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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 82

अन्तर्निष्ठ राजा) (६७
भेषनिष्ठ एक राजा
एक भूप भागौत की, कथा सुनत हरि होय रति।।
तिलक दाम धरि कोइ, ताहि गुरु गोविन्द जानै।
षट्दर्शनी अभाव, सर्वथा घट करि मानै॥
भाँड़ भक्त कौ भेष, हाँसि हित, भँड़कुट ल्याये।
नरपति कै दृढ़ नेम, ताहि ये पाँव धुवाये॥
भाँड़ भेष गाढ़ो गह्यो, दरस परस उपजी भगति।
एक भूप भागौत की कथा सुनत हरि होय रति।। ५६।।
राजा भक्तराज, डोम, भाँड़ कौ न काज होय भोय गई, याके धन हरी कौ न दीजियै।
आये भेष धारि, लै पुजाये, नाचैं दैकेँ तारि, नृपति निहारि कही यों निहाल कीजियै।।
भोजन कराये, भरि मुहरनि थार ल्याये, आगे धरि विनय करी, अजू यह लीजियै।
भई भक्तिरासि बोले, आवै बास भावै नाहिं, बाहिं गहि रहे, कैसैं चले मति भीजियै।। २५५।।
अन्तर्निष्ठ राजा
अन्तरनिष्ठ नृपाल इक, परम धरम, नाहिन धुजी।।
हरि सुमिरण हरि ध्यान, आन काहू न जनावै।
अलग न इहि विधि रहै, अँगना मरम न पावै।।
निद्रावश सो भूप, वदन ते नाम उच्चार्यो।
रानी पति पर रीझि, बहुत वसु ता पर वार्यो।।
ऋषिराज सोचि कह्यो नारि सौं, आज भक्ति मेरी कुजी।
अन्तरनिष्ठ नृपाल इक परम धरम नाहिन धुजी।। ५७।।
तिया हरिभक्त कहै, पति पै न भक्त पायौँ ! रहै मुरझायो मन, सोच बढ़यो भारी है।
मरम न जान्यो, निसि सोवत पिछान्यो भाव,-विरह प्रभाव नाम निकस्यौ, विहारी है।।
सुनत ही रानी, प्रेमसागर सभानी, भोर सम्पत्ति लुटाई मानो, नृपति जियारी है।
देखि उत्साह भूप पूछ्यो सो निवाह कह्यो रह्यो तन ठौर नाम जीव यों विचारी है।। २५६।।