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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

(vi)
अपना परिचय दिया है, तदनुसार वे दामोदरसूनु तो अवश्य हैं, परन्तु वे आयुर्वेदज्ञ नहीं हैं, अपितु वे 'कविकरीन्द्रकदम्बमृगाधिपः'
हैं। पद्धति के रचयिता शार्ङ्गधर का परिचय इस प्रकार है-शाकम्भरी देश में चौहान-वंशीय हमीर-नरेश के राजगुरु राघवदेव
थे। इनके पुत्र दामोदर और उनके पुत्र शार्ङ्गधर थे। हिन्दी में सुप्रसिद्ध एक काव्य 'हम्मीररासो' है। इसके रचयिता भी 'शार्ङ्गधर'
हैं। सम्भवतः ये दोनों एक ही रहे हों। रणथंभौर के राणा 'हमीरदेव' पर अलाउद्दीन खिलजी ने 1299 ई० में आक्रमण किया
था और 1301 ई० में उसे जीतकर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया था। इस प्रकार हमीरनरेश के गुरु राघवदेव के पौत्र,
पद्धतिकार शार्ङ्गधर का समय 14वीं शती सिद्ध होता है।
प्रस्तुत संहिताकार का समय निश्चय ही पद्धतिकार से प्राचीन प्रतीत होता है। क्योंकि शार्ङ्गधरसंहिता पर सर्वप्रथम 13वीं
शती के अन्त में तथा 14वीं शती के आरम्भ में स्थित श्रीबोपदेव ने टीका लिखी थी तथा 13-14वीं शती में स्थित हेमाद्रि ने
इस प्रसंग को उद्धृत किया है। इस दृष्टि से संहिताकार शार्ङ्गधर को तेरहवीं शती के पूर्वार्ध का स्वीकार करना ही उचित प्रतीत
होता है। 'शार्ङ्गधरसंहिता' की रचनाशैली प्रायः सोढल (12वीं शती) कृत 'गदनिग्रह' ग्रन्थ से मिलती-जुलती है। इससे यह
प्रतीत होता है कि प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता का काल 13वीं शती का पूर्वार्ध ही रहा होगा। तेरहवीं शती में सोढल के पुत्र शार्ङ्गदेव
हुए थे। ये उच्चकोटि के कवि, संगीतज्ञ तथा आयुर्वेदविद् थे। इन्होंने संगीतरत्नाकर, अध्यात्मविवेक आदि अनेक ग्रन्थों की
रचना की। अध्यात्मविवेक ग्रन्थ में इन्होंने शरीरशास्त्र का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया है। काल की इस समानता को देखकर
शार्ङ्गदेव तथा शार्ङ्गधर को एक मानने का ऐतिहासिकों ने जो प्रयास किया है, उनके उक्त निर्णय में ये बाधक तत्त्व हैं-शार्ङ्गधर
का दामोदरसूनु होना और शार्ङ्गदेव का सोढल-पुत्र होना। इतना होने पर भी कृतियों के आधार पर हमने इनका जो काल-निर्णय
ऊपर बतलाया है, वह सुतरां विश्वसनीय है।
शार्ङ्गधरसंहिता का मूलरूप-प्रस्तुत संहिता 2600 श्लोकों, 32 अध्यायों तथा तीन खण्डों (पूर्वखंड, मध्यमखंड, तथा
उत्तरखंड) में विभक्त थी। इस तथ्य की सूचना ग्रन्थकार ने इसके पूर्वखंड में इस प्रकार दी है-
द्वात्रिंशत् सम्मिताध्यायैर्युक्तेयं संहिता स्मृता।
षड्विंशतिशतान्यत्र श्लोकानां गणितानि च।। 1.13
किन्तु खेद है, कि आज उपलब्ध होने वाले शार्ङ्गधरसंहिता के किसी भी संस्करण में 2600 श्लोकों के दर्शन नहीं होते। ये
श्लोक कब और कैसे लुप्त हुए, यह एक विचारणीय विषय है। सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में प्रस्तुत संहिता पर टीका लिखते
समय श्रीआढमल्ल तथा काशीरामजी वैद्य ने इसके केवल 2325 श्लोकों पर ही टीका लिखी थी। इस बात पर न किसी का
ध्यान गया अथवा न किसी ने ध्यान ही देना चाहा। यदि किसी का ध्यान गया भी हो, तो उसका इसके पहले तक कोई परिणाम
नहीं दिखलायी दिया।
संस्कृत-टीकाकार-1. शार्ङ्गधरसंहिता पर विद्वानों ने अनेक टीकाएं लिखी हैं। उनमें सर्वप्रथम 'दीपिका' नामक संस्कृत
टीका श्रीभावसिंह के पुत्र 'आढमल्ल' ने लिखी; इनका काल 12वीं शती है। ये हमीरपुर के निवासी थे। इनके पितामह
चक्रपाणि तथा पिता भावसिंह थे। ये दोनों ही वैद्य थे। श्रीआढमल्ल चम्बल (चर्मण्वती) नदी के तीरवर्ती हस्तिकान्तपुरी के
राजा श्रीजैत्रसिंह की सभा के मान्य सभासद थे। 2. बोपदेव कृत 'गूढार्थदीपिका' टीका (देखें-वेडर्स कैटलाग ऑफ बर्लिन,
1853 जुलाई), 3. शार्ङ्गधर-शारीर टीका। 4. पं० काशीरामजी कृत शार्ङ्गधरसंहिता की 'गूढार्थ- दीपिका' टीका। ये भारद्वाजगोत्रीय
सारस्वत ब्राह्मण थे। आपने विक्रम संवत् 1605 के आस-पास शाहसलीम के राज्य में रहकर उक्त टीका का निर्माण किया। 5.
श्रीरुद्रट भट्ट कृत 'आयुर्वेददीपिका' टीका। इनके पिता का नाम श्रीकोनेरी भट्ट था। ये अब्दुलरहीम खानखाना (1557-1630
ई०) के राजवैद्य थे।
हिन्दी टीकाकार-1. श्रीबैजनाथ सारस्वत कृत 'शार्ङ्गधर-सुधाकर' नामक पद्यबद्ध अनुवाद। 2. कविराज प्रियमोहन सेन
गुप्त द्वारा कृत टीका का बंगला संस्करण। 3. पं० परशुराम शास्त्री द्वारा सम्पादित प्रथम संस्करण, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई द्वारा
प्रकाशित। 4. पं० दत्तराम चौबे, मथुरा। 5. पं० रामप्रसाद वैद्यरत्न, पटियाला। 6. बेरी निवासी बस्तीराम जी, रोहतक। 7. पं०
हरदयालु जी वाचस्पति, लाहौर। 8. पं० रामेश्वर भट्ट, वाराणसी। 9. आयुर्वेदाचार्य पं० प्रयागदत्त शर्मा कृत 'सुबोधिनी' टीका

