श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)
Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary
गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६) (श्री भक्तमाल
निकसी झमकि द्वार, हंस, निहारि सब, कौन भाग जागे, भेद नहीं मेरे नाम कौ।
मुहरनि पात्र भरि, लै महन्त आगे धर्यो, ढर्यो दृग नीर कही भोग करौ स्याम कौ।।२५०।।
पूछी तुम कौन? काके भौन में जनम लियो? कियो सुनि मौन महाचिन्ता चित्त धरी है।
खोलिकै निशंक कहौ, शंका जनि आनो मन, कहि बारमुखी, ऐपै पाँय आय परी है।।
भरो है भण्डार धन, करो अंगीकार अजू ! करिये विचार जोपे, तोपैं यह मरी है।
एक है उपाय, हाथ रंगनाथ जू को अहो, कीजिये मुकुट जामें, जाति गति हरी है।।२५१।।
विप्रहू न छुवें जाको, रंगनाथ कैसे लेत? देत हम हाथ तोकौं, रहें इहाँ कीजिये।
कियोई बनाय सब, घर कौ लगाय धन, बनि ठनि चली, थार मधि धरि लीजिये।।
ऐसें आज्ञा पाइकै, निशंक गई मन्दिर में, फिरी यों सशंक, धिक् तियाधर्म भीजिये।
बोले आप याको ल्याय, आप पहिराय जाय, दियो पहिराय, नयो सीस मति रीझियै।।२५२।।
ब्राह्मण-दम्पत्ति
और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।।
बीच दिये रघुनाथ, भक्त संग ठगिया लागे।
निर्जन वन में जाय, दुष्ट कर्म कियो अभागे।।
बीच दियो सो कहाँ? राम ! कहि नारि पुकारी।
आये सारंगपाणि, शोकसागर ते तारी।।
दुष्ट किये निर्जीव सब, दास प्राण संज्ञा धरी।
और युगन तें कमलनयन, कलियुग बहुत कृपा करी।।५५।।
विप्र हरिभक्त करि गौनो चल्यो तिया संग, जाके दूनौ रंग, ताकी बात लै जनाइयै।
मग ठग मिले, द्विज पूछैं अहो ! कहाँ जात? जहाँ तुम जात, यामें मन न पत्याइयै।।
पन्थ को छुटाय चाहैं, वन में लिवाय जायँ, कहैं अति सूधो पैंड़ो, उर में न आइयै।
बोले बीच राम, तऊ हिये नेकु धकधकी, कहै वह भाम, श्याम नाम कहाँ पाइयै।।२५३।।
चले लागि संग, अब रंग कै कुरंग करौ, तिया पर रीझे, भक्ति साँची इन जानी है।
गये वन मध्य, ठग लोभ लगि मार्यो विप्र, छिप्र लै कै चले, बधू अति बिलखानी है।।
देखै फिरि-फिरि पाछैं, कहैं कहा देखै? मार्यो तबतौ उचार्यौ देखौं वाही बीच प्रानी है।
आये राम प्यारे, सब दुष्ट मारि डारे, साधु प्रान दै उवारे, हित रीति यों बखानी है।।२५४।।
मास परायण ग्यारहवाँ विश्राम