श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरैदासजी) (६६
रामानन्द जू कौ शिष्य ब्रह्मचारी रहे एक, गहे वृत्ति छूटकी की कहे तासौं बानिये।
करो अंगीकार सीधो कहि दस बीस बार, बरषे प्रबल धार तामें वापै आनिये।।
भोग कौं लगावैं प्रभु ध्यान नहिं आवैं, अरे कैसें करि ल्यावैं जाइ पूछि नीच मानिये।
दियो शाप भारी बात सुनी न हमारी घटि, कुल में उतारी देह सोई याकों जानिये।।२५९।।
माता दूध प्यावे याकों छुयोऊ न भावे सुधि, आवे सब पाछिलि सो सेवा को प्रताप है।
भई नभ वानी रामानन्द मन जानी बड़ो, दण्ड दियो मानी वेगि आये चले आप है।।
दुखी माता-पिता देखि धाय लपटाय पाँय, कीजिये उपाय कियो शिष्य गयो पाप है।
स्तनपान कियो जियो लियो उन्हें ईश जानि, निपट अजानि फेरि भूले भयो ताप है।।२६०।।
बड़ेई रैदास हरिदासनि सौं प्रीति बढ़ी, पिता न सुहाई दई ठौर पिछवारहीं।
हुतो धन माल कन दियो हू न हाल तिया, पति सुख जाल अहो! किये जब न्यारहीं।।
गाँठैं पगदासी क हूँ बात न प्रकासी ल्यावैं, खाल करें जूती साधु-सन्त कौं सँभारही।
डारी एक छानि कियो सेवा को अस्थान रहे, चौड़े आप जानि बाँटि पावै यहि धारहीं।।२६१।।
सहे अति कष्ट अंग हिये सुखसील रंग, आये हरिप्यारे लियो भक्त भेष धारिकैं।
कियो बहु मान खान-पान सो प्रसन्न ह्वै कै दीनों कह्यो पारस हैं राखियो सँभारिकै।।
मेरे धन राम कछु पाथर न सरै काम, दाम मैं न चाहौं, चाहौं डारौं तन वारिकैं।
राँपी एक सोनों कियो दियो करि कृपा राखो, राखो यहु छानि माँझ लैहौं जु निकारिकैं।।२६२।।
आये फिरि श्याम मास तेरह वितीत भये प्रीति करि बोले 'कहो पारस की रीति कौं'।
वाही ठौर लीजै मेरो मन न पतीजै अब, चाहौ सोई कीजै मैं तो पावत हौं भीति कौं।।
लैंके उठि गये नये कौतुक सो सुनो पावैं सेवत मुहर पाँच नित ही प्रतीति कौं।
सेवा हू करत डर लाग्यो निसि कह्यो हरि, छोड़ो अर आपनी ओ राखो मेरी जीतिकौं।।२६३।।
मानि लई बात नई ठौर लै बनाय चाय, सन्तनि बसाय हरि मन्दिर चिनायो है।
विविध वितान तान गनौँ जो प्रमान होइ, भोय गई भक्तिपुरी जग जस गायो है।।
दरसन आवैं लोग नाना विधि रागभोग, रोग भयो विप्रनि कौं तन सब छायो है।
बड़ेई खिलारी वे रहे हैं छान डारि करी, घर पै अँटारी फेरि द्विजन सिखायो है।। २६४।।
प्रीति रसरासि सौं रैदास हरि सेवत हैं, घर में दुराय लोक रंजनादि टारी है।
प्रेरि दिये ह्रदै जाय द्विजानि पुकारि करी, भरी सभा नृप आगे कह्यो मुख गारी है।।
जन कौं बुलाय समझाय न्याय प्रभु सौंपि, कीनौ जग जस साधु लीला मनुहारी है।
जिते प्रतिकूल मैं तो माने अनुकूल, 'यातें सन्तनि प्रभाव मनि कोठरी की तारी है'।।२६५।।