(vii)
(चौखम्बा संस्कृत सीरीज़ आफिस वाराणसी द्वारा प्रकाशित)। 10. पं० दुर्गादत्तजी शास्त्री, प्रधान चिकित्सक-श्रीराम मारवाड़ी
हिन्दू अस्पताल, वाराणसी द्वारा कृत हिन्दी टीका तथा 11. अम्बाला निवासी पं० लालचन्द्र जी वैद्य शास्त्री, प्रधानाचार्य-श्रीअर्जुन
आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी। इनमें अनेक टीकाएँ आज उपलब्ध नहीं हैं।
शार्ङ्गधरसंहिता का महत्त्व-मध्यकालीन आयुर्वेदीय प्रवृत्तियों का परिचय प्रदान करने में प्रस्तुत संहिता पूर्णरूप से
सक्षम है। मध्यकाल में तान्त्रिकों तथा सिद्धों का सम्प्रदाय उन्नति के शिखर पर पहुँच चुका था। रसशास्त्र भी विकास की ओर
अग्रसर था। उक्त काल में मुसलमानों के साथ अनेक नये औषधोपयोगी द्रव्य तथा चिकित्सा-विधियाँ सामने आयीं, जिन्हें
आयुर्वेदविदों ने समयोचित समझकर सादर अपना लिया। उस समय फोड़ा चीरने, तुम्बी, सिंगी तथा पच्छ लगाने तक ही
शल्यतन्त्र सीमित हो गया था; इसके विशेषज्ञ जर्राह लोग थे। रसायन तथा वाजीकरण-प्रयोग अपनी चरमसीमा पर पहुँच चुके
थे। उस समय चिकित्सा का सिद्धान्तपक्ष कमजोर होकर योगों तथा कल्पों की प्रमुखता हो गयी थी। अतएव प्राचीन आयुर्वेदीय
संहिताएँ उपेक्षित हो चली थीं। विद्वान् समयोचित चिकित्सा-ग्रन्थों की रचना करने के लिए बाध्य हो गये थे, जिसके
फलस्वरूप शार्ङ्गधरसंहिता का निर्माण हुआ। यही कारण था कि उस समय के आयुर्वेदविद् बोपदेव और हेमाद्रि जैसे सुप्रसिद्ध
विद्वान् भी इस ग्रन्थ की टीका लिखने के लिए प्रवृत्त हुए। साथ ही इसका प्रवेश लघुत्रयी में किया गया, जो इस संहिता का
मानवर्धन ही था।
ग्रन्थ की विशेषताएँ-1. स्फुटरूप में सर्वप्रथम नाड़ीपरीक्षा का ज्ञान इसी ग्रन्थ में प्राप्त होता है। 2. शुक्रस्तम्भक द्रव्यों
के प्रयोग, 3. अहिफेन (अफीम), जयपाल (जमालगोटा), जायफल, भाँग आदि द्रव्यों के प्रयोग, 4. विष्णुपदामृत (आक्सीजन)
द्वारा समस्त शरीर को तृप्त करने की चर्चा, 5. स्नायुक (नहरुआ) नामक कृमि का वर्णन। इस सम्बन्ध में विद्वानों का मत है,
कि यह रोग मुसलमानों द्वारा इस देश में आया। 6. चिकित्सा के लिए विषद्रव्यों के प्रयोगों की अधिकता। जैसे-वत्सनाभ,
विषमुष्टि (कुचिला), जयपाल तथा कृष्णसर्पविष के मिश्रण से निर्मित अंजन का विधान। 7. रसौषधों के विशिष्ट तथा
अधिकाधिक प्रयोग। 8. चिकित्सा-विधियों में पञ्चकर्म, धारास्वेद, शिरोवस्ति, मूर्धतेल, बिडालक, शोणितस्राव आदि विधियों
का विशेष प्रयोग तथा शोणितनिर्हरण (रक्तस्रावण) में 'पद' का प्रयोग उस समय की विशेष देन है। इसी को 'फस्तखोलना'
भी कहते हैं। 9. विसूचिका (हैजा) रोग में पार्ष्णिदाह, यकृत्-प्लीहा में स्थानीय दाह का विधान। 10. सूचिकाभरण रस का
विलक्षण प्रयोग। 11. विलासिता-प्रधान युग होने के कारण वाजीकरण, वशीकरण, भगसंकोचक, लिंगवृद्धिकर, योनिद्रावक,
लोमशातन, केशवर्धन, पलितनाशन, मुखव्यंगनाशक आदि अनेक योगों के विविध प्रयोग।
प्रस्तुत ग्रन्थ की एक विशेषता और है-'मानपरिभाषा- निरूपण'। यद्यपि इस विषय का संग्रह अनेक आयुर्वेदीय
संहिताओं, परवर्ती ग्रन्थकारों तथा संग्रहकर्ताओं ने अपने-अपने ग्रन्थों में किया है। उस दृष्टि से इसमें जहाँ जो परिवर्तन-परिवर्धन
किया गया है, उसे यथास्थान देखें। किसी भी शास्त्र का अध्ययन करने के लिए जिस प्रकार उसके पारिभाषिक शब्दों का ज्ञान
आवश्यक होता है, उसी प्रकार आयुर्वेदीय चिकित्सा-ग्रन्थों में कहे गये योगों का सम्यक् प्रयोग करने के लिए उसकी
मान-परिभाषा का ज्ञान परमावश्यक होता है। इसी उद्देश्य से प्रेरित होकर कविराज गंगाधर राय (1799-1855 ई०) ने
आयुर्वेद की अनेक कृतियों के साथ एक 'आयुर्वेदीय परिभाषा' नामक लघुग्रन्थ की भी रचना की। उस कृति के उपजीव्य
आयुर्वेदीय साहित्य, स्मृतिग्रन्थ तथा कौटिल्य कृत अर्थशास्त्र आदि रहे हैं।
कुछ समय पहले तक यह सरकारी तौल प्रचलित थी-1 रुपया= 1 तोला, 5 तोला = 1 छटाँक, 16 छटाँक, 1 सेर तथा 40
सेर = 1 मन । 'मीयते अनेन इति मानम्' अर्थात् जिस पैमाने से नापा या तौला जाय, उसे नाप, माप या मान कहते हैं। ये
आर्यमान अनेक स्थानों में सामान्य नाम-परिवर्तन के साथ आज भी प्रचलित हैं। जैसे-रीवा रियासत में 'खारी' को 'खाँडी'
और बुन्देलखण्ड में 'कुडव' को 'कुरवा' कहते हैं। इस प्रकार के परिभाषा-ग्रन्थों में सामान्य परिभाषाओं का उल्लेख रहता ही
है; किन्तु जहाँ विशेष विधान किया गया हो, भले ही वह सामान्य परिभाषा का विरोध कर रहा हो, वहाँ उन द्रव्यों को उसी
परिमाण में लेकर योग का निर्माण करना चाहिए।
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टीका की विशेषताएँ- हमने अपने द्वारा लिखी हिन्दी टीका का नाम भी 'दीपिका' ही रखा है। यह पूर्ववर्ती टीकाकारों

