शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ें214 शार्ङ्गधरसंहिता [उत्तरखण्डे
(पाचनसंस्थान की गति में रुकावट) को उत्पन्न करके पचे,
उसे उष्ण जल द्वारा वमन (कै) करवा देनी चाहिये।
स्नेहानीर्ण का उपचार
स्नेहस्याजीर्णशङ्कायां पिबेदुष्णोदकं नरः ।। २३ ।।
तेनोद्गारो भवेच्छुद्धो भक्तं प्रति रुचिरतथा ।
यदि स्नेह के अजीर्ण की शंका हो तो उष्ण (गर्म) जल
पीना चाहिये। इससे अजीर्ण शान्त होकर उद्गार (डकार)
शुद्ध निकलता है तथा भोजन में रुचि उत्पन्न हो जाती है।
स्नेहपान-जनित तृष्णा-चिकित्सा
स्नेहेन पैत्तिकस्याग्निर्यदा तीक्ष्णतरीकृतः ।। २४ ।।
तदास्योदीरयेत् तृष्णां विषमां तस्य वामयेत् ।
शीतं जलं पाययेच्च पिपासा तेन शाम्यति ।। २५ ।।
पित्त प्रधान मनुष्य की अग्नि जब स्नेहपान के कारण
तीक्ष्ण हो जाती है, तो वह (अग्नि) तृष्णा (प्यास) को बढ़ा
देती है, जो अत्यन्त भीषण होती है। ऐसे रोगी को वमन
कराना चाहिये और शीतल जल पिलाना चाहिये, इससे पिपासा
(तृष्णा) शान्त हो जाता है।
वक्तव्य-महर्षि सुश्रुत के अनुसार इस स्थिति में भी
उष्णजल पिलाकर वमन कराना चाहिये। देखें-सु० चि० अ०
21 श्लोक 24।
स्नेहपान से हानि
(स्नेहपानाद् भवन्त्येषां नृणां नानाविधा गदाः।
गदा वा कृच्छ्रतां यान्ति न सिद्ध्यन्त्यथवा पुनः ।। २६ ।।)
जिन लोगों को स्नेहपान करने से नाना प्रकार के रोग
उत्पन्न हो जाते हैं, उनके साध्य रोग भी कष्टसाध्य अथवा
असाध्य हो जाते हैं।
स्नेहपान के अयोग्य रोगी
अजीर्णी वर्जयेत् स्नेहमुदरी तरुणज्वरी।
दुर्बलोऽरोचकी स्थूलो मूर्च्छार्तो मदपीडितः ।। २७ ।।
दत्तवस्तिर्विरिक्तश्च वान्तस्तृष्णाश्रमान्वितः।
अकालप्रस्रवा नारी दुर्दिने च विवर्जयेत् ।। २८ ।।
अजीर्ण (अपच) का रोगी, उदररोग से पीड़ित, तरुणज्वर
(आमज्वर) से पीड़ित, दुर्बल, अरुचि से युक्त, स्थूल
(मेदस्वी), मूर्च्छा से पीड़ित, मदात्यय (मद्य-विकारों) से
पीड़ित, जिसे वस्ति दी गयी हो, जिसे विरेचन कराया गया
हो, जिसे वमन कराया गया हो, प्यास तथा परिश्रम से युक्त
और अकालप्रस्रवा (जिसे अकाल में गर्भस्राव अथवा गर्भपात
हो गया हो), ऐसी स्त्री भी स्नेहपान न करें और दुर्दिन (जिस
दिन बादल छाये हों), में भी स्नेहपान करना उचित नहीं है।
वक्तव्य-थके हुये मनुष्य के लिए स्नेह का निषेध
विचारणीय है, जबकि स्थान-स्थान पर मनुष्य को स्नेहपान
का विधान किया गया है। उक्त पाठ सुश्रुत का है, किन्तु चरक
सू० अ० 13 में थके हुये मनुष्य को स्नेहपान का निषेध नहीं
किया है और स्नेहपान के अयोग्य मनुष्यों में-वे मनुष्य गिनाये
गये हैं, जिनकी द्रव धातु अत्यन्त क्षीण हो गयी हो। देखें-
'अतिप्रतान्तोऽतिक्षीणद्रवधातुः'-इति चक्रपाणिः।
स्नेहपान के योग्य रोगी
स्वेद्यसंशोध्यमद्यस्त्रीव्यायाम्यासक्तमानसाः ।
वृद्धा बालाः कृशा रूक्षाः क्षीणास्राः क्षीणरेतसः ।। २९ ।।
वातार्तास्तिमिरार्ता ये तेषां स्नेहनमुत्तमम्।
जिनको स्वेदन तथा संशोधन कराने की आवश्यकता
हो, मादक द्रव्यों, स्त्री-सहवास तथा व्यायाम में जिनका मन
आसक्त हो, बूढ़े, बालक, कृश, रूक्ष तथा जिनका रक्त क्षीण
हो गया हो, जिनका शुक्रक्षीण हो गया हो, जो वातव्याधि तथा
तिमिर (रतौंधी) रोग से पीड़ित हों, उनको स्नेहन कराना
उत्तम होता है।
स्निग्ध तथा रूक्ष के लक्षण
वातानुलोम्यं दीप्तोऽग्निर्वर्चः स्निग्धमसंहतम् ।। ३० ।।
मृदुस्निग्धाङ्गता ग्लानिः स्नेहोद्वेगोऽथ लाघवम्।
विमलेन्द्रियता सम्यक् स्निग्धे रूक्षे विपर्ययः ।। ३१ ।।
वायु का अनुलोम हो जाना, जठराग्नि का प्रदीप्त हो
जाना, पुरीष (मल) का चिकना तथा गाँठरहित हो जाना,
शरीर का कोमल तथा चिकना हो जाना, ग्लानि, स्नेह के प्रति
अरुचि, शरीर में लघुता (हल्का या फुर्तीलापन) और इन्द्रियों
की निर्मलता, ये 'सम्यक्-स्निग्ध' (जिसको उचित स्नेहन
हो गया हो) के लक्षण हैं और रूक्ष मनुष्य में इनके विपरीत
लक्षण होते हैं।
अतिस्निग्ध के लक्षण
भक्तद्वेषो मुखस्रावो गुदे दाहः प्रवाहिका।
तन्द्रातिसारः पाण्डुत्वं भृशं स्निग्धस्य लक्षणम् ।। ३२ ।।
भोजन में अरुचि, मुखस्राव, गुद में दाह, प्रवाहिका
(पेचिश), तन्द्रा, अतिसार तथा पाण्डु-रोग ये 'अत्यन्त स्निग्ध'
के लक्षण हैं।
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