श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
श्वेतद्वीप के भक्त) (३३
जम्बूद्वीप के भक्त
मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥
इलावर्त्त अधीस संकर्षण, अनुग सदाशिव।
रमनक मछ मनु दास, हिरण्य कूरम अर्जम इव॥
कुरु वराह भूभृत्य, वर्ष हरि सिंह प्रह्लादा।
किंपुरुष राम कपि, भरत नरायन बीना नादा॥
भद्राश्वग्रीवहय भद्रसव केतु काम कमला अनूप।
मध्यदीप नवखण्ड में, भक्त जिते मम भूप॥ २५॥
श्वेतद्वीप के भक्त
श्वेतदीप में दास जे, श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥
श्रीनारायण वदन निरन्तर ताही देखें।
पलक परै जो बीच कोटि जमजातन लेखैं॥
तिनके दरशन काज गये तहँ वीणाधारी।
श्याम दई कर सैन उलटि अब नहिं अधिकारी॥
नारायण आख्यान दृढ़, तहँ प्रसंग नाहिन तथा।
श्वेतदीप में दास जे श्रवण सुनौ तिनकी कथा॥ २६॥
श्वेतदीपवासी सदा रूप के उपासी गये, नारद विलासी उपदेस आसा लागी है।
दई प्रभु सैन जिनि आवो इहि ऐन दृग, देखें सदा चैन मति गति अनुरागी है।।
फिरे दुख पाइ जाइ कही श्रीवैकुण्ठनाथ, साथ लिये चले लखो भक्ति अँग पागी है।
देख्यो एक सर खग रह्यो ध्यान धरि ऋषि, पूछैं कहो हरि कह्यो बड़ो बड़भागी है।। १०३।।
बरष हजार बीते भये नहीं चितचीते, प्यासोई रहत ऐपै पानी नहीं पीजिये।
पावै जो प्रसाद तब जीभ सौं स्वाद लेत, लेत नहीं और याकी मति रस भीजिये।।
लीजै बात मानि जलपान करि डारि दियो, लियो चोंच भरि दृग भरि बुधि धीजिये।
अचरज देखि चख लगै न निमेष किहूँ, चहुँदिसि फिर्यो अब सेवा याकी कीजिये।। १०४।।
३४) (श्री भक्तमाल
चलो आगे देखौ कोऊ रहै न परेखौ भाव, भक्ति करि लेखौ गये द्वीप हरि गाइये।
आयो एकजन धाय आरती समय विहाय, खैचि लिये प्रान फिरि बधू याकी आइये।।
वही इन कही पति देख्यो नहीं मही पर्यो, हर्यो याको जीव तन गिर्यो मन भाइये।
ऐसे पुत्र आदि आये साँचे हित में दिखाये, फेरिकै जिवाये ऋषि गाये चित लाइये।।१०५।।
अष्टकुल नाग भक्त
उरग अष्टकुल द्वारपाल, सावधान हरिधाम थिति।।
इलापत्र मुख अनन्त, अनन्त कीरति बिसतारत।
पद्म शंकु पन प्रकट, ध्यान उर ते नहिं टारत।।
अश्वकमल वासुकी, अजित आज्ञा अनुवरती।
करकोटक तक्षक सुभट सेवा सिर धरती।।
आगमोक्त शिवसंहिता "अगर" एकरस भजन रति।
उरग अष्टकुल द्वारपाल सावधान हरिधाम थिति।। २७।।
।। इति पूर्वार्ध।।
श्रीसम्प्रदाय) (३५
अथ श्रीभक्तमाल उत्तरार्द्ध
चतुःसम्प्रदायाचार्य
चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।।
• श्रीरामानंद उदार, सुधानिधि अवनि कल्पतरु।
विष्णुस्वामि बोहित्य, सिन्धु संसार पार करु ।।
मध्वाचारज मेघ, भक्ति सर ऊसर भरिया ।
निम्बादित्य आदित्य, कुहर अज्ञान जु हरिया ।।
जनम करम भागवत, धरम सम्प्रदाय थापीं अघट।
चौबीस प्रथम हरि वपु धरे त्यौं चतुर्व्यूह कलियुग प्रगट ।। २८ ।।
रमा पद्धति रामानंद विष्णुस्वामि त्रिपुरारी ।
निम्बादित्य सनकादिका मधुकर गुरु मुखचारि ।। २६ ।।
श्रीनिम्बार्काचार्यजी
निम्बादित्य नाम जाते भयो अभिराम कथा, आयो एक दण्डी ग्राम न्योतो करि आये हैं।
पाक को अबार भई सन्ध्या मानि लई जती, 'रतीहूँ न पाऊँ' वेद वचन सुनाये हैं।।
आँगन में नींब तापै आदित दिखायौ ताहि, भोजन करायो पाछे निसि चिह्न पाये हैं।
प्रगट प्रभाव देखि जान्यो भक्तिभाव जग, दाँव पाइ नाव पर्यो हर्यो मन गाये हैं।। १०६ ।।
श्रीसम्प्रदाय
सम्प्रदाय शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्तान ।।
विष्वक्सेन मुनिवर्य, सु पुनि सठकोप पुनीता।
वोपदेव भागवत, लुप्त उधर्यो नवनीता ।।
• पाठान्तर - श्रीरामानुज उदार सुधानिधि अवनि कल्पतरु।
३६) (श्री भक्तमाल
मंगल मुनि श्रीनाथ, पुण्डरीकाक्ष परम जस।
राममिश्र रसरासि, प्रगट परताप परांकुश॥
यामुन मुनि रामानुज, तिमिर हरन उदय भान।
सम्प्रदायं शिरोमणि सिन्धुजा, रच्यौ भक्ति वित्त न॥ ३०॥
स्वामी श्रीरामानुजाचार्यजी
सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत उधारन जतन कियो॥
गोपुर ह्वै आरूढ़, उच्चस्वर मन्त्र उच्चार्यो।
सूते नर परे जागि, बहत्तरि श्रवणनि धार्यो॥
तितनेई गुरुदेव पधति, भई न्यारी न्यारी।
कुरुतारक शिष्य प्रथम, भक्ति वपु मंगलकारी॥
कृपणपाल करुणा समुद्र, रामानुज सम नहिं बियो।
सहस्त्र आस्य उपदेश करि जगत् उधारन जतन कियो॥३१॥
आस्य सो वदन नाम सहस हजार मुख, शेष अवतार जानो वही सुधि आई है।
गुरु उपदेसि मन्त्र कह्यो 'नीके राख्यो' अन्त्र, जपतहिं श्याम जू ने मूरति दिखाई है॥
करुनानिधान कही 'सब भगवान पावें' चढ़ि दरवाजे सो पुकार्यो धुनि छाई है।
सुनि सीखि लियो यों बहत्तरहि सिद्ध भये, नयो भक्ति चोज यह रीति लैके गाई है॥१०७॥
गये नीलाचल जगन्नाथ जू के देखिवे कौं, देख्यो अनाचार सब पण्डा दूरि किये है।