(viii)
का अनुकरण मात्र नहीं है, अपितु 'दीपिका' शब्द की विपुलार्थ वाचकता एवं आयुर्वेदीय चिकित्सा क्षेत्र में उसकी सदाशयता
ने हमें इसी नाम को रखने के लिए बाध्य किया, क्योंकि यह टीका 'छात्रबुद्धि-दीपिका' तथा अपने सत्प्रयोग से 'जठराग्नि-दीपिका'
भी है। यहाँ तक 'दीपिका' नाम की सार्थकता का विवरण दिया गया है। अब हम इसके आगे टीका-सम्बन्धी विशेषताओं की
संक्षिप्त चर्चा प्रस्तुत करेंगे।
आयुर्वेदीय ग्रन्थों की टीका करते समय इस बात का विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है, कि पद्यों द्वारा जितना
विषय कहा गया है। क्या वह प्रायोगिक दृष्टि से पर्याप्त है? अथवा उसे और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता है? इस टीका में
इन दृष्टियों से पूरा-पूरा ध्यान दिया गया है। आप किसी भी योग का निर्माण इसमें दी गयी टीका तथा वक्तव्यों की सहायता से
सरलतापूर्वक कर सकते हैं। इसके बाद आपको कुछ भी सोचने-विचारने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
योगों के निर्माण में कहाँ किस प्रकार की अड़चनें आती हैं, कैसे उनका निराकरण किया जाता है, किस प्रकार की
सावधानियाँ रखनी चाहिए, कौन द्रव्य किसमें अतिरिक्त ग्राह्य है और कौन त्याज्य है, शास्त्रोक्त न होने पर भी किस योग में
कौन-सा कार्य विशेष रूप से किया जाता है, परम्परागत योगों में क्या-क्या विशेष कर्तव्य होते हैं, इस प्रकार की सभी बातों
पर इस टीका में विशेष ध्यान दिया गया है; यही इसका मौलिक स्वरूप है। वक्तव्य तथा विशेष वक्तव्य आदि में जो कुछ जहाँ
कहा गया है, वह अपने चिरकालीन चिकित्सा एवं औषधनिर्माण-सम्बन्धी अनुभवों का सारसमुच्चय है।
चिकित्सा-क्षेत्र में अति उपयोगी होने के कारण महर्षि अग्निवेश कृत 'अञ्जननिदान' को भी इस ग्रन्थ के अन्त में स्थान
दिया गया है। इसके उक्त नाम की सार्थकता यह है, कि चिकित्साकाल में चिकित्सक की दृष्टि को निदान साहित्य उसी प्रकार
निर्मल कर देता है जिस प्रकार रोगग्रस्त नेत्रों को अञ्जन-प्रयोग।
पूर्ववर्ती ग्रन्थकारों का प्रभाव-शार्ङ्गधरसंहिता में चरक, सुश्रुत आदि संहिता ग्रन्थों के अतिरिक्त चक्रदत्त तथा सोढल
का प्रभाव परिलक्षित होता है। इसमें रसशास्त्र-सम्बन्धी सामग्री समसामयिक एवं पूर्ववर्ती विभिन्न रसशास्त्रीय ग्रन्थों से ली गयी
प्रतीत होती है।
शार्ङ्गधर के संस्करण-आज उपलब्ध होने वाले शार्ङ्गधरसंहिता के संस्करणों में कोई भी संस्करण ऐसा नहीं है, जिसे
हम 2600 श्लोकों से परिपूर्ण देख सकें। विभिन्न पुस्तकालयों में सुरक्षित इसकी पाण्डुलिपियाँ भी खण्डित ही प्राप्त हुई हैं। आज
प्राप्त होने वाले प्रायः सभी संस्करणों में 2400 के लगभग श्लोक प्राप्त होते हैं। पं० परशुरामशास्त्री विद्यासागर द्वारा सम्पादित,
निर्णयसागर प्रेस द्वारा प्रकाशित उक्त संहिता में सर्वाधिक श्लोक 2361 प्राप्त हैं, किन्तु इसे भी सम्पूर्ण नहीं कहा जा सकता।
अतः मेरे हृदय में इसे पूर्ण करने की प्रबल इच्छा जागृत हुई।
प्रेरणास्रोत-किसी क्षेत्र में किसी प्रकार की भी ज्यों की त्यों क्षति-पूर्ति करना अत्यन्त दुष्कर कार्य होता है, फिर भी
प्रयत्नशील एवं साहसी पुरुष इस ओर प्रवृत्त होते ही हैं। जैसे कालक्रम से खण्डित चरकसंहिता की पूर्ति आचार्य दृढ़बल ने की
थी, जो आज सर्वमान्य है। इसी एक प्रकाश-किरण ने मेरे विचार-पथ को भी आलोकित किया, जिसके फलस्वरूप मैं
शार्ङ्गधरसंहिता की पूर्ति करने के लिए प्रवृत्त हुआ। इस दुरूह कार्य के सम्पादन में मुझे अध्ययनकाल में अपने परमपूज्य गुरुजी
के समय-समय पर प्राप्त अमूल्य उपदेश, शार्ङ्गधरसंहिता का विषयक्रम-उक्त संहिता में संगृहीत पद्यों का पूर्वापर सम्बन्ध,
उन-उन मूलसंहिताओं से उद्धृत पद्यों के अवशिष्ट प्रसंगोचित विषयों का अभाव तथा ग्रन्थकार की शैली एवं उसके सिद्धान्त
आदि का यथासम्भव विचार कर इसकी पूर्ति की गयी है।
शार्ङ्गधर के परवर्ती भावमिश्र ने इसके अनेक पद्यों को अपने ग्रन्थ में उद्धृत किया है। ऐसे पद्यों का हमने पुनः इसमें
निःसंकोच संग्रह कर लिया है। ग्रन्थकार ने कुचिला तथा भिलावे के प्रयोग तो लिखे हैं, परन्तु उनके संशोधन प्रकार छोड़ दिये
हैं, उन्हें इसमें पूरा किया गया है। 'अणुतैल' की नस्य लेने का विधान तो इसमें मिलता है, किन्तु उसके निर्माण-विधि का निर्देश
न होने पर उसे भी इसमें यथास्थान व्यवस्थित कर दिया है। इस प्रकार के विभिन्न स्थलों को खोज-खोजकर इसकी श्लोक
संख्या की पूर्ति की गयी है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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इस प्रकार के कार्य पूर्ववर्ती आचार्यों ने भी अपनी अन्तःप्रेरणा से प्रेरित होकर समय-समय पर किये हैं और उन्हें आदर
प्राप्त हुआ है। उनकी कृतियाँ भी विद्वानों द्वारा सम्मानित होती रही हैं और उससे पाठकों को भी दिशा-निर्देश मिला है। इन्हीं
प्रलोभनों से प्रलोभित होकर मैंने भी यह पूर्ति-कार्य किया है। इसमें मुझे कहाँ तक सफलता प्राप्त हुई है, इसे आयुर्वेद-मर्मज्ञ
सहृदय विद्वान् ही बतला सकेंगे। इस ग्रन्थ में ब्रेकेट से घिरे हुए समस्त पद्य परिवर्धित हैं, शेष प्राचीन। इसका स्पष्टीकरण
निम्नलिखित तालिका से हो जायेगा।
शार्ङ्गधरसंहिता के श्लोकों की स्थिति
निर्णयसागरीय श्लोकसंख्या वर्तमान प्रति श्लोकसंख्या परिवर्धित श्लोकसंख्या
पूर्वखंड- 454 पूर्वखंड- 598 पूर्वखंड- 144
मध्यमखंड- 1267 मध्यमखंड- 1290 मध्यमखंड- 23
उत्तरखंड- 640 उत्तरखंड- 712 उत्तरखंड- 72
कुलयोग 2361 2600 239
आभार-प्रस्तुत शार्ङ्गधरसंहिता की टीका लिखते समय तथा इसके अपूर्ण स्थलों की पूर्ति करते समय मुझे पूर्ववर्ती मूल
एवं टीका ग्रन्थों का अवलोकन, परिशीलन तथा मनन करने की आवश्यकता पड़ी। उन-उन ग्रन्थों से जिस अंश में जो सहायता
प्राप्त हुई है, उसके लिए मैं उन सभी वैद्यविद्यावदात विद्वानों और उनकी कृतियों का आभारी हूँ। अपने पूज्य गुरुचरणों, सम्प्रति
स्वर्गीय पं० लालचन्द्र जी वैद्य का, जिन्होंने मुझे सदैव शिष्य एवं पुत्र निर्विशेष समझकर अपनी चतुरस्र प्रतिभा से प्रभावित
किया, अपने अतुल शास्त्रीय ज्ञान से अनुशासित किया और शेष अवसरों पर स्नेहपूर्ण दृष्टि से देखकर मेरा समुपबृंहण किया,
उनका मैं विशेष रूप से आभारी हूँ, क्योंकि मैं अध्ययन-काल में सभी प्रकार से उनका अन्तेवासी रहा। उन्होंने मुझे
अध्यापन-काल के अतिरिक्त उठते-बैठते, चलते-फिरते, सोते-जागते अपने ज्ञानामृत से सदैव सिंचित किया है। आयुर्वेदीय
गुत्थियों को सुलझाने में वे सिद्धहस्त थे और चिकित्सा करने में पीयूषपाणि थे, अतः आपसे प्राप्त ज्ञान का मैं जन्म-जन्मान्तरों
तक ऋणी हूँ।
धन्यवाद-चौखम्बा सुरभारती परिवार को अनेकानेक धन्यवाद है, जिन्होंने अनेक विषयों पर लिखी हुई मेरी कृतियों को
प्रकाशित कर उन्हें मूर्त रूप प्रदान किया है। इसके पूर्व 'चरकचन्द्रिका-टीका' से युक्त चरकसंहिता को आपने प्रकाशित किया।
इसके बाद बृहत्त्रयी के शेष भाग को प्रकाशित करने के लिए भी कृतसंकल्प हैं।
वसन्तपञ्चमी विद्वद्विधेय
2046 वि० संवत् डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी
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पूर्वखण्ड

विषय-सूची
आमुख (v)
पूर्वखण्ड
प्रथमोऽध्यायः | भार तथा तुला के मान 6
मङ्गलाचरणम् 1 | क्रमशः चतुर्गुण के मान 6
टीकाकर्तुः मङ्गलाचरणम् 1 | द्रव आदि द्रव्यों का मान 7
ग्रन्थ का महत्त्व 1 | द्विगुण मान-व्यवहार 7
निदान के बाद चिकित्सा-निर्देश 2 | कुडवमान-मापक पात्र 7
दिव्यौषधियों के प्रभाव 2 | योग-नामकरण-विधि 7
चिकित्सा-विधि-निर्देश 3 | मात्रा-विचार 7
ग्रन्थ की प्रामाणिकता 3 | कालिंग-मान 8
पूर्वखण्ड के अध्याय 3 | द्विविध-मान 8
मध्यमखण्ड के अध्याय 3 | प्राचीनकाल में मान-भेद 9
उत्तरखण्ड के अध्याय 4 | कतिपय प्राचीन पौतवमान 9
अध्यायों तथा श्लोकों की गणना 4 | आयुर्वेदीय द्रुवयमान 11
मान-परिभाषा 4 | आयुर्वेदीय पाय्यमान 11
मागधमान-परिभाषा 4 | नवीन तथा प्राचीन द्रव्य 12
परमाणु-परिचय 5 | गीले द्रव्यों का प्रयोग 12
वंशी का मान 5 | सूखे तथा गीले द्रव्यों का विचार 12
मरीचि आदि के मान 5 | अनुक्त परिभाषा 12
यव आदि के मान 5 | प्राणिज द्रव्यग्रहण-विधि 13
शाण आदि के मान 5 | पुनरुक्त द्रव्य का मान 13
कर्ष का मान तथा पर्याय 5 | लाल एवं सफेद चन्दन का विचार 13
आधा पल तथा पल का मान 6 | चूर्णादि में गुणहीनता का विचार 14
प्रसृति आदि के मान 6 | गुणहीनता का निर्णय 14
प्रस्थ तथा आढक के मान 6 | भेषज-भण्डार 14
द्रोण तथा शूर्प मान 6 | भेषज-भण्डार-स्वरूप 15
द्रोणी तथा खारी के मान 6 | उचित-अनुचित द्रव्य 15

