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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 80

भक्ता बारमुखीजी) (६५
नामा ज्यौं नँददास, मुई इक बच्छि जिवाई।
अंब अल्ह कौं नये, प्रसिद्ध जग गाथा गाई॥
बारमुखी के मुकुट कौं, श्रीरंगनाथ को सिर नयो।
बच्छ हरन पाछैं विदित सुनौ सन्त अचरज भयो॥५४॥
श्रीजसूसूवामीजी
जसू नाम स्वामी, गंगा जमना के मध्य रहें, गहैं साधुसेवा ताको खेती उपजावहीं।
चोरी गये बैल, ताकी इनकौं न सुधि कछू, तैसे दिये स्याम, हल जुटै, मन भावहीं॥
आये ब्रजवासी पैंठ, वृषभ निहारि कही, इन्हें कौन ल्यायो? घर जाय देखि आवहीं।
ऐसे बार दोय चारि, फिरेउ न ठीक होत, पूछी पुनि ल्याये आये उन्हें पै न पावहीं॥२४६॥
बड़ोई प्रभाव देख्यो, तैसे प्रभु बैल दिये भयो हिये भाय, जाय पाँयनि में परे हैं।
निपट अधीन दीन, भाषि अभिलाष जानि, दया के निधान स्वामी, शिष्य लै कै करे हैं॥
चोरी त्यागि दई, अति शुद्ध बुद्धि भई, नई रीति गहि लई, साधु पन्थ अनुसरे है।
अन्न पहुँचावैं, दूध दही दै लड़ावैं आवैं, सन्त गुन गावैं, वे अनन्त सुख भरे हैं॥२४७॥
श्रीनन्ददासजी वैष्णवसेवी
निकट बरेली गाँव, तामें सो हवेली रहें, नन्ददास विप्र, भक्त, साधुसेवा रागी है।
करै द्विज द्वेष, तासौं मुई एक बछिया लै, डारि दई खेत माँझ, गारी जक लागी है॥
हत्या कौं प्रसंग करें, सन्तजन हूँ सौं लरैं, हिन्दू सो न मारै, यह बड़ोई अभागी है।
खेत पर जाय वाही लियो है जिवाय, देखि द्वेषी परे पाँय, भक्ति भाय मति पागी है॥२४८॥
श्रीअल्हजी अर्चवतारनैष्ठिक
चले जात अल्ह, मग लगि बाग दीठि पर्यो, करि अनुराग हरिसेवा विस्तारियै।
वाकि रहे आँव माँगे, माली पास भोग लिये, कह्यो ‘लीजै’ कही, झुकि आई सब डारियै॥
चल्यौ दौरि राजा जहाँ, जायकै सुनाई बात, गात भई प्रीति आप तट पाँय धारियै।
आवत ही लोटि गयो, मैं तो जू सनाथ भयो, देवो लै प्रसाद भक्तिभाव ही सँभारियै॥२४६॥
भक्ता वारमुखीजी
वेश्या को प्रसंग सुनौ, अति रस संग भर्यो, भर्यो घर धन अहो ऐपै कौन काम कौ।
चले मग जात, जन ठौर स्वच्छ आई मन, छाई भूमि आसन सो, लोभ नाहीं दाम कौ॥