संग लै हजार शिष्य रंग भरि सेवा करें, धरैं हिये भाव गूढ़ मत दरसाये हैं॥
बोले प्रभु 'वेई आवैं' करे अंगीकार मैं तो, प्यार ही को लेत कँभू औगुन न लिये है।
तऊ दृढ़ कीनी फिरि कही नहीं कान दीनी, लीनी वेदवानी विधि कैसे जात छिये हैं॥१०८॥
जोरावर भक्त सौं बसाइ नहीं कही किती, रती हूँ न लावैं मन चोज दरसायौ है।
गरुड़ को आज्ञा दई सोई मानि लई उन, शिष्य नि समेत निज देस छोड़ि आयौ है॥
जागिकै निहारे ठौर और ही मगन भये, दिये यों प्रगट करि गूढ़ भाव पायौ है।
वेई सब सेवा करैं, श्याम मन सदा हरैं, धरें साँचो प्रेम हिये प्रभू जू दिखायौ है॥१०६॥
मास परायण पांचवा विश्राम
श्रीलालाचार्यजी) (३७
चार दिग्गज महन्त
चतुर महन्त दिग्गज चतुर, भक्तिभूमि दाबे रहैं।।
श्रुतिप्रज्ञा श्रुतिदेव, ऋषभ पुहकर इभ ऐसे।
श्रुतिधामा श्रुतिउदधि, पराजित वामन जैसे।।
श्रीरामानुज गुरु बन्धु, विदित जग मंगलकारी।
शिवसंहिता प्रणीत, ज्ञान सनकादिक सारी।।
इन्दिरा पद्धति उदारधी, सभा साखि सारंग कहैं।
चतुर महन्त दिग्गज चतुर भक्तिभूमि दाबे रहैं।। ३२।।
श्रीलालाचार्यजी
आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।।
कोउ मालाधारी मृतक, बह्यो सरिता में आयो।
दाह कृत्य ज्यों बन्धु, न्यौति सब कुटुम्ब बुलायो।।
नाक सकोचहिं विप्र, तबहिं हरिपुर जन आये।
जेंवत देखे सबनि, जात काहू नहिं पाये।।
लालाचारज लक्षधा, प्रचुर भई महिमा जगति।
आचारज जामात की, कथा सुनत हरि होइ रति।। ३३।।
आचारज को जामात बात ताकी सुनौ नीके, पायो उपदेस 'सन्त बन्धु करि मानियै'।
कीजै कोटिगुनी प्रीति ऐपै न बनति रीति तातें इति करौ याते घटती न आनिये।।
मालाधारी साधु तनु सरिता में बह्यो आयो, ल्यायो घर फेरिकै विमान सब जानिये।
गावत बजावत लै नीर तीर दाह कियो, हियो दुख पायो सुख पायो समाधानिये।। ११०।।
कियो सो महोच्छो ज्ञाति विप्रन को न्योतो दियो, लियो आये नहिं कियो शंका दुखदाइये।
भये इकठौरे माया कीने सब बौरे कछु, कहैं बात औरे मरी देह बही आइये।।
याते नहीं खात वाकी जानत न जाति-पाँति, बड़ौ उतपात घर ल्याइ जाइ दाहिये।
मग अवलोकि उत पर्यो सुनि शोक हिये, जिये आइ पूछें गुरु कैसे कै निवाहिये।। १११।।
चले श्री आचारज पै बारिज बदन देखि, करि साष्टांग बात कहि सो जनाइयै।
जाओ निहशंक, वे प्रसाद को न जानैं रंक, जानैं जे प्रभाव आवैं वेगि सुखदाइयै।।
३८) (श्री भक्तमाल
देखे नभ-भूमि-द्वार ऐंहैं निरधारजन, वैकुण्ठ-निवासी पाँति ढिग ह्वै कै आइयै।
इन्हें अब जान देवो जनि कछू कहो अहो ! गहो करौ हाँसी जब घर जाय खाइयै।। ११२।।
आये देखि पारषद गयो गिरी भूमि सद, हद करी कृपा यह जानि निज जन को।
पायौ लै प्रसाद स्वाद कहि अह्लाद भयो, नयो लयो मोद जान्यो साँचो सन्तपन को।।
विदा ह्वै पधारे नभ-मग में सिधारे विप्र, देखत विचारे द्वार व्यथा भई मन को।
गयौ अभिमान आनि मन्दिर मगन भये, नये दृग लाज बीनि-बीनि लेत कन को।। ११३।।
पांइ लपटाय अँग धूरि में लुटाय कहैं, करौ मनभायो और दीन बहु भाख्यौ है।
कही भक्तराज तुम कृपा मैं समाज पायो, गायो जो पुरानन में रूप नैन चाख्यौ है।।
छाड़ो उपहास अब करो निज दास हमें, पूजै हिये आस मन अति अभिलाख्यौ है।
किये परशंस मानो हंस ये परम कोऊ, ऐसे जस लाख भाँति घर-घर राख्यो है।। ११४।।
श्रीपादपद्माचार्य जी (गुरु और शिष्य)
श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।।
गुरु गमन कियो परदेश, शिष्य सुरधुनी दृढ़ाई।
इक मंजन इक पान, हृदय वन्दना कराई।।
गुरु गंगा में प्रविशि, शिष्य को वेगि बुलायौ।
विष्णुपदी भय मानि, कमल पत्रन पर धायौ।।
पादपद्म ता दिन प्रगट, सब प्रसन्न मन परम रुचि।
श्रीमदारग उपदेश कृत, श्रवण सुनौ आख्यान शुचि।। ३४।।
देवधुनी तीर सो कुटीर बहु साधु रहैं, रहै गुरुभक्त एक न्यारो नहिं ह्वै सकै।
चले प्रभु गाँव ‘जिनि तजो बलि जांव’ करौ कही दास सेवा गंगा में ही कैसें छ्वै सकै।।
क्रिया सब कूप करै विष्णुपदी ध्यान धरै, रोष भरे सन्तश्रेणी भाव नहीं भ्वै सकै।
आये ईश जानि दुखमानि सो बखान कियो, आनि मन जनि बात अंग कैसे ध्वै सकै।। ११५।।
चले लैके न्हान संग गंग में प्रवेस कियो, रंग भरि बोले सो अँगोछा वेगि ल्याइयै।
करत विचार सोच सागर न पारावर, गंगा जू प्रकट कह्यो कजन पै आइये।।
चलेई अधर पग धरै सो मधुर जाइ, प्रभु हाथ दियो लियो तीर भीर छाइये।
निकसत धाय चाय पग लपटाय गये, बड़ौ परताप यह निसिदिन गाइये।। ११६।।
श्रीअनन्तानन्दजी) (३६
श्रीसम्प्रदाय
• श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।।
देवाचारज द्वितीय, महामहिमा हरियानन्द।
तस्य राघवानन्द भये, भक्तन को मानद।।
पत्रावलम्ब पृथिवी करी, व काशी स्थाई।
चारि वरन आश्रम, सबही को भक्ति दृढ़ाई।।
तिनके रामानन्द प्रगट, विश्व मंगल जिन्ह वपु धर्यौ।