स्थानभेद से औषधद्रव्यों का विचार 15

(xii)
स्थानभेद से औषधद्रव्यों का विचार 15
त्रिविध देश-लक्षण 16
द्रव्यग्रहण-निर्देश 16
निन्दित भेषज द्रव्य 16
ऋतुभेद से औषधद्रव्य-संग्रह 16
द्रव्यों के अवयवों का ग्रहण 17
द्वितीयोऽध्यायः
औषध-सेवन-काल 18
औषध-सेवन के पाँच काल 18
औषध-सेवन का प्रथम-काल 18
औषध-सेवन का द्वितीय काल 18
औषध-सेवन का तृतीय काल 19
औषध सेवन का चतुर्थ काल 19
औषध-सेवन का पञ्चम काल 19
द्रव्य की पाँच अवस्थाएँ 19
द्रव्य का लक्षण 20
रसों के छः भेद 20
मधुररस के लक्षण 20
अम्लरस के लक्षण 20
लवणरस के लक्षण 20
कटुरस के लक्षण 20
तिक्तरस के लक्षण 21
कषायरस के लक्षण 21
रसों का उत्पत्ति-क्रम 21
पञ्चमहाभूतों के गुण 21
गुरु गुण के लक्षण 22
स्निग्ध गुण के लक्षण 22
तीक्ष्ण गुण के लक्षण 22
रूक्ष गुण के लक्षण 22
लघु गुण के लक्षण 22
वीर्य का वर्णन 22
उष्ण-शीतवीर्य के लक्षण 22
विपाक-परिचय 23
प्रभाव का वर्णन 23
प्रभाव का लक्षण 23
रस आदि के कर्म 24
ऋतु-भेद से दोषों का चय, कोप, शम 24
राशियों के क्रम से छः ऋतुएँ 24
संशोधनार्थ ऋतुक्रम 24
व्यवहारार्थ ऋतुक्रम 24
दोषों का चय, कोप, शम काल 24
वातादि दोषों की चय, प्रकोप, प्रशम तालिका 25
यमदंष्ट्रा काल-परिचय 25
चय आदि पर आहार-विहार का प्रभाव 25
वातदोष का प्रकोप तथा प्रशम 25
पित्तदोष का प्रकोप तथा प्रशम 26
कफदोष का प्रकोप तथा प्रशम 26
तृतीयोऽध्यायः
नाड़ी-परीक्षा का स्थान 27
वातदोष में नाड़ी की गतियाँ 27
पित्तदोष में नाड़ी की गतियाँ 27
कफदोष में नाड़ी की गतियाँ 28
सन्निपात में नाड़ी की गतियाँ 28
द्विदोषज तथा असाध्य नाड़ी की गतियाँ 28
प्राणनाशिनी नाड़ी 28
ज्वर आदि में नाड़ी की गति 28
मन्दाग्नि आदि में नाड़ी की गति 28
स्वस्थ आदि पुरुषों में नाड़ी की गति 28
नेत्र-परीक्षा 29
जिह्वा-परीक्षा 29
मूत्र-परीक्षा 29
दूत-परीक्षा 30
दूत के शकुन 30
वैद्य के शकुन 30
चिकित्सा-योग्य रोगी के लक्षण 30
वैद्य का लक्षण 30
परिचारक का लक्षण 30
भेषज का लक्षण 31
चिकित्सा के चार पाद 31
विविध प्रकार के दुःस्वप्न 31
दुःस्वप्नों के प्रायश्चित्त 31
शुभ स्वप्न 31

(xiii)
चतुर्थोऽध्यायः तीक्ष्ण एवं मन्द द्रव्य का लक्षण ३७
दीपन-पाचन द्रव्यों के लक्षण ३३ मृदु एवं कर्कश द्रव्य का लक्षण ३७
शमन द्रव्य का लक्षण ३३ पञ्चमोऽध्यायः
अनुलोमन द्रव्य का लक्षण ३३ शरीर-परिचय ३८
संस्रन द्रव्य का लक्षण ३३ कला का वर्णन ३८
भेदन द्रव्य का लक्षण ३३ कला-परिचय ३८
रेचन द्रव्य का लक्षण ३४ आशय-परिचय ३९
वमन द्रव्य का लक्षण ३४ धातुओं का उत्पत्ति-क्रम ३९
शोधन द्रव्य का लक्षण ३४ धातुओं के नाम ३९
छेदन द्रव्य का लक्षण ३४ धातुओं के मुख्य कार्य ३९
लेखन द्रव्य का लक्षण ३४ रस-स्वरूप ४०
ग्राही द्रव्य का लक्षण ३४ रक्त का स्वरूप ४०
स्तम्भन द्रव्य का लक्षण ३४ मांस का स्वरूप ४०
रसायन द्रव्य का लक्षण ३४ मेदस् का स्वरूप ४०
वाजीकरण द्रव्य का लक्षण ३५ अस्थि का स्वरूप ४०
शुक्रल द्रव्य का लक्षण ३५ मज्जा का स्वरूप ४०
शुक्र के प्रवर्तक तथा जनक द्रव्यों के लक्षण ३५ शुक्र का स्वरूप ४०
प्रवर्तक आदि द्रव्यों के लक्षण ३५ सप्त धातुओं के मल ४०
सूक्ष्म द्रव्य का लक्षण ३५ धातुमलों का परिगणन ४०
व्यवायी द्रव्य का लक्षण ३५ उप-धातु ४०
विकासी द्रव्य का लक्षण ३५ स्तन्य का स्वरूप ४१
मदकारी द्रव्य का लक्षण ३६ रजस् का स्वरूप ४१
विष का लक्षण ३६ वसा का स्वरूप ४१
प्रमाथी द्रव्य का लक्षण ३६ स्वेद का स्वरूप ४१
अभिष्यन्दी द्रव्य का लक्षण ३६ दाँत का स्वरूप ४१
विदाही द्रव्य का लक्षण ३६ केश का स्वरूप ४१
लंघन द्रव्य का लक्षण ३६ ओजस् का स्वरूप ४१
बृंहण द्रव्य का लक्षण ३६ त्वचाओं का स्वरूप तथा नाम ४१
रूक्षण द्रव्य का लक्षण ३६ दोषों का वर्णन ४२
स्नेहन द्रव्य का लक्षण ३६ दोष आदि संज्ञाओं का हेतु ४२
स्वेदन द्रव्य का लक्षण ३६ दोषों में वायु की प्रधानता ४२
श्लक्ष्ण द्रव्य का लक्षण ३६ वात के गुण, स्थान तथा नाम ४२
स्थिर, सर, पिच्छिल द्रव्य का लक्षण ३७ पित्त के गुण, स्थान तथा नाम ४३
विशद द्रव्य का लक्षण ३७ कफ के गुण, स्थान तथा नाम ४३
स्थूल द्रव्य का लक्षण ३७ सन्धि-परिचय ४३
द्रव एवं सान्द्र द्रव्य का लक्षण ३७ अस्थि-परिचय ४४

(xiv)
मर्म-परिचय 44 पञ्चतन्मात्राएँ 50
सिरा-परिचय 44 तन्मात्राओं के स्थूल रूप 50
धमनी-परिचय 44 इन्द्रियों के विषय 50
पेशी-परिचय 45 प्रकृति-परिचय 50
कण्डरा-परिचय 45 प्रकृति-विकृति 51
रन्ध्र-परिचय 45 सोलह-विकार 51
मल तथा स्रोतस्-परिचय 45 जीवात्मा का निवास-स्थान 51
जाल-परिचय 45 जीवात्मा का स्वरूप 51
कूर्च्च-परिचय 45 जीवात्मा के प्रतिबन्धक 51
रज्जु-परिचय 45 मोह का लक्षण 51
सेवनी-परिचय 45 अहङ्कार का लक्षण 51
सङ्घात-परिचय 45 काम का लक्षण 51
सीमन्त-परिचय 46 क्रोध का लक्षण 52
जिह्वा-परिचय 46 लोभ का लक्षण 52
हृदय-परिचय 46 रोग-आरोग्य के लक्षण 52
फुफ्फुसादि का स्थान 46 षष्ठोऽध्यायः
फुफ्फुस-परिचय 46 आहार-परिचय 53
प्लीहा-परिचय 46 आहार के भेद 53
यकृत्-परिचय 46 पाचन-प्रकार 53
क्लोम-परिचय 46 ग्रहणी-परिचय 53
वृक्क-परिचय 47 जठराग्नि के कार्य 54
वृषण-परिचय 47 रस-परिपाक 54
लिंग-परिचय 47 अपक्वरस से हानि 54
गर्भाशय-परिचय 47 रस, मल, मूत्र तथा वली-परिचय 54
शरीर-पोषण के प्रकार 47 रक्तनिर्माण-प्रक्रिया 54
प्राणवायु द्वारा शरीर-पोषण 47 रक्त का महत्त्व 54
जीवन-मरण-परिभाषा 48 रसादि धातुओं का परिणाम-क्रम 55
रोग-निवृत्ति का महत्त्व 48 गर्भावतरण-क्रम 55
चिकित्सा का महत्त्व 48 पुत्र-कन्या की उत्पत्ति में कारण 55
रोगनिवारण-निर्देश 48 जातकर्म-संस्कार 55
समदोष का महत्त्व 48 मन्त्र 56
स्वस्थ की परिभाषा 49 नाल-छेदन 56
सृष्टि क्रम 49 अभिमन्त्रण-मन्त्र 56
सृष्टि में प्रकृति का योगदान 49 स्त्री की देख-रेख 57
बुद्धि आदि तत्त्वों की उत्पत्ति 49 प्रसूतासंज्ञा 57
दस इन्द्रियाँ 50 प्रसूता का आहार-विहार 57

