श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकबीरजी) (७१
ठाढ़े मण्डी माँझ पट बेचन लै जन कोऊ, आयो मोकों देहु देह मेरी है उघारियै।
लग्यौ देन आधौ फारि आधे सौं न काम होत, दियो सब लियौ जोपै यहै उर धारियै॥२७०॥
तिया सुत मात मग देखें भूखे आवैं कब? दबि रहे हाटनि में ल्यावैं कहा धाम कौं।
साँचो भक्तिभाव जानि निपट सुजान वे तौ, कृपा के निधान गृह सोच पर्यो श्याम कौं॥
बालद लै धाये दिन तीनि यों बिताये जब, आये घर डारि दई, दई हौ आराम कौं।
माता करै शोर कोऊ हाकिम मरोरि बाँधै, डारौ बिन जानें सुत लेत नहीं दाम कौं॥२७१॥
गये जन दोय चार ढूँढ़िकै लिवाय ल्याये, आये घर सुनी बात जानी प्रभु पीर कौं।
रहे सुख पाय कृपा करी रघुराय दई, छिन में लुटाय सब बोलि भक्त भीर कौं॥
दियौ छोड़ि तानौं-बानौ सुख सरसानौं हिये, किये रोष धाये सुनि विप्र तजि धीर कौं।
क्यों रे तूं जुलाहे ! धन पाये न बुलाये हमें? शूद्रनि कौं दियो जावौ कहैं यों कबीर कौं॥२७२॥
क्यों जू उठि जाऊँ? कछु चोरी धन ल्याऊँ नित, हरिगुन गाऊँ कोऊ राह मैं न मारी है।
उनकौं लै मान कियो याही में अमान भयौ, दयो जोपै जाय हमें तौही तो जियारी है॥
‘घर में तौ नाहीं मण्डी जाहिं तुम रहौ बैठें’, नीठिकै छुटायौ पैडौ छिपे ब्याधि टारी है।
आये प्रभु आप द्रव्य ल्याये समाधान कियो, लियो सुख होय भक्त कीरति उजारी है॥२७३॥
ब्राह्मन कौ रूप धरि आये छिपि बैठे जहाँ, ‘काहे कौं मरत भौन जावौ जू कबीर के।
कोऊ जाय द्वार ताहि देत है अढ़ाई सेर, बेर जिनि लावो चले जावौ यों बहीर के’॥
आये घर माँझ देखि निपट मगन भये, नये-नये कौतुक ये कैसें रहै धीर के।
वारमुखी लई संग मानौ वाही रंग रँगे, जानौ यह बात करी डर अति भीर के॥२७४॥
सन्त देखि डरे सुख भयौई असन्तनि कें, तब तौ विचार मन माँझ और आयो है।
बैठी नृप सभा जहाँ गये पै न मान कियौ, कियौ एक चोज उठि जल ढरकायो है॥
राजा जिय सोच पर्यो कर्यो कहा? कह्यो तब, जगन्नाथ पण्डा पाँव जरत बचायो है।
सुनि अचरज भरे नृप ने पठाये नर ल्याये सुधि कही ‘अजू साँच ही सुनायो है’॥२७५॥
कही राजा रानी सौं ‘जु बात वह साँची भई, आँच लागी हिये अब कहो कहा कीजियै?’।
‘चले ही बनत चले’ सीस तृण बोझ भारी, गरे सो कुल्हारी बाँधि तिया संग भीजियै॥
निकसे बजार ह्वैकै डारि दई लोकलाज, कियौ मैं अकाज छिन-छिन तन छीजियै।
दूर ते कबीर देखि ह्वै गये अधीर महा, आये उठि आगे कह्यौ डारि मति रीझियै॥२७६॥
देखिकै प्रभाव फेरि उपज्यूँ अभाव द्विज, आयौ पादसाह सो सिकन्दर सुनावै है।
विमुख समूह संग माता हूँ मिलाय लई, जायकै पुकारे ‘जू दुखायौ सब गाँव है’॥