श्रीरामानंद पद्धति प्रताप, अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।। ३५।।
स्वामी श्रीरामानन्दाचार्यजी
श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं, दृतिय सेतु जग तरन कियो।।
अनन्तानन्द, कबीर, सुखा, सुरसुरा, पद्मावति नरहरि।
पीपा, भावानन्द, रैदास, धना, सेन सुरसुर की घरहरि।।
औरौ शिष्य प्रशिष्य, एक ते एक उजागर।
जग मंगल आधार, भक्ति दशधा के आगर।।
बहुत काल वपु धारिकै, प्रणत जनन कौं पार दियो।
श्रीरामानन्द रघुनाथ ज्यौं दृतिय सेतु जग तरन कियो।। ३६।।
श्रीअनन्तानन्दजी
श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।।
योगानन्द, गयेश, करमचन्द, अल्ह, पैहारी।
सारी रामदास श्रीरंग, अवधि गुण महिमा भारी।।
तिनके नरहरि उदित, मुदित मेहा मंगलतन।
रघुवर यदुवर गाइ, विमल कीरति संच्यो धन।।
हरिभक्ति सिन्धु बेला रचे, पानि पद्मजा सिर दये।
श्रीअनन्तानन्द पद परसिकै, लोकपाल से ते भये।। ३७।।
• पाठान्तर - श्रीरामानुज पद्धति प्रताप अवनि अमृत ह्वै अनुसर्यौ।
४०) (श्री भक्तमाल
श्रीरंगजी
द्यौसा एक गाँव, तहाँ श्रीरंग सुनाम हुतो, बनिक सराबगी की कथा लै बखानिये।
रहतो गुलाम गयो धर्मराज धाम उहाँ, भयो बड़ो दूत कही सुनु अरे बानिये।।
आये बनिजारे लैन देख तूँ दिखावैं चैन, बैल शृंगमध्य पैठि मारे पहचानिये।
बिनु हरिभक्ति सब जगत की यही रीति, भयो हरिभक्त श्रीअनन्तपद ध्यानिये।।११७।।
सुत को दिखाई देत भूत नित सूख्यो जात, पूछें कही बात जाइ वाही ठौर सोयो है।
आयो निसि मारिवे को धायो यह रोष भर्यो, देवो गति मोकों उन बोलिकै सुनायो है।।
जाति को सोनार पर नारि लगि प्रेत भयौं, लयौं तेरी सरन मैं ढूँढ़ि जग पायो है।
दियो चरनामृत लै कियो दिव्यरूप वाको, अति ही अनूप सुनो भक्तिभाव गायो है।।११८।।
पयहारी श्रीकृष्णदासजी
निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन्न परिहरि पय पान कियो।।
जाके सिर कर धरयो, तासु कर तर नहिं आँड़यो।
अर्प्यो पद निर्वान, शोक निर्भय करि छाँड़्यो।।
तेजपुंज बल भजन, महामुनि ऊरधरेता।
सेवत चरण सरोज, राय राना भुविजेता।।
दहिमा वंश दिनकर उदय, सन्त कमल हिय सुख दियो।
निर्वेद अवधि कलि कृष्णदास, अन्न परिहरि पय पान कियो।।३८।।
जाके सिर कर धरयो ता तर न आँड़यो हाथ, दीनो बड़ो वर राजा कुल्हू को जू साखिये।
परवत कन्दरा में दरसन दीयो आनि, दियो भावसाधु हरिसेवाँ अभिलाखिये।।
गिरी जो जलेबी थार माँझ ते उठाई बाल, भयो हियो शाल बिन अरपित चाखिये।
लै करि खड़ग ताहि मारन उपाइ कियो, जियो सन्त ओट फिरि मोल करि राखिये।।११६।।
नृपसुत भक्त बड़ो अबलौं विराजमान, साधु सनमान में न दूसरो बखानिये।
सन्त बधू गर्भ देखि उभै पनवारे दिये, कही अर्भ इष्ट मेरो ऐसी उर आनिये।।
कोऊ भेषधारी सो व्योपारी पगदासिन को, कही कृपा करो कहा जानै और प्रानिये।
ऐपै तजि देवो क्रिया देखि जग बुरो होत, जोति बहु दई दाम राम मति सानिये।।१२०।।
श्रीकील्हदेवजी) (४१
पयहारी के शिष्यगण
पयहारी परसाद तें, शिष्य सबै भये पारकर।।
कील्ह अगर केवल, चरण ब्रतहठी नारायण।
सूरज पुरुषां पृथु, तिपुर हरिभक्ति परायन।।
पद्मनाभ गोपाल, टेक टीला गदाधारी।
देवा हेम कल्यान, गंगा गंगासम नारी।।
विष्णुदास कन्हर रंगा, चाँद सबही गोविन्द पर।
पयहारी परसाद तें शिष्य सबै भये पारकर।।३६।।
श्रीकील्हदेवजी
गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं, त्यौं कील्ह करन नहिं कालवश।।
राम चरण चिन्तवनि, रहति निशिदिन लौं लागी।
सर्वभूत सिर नामित, सूर भजनानन्द भागी।।
सांख्ययोग मति सुदृढ़, कियो अनुभव हस्तामल।
ब्रह्मरन्ध्र करि गौन भये, हरि तन करनी बल।।
सुमेरदेव सुत जग विदित, भुवि विस्तार्यो विमल यश।
गांगेय मृत्यु गंज्यो नहीं त्यौं, कील्ह करन नहिं कालवश।।४०।।
श्रीसुमेर देव पिता सूबे गुजरात हुतें, भयो तनु पात सो विमान चढ़ि चले हैं।
बैठे मधुपुरी कील्ह मानसिंह राजा ढिंग, देखे नभ जात उठि कही भले-भले हैं।।
पूछे नृप 'बोले कासौँ?' कैसे के प्रकासौँ, कहौ, कह्यो हठ परे सुनि अचरज रले है।
मानुस पठाये सुधि ल्याये साँच आँच लागी, करी साष्टांग बात मानी भाग फले हैं।।१२१।।
ऐसे प्रभु लीन नहीं काल के अधीन बात, सुनिये नवीन चाहें रामसेवा कीजिये।
धरी ही पिटारी फूल-माला हाथ डार्यो तहाँ, ब्याल कर काट्यो कह्यो फेरि काटि लीजिये।।
ऐसे ही कटायो बार तीनि हुलसायो हियो, कियो न प्रभाव नेकु सदा रस पीजिये।
करिकै समाज साधु मध्य यों विराज प्रान, तजे, दसैँ द्वार योगी थके सुनि जीजिये।।१२२।।
४२) (श्री भक्तमाल)
श्रीअग्रदासजी
(श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।।
सदाचार ज्यौं सन्त, प्राप्त जैसें करि आये।
सेवा सुमिरन सावधान, चरण राघव चित लाये।।
प्रसिध बाग सौं प्रीति, सुहथ कृत करत निरन्तर।