(xv)
बालक की स्तन्यपान विधि ५७ ग्लानि का कारण और लक्षण ६१
अभिमन्त्रण मन्त्र ५७ गौरव का कारण और लक्षण ६१
स्तन्य-प्रवृत्ति ५७ सप्तमोऽध्यायः
नवजात के लिए पेय ५७ रोगभेद-परिचय ६२
दूध की कमी का कारण ५७ ज्वर-संख्या ६२
माता के दूध का विकल्प ५७ अतिसार-ग्रहणी-प्रवाहिका-गणना ६३
शुद्ध दुग्ध के लक्षण ५८ अजीर्ण-अलसक-विसूची-दण्डालसक-
बालक की परिचर्या-विधि ५८ विलम्बिका-गणना ६३
बालक का अन्नप्राशन ५८ अर्श-गणना ६३
तीन प्रकार की अवस्था ५८ कृमि-गणना ६३
अवस्था-क्रम से दोष-विचार ५८ पाण्डुकामला-कुम्भकामला-हलीमक-गणना ६४
औषधमात्रा-विचार ५८ रक्तपित्त-गणना ६४
बालकोचित-उपचार ५९ कास-गणना ६४
प्रमुख उपचारों में काल की अवधि ५९ क्षय-गणना ६४
अञ्जन-प्रयोग ५९ शोष की कारण-भेद से गणना ६५
उबटन ५९ श्वास-गणना ६५
स्नान ५९ हिक्का-गणना ६५
अभ्यङ्ग ५९ जठराग्निविकार-गणना ६५
व्यायाम ५९ अरोचक-गणना ६५
मैथुन ५९ छर्दि-गणना ६५
ह्रास-क्रम ५९ स्वरभेद-गणना ६५
प्रकृति का कारण ६० तृष्णा-गणना ६५
वात-प्रकृति का लक्षण ६० मूर्च्छादि-गणना ६६
पित्त-प्रकृति का लक्षण ६० मद-मदात्ययादि-गणना ६६
कफ-प्रकृति का लक्षण ६० दाह-गणना ६६
मिश्रित प्रकृति का लक्षण ६० उन्माद-गणना ६६
निद्रा, मूर्च्छा, भ्रम एवं तन्द्रा का कारण ६० भूतोन्माद-गणना ६६
ग्लानि और आलस्य का लक्षण ६० अपस्मार-गणना ६७
जृम्भा का लक्षण ६० आमवात-गणना ६७
छींक का कारण और लक्षण ६० शूल-गणना ६७
उद्गार का कारण तथा लक्षण ६० परिणामशूल-गणना ६७
निद्रा का कारण और लक्षण ६० उदावर्त-गणना ६७
भ्रम का कारण और लक्षण ६१ आनाह-गणना ६७
तन्द्रा का कारण और लक्षण ६१ उरोग्रह-गणना ६८
क्लम का कारण और लक्षण ६१ हृद्रोग-गणना ६८
उत्क्लेश का कारण और लक्षण ६१ उदररोग-गणना ६८

(xvi)
गुल्मरोग-गणना 68 मुखरोग-गणना 75
मूत्राघात-गणना 68 ओष्ठरोग-गणना 75
मूत्रकृच्छ्र-गणना 68 दन्तरोग-गणना 75
अश्मरी-गणना 69 दन्तमूलगत रोग-गणना 76
प्रमेह-गणना 69 जिह्वागत रोग-गणना 76
सोमरोग-गणना 69 तालुगत रोग-गणना 76
प्रमेहपिड़का-गणना 69 कण्ठगत रोग-गणना 76
मेदोरोग-गणना 69 मुखगत रोग-गणना 76
शोथ-गणना 69 कर्णगत रोग-गणना 76
वृद्धिरोग-गणना 69 कर्णपालीगत रोग-गणना 77
अण्डवृद्धि-गणना 70 कर्णमूलगत रोग-गणना 77
गण्डमाला-गणना 70 नासारोग-गणना 77
गण्डालजी-गणना 70 शिरोरोग-गणना 77
ग्रन्थि-गणना 70 शिरःकपालगत रोग-गणना 77
अर्बुद-गणना 70 नेत्ररोग-गणना 78
श्लीपद-गणना 70 नेत्रवर्त्म रोग-गणना 78
विद्रधि-गणना 70 नेत्रसन्धिगत रोग-गणना 78
व्रण-गणना 70 नेत्रशुक्ल-भागगत रोग-गणना 78
सद्योव्रण-गणना 70 नेत्रकृष्ण-भागगत रोग-गणना 78
कोष्ठभेद-गणना 71 काचरोग-गणना 78
अस्थिभंग-गणना 71 तिमिररोग-गणना 79
अग्निदग्ध-गणना 71 लिङ्गनाश रोग-गणना 79
नाड़ीव्रण-गणना 71 दृष्टिगत रोग-गणना 79
भगन्दर-गणना 71 अधिमन्थरोग-गणना 79
उपदंश-गणना 71 अभिष्यन्दरोग-गणना 79
शूकरोग-गणना 72 सर्वनैत्ररोग-गणना 79
कुष्ठरोग-गणना 72 पुंस्त्वरोग-गणना 79
क्षुद्ररोग-गणना 72 शुक्रधातु रोग-गणना 80
विसर्परोग-गणना 73 स्त्रीरोग-गणना 80
उदर्द एवं शीतपित्त-गणना 73 रक्तप्रदर-गणना 80
अम्लपित्त-गणना 73 योनिरोग-गणना 80
वातरक्तरोग-गणना 73 योनिकन्द-गणना 81
वातज रोग-गणना 73 गर्भरोग-गणना 81
पित्तज रोग-गणना 74 स्तनगत रोग-गणना 81
कफज रोग-गणना 75 स्तनविकार-गणना 81
रक्तज रोग-गणना 75 स्त्रीदोष-गणना 81

(xvii)
| प्रसूताविकार-गणना | 81 | शीत आदि उपद्रव | 83 |
| बालरोग-गणना | 81 | विष-विवेचन | 83 |
| बालग्रह-गणना | 82 | जङ्गमविष-भेद | 83 |
| पादरोग-गणना | 82 | कृत्रिम-विष | 83 |
| दोष-भेद | 82 | अन्य उपद्रव | 83 |
| पञ्चकर्म-व्यापद् | 82 | मद-विचार | 83 |
| स्नेहादि व्यापद् | 82 | अध्यायोपसंहार | 84 |
मध्यमखण्ड
| प्रथमोऽध्यायः | | चावल का धोवन बनाने की विधि | 88 |
| पञ्च-कषाय | 85 | अरलूत्वक् पुटपाक | 88 |
| स्वरस-निर्माण-विधि | 85 | तित्तिर पुटपाक | 88 |
| स्वरस की दूसरी विधि | 85 | दाड़िम पुटपाक | 88 |
| स्वरस की तीसरी विधि | 85 | बीजपूरादि पुटपाक | 88 |
| स्वरस-पान की मात्रा | 85 | वासा पुटपाक | 88 |
| प्रक्षेप द्रव्यों का मान | 86 | कण्टकारी पुटपाक | 88 |
| अमृता-स्वरस | 86 | बिभीतक पुटपाक | 88 |
| वासक-स्वरस | 86 | शुण्ठी पुटपाक | 89 |
| त्रिफलादि का स्वरस | 86 | दूसरा शुण्ठी पुटपाक | 89 |
| तुलसी आदि का स्वरस | 86 | सूरण पुटपाक | 89 |
| जम्ब्वादि पत्र-स्वरस | 86 | मृगशृंग पुटपाक | 89 |
| बब्बूलादि स्वरस | 86 | द्वितीयोऽध्यायः | |
| आर्द्रक-स्वरस | 86 | क्वाथ बनाने की विधि | 90 |
| बीजपूर-स्वरस | 86 | क्वाथ-पान की विधि | 90 |
| शतावरी आदि का स्वरस | 86 | क्वाथ में मधु आदि का परिमाण | 90 |
| अलम्बुषादि स्वरस | 86 | क्वाथ में जीरा आदि का परिमाण | 90 |
| मुण्डी-स्वरस | 87 | क्वाथ में दूध आदि का परिमाण | 90 |
| ब्राह्मी आदि का स्वरस | 87 | क्वाथ पकाने को विधि | 90 |
| सोमरोग-चिकित्सा | 87 | गुडूच्यादिगण क्वाथ | 91 |
| उदर्द-चिकित्सा | 87 | गुडूच्यादि क्वाथ | 91 |
| उष्णोपद्रव-चिकित्सा | 87 | शालपर्ण्यादि क्वाथ | 91 |
| कूष्माण्ड-स्वरस | 87 | काश्मर्यादि क्वाथ | 91 |
| गाङ्गेरुकी-स्वरस | 87 | कट्फलादि क्वाथ | 91 |
| पुटपाक-विधि | 87 | पर्पटादि क्वाथ | 91 |
| कुटज पुटपाक | 88 | द्राक्षादि क्वाथ | 91 |

