श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त) (६३
साषि देन कौ स्याम, खुरदहा प्रभुहिं पधारे।
रामदास के सदन, राय रनछोर सिधारे॥
आयुध छत तन अनुग के, बलि बन्धन अपु वपु धरैं।
भक्तनि संग भगवान् नित, ज्यौं गऊबच्छ गोहन फिरैं।। ५३ ।।
श्रीहरिपालजी
भक्तनि के संग, भगवान् ऐसे फिरयो करैं, जैसे बच्छ संग फिरै नेहवती गाइ है।
हरिपाल नाम विप्र, धाम में जनम लियो, कियो अनुराग, साधु दई श्री लुटाइ है।।
केतिक हजार लै बजार के करज ख्वाये, गरज न सरै कियौ चोरी को उपाइ है।
विमुख कौं लेत, हरिदास कौं न दुख देत, आये सन्त द्वार, तिया संग बतराइ है।। २३५।।
बैठे कृष्ण रुक्मिनी, महल तहाँ सोच पर्यो, हर्यो मन साधुसेवा साहूरूप कियौ है।
पूछी चले कहाँ? कही भक्त है हमारो एक मैं हूँ आऊँ? आओ आये जहाँ पूछि लियौ है।।
अजू मग चल्यो जात बड़ो उतपात मधि, कोऊ पहुँचावै देवौ, लै रुपैया दियौ है।
करो समाधान, सन्त मैं लिवाइ जाऊँ इन्हें, लाइ वन माँझ देखि, बहु धन जियौ है।। २३६।।
देखें जो निहार माला-तिलक न सदाचार, होयँगे भण्डार जोपै, इतो धन लायो है।
लीजियै छिनाइ, 'यही वारि' कहै डारि देवौ, दियौ सब डारि दला छिगुनी में छायो है।।
अँगुरी मरोरि, कही, 'बड़ो तूँ कठोर अहो', तोकौं कैसे छोड़ौ, सन्त जेवैं मोको भायो है।
प्रगट दिखायो रूप, सुन्दर अनूप वह, मेरौ भक्तभूप, लैके छाती सौं लगायो है।। २३७।।
श्रीसाक्षीगोपालजी के भक्त
गौड़देसवासी उभै विप्र ताकी कथा सुनौ, एक वयस वृद्ध जाति वृद्ध छोटो संग है।
और-और ठौरि, फिरि आये फिरि आये वन, तन भयो दुखी कीनी टहल अभंग है।।
रीझो बड़ो द्विज निज सुता तोको दई अहो, रहो, नहीं चाह मेरे लई बिनै रंग है।
साखी दै गोपाल, अब बात प्रतिपाल करो, ढरो कुल ग्राम भाग पूछ्यो सो प्रसंग है।। २३८ ।।
बोल्यो छोटो विप्र, छिप्र दीजियै कही जो बात, तिया सुत कहैं, अहो सुता याके जोग है?।
द्विज कहै नाहीं कैसे करौं?, मैं तो दैन कही, कही कहो भूलि भयो, विथा कौ प्रयोग है।।
भई सभा भारी, पूछ्यो साखी नर-नारी? श्रीगोपाल वनवारी, और कौन तुच्छ लोग है।
लेवौ जू लिखाइ जोपै साखी भरैं आइए तोपै ब्याहि बेटी दीजै लीजै करौ सुख भोग है।। २३६ ।।