रसना निर्मल नाम, मनहुँ वर्षत धाराधर।।
कृष्णदास(कृपाकरि)भक्तिदत्त, मन वच क्रम करि अटल दयो।
(श्री) अग्रदास हरिभजन बिन काल वृथा नहिं बित्तयो।।४१।।
दरसन काज महाराज मानसिंह आयो, छायो बाग माँझ बैठे द्वार द्वारपाल हैं।
झारिकै पतौवा गये बाहिर लै डारिवे को, देखी भीर भार रहे बैठि ये रसाल हैं।।
आये देखि नाभा जू ने उठि साष्टांग करी, भरी जल आँखे चले अँसुवनि जाल हैं।
राजा मग चाहि हारि आनिकै निहारै नैन, जानी आप जानी भये दासनि दयाल है।।१२३।।
श्रीशंकराचार्यजी
कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।।
उत्शृंखल अज्ञान, जितें अनईश्वरवादी।
बौद्ध कुतर्की जैन, और पाखण्डहिं आदी।।
विमुखनि को दियों, दण्ड ऐंचि सन्मारग आने।
सदाचार की सीव, विश्व कीरतिहिं बखाने।।
ईश्वरांश अवतार महि, मरजादा माँडी अघट।
कलियुग धर्मपालक प्रगट, आचारज शंकर सुभट।।४२।।
विमुख समूह लैकें किये सनमुख श्याम, अति अभिराम लीला जग बिसतारी है।
सेवरा प्रबल बास केवरा ज्यौं फैलि रहे, गहे नहीं जाहिं वादी शुचि बात धारी है।।
तजिकै सरीर काहू नृप में प्रवेस कियो, दियो करि ग्रन्थ मोह–मुद्गर सुभारी है।
शिष्यानि सौं कह्यो कँभू देह में आवेस जानो, तबही बखानो आय सुनि कीजै न्यारी है।।१२४।।
जानिकै आवेस तन शिष्य नै प्रवेस कियो, रावले में देखि सो श्लोक लै उच्चार्यो है।
सुनतहिं तज्यो तन निज तन आय लियो, कियो यों प्रमान दासपन पूरो पार्यो है।।
श्रीनामदेवजी) (४३
सेवरा हराये वादी आये नृप पास ऊँचे, छात पर बैठि एक माया फन्द डार्यो है।
जल चढ़ि आयो नाव भाव लै दिखायो कहैं, 'चढ़ौं नहिं बूड़ो' आप कौतुक सौं धार्यो है।।१२५।।
आचारज कही यों चढ़ाओ इन सेवरानि, राजा ने चढ़ाये गिरे टूँक उड़ि गये हैं।
तबतौ प्रसन्न नृप पाँव पर्यो भाव भर्यो, कह्यो जोई कर्यो धर्म भागवत लये हैं।।
भक्ति ही प्रचार पाछे मायावाद डारि दीनौ, कीनौ प्रभु कह्यौ किते विमुखहू भये हैं।
आशय सो गँभीर सन्त धीर वह रीति जाने, प्रीति ही में साने हरिरूप गुन नये हैं।।१२६।।
श्रीनामदेवजी
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं त्रेता नरहरिदास की।।
बालदशा बीठल्य, पानि जाके पै पीयौ।
मृतक गऊ जिवाय, परचौ असुरन कौं दीयौ।।
सेज सलिल तें काढ़ि, पहिल जैसी ही होती।
देवल उलट्यो देखि, संकुचि रहे सबही सोती।।
पण्ढरनाथ कृत अनुग ज्यौं, छानि सुकर छाई घास की।
नामदेव प्रतिज्ञा निर्वही ज्यौं, त्रेता नरहरिदास की।। ४३।।
छीपा वामदेव हरिदेव जू का भक्त बड़ो, ताकी एक बेटी पतिहीन भई जानिये।
द्वादश बरष माँझ भयो तब कही पिता, सेवा सावधान मन नीके करि आनिये।।
तेरे जे मनोरथ हैं पूरन करन येई, जोपै दत्तचित्त ह्वै कैं मेरी बात मानिये।
करत टहल प्रभु वेगि ही प्रसन्न भये कीनी, काम-वासना सो पोषि उन मानिये।। १२७।।
विधवा को गर्भ ताकी बात चली ठौर-ठौर, दुष्ट सिरमौरनि की भई मन भाइयै।
चलत-चलत वामदेव जू के कान परी, करी निरधार प्रभू आप अपनाइयै।।
भयो जू प्रगट बाल नाम नामदेव धर्यौ, कर्यौ मनभायो सब सम्पत्ति लुटाइयै।
दिन-दिन बढ़्यो कछू औरे रंग चढ़यो भक्तिभाव, अंग मढ़यो कढ़यो रूप सुखदाइयै।। १२८।।
खेलत खिलौना रीति-प्रीति सब सेवा ही की, पट पहिरावैं पुनि भोग को लगावहीँ।
घण्टा लै बजावैं नीके ध्यान मन लावैं त्यौं-त्यौं, अति सुख पावैं नैन नीर भरि आवहीँ।।
बार-बार कहैं नामदेव वामदेव जू सौं, 'देवो मोहि सेवा माँझ अति ही सुहावहीं'।
'जाँऊ एक गाँव फिरि आऊँ दिन तीनि मध्य, दूध को पिवावौ मत पीवौ मोहि भावहीँ' ।। १२६ ।।
४४) (श्री भक्तमाल
कौन वह बेर ? जेहि बेर दिन फेर होय, फेर-फेर कहैं वह बेर नहीं आइये? ।
आई वह बेर लै कराही माँझ हेरि दूध, डार्यो युग सेर मन नीके कै बनाइये।।
चोपनि के ढेर लागि निपट औसेर दृग, आयो नीर घेरि जिनि गिरैं घूँटि जाइये।
माता कहै टेरि 'करी बड़ी तैं अबेर अब, करो मति झेर' अजू चित दै औंटाइये।।१३०।।
चल्यो प्रभु पास लै कटोरा छबिरास तामें, दूध सो सुबास मध्य मिसिरी मिलाइयै।
हिये में हुलास निज अज्ञता को त्रास, ऐपै करें जोपै दास मोहि महा सुखदाइयै।।
देख्यौ मृदुहास कोटि चाँदनी की भास कियौ, भाव को प्रकास मति अति सरसाइयै।
प्याइवे की आस करि ओट कछु भर्यो स्वास, देखिकै निरास कह्यो पीवौ जू अघाइयै।।१३१।।
ऐसैं दिन बीते दोय राखी हिये बात गोय, रह्यो निसि सोय ऐपैं नींद नहीं आवही।
भयो जू सवारो फिरि वैसे ही सुधार लियौ, हियौ कियौ गाढ़ौ जाय धर्यौ पियो भावही।।
बार-बार पीवो कहूँ अब तुम पीवो नाहिं, आवै भोर नाना गरे छूरी दै दिखावहीँ।
गहि लीयो 'कर जिनि कर ऐसी पीवौं मैं तो', पीवे कौ लगेई नेकु राखौ सदा पावही।।१३२।।
आये वामदेव पाछैं पूछैं नामदेव जू सौं, दूध को प्रसंग अति रंग भरि भाखियै।
