँगन कौं धायौ।
सत्य कह्यो तिहिं शक्ति, सुदृढ़ हरिशरण बतायौ ।।
श्रीरामानन्द पद पाइ, भयौ अति भक्ति की सीवाँ ।
गुण असंख्य निर्मोल, सन्त धरि राखत ग्रीवाँ ।।
परसि प्रणाली सरस भई, सकल विश्व मंगल कियौ ।
पीपा प्रताप जग वासना नाहर कौं उपदेश दियौ ।। ६१ ।।