शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
शार्ङ्गधराचार्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 356 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ] स्नेहपानविधिः 215
वक्तव्य-ये लक्षण प्रायः स्नेह-प्रयोग की अधिकता से
उत्पन्न हो जाते हैं।
रूक्ष तथा अतिस्निग्ध का उपचार
रूक्षस्य स्नेहनं स्नेहैरतिस्निग्धस्य रूक्षणम्।
रूक्ष मनुष्य को स्नेहों द्वारा स्नेहन अतिस्निग्ध को द्रव्यों
द्वारा रूक्षण कराना चाहिये।
रूक्षण द्रव्य
श्यामाकचणकाद्यैश्च तक्रपिण्याकसक्तुभिः ।। ३३ ।।
अतिस्निग्ध मनुष्य को श्यामाक (सवाँ) के चावल तथा
चना आदि (चना भुना हुआ होना चाहिये) से अथवा मट्ठा या
लस्सी, खली तथा सत्तुओं को आहार-काल में खिलाकर
रूक्षण करना चाहिये।
स्नेह-सेवन का फल
दीप्ताग्निः शुद्धकोष्ठश्च पुष्टधातुर्दृढेन्द्रियः।
निर्जरो बलवर्णाढ्यः स्नेहसेवी भवेन्नरः ।। ३४ ।।
स्नेह का सेवन करने वाले मनुष्य का अग्नि दीप्त हो
जाती है, कोष्ठ शुद्ध हो जाता है, धातुयें पुष्ट हो जाती हैं इन्द्रियाँ
दृढ़ या बलवान् हो जाती हैं, बुढ़ापा शीघ्र नहीं आता और वह
पुरुष सदैव बल तथा वर्ण से युक्त रहता है।
स्नेह-सेवन में त्याज्य
स्नेहे व्यायामसंशीतवेगाघातप्रजागरणम्।
दिवास्वप्नमभिष्यन्दि रूक्षान्नं च विवर्जयेत् ।। ३५ ।।
इति श्रीदामोदारसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायां उत्तरखण्डे स्नेहपानविधिः नाम
प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
स्नेहपान करते समय तथा उसके कुछ दिन बाद तक
व्यायाम, शीतल स्थान, पान, भोजन, तथा मलमूत्रादि के वेगों
का निरोध रात्रि में जागना, दिन में सोना और अभिष्यन्दि
पदार्थ तथा रूक्ष अन्न को त्याग देना चाहिये।
वक्तव्य-स्नेहपान के सम्बन्ध में विशेष जानकारी के
लिए चरक सू० अ० 13 तथा सु० चि० अ० 31 का अवलोकन
करें।
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का पहला अध्याय समाप्त ।। 1 ।।