(xviii)
पर्पटादि क्वाथ ९१ | पुनर्नवादि क्वाथ ९६
बीजपूरादि क्वाथ ९२ | वासादि क्वाथ ९६
भूनिम्बादि क्वाथ ९२ | वासादि तथा क्षुद्रा क्वाथ ९७
पटोलादि क्वाथ ९२ | क्षुद्रादि क्वाथ ९७
पञ्चभद्र क्वाथ ९२ | रेणुकादि क्वाथ ९७
कण्टकार्यादि क्वाथ ९२ | बिल्वत्वक् क्वाथ ९७
आरग्वधादि क्वाथ ९२ | गृध्रसीनाशक क्वाथ ९७
अमृताष्टक क्वाथ ९२ | रास्नापञ्चक क्वाथ ९७
पटोलादिगण क्वाथ ९२ | रास्नासप्तक क्वाथ ९७
कण्टकार्यादि क्वाथ ९३ | महारास्नादि क्वाथ ९७
दशमूल क्वाथ ९३ | एरण्डादि क्वाथ ९८
अभयादि क्वाथ ९३ | नागरादि क्वाथ ९८
पिप्पल्यादि क्वाथ ९३ | त्रिफलादि क्वाथ ९८
किरातादि क्वाथ ९४ | एरण्ड क्वाथ ९८
कट्फलादि क्वाथ ९४ | दशमूल क्वाथ ९८
गुडूची क्वाथ ९४ | हरीतक्यादि क्वाथ ९८
निदिग्धिकादि क्वाथ ९४ | वीरतर्वादि क्वाथ ९८
देवदार्वादि क्वाथ ९४ | एलादि क्वाथ ९९
क्षुद्रादि क्वाथ ९४ | गोक्षुरादि क्वाथ ९९
मुस्तादि क्वाथ ९४ | वरादि क्वाथ ९९
पटोलादि क्वाथ ९४ | फलत्रिकादि क्वाथ ९९
गुडूच्यादि क्वाथ ९५ | दार्व्यादि क्वाथ ९९
देवदार्वादि क्वाथ ९५ | न्यग्रोधादि क्वाथ ९९
बृहद्गुडूच्यादि क्वाथ ९५ | बिल्वादि क्वाथ १००
नागरादि क्वाथ ९५ | त्रिफला क्वाथ १००
धान्यपञ्चक क्वाथ ९५ | चव्यादि क्वाथ १००
धान्यनागर क्वाथ ९५ | पुनर्नवादि क्वाथ १००
वत्सकादि क्वाथ ९५ | पथ्यादि क्वाथ १००
कुटजाष्टक क्वाथ ९५ | पुनर्नवादि क्वाथ १००
ह्रीबेरादि क्वाथ ९६ | फलत्रिक क्वाथ १००
धातक्यादि क्वाथ ९६ | रास्नादि क्वाथ १००
शालपर्ण्यादि क्वाथ ९६ | काञ्चनार क्वाथ १००
गुडूच्यादि क्वाथ ९६ | शाखोटक क्वाथ १०१
इन्द्रयवादि क्वाथ ९६ | पुनर्नवादि क्वाथ १०१
त्रिफलादि क्वाथ ९६ | वरुणादिगण में ऊषकादिगण का योग १०१
फलत्रिकादि क्वाथ ९६ | वरुणादि क्वाथ १०१

(xix)
खदिरादि क्वाथ १०१ | पेया तथा यूष १०६
पटोलादि क्वाथ १०१ | भक्त-निर्माण-विधि १०६
अमृतादि क्वाथ १०१ | मण्ड-निर्माण-विधि १०६
पटोलादि क्वाथ १०२ | अष्टगुण मण्ड १०७
धात्रीखदिर क्वाथ १०२ | यवमण्ड १०७
लघुमञ्जिष्ठादि क्वाथ १०२ | लाजमण्ड १०७
बृहन्मञ्जिष्ठादि क्वाथ १०२ | तृतीयोऽध्यायः
पथ्यादि क्वाथ १०२ | फाण्ट-निर्माण-विधि १०८
वासादि क्वाथ १०२ | बृहत् मधूकपुष्पादि फाण्ट १०८
अमृतादि क्वाथ १०३ | आम्रादि फाण्ट १०८
पञ्चवल्कल क्वाथ १०३ | लघुमधूकपुष्पादि फाण्ट १०८
पाठादि क्वाथ १०३ | मन्थ-विधि १०८
निम्बादि क्वाथ १०३ | खर्जूरादि मन्थ १०९
काञ्चनार क्वाथ १०३ | मसूर सक्तु मन्थ १०९
शतपुष्पादि क्वाथ १०३ | यवसक्तु मन्थ १०९
लंघन या अपतर्पण १०३ | चतुर्थोऽध्यायः
लंघन के अयोग्य व्यक्ति १०३ | हिम-निर्माण-विधि ११०
लंघन का फल १०३ | आम्रादि हिम ११०
सुलंघित का लक्षण १०३ | मरिचादि हिम ११०
अति लंघन के दोष १०३ | नीलोत्पलादि हिम ११०
लंघन का सदुपयोग १०३ | अमृता हिम ११०
प्रमथ्यापाक-विधि १०३ | धान्यक हिम ११०
मुस्तकादि प्रमथ्या १०४ | धान्यकादि हिम ११०
यवागू-निर्माण-विधि १०४ | पञ्चमोऽध्यायः
आम्रादि यवागू १०४ | कल्क-निर्माण-विधि ११२
यूष-निर्माण-विधि १०४ | वर्द्धमानपिप्पली कल्क ११२
सप्तमुष्टिक यूष १०४ | निम्बपत्र कल्क ११२
पानादि विधि १०५ | महानिम्ब कल्क ११२
षडङ्ग-पानीय १०५ | रसोन कल्क ११२
उष्णोदक-विधि १०५ | द्वितीय रसोन कल्क ११३
उष्णोदक के गुण १०५ | पिप्पल्यादि कल्क ११३
क्षीरपाक-विधि १०५ | विष्णुक्रान्ता कल्क ११३
पञ्चमूलपक्व-क्षीर १०५ | शुण्ठ्यादि कल्क ११३
त्रिकण्टकपक्व-क्षीर १०५ | अपामार्गबीज कल्क ११३
यवागू आदि की निर्माण-विधि १०६ | बदरीमूल कल्क ११४
विलेपी-विधि १०६