मोसों न पिछाँनि दिन दोय हानि भई तब, मानि डर प्रान तज्यो चाहौं अभिलाषियै।।
पीयो सुख दीयो जब नेकु राखि लीयो मैं तो, जीयो सुनि बातें कही प्यायो कौन साखियै।
धर्यौ पै न पीयैं, अर्यो, प्यायौ सुख पायो नाना, यामें लै दिखायौ भक्तवश रस चाखियै।।१३३।।
नृप सो मलेच्छ बोलि कही 'मिले साहिब को, दीजिये मिलाय करामात दिखराइयै'।
होय करामात तोपै काहे को कसब करैं?, भरैं दिन ऐसैं बाँटि सन्तन सौं खाइयै।।
ताही के प्रताप आप इहाँ लौं बुलायो हमें, दीजिये जिवाय गाय घर चलि जाइयै।
दई लै जिवाय गाय सहज सुभाय ही मैं, अति सुख पाय पाँय पर्यो मन भाइयै।।१३४।।
'लेवो देस गाँव जाते मेरो कछु नांव होय', 'चाहिये न कछु' दई सेज मनिमई है।
धरि लई सीस 'देऊँ संग दस बीस नर,' नाहीं करि आये जल माँझ डारि दई है।।
भूप सुनि चौंकि पर्यो ल्यावो फेरि आये, कहौ कही नेकु आनिकै दिखावो कीजै नई है।
जल तैं निकालि बहु भाँति गहि डारी तट, लीजिये पिछानि देखि सुधि-बुधि गई है।।१३५।।
आनि पर्यो पाँय प्रभु पांश तें बचाय लीजै, 'कीजै एक बात कभूँ साधु न दुखाइये'।
लई यही मानि 'फेरि कीजियै न सुंधि मेरी', लीजियै गुननि गाय मन्दिर लौं जाइये।।
देखि द्वार भीर पगदासी कटि बाँधी धरि, कर सौं उछीर करि चाहै पद गाइये।
देखि लीनी वेई काहू दीनी पाँच सात चोट, कीनी धक्काधकी रिस मन में न आइयै।।१३६।।
श्रीनामदेवजी) (४५
बैठे पिछवारे जाइ कीनी जू उचित यह, लीनी जो लगाइ चोट मेरे मन भाइयै।
कान दै कैं सुनो अब चाहत न और कछु, ठौर मोकौं यही नित नेम पद गाइयै॥
सुनत ही आनि करि करुना विकल भये, फेर्यो द्वार इतै गहि मन्दिर फिराइयै।
जेतिक वे सोती मोती आब-सी उतरि गई, भई हिये प्रीति गहे पाँव सुखदाइयै॥१३७॥
औचक ही घर माँझ साँझ ही अगिनि लागी, बड़ो अनुरागी राहि गई सोऊ डारियै।
कहै अहो नाथ! सब कीजिये जु अंगीकार, हँसे सुकुमार हरि मोही कौं निहारियै॥
तुम्हरौ भवन और सकै कौन आइ इहाँ?, भये यों प्रसन्न छानि छाई आप सारियै।
पूछैं आनि लोग कौने छाई हो? छबाइ दीजै, लीजै जोई भावै 'तन-मन-प्रान वारियै'॥१३८॥
सुनौ और परचै जो आये न कवित्त माँझ, बाँझ भई माता क्यौं न? जौ न मति पागी है।
हुतो एक शाह तुलादान को उछाह भयो, दयो पुर सबै रह्यो नामदेव रागी है॥
'ल्यावौ जू बुलाइ' एक दोई तो फिराइ दिये, तीसरे सौं आये 'कहा कहो? बड़भागी है'।
'कीजिये जु कछु अंगीकार मेरो भलो होय', 'भयो भलो तेरो दीजै जोपै आसा लागी है'॥१३९॥
जाके तुलसी हैं ऐसे तुलसी के पत्र माँझ, लिख्यो आधो राम-नाम यासौँ तोल दीजियै।
कहा परिहास करो? ढरो ह्वै दयाल देखि, होत कैसो ख्याल याकौं पूरो करो रीझियै॥
ल्यायो एक काँटो लै चढ़ायो पात सोना संग, 'भयो' बड़ो रंग सम होत नाहिं छीजियै।
लई सो तराजू जासौँ तुलै मन पाँच सात, जाति-पाँतिहू को धन धर्यो पै न धीजियै॥१४०॥
पर्यो सोच भारी दुख पावें नर-नारी, नामदेव जू विचारी एक और काम कीजिये।
जिते व्रत दान और स्नान किये तीरथ में, करियै संकल्प यापै जल डारि दीजिये॥
करेऊ उपाय पात पला भूमि गाढ़े पाँय, रहे वे खिसाय कह्यो इतनोई लीजियै।
लैवैं कहाँ धरैं? सरवरहू न करें भक्तिभाव सौं लै भरैं हिये मति अति भीजिये॥१४१॥
कियो रूप ब्राह्मन कौं दूबरो निपट अंग, भयो हिये रंग व्रत परिचै को लीजियै।
भई एकादशी अन्न माँगत बहुत भूखो, आजु तो न दैहौं भोर चाहौ जितो लीजिये॥
कर्यो हठ भारी मिलि दोऊ ताको शोर पर्यो, समझवै नामदेव याको कहा खीझिये।
बीते जाम चारि मरि रहे यों पसारि पाँव, भाव पै न जानैं दई हत्या नहीं छीजिये॥१४२।
रचिकै चिता कौं विप्र गोद लैके बैठे जाइ, दियो मुसुकाय मैं परीच्छा लीनी तेरी है।
देखि सो सचाई सुखदाई मनभाई मेरे, भये अन्तर्धान परे पाँय प्रीति हेरी है॥
जागरन माँझ हरि भक्तन को प्यास लगी, गये लैन जल प्रेत आनि कीनी फेरी है।
फेंट तें निकांसी ताल गायो पद ततकाल, बड़ई कृपाल रूप धर्यो छबि ढेरी है॥१४३॥
मास परायण छठवाँ विश्राम
४६) (श्री भक्तमाल
श्रीजयदेवजी
जयदेव कवि नृप चक्कवै खंडमंडलेश्वर आन कवि।।
प्रचुर भयो तिहुँ लोक, गीतगोविन्द उजागर।
कोक काव्य नवरस, सरस सिंगार को आगर।।
अष्टपदी अभ्यास करै, तेहिं बुद्धि बढ़ावै।
(श्री) राधारमन प्रसन्न, सुनन निश्चय तहँ आवै।।
सन्त सरोरुहखण्ड कौं, पद्मापति सुखजनक रवि।
जयदेव कवि नृप चक्कवै खंडमंडलेश्वर आन कवि।।४४।।
नवाह परायण द्वितीय विश्राम
किन्दुबिल्व ग्राम तामें भये कविराज राज, भरयो रसराज हिये मन-मन चाखिये।
दिन-दिन प्रति रूख-रूखतर जाइ रहैं, गहैं एक गूदरी कमंडलु कौं राखिये।।
कही देवै विप्र सुता जगन्नाथदेव जू कौं, भयो जब समै चल्यो दैन प्रभु भाखिये।
'रसिक जैदेव नाम मेरोई सरूप ताहि देवौ, ततकाल अहो! मेरी कहो साखिये'।।१४४।।
चल्यो द्विज तहाँ-जहाँ बैठे कविराजराज, अहो महाराज! मेरी सुता यह लीजिये।
