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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

प्रसादानिष्ठ श्रीपुरुषोत्तमजी नृपति) (५५
मार मार करि कर खड्ग निकासि लियौ, दियौ घोरौ सागर में सो आवेस आयो है।
'मारौं याहि काल दुष्ट रावन विहाल करौं, पाँवन को देखौं सीता' भाव दृग छायो है।।
जानकीरवन दोऊ दरसन दियो आनि, बोले 'बिन प्रान कियौ नीच फल पायो है'।
सुनि सुख भयो गयौ शोक हृदै दारुन जो, रूप की निहारनि यों फेरिकै जिवायो है।। १६१।।
श्रीलीलानुकरणजी, श्रीरतिवन्तीबाईजी
नीलाचल धाम तहाँ लीला अनुकर्न भयो, नरसिंह रूप धारि साँचै मारि डार्यो है।
कोऊ कहै द्वेष कोऊ कहत आवेस तोपै, करौ दसरथ कियो भाव पूरो पार्यो है।।
हुती एक बाई कृष्ण रूप सौं लगाई मति कथा में न आई सुत सुनी कह्यो धार्यो है।
'बाँधे जसुमति' सुनि औरै भई गति करि दई साँची रति तन तज्यो मानौ वार्यो है।। १६२।
सप्ताह परायण दूसरा विश्राम
प्रसाद अवज्ञा जानिकैं, पाणि तज्यौ एकै नृपति।।
हौं कहा कहौं बनाइ, बात सबही जग जानैं।
कर तैं दौना भयो, स्याम सौरभ मन मानैं।।
छपन भोग तैं पहिल, खीच करमा कौ भावैं।
सिलपिल्ले के कहत, कुँअरि पै हरि चलि आवैं।।
भक्तन हित सुत विष दियौ, भूप नारि प्रभु राखि पति।
प्रसाद अवज्ञा जानिकैं, पाणि तज्यौ एकै नृपति।। ५०।।
प्रसादानिष्ठ श्रीपुरुषोत्तमजी नृपति
प्रसाद की अवज्ञा तैं तज्यो नृप कर एक, करिकैं विवेक सुनौ जैसें बात भई है।
खेलै भूप चौपरि कौं आयो प्रभु-भुक्त-शेष, दाहिने में पासे बाँये छुयौ मति गई है।।
लै गये रिसायकैं फिराय महा दुख पाय, उठ्यो नरदेव गृह गयो सुनी नई है।
लियो अनसन 'हाथ तजौं याही छन तब, साँचौ मेरौ पन' बोलि विप्र पूछि लई है।। १६३।।
काटै हाथ कौन मेरो? रह्यो गहि मौन यातैं, पूछत सचिव कही विथा सो विचारियै।
आवै एक प्रेत मो दिखाई नित देत, निसि डारिकैं झरोखा कर शोर करै भारियै।।
'सोऊँ ढिंग आइ रहौं आपुकौं छिपाइ जब, डारैं पानि आनि तबही सुकाटि डारियै'।
कही नृप भलैं चौकी देत में घुमायो भूप, डार्यो उठि आइ छेद न्यारो कियौ वारियै।। १६४।।