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सर्वकोश
शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 356 में से

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पृष्ठ 289

नवमोऽध्यायः ] धूमपानविधिः 253
वक्तव्य-वह सामान्य नियम है, आवश्यकता पड़ने पर
चिकित्सक के परामर्श से इसको आगे-पीछे भी लिया जा
सकता है।
सुप्रयुक्त धूम-प्रशंसा
कासश्वासप्रतिश्यायान् मन्याहनुशिरोरुजः।
वातश्लेष्मविकारांश्च हन्याद् धूमः सुयोजितः ।। 10 ।।
धूमप्रयोगात् पुरुषः प्रसन्नेन्द्रियवाङ्‌मनाः।
दृढकेशद्विजश्मश्रुः सुगन्धिवदनो भवेत् ।। 11 ।।
धूमपान का विधिपूर्वक प्रयोग करने से कास, श्वास,
प्रतिश्याय, मन्याग्रह, हनुग्रह, शिर का पीड़ा, वात तथा कफ
के विकारों को नष्ट करता है। धूम के प्रयोग से मनुष्य की
इन्द्रियाँ, वाणी तथा मन प्रसन्न हो जाते है। केश, दाँत तथा
श्मश्रु (दाढ़ी-मोछ) दृढ़ हो जाते हैं एवं मुख सुगन्धित हो
जाता है।
धूमयन्त्र-परिचय
धूमनाडी भवेत् तत्र त्रिखण्डा च त्रिपर्विका।
कनिष्ठिकापरीणाहा राजमाषागमान्तरा ।। 12 ।।
धूमनाडी भवेद् दीर्घा शमने रोगिणोऽङ्गुलैः।
चत्वारिंशन्मितैस्तद्वद् द्वात्रिंशद्भिर्मृदौ मता ।। 13 ।।
तीक्ष्णे चतुर्विंशतिभिः कासघ्नी षोडशोन्मितैः।
दशाङ्गुलैर्वामनीये तथा स्याद् व्रणनाडिका ।। 14 ।।
कलायमण्डलस्थूला कुलित्थागामरन्ध्रका।
धूमपान के लिए नाड़ी (नेचा) तीन खण्डों (टुकड़ों में
विभक्त, जिससे छोटी-बड़ी बनायी जा सके) तथा तीन पर्वों
(पोरों) वाली होनी चाहिये। उसकी मोटाई कनिष्ठिका अंगुली
के समान हो और उसका छिद्र राजमाष के आने-जाने योग्य
हो। उसकी लम्बाई 'शमन धूमपान' के लिए रोगी के चालीस
अंगुल, 'मृदु' में बत्तीस अंगुल, 'तीक्ष्ण' में चौबीस अंगुल,
कासनाशक धूम के लिए सोलह अंगुल और वामनीय धूम में
दस अंगुल होनी चाहिये तथा व्रण को धूप देने के लिए भी
दस अंगुल की ही नाड़ी होनी चाहिये, किन्तु इसकी मोटाई
कलाय (मटर) जैसी और इसका रन्ध्र (छेद) कुलथी के
आने-जाने योग्य होना चाहिये।
प्रकार-भेद से धूमपान
अथेषिकां प्रलिम्पेच्च सुश्लक्ष्णां द्वादशाङ्गुलाम् ।। 15 ।।
धूमद्रव्यस्य कल्केन लेपश्चाष्टाङ्गुलः स्मृतः।
कल्कं कर्षमितं लिप्त्वा छायांशुष्कं च कारयेत् ।। 16 ।।
ईषिकामपनीयाथ स्नेहाक्तां वर्तिमादरात्।
अङ्गारैर्दीपितां कृत्वा धृत्वा नेत्रस्य रन्ध्रके ।। 17 ।।
वदनेन पिबेद् धूमं वदनेनैव सन्त्यजेत्।
नासिकाभ्यां ततः पीत्वा मुखेनैव वमेत् सुधीः ।। 18 ।।
बारह अंगुल लम्बी तथा साफ चिकनी एक सलाई लें
और उस पर धूमोपयोगी द्रव्यों के कल्क का लेप करें। यह
लेप आठ अंगुल लम्बा (दोनों ओर दो-दो अंगुल सलाई
रखनी चाहिये) तथा कल्क का परिमाण एक कर्ष (1 तोला)
हो। इसे छाया में सुखा लें और सूख जाने पर सावधानी के
साथ सलाई को निकाल कर बत्ती को स्नेह में भिगा लें, फिर
इसे अंगारों से क्व ओर अग्नि लगाकर और दूसरी ओर के
नेत्र अर्थात् नलिका के रन्ध्र में फँसाकर मुख से धूमपान करें
और मुख से ही धूम (धुँआ) का परित्याग करें। इसके पश्चात्
नाक से धूमपान करके मुख से निकाल दें।
वक्तव्य-तात्पर्य यह है कि नाक से धुवाँ निकालना
उचित नहीं है। आवश्यकता पड़ने पर नाक से धूमपान किया
जा सकता है।
व्रणधूपन-विधि
शरावसम्पुटे क्षिप्त्वा कल्कम्ङ्गारदीपितम्।
छिद्रे नेत्रं निवेश्याथ व्रणं तेनैव धूपयेत् ।। 19 ।।
उपयोगी द्रव्यों का कल्क सम्पुट में रखकर उस सम्पुट
को अग्नि पर रख दें। उसके छिद्र (यह छिद्र पहले ही कर
लेना चाहिये) में नलिका लगा दें। इस प्रकार व्रण का धूपन
करें।
विविध धूपन-प्रयोग
एलादिकल्कं शमने स्निग्धं सर्जरसं मृदौ।
रेचने तीक्ष्णकल्कं च कासघ्नं क्षुद्रिकोषणम् ।। 20 ।।
वामने स्नायुचर्माद्यं दद्याद् धूमस्य पानकम्।
व्रणे निम्बवचाद्यं च धूपनं सम्प्रशस्यते ।। 21 ।।
शमनधूप में एलादिगण का (कुष्ठ और तगर को
छोड़कर) कल्क, मृदु में स्नेह युक्त फल (बिभीतक, बादाम
आदि) तथा राल (मोम, गूगल आदि) का कल्क, रेचनधूम
में तीक्ष्ण द्रव्यों का कल्क, कासघ्न में कण्टकारी, काली
मिरच आदि द्रव्यों का कल्क, वामनधूप में में स्नायु तथा चर्म
(चमड़ा) आदि प्रयुक्त किये जा सकते हैं और व्रण में नीम
तथा वचा आदि की धूप देन' प्रशस्त है।
वक्तव्य-उक्त पाठ सु० चि० अ० 40.4 का पद्यानुवाद
मात्र है। एलादिगण के द्रव्यों सु० सू० अ० 38 में देखें।