कीजिये विचार अधिकार बिसतार जाके, ताहि को निहारि सुकुमारि यह दीजिये।।
जगन्नाथदेव जू की आज्ञा प्रतिपाल करो, डरो मति धरो हिये ना तो दोष भीजिये।
उनको हजार सौहँ हमको पहार एक, ताते फिरि जावो तुम्हें कहा कहि खीजिये।।१४५।।
सुता सौं कहत 'तुम बैठि रहौ याही ठौर', आज्ञा सिरमौर मोपै नाहीं जात टारी है'।
चल्यौ अनखाइ समझाइ हारे बातनि सौं, 'मन! तू समझ कहा कीजै?' सोच भारी है।।
बोले द्विज बालकी सौं 'आप ही विचार करो, धरो हिये ध्यान मोपै जात न सँभारी है'।
बोली कर जोरि 'मेरो जोर न चलत कछू, चाहौ सोई होहु यह वारि फेरि डारी है'।।१४६।।
जानी जब भई तिया कियो प्रभु जोर मोपै, तोपै एक झोंपड़ी की छाया करि लीजिये।
भई तब छाया श्याम-सेवा पधराइ लई, 'नई एक पोथी मैं बनाऊँ' मन कीजिये।।
भयो जू प्रगट गीत सरस गोविन्द जू को, मान में प्रसंग 'सीस मंडन को दीजिये'।
यही एक पद मुख निकसत सोच पर्यो, धर्यो कैसे जात? लाल लिख्यो मति रीझिये।।१४७।।
नीलाचल धाम तामें पण्डित नृपति एक, करी यही नाम धरि पोथी सुखदाइयै।
द्विजन बुलाइ कही यही है, प्रसिद्ध करो, लिखि-लिखि पढ़ौ देस-देसनि चलाइयै।।
श्रीजयदेवजी) (४७
बोले मुसुकाइ विप्र क्षिप्र सो दिखाइ दई, नई यह कोऊ मति अति भरमाइयै।
धरी दोऊ मन्दिर में जगन्नाथदेव जू के, दीनी यह डारि वह हार लपटाइयै ।। १४८ ।।
पर्यो सोच भारी नृप निपट खिसानो भयो, गयो उठि सागर में बूड़ौ वही बात है।
अति अपमान कियो, कियो मैं बखान सोई, गोई जात कैसे? आँच लागी गात-गात है।।
आज्ञा प्रभु दई 'मत बूड़ै तू समुद्र माँझ, दूसरो न ग्रन्थ ऐसो वृथा तनु पात है।
द्वादस सुश्लोक लिखि दीजे सर्ग द्वादस में, ताहि संग चलै जाकी ख्याति पात-पात है' ।। १४६ ।।
सुता एक माली की जु बैंगन की वारी माँझ, तौरै वनमाली गावै कथा सर्ग पाँच की।
डौलैं जगन्नाथ पाछें-काछें अँग मिहीं झँगा, आछे कहि घूमैं सुधि आवै बिरहाँच की।।
फट्यौ पट देखि नृप पूछी 'अहो! भयो कहा?' 'जानत न हम' 'अब कहो बात साँच की'।
प्रभु ही जनाई 'मनभाई मेरे वही गाथा', ल्याये वही बालकी कौं पालकी मैं नाँच की।। १५० ।।
फेरी नृप डाँडी यह औंड़ी बात जानि महा, कहा राजा रंक पढ़ै नीकी ठौर जानिकैं।
अक्षर मधुर और मधुर स्वरनि ही सौं, गावैं जब लाल प्यारी ढिंगहि लैं मानिकैं।।
सुनी यह रीति एक मुगल ने धारि लई, पढ़ै-चढ़ै घोड़े आगे श्याम रूप ठानिकैं।
पोथी को प्रताप स्वर्ग गावत हैं देवबधू आप ही जु रीझि लिख्यो निज कर आनिकैं ।। १५१ ।।
पोथी की तो बात सब कही मैं सुहात हिये, सुनौ और बात जामें अति अधिकाइये।
गाँठि में मुहर मग चलत में ठग मिले 'कहो कहाँ जात?' 'जहाँ तुम चलि जाइये'।
जानि लई बात खोलि द्रव्य पकराइ दियो, लियो चाहो जोई-जोई सोई मोकौं ल्याइये।
दुष्टनि समुझि कही कीनी इन विद्या अहो! आवै जो नगर इन्हें वेगि पकराइये।। १५२।।
एक कहै 'डारौ मार भलो है विचार यही', एक कहै 'मारौ मत धन हाथ आयो है'।
'जोपै ले पिछान कहूँ कीजिये निदान कहा', हाथ-पाँव काटि बड़े गाढ़ पधरायो है।।
आयो तहाँ राजा एक देखिकै विवेक भयो, छायो उजियारो औ प्रसन्न दरसायो है।
बाहर निकालि मानो चन्द्रमा प्रकास राशि, पूछ्यो इतिहास कह्यो 'ऐसो तनु पायो है' ।। १५३ ।।
बड़ेई प्रभाववान सकै को बखान? अहो! मेरे कोऊ भूरि भाग दरसन कीजिये।
पालकी बिठाइ लिये किये सब ठूठ नीके, जी के भाये भये 'कछु आज्ञा मोहि दीजिये'।
'करौ हरि साधु-सेवा नाना पकवान मेवा, आवैं जोई सन्त तिन्हें देखि-देखि भीजिये'।
आये वेई ठग माला तिलक चिलक किये, किलकि के कही 'बड़े बन्धु लखि लीजिये' ।। १५४ ।।
नृपति बुलाइ कही हिये हरि भाय भरि, 'ढरे तेरे भाग अब सेवा फल लीजिये'।
गयो लै महल माँझ टहल लगाये लोग, लागे होन भोग जिय शंका तन छीजिये ।।
४८) (श्री भक्तमाल
माँगे बार-बार विदा राजा नहीं जान देत, अति अकुलाये कही स्वामी 'धन दीजिये'।
देकैं बहु भाँति सो पठाये संग मानस हूँ, 'आवौ पहुँचाय तब तुम पर रीझिये'।। १५५ ।।
पूछैं नृप नर 'कोऊ तुम्हरी न सरवर, जिते आये साधु ऐसी सेवा नहीं भई है।
स्वामी जू सौं नातौ कहा? 'कहौ हम खाँइ हा-हा', 'राखियो दुराइ यह बात अति नई है'।
हुते एकठौर नृप चाकरी में तहाँ इन कियोई बिगार मारि डारौ आज्ञा दई है।
राखे हम हितू जानिलै निदान हाथ-पाँव वाही के ऐसान अब हम भरि लई है'।। १५६ ।।
फाटि गई भूमि सब ठग वे समाइ गये, भये ये चकित दौरि स्वामी जू पै आये है।
कही जिती बात सुनि गात-गात काँपि उठे, हाथ-पाँव मीड़ैं भये ज्यौं के त्यौं सुहाये है।।
अचरज दोऊ नृप पास जा प्रकास किये, जिये एक सुनि आये वाही ठौर धाये हैं।
पूछैं बार-बार सीस पाँयनि पै धारि रहे, कहिये उघारि कैसे मेरे मनभाये हैं।। १५७ ।।
राजा अति अर गही कही सब बात खोलि, निपट अमोल यह सन्तन को वेश है।