(xx)
लाक्षा कल्क 114 | वृद्धगङ्गाधर चूर्ण 121
तण्डुलीय कल्क 114 | अजमोदादि चूर्ण 121
अङ्कोट कल्क 114 | मरिचादि चूर्ण 121
वन्ध्याकर्कोटकादि कल्क 114 | कपित्थाष्टक चूर्ण 121
अभयादि कल्क 114 | दाडिमाष्टक चूर्ण 121
त्रिवृतादि कल्क 114 | बृहद् दाडिमाष्टक चूर्ण 122
तिल कल्क 114 | पिप्पल्यादि चूर्ण 122
शुण्ठी कल्क 115 | लवङ्गादि चूर्ण 122
षष्ठोऽध्यायः | जातीफलादि चूर्ण 122
| महाखाण्डव चूर्ण 123
चूर्ण-निर्माण-विधि 116 | नारायण चूर्ण 123
चूर्ण में गुड़ आदि का मान 116 | हपुषादि चूर्ण 124
चूर्ण-सेवन-विधि 116 | पञ्चसम चूर्ण 124
चूर्ण का अनुपान 116 | नाराच चूर्ण 124
अनुपान का फल 116 | लवणत्रितयादि चूर्ण 124
चूर्ण-भावना-विधि 117 | तुम्ब्रुवादि चूर्ण 125
आमलकादि चूर्ण 117 | चित्रकादि चूर्ण 125
पिप्पली चूर्ण 117 | वडवानल चूर्ण 125
त्रिफला चूर्ण 117 | अजमोदादि चूर्ण 125
त्र्यूषण चूर्ण 117 | शुण्ठ्यादि चूर्ण 126
पञ्चकोल चूर्ण 117 | हिंग्वादि चूर्ण 126
त्रिगन्ध-चतुर्जात चूर्ण 118 | यवानीखाण्डव चूर्ण 126
कृष्णादि चूर्ण 118 | तालीसादि चूर्ण 127
जीवनीयगण चूर्ण 118 | सितोपलादि चूर्ण 127
अष्टवर्ग चूर्ण 118 | लवणभास्कर चूर्ण 127
लवणपञ्चक चूर्ण 118 | एलादि चूर्ण 128
क्षारद्वय चूर्ण 119 | व्याघ्री चूर्ण 128
सुदर्शन चूर्ण 119 | पञ्चनिम्ब चूर्ण 128
त्रिफलापिप्पली चूर्ण 120 | शतावर्यादि चूर्ण 128
कट्फलादि चूर्ण 120 | अश्वगन्धादि चूर्ण 128
बृहत्कट्फलादि चूर्ण 120 | मुसल्यादि चूर्ण 129
तृतीय कट्फलादि लेह 120 | नवायस चूर्ण 129
शृंग्यादि चूर्ण 120 | आकारकरभादि चूर्ण 129
यवक्षारादि चूर्ण 120 | पञ्चवल्कल चूर्ण 129
शुण्ठ्यादि चूर्ण 120 | माषादि चूर्ण 129
हरीतक्यादि चूर्ण 121 | बकुलत्वक् चूर्ण 129
लघुगङ्गाधर चूर्ण 121 |

(xxi)
सप्तमोऽध्यायः | कूष्माण्डावलेह 141
वटी के पर्याय नाम 130 | सूरणावलेह 142
वटी-निर्माण की विधि 130 | अगस्त्यहरीतकी अवलेह 142
वटी-निर्माण की दूसरी विधि 130 | कुटजावलेह 142
वटी में सिता आदि का मान 130 | कुटजाष्टकावलेह 143
बाहुशाल गुड़ 130 | नवमोऽध्यायः
मरिचादि गुटिका 131 | स्नेहपाक की विधि 144
गुडादि गुटिका 131 | स्नेहपाकार्थ क्वाथ-विधि 144
आमलक्यादि गुटिका 131 | क्वाथ में जल का परिमाण 144
सञ्जीवनी वटी 132 | अन्य प्रकार से जल का मान 144
व्योषादि वटी 132 | स्नेह में कल्क का परिमाण 144
गुड़ के चार योग 132 | स्नेह में द्रवद्रव्यों का परिमाण 145
वृद्धदारुक मोदक 132 | केवल क्वाथ से स्नेहपाक 145
सूरण-पिण्डी 132 | कल्कहीन स्नेहपाक 145
सूरण-बटक 132 | पुष्पकल्क से स्नेहपाक-विधि 145
मण्डूर-बटक 133 | स्नेहसिद्धि का लक्षण 145
पिप्पली मोदक 133 | स्नेहपाक के प्रकार 146
चन्द्रप्रभा वटी 133 | मृदुपाक आदि के गुण 146
कांसायन वटी 134 | घृतादि पाक में काल-निर्देश 146
योगराज गुग्गुलु 135 | पिप्पल्यादि घृत 146
कैशोर गुग्गुलु 136 | चाङ्गेरी घृत 146
त्रिफला गुग्गुलु 137 | मसूर घृत 147
गोक्षुरादि गुग्गुलु 137 | कामदेव घृत 147
त्रिफला मोदक 137 | पानीयकल्याणक घृत 148
काञ्चनार गुग्गुलु 137 | अमृता घृत 148
गूगलशोधन विधि 138 | महापञ्चतिक्त घृत 148
माषादि मोदक 138 | कासीसादि घृत 149
उदर्दनाशक मोदक 138 | जात्यादि घृत 149
अष्टमोऽध्यायः | षड्बिन्दु घृत 149
अवलेह-निर्माण-विधि 139 | त्रिफला घृत 150
अवलेह में सिता आदि का मान 139 | गौराद्य घृत 150
अवलेह-सिद्धि का लक्षण 139 | मयूर घृत 151
अवलेह के अनुपान 140 | फलघृत 151
कण्टकारी अवलेह 140 | दूसरा फल घृत 152
च्यवनप्राशावलेह 140 | पञ्चतिक्त घृत 152

अङ्गारक तैल 153 | सन्धान-कल्पना 164

(xxii)
लाक्षादि तैल 152 | दशमोऽध्यायः
अङ्गारक तैल 153 | सन्धान-कल्पना 164
नारायण तैल 153 | आसव तथा अरिष्ट का भेद 164
वारुणी तैल 154 | अरिष्टों में जल, गुड़ तथा मधु का मान 164
बलादि तैल 154 | सीधु का लक्षण 165
प्रसारिणी तैल 155 | सुरा आदि का लक्षण 165
माषादि तैल 155 | वारुणी का लक्षण 165
शतावरी तैल 156 | शुक्त बनाने की विधि 165
कासीसादि तैल 157 | विनष्ट तथा चुक्र लक्षण 166
पिण्ड तैल 157 | मधुशुक्त बनाने की विधि 166
अर्क तैल 157 | गुड़शुक्त का लक्षण 166
मरिचादि तैल 157 | शुक्त का लक्षण 166
त्रिफलादि तैल 158 | तुषाम्बु तथा सौवीर का लक्षण 166
निम्बबीज तैल 158 | काञ्जिक का लक्षण 166
यष्टीमधुक तैल 158 | उशीरासव निर्माण-विधि 167
करञ्ज तैल 158 | कुमार्यासव 167
नीलिकादि तैल 158 | पिप्पल्यासव 168
भृङ्गराज तैल 159 | लोहासव 168
इरिमेदादि तैल 159 | मृद्वीकारिष्ट 168
जात्यादि तैल 159 | कुटजारिष्ट 169
हिंग्वादि तैल 159 | विडङ्गारिष्ट 169
बिल्व तैल 160 | देवदार्वादि अरिष्ट 169
क्षार तैल 160 | खदिरारिष्ट 170
पाठादि तैल 160 | बब्बूलारिष्ट 170
व्याघ्री तैल 160 | द्राक्षारिष्ट 171
कुष्ठादि तैल 160 | रोहीतकारिष्ट 171
गृहधूम तैल 160 | दशमूलारिष्ट 171
वज्री तैल 160 | एकादशोऽध्यायः
करवीरादि तैल 161 | धातुओं की संख्या 173
चन्दनादि तैल 161 | धातुओं के शोधन की विधि 173
वचा तैल 161 | सुवर्ण भस्म की विधि 173
निर्गुण्डी लांगली तैल 162 | सुवर्ण भस्म की दूसरी विधि 174
चक्रमर्द तैल 162 | तीसरी विधि 174
धत्तूर तैल 162 | चौथी विधि 175
कटुतैलमूर्च्छन-विधि 163 | पाँचवीं विधि 175
तैल की गन्धवृद्धि 163 | छठी विधि 175
पत्रकल्क 163

(xxiii)

