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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

६४) (श्री भक्तमाल
आयौ वृन्दावन, वनवासी श्रीगोपाल जू सौं बोल्यो चलौ साखी देवौ, लई है लिखाइकै।
बीते कैयौ याम, तब बोले स्यामसुन्दर जू, प्रतिमा न चलै, तोपै बोले क्यौं जू भायकै॥
लागे जब संग, युग सेर भोग धरौ रंग, आधे-आध पावैं, चलौं नूपुर बजायकै।
धुनि तेरे कान परै, पाँछै जिनि दीठि करै, करैं रहौं वाहि ठौर कही मैं सुनायकै॥ २४०॥
गये ढिंग गाँव, कही नेकु तौ चितॉव रहे, चितये तें ठाढ़े, दियो मृदु मुसकायकै।
ल्यावौ जू बुलाय कह्यो, आय देखौ, आये आप, सुनतहिं चौंकि सब ग्राम आयो धायकै॥
बोलिकै सुनाई साष, पूजी हिये अभिलाष, लाख लाख भाँति रंग भर्यो उर भायकै।
आयो न सरूप फेरि, विनै करि राख्यो घेरि, भूप सुख ढेरि दियो, अबलौं बजायकै॥ २४१॥
श्रीरामदासजी
द्वारका के ढिंग ही डाकौर एक गाँव रहे रहै, रामदास भक्त-भक्ति जाकौं प्यारियै।
जागरण एकादशी करे रनछोर जू के, भयौ तन वृद्ध, आज्ञा दई नहिं धारियै॥
बोले भरि भाय, तेरौ आयवौ सह्यौ न जाय, चलौं घर धाय तेरे, ल्यावौ गाड़ी भारियै।
खिरकी जु मन्दिर के पाछे, तहाँ ठाढ़ी करौ, भरौ अँकवारी मोकौं, वेगि ही पधारिये॥ २४२॥
करी वाही भाँति, आयौ जागरण गाड़ी चढ़ि, जानी सब वृद्ध भयो, थकी पाँव गति है।
द्वादशी की आधी रात, लैंके चल्यो मोद गात, भूषण उतारि धरे, जाकी साँची रति है॥
मन्दिर उघारि देखें, परो है उजारि तहाँ, दौरे पाछे जानि, देखि कही कौन मति है।
बापी पधराय हाँकि जाय सुख पाय रह्यो, गह्यो चल्यो जात आनि मार्यो घाव अति है॥२४३॥
देखे चहुँदिसि गाड़ी, कहुँ पै न पाये हरि, करि पछतावो कहैं, भक्त कै लगाई है।
बोलि उठ्यो एक, एहि ओर यह गयो हुतौ, जाय देखें बावरी कौं, लोहू लपटाई है॥
दास कौं जु डारी चोट, ओट लई अंग में ही, नहीं मै तो जाऊँ, बिजै मूरति बताई है।
मेरी सम सोनो लेहु, कही जन तोलि देहु, मेरे कहाँ? बोल्यो बारी तिया कै जताई है॥२४४॥
लगे जब तौलिवे कौं, बारी पाछे डारि दई, नई गति भई, पल उठै नहीं बारी कौ।
तबतौ खिसाने भये, सबै उठि घर गये, कैसें सुख पावैं, फिर्यो मत ही मुरारी कौ॥
घर ही विराजे आप, कह्यो भक्ति कौ प्रताप, जाप करैं जोपै, फुरैं रूप लाल प्यारी कौ।
बलिबन्ध नाम प्रभु, बाँधे बलि भयो तब आयुध को छत सुनि, आये चोट मारी कौ॥ २४५॥
बच्छ हरन पाछैं विदित, सुनौ सन्त अचरज भयो॥
जसू स्वामि के वृषभ, चोरि ब्रजवासी ल्याये।
तैसेई दिये स्याम, वरष दिन खेत जुताये॥