कैसो अपकार करै तऊ उपकार करैं, ढरै रीति अपनी ही सरस सुदेश है।।
साधुता न तजैं कँभू जैसे दुष्ट दुष्टता न, यही जानि लीजै मिले रसिक नरेश है।
जान्यो जब नाव ठाँव रहो इहाँ बलि जाँव, भयो मैं सनाथ प्रेमभक्ति भई देश है।। १५८ ।।
गये जा लिवाय ल्याय कविराजराज तिया, कियो लै मिलाप आप रानी ढिग आई है।
मर्यो एक भाई वाकैं भई यों भौजाई सती, कोऊ अंग काटि कोऊ कूदि परी धाई है।।
सुनत ही नृपबधू निपट अचम्भो भयो, इनकैं न भयो फिरि कही समुझाई हैं।
प्रीति की न रीति यह बड़ी विपरीति अहो! छुटै तन जबै प्रिया प्रान छूटि जाई है।। १५६ ।।
'ऐसी एक आप' कहि राजा सौं लै बात कही, 'लैकैं जाओ बाग स्वामी नेकु देखौं प्रीति को'।
'निपट विचारी बुरी देत मेरे गरे छुरी' तिया हठ मानि करी वैसे ही प्रतीति को।।
आनि कहे आप पाये कही यही भाँति आय, बैठी ढिग तिया देखि लोटि गई रीति को।
बोली भक्तवधू 'अजू वे तौ हैं बहुत नीके, तुम कहा औचक ही पावति हौं भीति को' ।। १६० ।।
भई लाज भारी पुनि फेरिकै सँवारी दिन बीति गये कोऊ जब-तब वही कीनी है।
जानि गई भक्तवधू चाहति परीक्ष्छा लियो, कही 'अजू! पाये' सुनि तजी देह भीनी है।।
भयो मुख श्वेत रानी-राजा आये जानी यह, 'रचौं चिता जरौं मति भई मेरी हीनी है'।
भई सुधि आपकौं जु आये वेगि दौरि इहाँ, देखि मृत्युप्राय नृप कह्यो 'मेरी दीनी है' ।। १६१ ।।
बोल्यो नृप 'अजू! मोहिं जरई बनत अब, सब उपदेस लैकै धूरि में मिलायो है'।
कह्यो बहु भाँति ऐपै आवति न शान्ति किहूँ गाई अष्टपदी सुर दियो तन ज्यायो है।।
श्रीबिल्वमंगलजी) (४६
लाजनि को मार्यो राजा चाहे अपघात कियो, जियो नहीं जात ‘भक्ति लेशहूँ न आयो है’।
करि समाधान निज ग्राम आये किन्दुबिल्व, जैसो कछु सुन्यो यह परचो लै गायो है।। १६२।।
देवधुनि सोत हो अठारै कोस आश्रम तैं, सदाई असनान करें धरैं योग्यताई कौं।
भयो तन वृद्ध तऊँ छोड़ैं नहीं नित्यनेम, प्रेम देखि भारी निसि कही सुखदाई कौं।।
‘आवो जिनि ध्यान करौ, करौ मत हठ ऐसौ’, मानी नहीं ‘आऊँ मैं हीं’ ‘जानौ कैसे आई कौं’।
फूले देखौ कंज तब कीजियो प्रतीति मेरी, भई वही भाँति सेवैं अबलौं सुहाई कौं।। १६३।।
श्रीश्रीधराचार्यजी
श्रीधर श्रीभागौत में, परम धरम निरनै कियौ।।
तीन काण्ड एकत्व, सानि कोउ अज्ञ बखानत।
कर्मठ ज्ञानी ऐंचि, अर्थ कौ अनरथ बानत।।
परमहंस सहिंता, विदित टीका बिसतार्यौ।
षट्शास्त्रनि अविरुद्ध, वेद संमतहिं विचार्यौ।।
परमानन्द प्रसाद तें, माधौ सुकर सुधारि दियौ।
श्रीधर श्रीभागौत में परम धरम निरनै कियौ।। ४५।।
पंडित समाज बड़े-बड़े भक्तराज जिते, भागवत टीका करि आपस में रीझिये।
भयो जू विचार काशीपुरी अविनासी माँझ, सभा अनुसार जोई-सोई लिखि दीजिये।।
ताको सो प्रमान भगवान बिन्दुमाधौजी है, साधौ यही बात धरि मन्दिर में लीजिये।
धरे सब जाय प्रभु सुकर बनाय दियो, कियो सर्वोपरि लैकै, चल्यो मति धीजिये।। १६४।।
मास परायण सातवाँ विश्राम
श्रीबिल्वमंगलजी
कृष्ण कृपा कोपर प्रगट विल्वमंगल मंगलस्वरूप।।
‘करणामृत’ सुकवित्त, उक्ति अनुछिष्ट उचारी।
रसिकजनन जीवन, हृदय जै हारावलि धारी।।
हरि पकरायो हाथ, बहुरि तहँ लियो छुड़ाई।
कहा भयो कर छुटे, बदौं जो हिय तें जाई।।
५०) (श्री भक्तमाल
चिन्तामणि सँग पायकै, ब्रजवधू केलि बरनी अनूप।
कृष्ण कृपा कोपर प्रगट विल्वमंगल मंगलस्वरूप।। ४६।।
कृष्णवेना तीर एक द्विज मतिधीर रहै, ह्वै गयो अधीर संग चिन्तामनि पाइकै।
तजी लोकलाज हिये वाही को जु राज भयो, निसिदिन काज वहै रहै घर जाइकै।।
पिता को सराध नेकु रह्यो मन साधि, दिन शेष में आवेस चल्यो अति अकुलाइकै।
नदी चढ़ी रही भारी पैये न अवारी नाव, भाव भर्यो हियो जियो जात नधि जाइकै।। १६५।।
करत विचार वारि धार में न रहें प्रान, तातें भली धारि मित्र सनमुख जाइयै।
परे कूदि नीर कछु सुधि न सरीर की है, वही एक पीर कब दरसन पाइयै।।
पैयत न पार तन हारि भयो बूडिवे कौं, मृतक निहारि मानी नाव मन भाइयै।
लगेई किनारे जाय चले पग धाय चाय, आये पट लागे निसि आधी सो बिहाइये।। १६६।।
अजगर घूमि झूमि भूमि कौं परस कियो, लियोई सहारौ चढ़यो छत पर जायकै।
ऊपर किवार लगे पर्यो कूदि आँगन में, गिरयो यों गिरत रागी जागी शोर पायकै।।
दीपक बराइ जोपै देखै विल्वमंगल है, 'बड़ोई अमंगल तूँ कियो कहा आयकै'।
जल अन्हवाय सूखे पट पहिराय 'हाय! कैसे करि आयो जलपार द्वार धायकै'।। १६७।।
'नौका पठवाई द्वार लाव लटकाई देखि, मेरे मनभाई मैं तो तबै लई जानिकै।
'चलो देखौं अहो! यह कहा धौं प्रलाप करै', देख्यौ विषधर महा खीजी अपमानिकै।।
'जैसो मन मेरे हाड़-चाम सौं लगायो तैसो श्याम सौं लगावो तोपै जानियें सयानिकै।
मैं तो भये भोर भजौं युगलकिशोर अब तेरी तुही जानै चाहौ करौ मन मानिकै'।। १६८।।
खुलि गई आँखै अभिलाखैं रूपमाधुरी कौ, चाखैं रसरंग औ उमंग अंग न्यारियै।
