शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 356 में से
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250 | शार्ङ्गधरसंहिता | [ उत्तरखण्डे
[बायाँ स्तम्भ (Left Column)]
शिर को कुछ नीचे लटका दें। उसे कहें कि हाथ-पाँव फैला
लो, उसकी आँखों को वस्त्र से ढाँक दें, फिर उसकी नाक के
अग्रभाग को ऊपर की ओर उठाकर चिकित्सक नस्य का
प्रयोग करें। नस्योपयोगी द्रव गुनगुना हो, नाक में डालते
समय उसकी धार टूटे नहीं, सोना अथवा चाँदी की सीपी
(चम्मच), फाहा अथवा और किसी युक्ति से नाक में उसे
डालना चाहिये। रोगी को पहले से सावधान कर दें कि जब
नस्य दी जा रही हो उस समय शिर हिलाना, क्रोध करना,
बहुत बोलना, सुड़कना तथा हँसना उचित नहीं, क्योंकि ऐसा
करने से स्नेह भीतर (उचित भागों में) नहीं पहुँचता और इसी
कारण से कास, प्रतिश्याय, शिरोरोग तथा नेत्ररोग उत्पन्न हो
जाते हैं। उस द्रव को शृंगाटक (नासावंश तथा भौंहों का
मध्यभाग) तक ले जाकर ठहराने का प्रयत्न करें और उसे
निगले नहीं।
नस्य-धारण-काल
पञ्च सप्त दशैव स्युर्मात्रा नस्यस्य धारणे ।। ५३ ।।
उपविश्याथ निष्ठीवेन्नासावक्त्रगतं द्रवम् ।
वामदक्षिणपार्श्वाभ्यां निष्ठीवेत् सम्मुखे न हि ।। ५४ ।।
नीते नस्ये मनस्तापं रजः क्रोधं च सन्त्यजेत् ।
शयीत निद्रां त्यक्त्वा च प्रोत्तानो वाक्शतं नरः ।। ५५ ।।
तथा वैरेचनश्चान्ते धूमो वा कवलो हितः ।
नस्य को धारण करके रखने में पाँच, सात अथवा दश
मात्रा का समय लगना चाहिये। इसके बाद रोगी उठ बैठे और
नाक तथा मुख में आये हुये द्रव को बायीं या दाहिनी ओर
थूक दें (इस प्रकार मल शीघ्र झड़ जाता है), सामने की ओर
नहीं थूकना चाहिये, ऐसा करने से विपरीत प्रभाव पड़ता है।
नस्य लेने के बाद मानसिक सन्ताप, धूलि तथा क्रोध का
परित्याग करना चाहिये। रोगी निद्रा को त्याग कर सौ मात्रा
तक केवल चित लेटा रहे। अन्त में विरेचन धूम (क्योंकि
स्नेहन किया गया है, यदि रेचन-नस्य दी गयी हो तो बृंहण-
धूम उपयोगी होता है) अथवा कवल लाभदायक होता है।
नस्य के तीन योग
नस्ये त्रीण्युपदिष्टानि लक्षणानि प्रयोगतः ।। ५६ ।।
शुद्धिहीनातियोगानि विशेषाच्छास्त्रचिन्तकैः ।
आयुर्वेद का मनन करने वाले विद्वानों ने नस्य में विशेष
रूप से प्रयोगों के अनुसार तीन लक्षण बतलाये हैं– 1 शुद्धि
(सम्यक्) योग, 2. हीनयोग और 3. अतियोग।
[दायाँ स्तम्भ (Right Column)]
**वक्तव्य—**स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन तथा वस्ति का
जहाँ विवेचन किया गया है, वहाँ उक्त तीनों योगों की विस्तृत
चर्चा भी की गयी है, इसका अवलोकन करें।
नस्य-शुद्धि का लक्षण
लाघवं मनसः शुद्धिः स्रोतसां व्याधिसङ्क्षयः ।। ५७ ।।
चित्तेन्द्रियप्रसादश्च शिरसः शुद्धिलक्षणम् ।
शिर का हल्कापन, स्रोतों की शुद्धि, व्याधि का नाश,
मन तथा इन्द्रियों की प्रसन्नता–ये शिर की सम्यक् शुद्धि के
लक्षण हैं।
**वक्तव्य—**इस स्थिति में समझना चाहिये कि नस्य का
प्रयोग विधिपूर्वक हुआ है।
नस्य का हीनयोग
कण्डूपदेहो गुरुता स्रोतसां कफसंस्रवः ।। ५८ ।।
मूर्ध्नि हीनविशुद्धेस्तु लक्षणं परिकीर्तितम् ।
मुख तथा नासिका आदि में कण्डू (खुजलाहट), उपदेह
(चिपचिपाहट), गुरुता (भारीपन का अनुभव) और स्रोतों
(मुख, नासिका आदि) में से कफ का झरना–ये सभी शिर
की हीन शुद्धि के लक्षण हैं।
**वक्तव्य—**इस स्थिति में समझना चाहिये कि शिर का
शोधन भली-भाँति नहीं हुआ है।
नस्य का अतियोग
मस्तुलुङ्गागमो वातवृद्धिुरिन्द्रियविभ्रमः ।। ५९ ।।
शून्यता शिरसश्चापि मूर्ध्नि गाढं विरेचिते ।
मस्तुलुंग (जिन द्रव्यों से मस्तिष्क का निर्माण हुआ है)
का आना अर्थात् निकल जाना, वायु की वृद्धि (कोप),
इन्द्रियों (ज्ञानेन्द्रियों) का विनाश या विह्वल हो जाना और
शिर का शून्य (खाली) प्रतीत होना, ये सब शिर के अत्यन्त
विरेचित हो जाने के लक्षण हैं।
**वक्तव्य—**इस स्थिति में समझना चाहिये कि विरेचन-
नस्य का अतियोग हो गया है।
हीनातियोग में उपचार
हीनातिशुद्धे शिरसि कफवातघ्नमाचरेत् ।। ६० ।।
सम्यग्विशुद्धे शिरसि सर्पिर्नस्ये निषेचयेत् ।
शिर की हीनशुद्धि होने पर कफनाशक तथा अतिशुद्ध
होने पर वातनाशक उपाय करने चाहिये। सम्यक् शुद्धि होने
पर नस्य में घृत का प्रयोग करना चाहिये।