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सर्वकोश
श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

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पृष्ठ 74

हंस भक्त) (५६
दक्षिण में रंगनाथ नाम अभिराम जाकौ, ताकौ ले बनावैं धाम काम सब टारियै।
धन के जतन फिरे भूमि पै न पायो कहूँ, चहुँ दिसि हेर देख्यो भयो सुख भारियै।। २१२।।
मन्दिर सराबगी कौं प्रतिमा सौं पारस की, आरस न कियो वेद न्यून हूँ बतायो है।
'पावैं प्रभु सुख हम नर्कहूँ गये तौ कहा?' धरक न आई तब कान लै फुकायो है।।
ऐसी करी सेवा जासौँ हरी मति केवरा ज्यौं, सेवरा समाज सबै नीके कैं रिझायो है।
दियो सौंपि भार तब लैवे को विचार करैं, हरैं कौन राह? भेद राजनि पैं पायो है।। २१३।।
मामा रह्यो भीतर औ ऊपर सो भानजो हो, कलस भँवरकली हाथ सौं फिरायो है।
जेबरी लै फाँसि दियो मूरति सो खैंचि लई, और बार बहु आप नीकैं चढ़ि आयो है।।
कियो हो जो द्वार तामें फूलि तन फँसि बैठ्यो, अति सुख पाय तब बोलिकै सुनायो है।
'काटि लेवौ सीस ईश भेष की न निन्दा करैं,' भरैं अँकवारि मन कीजियै सवायो है।। २१४।।
काटि लियो सीस ईश इच्छा कौ विचार कियो, जियौ नहीं जाय तऊ चाह मति पागी है।
जोपै तन त्याग करौं कैसें आस सिन्धु तरौं?, ढरौं वाही और आयो नींव खुदै लागी है।।
भयो शोक भारी हमें ह्वै गई अबारी काहू, और नै विचारी देखें वही बड़भागी है।
भरि अकँवारि मिले मन्दिर सँवारि झिले, खिले सुख पाइ नैन जानै जोई रागी है।। २१५।।
रां हंस भक्त रां
कोढ़ी भयो राजा, किये जतन अनेक ऐपैं, एकहूँ न लागै, कह्यो हँसनि मँगाइयै।
बधिक बुलाय कही, वेगि ही उपाय करौ, जहाँ-तहाँ ढूँढ़ि अहो, इहाँ लगि ल्याइयै।।
कैसे करि ल्यावै? वेतौ रहैं मानसर माँझ, ल्यावोगे छुटौगे तब जनैं चारि जाइयै।
देखत ही उड़ि जात, जाति को पिछानि लेत, साधु सौं न डरैं, जानि भेष लै बनाइयै।। २१६।।
गये जहाँ हँस, सन्त बानौ सो प्रशंस, देखि, जानिके बँधाये राजा पास लैके आये हैं।
मानि मत सार, प्रभु वैद को स्वरूप धारि, पूछिकें बजार लोग, भूप ढिंग ल्याये हैं।।
काहे कौ मँगाये पच्छी? आछी हम करैं देह, छोड़ि दीजै इन्हें, कही नीठ करि पाये हैं।
औषधि पिसाये, अँग-अंगनि मलाये, किये नीके, सुख पाये, कहि उनको छुटाये हैं।।२१७।।
लेवो भूमि गाऊँ, बलि जाऊँ या दयालुता की, भाल भाग ताकैं जाकौं दरसन दीजियै।
पायो हम सब, अब करौ हरि साधुसेवा, मानुष जनम ताकी सफलता कीजियै।।
करी लै निदेस, देशभक्ति विसतार भयो, हंस हितसार जानि, हिये धरि लीजियै।
बधिकनि जानी, जासौँ खगनि प्रतीति कीनी, ऐसो भेष छोड़िये न राख्योँ मति भीजियै।। २१८।।