सुवर्ण भस्म के गुण ..................................... 175 | क्षार बनाने की विधि ..................................... 185
रजत भस्म की विधि .................................... 175 | पानीय प्रतिसारणीय क्षार ................................. 185
रजत भस्म की दूसरी विधि ............................ 176 |
आर भस्म की विधि ..................................... 176 | द्वादशोऽध्यायः
ताम्र, पीतल, कांस्य भस्म-विधि ..................... 177 | पारद के गुण ................................................ 187
ताम्र भस्म की विधि ..................................... 177 | पारद के नाम ................................................ 187
नाग भस्म ................................................... 178 | ग्रहानुसार धातु-नाम ...................................... 187
नाग भस्म की विधि .................................... 178 | पारद की शोधन-विधि .................................... 187
वंग भस्म की विधि ..................................... 178 | गन्धक शोधन-विधि ....................................... 188
लोह भस्म की विधि .................................... 178 | शिंगरफ शोधन-विधि .................................... 188
दूसरी विधि ................................................ 178 | शिंगरफ से पारा निर्माण-विधि .......................... 188
तीसरी विधि ................................................ 179 | डमरू यन्त्र-निर्माण-विधि ................................ 188
उपधातु संख्या ........................................... 179 | पारद को बुभुक्षित करने की विधि .................... 188
स्वर्णमाक्षिक शोधन-विधि ............................ 179 | दूसरी विधि ................................................... 189
स्वर्णमाक्षिक मारण-विधि ............................. 180 | तीसरी विधि ................................................... 189
विमला शोधन-विधि ................................... 180 | गन्धक-जारण-विधि ........................................ 189
तुत्थ-शोधन-विधि ..................................... 180 | पारद-मारण-विधि ......................................... 189
अभ्रक-शोधन-विधि ................................... 180 | पारद-मारण-विधि ......................................... 190
अभ्रक मारण-विधि ..................................... 180 | अन्य विधि .................................................... 191
अभ्रक मारण-विधि ..................................... 181 | अन्य विधि .................................................... 191
अभ्रक सत्व प्रकार ...................................... 181 | ज्वराङ्कुश रस ............................................... 191
नीलाञ्जन-शुद्धि .......................................... 181 | ज्वरारि रस .................................................... 191
मनःशिला-शुद्धि ......................................... 182 | शीतारि रस .................................................... 191
हरिताल-शोधन .......................................... 182 | ज्वरघ्नी गुटिका ............................................. 192
दोलायन्त्र ................................................... 182 | लोकनाथ रस ................................................. 192
रसक-शुद्धि .............................................. 183 | लघु लोकनाथ रस .......................................... 194
उपधातुओं से सत्व निकालने की विधि ........... 183 | मृगाङ्कपोट्टली रस ......................................... 194
रत्नशोधन-विधि ......................................... 183 | हेमगर्भपोट्टली रस .......................................... 195
वज्रभस्म की विधि ...................................... 183 | दूसरा हेमगर्भपोट्टली रस ................................. 195
दूसरी विधि ................................................ 183 | द्वितीय ज्वरांकुश रस ...................................... 196
तीसरी विधि ................................................ 183 | आनन्दभैरव रस ............................................ 196
वैक्रान्त-मारण ........................................... 184 | सूचिकाभरण रस ........................................... 197
रत्नों का शोधन-मारण ................................ 184 | जलबन्धु रसं ................................................. 197
शिलाजतु शोधन-विधि ............................... 184 | पञ्चवक्त्र रस ................................................ 197
शिलाजतु निर्माण-विधि .............................. 184 | उन्मत्त रस .................................................... 198
मण्डूर भस्म निर्माण-विधि ............................ 185 | सन्निपाताञ्जन ................................................ 198
| नाराच रस ..................................................... 198

(xxiv)
इच्छाभेदी रस १९८ | अजीर्णकण्टक रस २०४
वसन्तकुसुमाकर रस १९८ | मन्थानभैरव रस २०५
राजमृगाङ्क रस १९९ | वातनाशन रस २०५
स्वयमग्नि रस १९९ | कनकसुन्दर रस २०५
अमृतार्णव रस २०० | सन्निपातभैरव रस २०५
सूर्यावर्त रस २०० | ग्रहणीकपाट रस २०६
स्वच्छन्दभैरव रस २०० | ग्रहणीवज्रकपाट रस २०६
हंसपोट्टली रस २०१ | मदनकामदेव रस २०७
त्रिविक्रम रस २०१ | कन्दर्पसुन्दर रस २०८
महातालेश्वर रस २०१ | लोह रसायन २०८
कुष्ठकुठार रस २०१ | जैपाल-शुद्धि की विधि २०९
उदयादित्य रस २०२ | विष-शुद्धि की विधि २०९
सर्वेश्वर रस २०२ | अहिफेन-शोधन २१०
स्वर्णक्षीरी रस २०३ | भंगा-शोधन २१०
मेहबद्ध रस २०३ | विषमुष्टि शोधन २१०
महावह्नि रस २०३ | लांगली-शोधन २१०
विद्याधर रस २०४ | गुञ्जा-शोधन २१०
त्रिनेत्र रस २०४ | करवीर-शोधन २१०
गजकेसरी रस २०४ | अर्क-सेहुण्ड दुग्ध-शोधन २१०
अग्नितुण्डवटी रस २०४ |
उत्तरखण्ड
प्रथमोऽध्यायः
स्नेह के भेद, उनके पान का समय २११ | तैलपान के योग्य व्यक्ति २१२
स्नेह की दो योनियाँ २११ | वसापान के योग्य व्यक्ति २१३
मिलित स्नेहों के नाम २११ | मज्जापान के योग्य व्यक्ति २१३
स्नेह-सेवन की कालावधि २११ | स्नेहपान का काल २१३
स्नेह की मात्राएँ २१२ | घृत तैल की उपयोग-विधि २१३
विधिहीन स्नेहपान के दोष २१२ | स्नेहों के अनुपान २१३
दोषशान्ति के उपाय २१२ | स्नेह-सेवन २१३
स्नेह-मात्रा-विचार २१२ | यवागू से स्नेह-सेवन २१३
अन्य प्रकार से मात्रा का निश्चय २१२ | धारोष्ण दुग्ध से स्नेह-पान २१३
मात्राओं के गुण २१२ | स्नेहाजीर्ण की चिकित्सा २१३
दोष-भेद से स्नेह का विधान २१२ | स्नेहाजीर्ण का उपचार २१४
घृतपान के योग्य व्यक्ति २१२ | स्नेहपान-जनित तृष्णा-चिकित्सा २१४
| स्नेहपान से हानि २१४

(xxv)
स्नेहपान के अयोग्य रोगी 214 | वमन के योग्य रोग 221
स्नेहपान के योग्य रोगी 214 | वमन के अयोग्य रोग 221
स्निग्ध तथा रूक्ष के लक्षण 214 | वमन के अयोग्य रोगी 221
अतिस्निग्ध के लक्षण 214 | वमन के अयोग्यों को भी वमन का विधान 222
रूक्ष तथा अतिस्निग्ध का उपचार 215 | सुकुमार आदि के वमन की विधि 222
रूक्षण द्रव्य 215 | वमन का विशेष विधान 222
स्नेह-सेवन का फल 215 | वमन के सहायक द्रव्य 222
स्नेह-सेवन में त्याज्य 215 | वमन-विरेचन-स्वरूप 222
द्वितीयोऽध्यायः | वमन-द्रव्यों का परिमाण 222
स्वेद की संख्या और गुण 216 | क्वाथ-पान की मात्रा 222
स्वेद के भेद तथा प्रयोग 216 | कल्कादि की मात्रा 222
दोष भेद से स्वेद के भेद 216 | वमन के वेग 222
पूर्व स्वेदनीय रोगी 216 | वमनादि में प्रस्थ का मान 222
पश्चात् स्वेदनीय रोगी 216 | दोष-भेद से द्रव्य-भेद 222
उभयविध स्वेदनीय रोगी 217 | पित्त में वमन 223
स्वेद की व्यवस्था 217 | कफवातज रोगों में वमन 223
स्वेद का फल 217 | वमन के उपद्रवों की चिकित्सा 223
स्वेदन-काल में रोगी की रक्षा 217 | वमन करते समय कर्तव्य 223
स्वेद के अयोग्य रोगी 217 | दुर्दान्त के लक्षण 223
मृदुस्वेद के स्थान 217 | अतिवान्त के लक्षण 223
अतिस्वेद के उपद्रव 217 | वमन के उपद्रवों की चिकित्सा 223
तापस्वेद-विधि 218 | सम्यग् वात के लक्षण 224
ऊष्मस्वेद-विधि 218 | वान्त का पथ्य 224
उपनाह-स्वेद-विधि 218 | वमन के लाभ 224
द्रवस्वेद-विधि 219 | वमन में परिहार्य 224
द्रवद्रव्य का परिमाण 219 | वमन-विरेचन के पूर्व स्नेहन-स्वेदन 224
स्नेहकृत स्वेद का काल 219 | चतुर्थोऽध्यायः
स्वेद का लाभ-प्रकार 219 | विरेचन-योग्य रोगी 225
स्वेद से धातुवृद्धि 219 | वमन-रहित विरेचन के दोष 225
स्वेदन की अवधि 219 | विरेचन का काल 225
सुस्विन्न का आहार-विहार 219 | संशोधन का फल 225
उष्ण जल से स्नान-विधि 220 | विरेचन-योग्य रोग 225
तृतीयोऽध्यायः | विरेचन के अयोग्य रोगी 225
वमन-विरेचन का काल 221 | विरेचन-योग्य रोगी 226
वमन के योग्य पुरुष 221 | विरेचन के लिए कोष्ठ-भेद 226
| कोष्ठ-भेद से मात्रा-विचार 226