बीन लै बजाई गाई विपिन निकुंज क्रीड़ा, भयो सुखपुंज जापै कोटि विषै वारियै।।
बीति गई राति प्रात चले आप आपकौ जू, हिये वही जाप दृग नीर भरि डारियै।
सोमगिरी नाम अभिराम गुरु कियो आनि, सकै को बखानि लाल भुवन निहारियै।। १६९।।
रहे सो बरस रससागर मगन भये, नये-नये चोज के श्लोक पढ़ि जीजिये।
चले वृन्दावन मन कहै कब देखौं जाइ, आइ मग माँझ एक ठौर मति भीजिये।।
पर्यो बड़ो शोर दृग कोरकैं न चाहै काहू, तहाँ सर तिया न्हाति देखि आखैं रीझिये।
लगे वाके पाछे काँछ काछै की न सुधि कछू, गई घर आछे रहे द्वार तन छीजिये।। १७०।।
आयो वाको पति द्वार देखे भागवत ठाढ़े, बड़ो भागवत पूछी बधू सौं जनाइये।
कही जू पधारो पाँव धारो गृह पावन कौं, पावन पखारौं जल धारौं सीस भाइये।।
श्रीविष्णुपुरीजी) (५१
चले भौन माँझ आरति मिटायवे कौं, गायवे कौं जोई रीति सोई कें बताइये।
नारि सौं कह्यो है तू सिंगार करि सेवा कीजै, लीजै यों सुहाग जामें वेगि प्रभु पाइये ।।१७१।।
चली यै सिंगार करि थार में प्रसाद लै कै, ऊँची चित्रसारी जहाँ बैठे अनुरागी हैं।
झनक-मनक जाइ जोरि कर ठाढ़ी रही, गही मति देखि-देखि न्यूनवृत्ति भागी है।।
कही युग सुई ल्यावो ल्याई दई लई हाथ, फोरि डारी आँखें 'अहो! बड़ी ये अभागी हैं'।
गई पति पास स्वांस भरत न बोलि आवै, बोली दुख पाय आय पाँय परे रागी हैं।।१७२।।
'कियो अपराध हम साधु कौं दुखायौं' अहो! बड़े तुम साधु हम नाम साधु धर्यो है।
रहौ अजू सेवा करौं करी तुम सेवा ऐसी जैसी नहीं काहू माँझ मेरो मन भर्यो है।।
चले सुख पाय दृग भूत से छुटाइ दिये हिये ही की आँखिन सौं अबै काम पर्यो है।
बैठे वनमध्य जाइ भूखे जानि आप आइ भोजन कराइ चलौ छाया दिन ढर्यो है।।१७३।।
चलै लै गहाय कर छाया घन तरु तर, चाहत छुटायो हाथ छोड़ैं कैसे? नीको है।
ज्यौं-ज्यौं बल करैं त्यौं-त्यौं तजत न ऐऊ अरे, लियोइ छुटाइ गह्यो गाढ़ो रूप हीको है।।
ऐसे ही करत वृन्दावन घन आइ लियो, पियो चाहैं रस सब जग लाग्यो फीको है।
भई उतकण्ठा भारी आये श्रीविहारीलाल, मुरली बजाइकै सु कियो भायो जीको है।।१७४।।
खुलि गये नैन ज्यौं कमल रवि उदै भये, देखि रूपरासि बाढ़ी कोटिगुनी प्यास है।
मुरली मधुर सुर राख्यो मद भरि मानो, ढरि आयो कानन में आनन में भास है।।
मानिकै प्रताप चिन्तामणि मन माँझ भई, 'चिन्तामणि जैति' आदि बोले रसरास है।
'करनामृत' ग्रन्थ हृदै ग्रन्थि कौं विदारि डारै, बाँधै रस ग्रन्थ-पन्थ युगल प्रकास है।।१७५।।
चिन्तामनि सुनी 'वन माँझ रूप देख्यो लाल', ह्वै गई निहाल आई नेह नातो जानिकैं।
उठि बहु मान कियो दियौं दूध-भात दोना, दै पठावैं नित हरि हितू जन मानिकैं।।
लियो कैसे जाइ तुम्हें भाय सौं दियो जो प्रभु, लैहौं नाथ हाथ सौं जो देहैं सनमानिकै।
बैठे दोऊजन कोऊ पावैं नहीं एक कन, रीझे श्यामघन दीनो दूसरो हूँ आनिकै।।१७६।।
श्रीविष्णुपुरीजी
कलि जीव जंजाली कारनै, विष्णुपुरी बड़ि निधि सँची।।
भगवत धर्म उतंग, आन धर्म आन न देखा।
पीतर पटतर विगत, निकष ज्यौं कुन्दन रेखा।।
५२) (श्री भक्तमाल
कृष्ण कृपा कहि बेलि, फलित सत्संग दिखायो।
कोटि ग्रन्थ को अर्थ, तेरह विरचन में गायो।।
महा समुद्र भागौत तें, भक्तिरतन राजी रची।
कलि जीव जंजाली कारनै, विष्णुपुरी बड़ी निधि सँची।।४७।।
जगन्नाथ क्षेत्र माँझ बैठे महाप्रभु जू वे, चहुँ ओर भक्त भूप भीर अति छाई है।
बोले 'विष्णुपुरी पुरी काशी मध्य रहें जाते, जानियत मोक्ष चाह नीकी मन आई है'।
लिखी प्रभु चीठी 'आपु मनिगन माला एक, दीजिये पठाइ मोहिं लागती सुहाई है'।
जानि लई बात निधि भागवत रत्नदाम, दइ पठै आदि मुक्ति खोदिकै बहाई है।।१७७।।
श्रीज्ञानदेवजी
विष्णुस्वामि सम्प्रदाय दृढ़, ज्ञानदेव गम्भीर मति।।
नाम तिलोचन शिष्य, सूर शशि सदृश उजागर।
गिरा गंग उनहारि, काव्य रचना प्रेमाकर।।
आचारज हरिदास, अतुल बल आनँददायन।
तेहिं मारग वल्लभ, विदित पृथु पधति परायन।।
नवधा प्रधान सेवा सुदृढ़, मन वच क्रम हरि चरन रति।
विष्णुस्वामि सम्प्रदाय दृढ़ ज्ञानदेव गम्भीर मति।। ४८।।
विष्णुस्वामि सम्प्रदाई बड़ेई गम्भीर मति, ज्ञानदेव नाम ताकी बात सुनि लीजिये।
पिता गृह त्यागि आइ ग्रहन संन्यास कियो, दियो बोलि झूठि तिया नहीं गुरु कीजिये।।
आई सुनि बधू पाछैं कह्यो जान्यो मिथ्यावाद, 'भुजनि पकरि मेरे संग करि दीजिये'।
ल्याई सो लिवाइ जाति अति ही रिसाइ दियो, पाँति में ते डारि रहें दूरि नहीं छीजिये।।१७८।।
भये पुत्र तीन तामें मुख्य बड़ो ज्ञानदेव, जाकी कृष्णदेव जू सौं हिये की सचाई है।
वेद न पढ़ावे कोऊ कहैं सब जाति गई, लई करि सभा अहो! कहा मन आई है।।
'बिनस्यो ब्रह्मत्व' कही 'श्रुति अधिकार नाहिं', बोल्यो यों निहारि 'पढ़ै भैंसा' लै दिखाई है।
देखि भक्तिभाव चाव भयो आनि गहैं पाँव, कियोई सुभाव वही गही दीनताई है।। १७६।।