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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

शालिहोत्र । १०१
ज, कचरी. मेथी, मस्तंगी,बङ्ग, अदरख, गुगल, कुचला, इलायची,
पीपल लोंग, स्याहजीरा, सफेदजीरा, अरनी, असगन्ध, धाय के
फूल, कवांच के बीज,इन्द्रायणकी जड, जायफल, कवावा, इन्द्र-
जौ, तज, अतरज, आंवला, गिलोय, भङ्ग, भारङ्गी, भिलावा,
हल्दी, सोंठ, सोंफ, सतुआ, गन्धक, वायविडंग, काली मिरच,
घुड़बच, वेलगिरी, खारी नमक, असखार; सांभर नमक, सज्जी,
जवाखार, काला नमक, सहजने की छाल, चिरायता, देवदारू,
दारुहल्दी, जंगली कनेर की छाल और पोहकर मूल सबको
आध २ सेर ले और जायफल टकाभर ले सबको मिलाकर
कूट छानकर नीबू के अर्क में भिगोकर सुखाले, फिर दही में
भिगोकर सुखाले इसमें से प्रतिदिन आठ या नौ दिरम गुड के
साथ खिलावे और जो किसी प्रकार की बीमारी हो तो सत्तू
के साथ दाना खाने के पश्चात् खिलावे ।
रूमी चूर्ण-यह चूर्ण बहुत लाभदायक है, इससे जहरवाद
बादो और कफ आदिक अनेक रोग दूर होते हैं तथा यह
प्रत्येक ऋतु में लाभदायक होता है ।
दवा-अजमोद, चिरायता, जवाखार, काकडासिंगी, कूट वि-
लास पापडा, कुटकी, तीखर, पापल, सम्हालू के पत्ता, गुगल,
चीता, मरोड़फली, पीपलामूल प्रत्येक पावभर प्याज, बन्दाल
हल्दी, सोंठ, हर्रा, बहेडा, कचरी, सहजनेकी छाल और पोदीना प्रत्ये
क एकसेर, सेंधा नमक, काला नमक, सांभर नमक, पांगा नमक,
घुड़बच, सज्जी, राई, काली जीरी; अदरख, कालीमिरच, इन्द्रजौ
देसी अजवायन, गिलोय, वेलगिरी, भंग, मँगरेला, दोनोंजीरे,नीम
के पत्ता, बकायनका पत्ता, इन्द्रायनका सूखा फल और छोटी हरड

१०२ शालिहोत्रम्।
प्रत्येक आध २ सेर, फिटकरी और सुहागा भुना हुआ, कुचला
आधापाव, भुनी हुई हींग छटांकभर; सबको कूटछान कर रखले
और दाना देने के पश्चात् सत्तू के साथ आधापाव चूर्ण
खिलावे और एक पहर पर कायजा रक्खे।
सम्बुलखारकी गोलियां-जहरवाद और कुरकुरी आदि सबको
फायदा रखती है :-
दवा-बचनाग, सम्बुल, हरताल, संगरफ, संगरेजा सोंठ, लोंग,
सुहागा, काली मिर्च; प्रत्येक एक तोला और अदरख पांचसेर
ले अदरख को कूटकर उसका अर्क निकालले और उसमें शेष
सब दवाइयोंको कूटकर खरलमें डालकर अदरखके अर्कके साथ
सात दिनतक घोटे और ऐसी बारीक करे कि सुर्माभी उसके
सामने कुछ न रहे जो अदरख न हो तो पानके अर्क में ही घोट
ले खरल भी पक्के पत्थर का हो जिससे दवा में पत्थर का अंश
न आजाय, फिर चनाकी बराबर गोलियां बनाले, जब आवश्यक-
ता हो तब छटांकभर गेहूं के चून की रोटी बनाकर उसमें एक
गोली को पीसकर रखकर घोडे को खिलादे. दाना खिलाने के
बाद सन्ध्या समय घोडे को खिलावे ।
मरहमकी बनाने का विधि-राल पावभर, मोम टकाभर, शीशम
का तेल सेरभर ले, तेलको लोहे की कढाई में नीमकी सेरभर
पत्ती डालकर जलादे, जब पत्ती जलजाय तब निकालकर फेंक
देवे, फिर राल और मोम डालकर नीमकी लकडी से घोटे,
तदुपरांत पानी से पचास बार धोकर रखले यह मरहम सब
प्रकार के घावों को लाभदायक है।

शालिहोत्र। १०३
मरहम जंगार बनानेकी विधि-यह मरहम नासूरके लिये बहुत
ही लाभ दायक है; चाहे मनुष्यके नासूर हो और चाहे घोडे के
सबको लाभ देता है।
नीमकी हरी पत्ती आठ दाम, मोम, राल, जंगार; प्रत्येक एक
दाम, साबुन पांच दाम, तूतिया चार रत्ती इनको कूट छानकर
रक्खे, फिर गर्मियों में पावसेर तिलका तेल और जाडे में कडवा
ले नीमकी पत्तियों को डालकर जलावै, जब जल जांय तब
पत्तियों को निकाल कर फेंक देवे और उक्त सब दवाओं को
छानकर धीरे २ मिलावे, नहीं तो गोली बंध जायगी और दवा
बिगड जायगी।
मरहम ददरेजा के बनाने की विधि-काला जीरा, तूतिया;
भिलावा, हरताल, समुद्र चक, दारुहल्दी और जवाखार पचीस
२ दाम ले, पावसेर तेलको कढाई में चढाकर जोशदे, फिर
उतार कर सब दवाओं को कूटकर धीरे २ नीमकी लकडी से
चार पहर तक घोटे यह तेल सब प्रकार के घाव, नासूर, तंग
और पीठ के घाव सबको दूर करता है।
आश्चर्य जनक नुसखोंका वर्णन।
पहिला नुसखा-अगर घोडेकी भौरी दूर करनी हो तो उस
जगह की खाल काटकर वहां सिन्दूर और तेल मिलाकर
लगावे जब तक घाव न भरै तब तक बराबर इसी उपाय को
करता रहे।
दूसरा नुसखा-चूना और सज्जी दोनों को पानी में मिलाकर
भौरी पर लगावै तो यह रोग दूर होता है; लगातार २ चार
दिन तक यही उपाय करे।

१०४ शालिहोत्रम् ।
तीसरा नुसखा-जो घोडा आग या बारूद से जल जाय तो
उसके घावको प्याजके पानीसे धोया करै. मनुष्यों के लिये भी यह
लाभदायक है बरसाती भी इससे दूर होती है।
चौथा नुसखा-जो घोडे के घावसे रुधिर बहना बंद न होतो
मकडीका जाला लेकर उस जगह पर लगावै अथवा सुहागे के
चूर्ण को घाव पर छिडके ।
पांचवां नुसखा-यदि घोडेके घावको नीमके पानी अथवा आद
मी के मूत्र से धोवै तो बहुत लाभदायक है ।
छठा नुसखा-जिस घावमें कीडे पड गये हों उसमें सूखा
तम्बाकू भरना उत्तम है अथवा कुटकी पीसकर भरै ।
सातवां नुसखा-जब इन्दमालका घाव होजाय तब यह इलाज
करै कि फिटकरी; माई, बडी हरड, अनारको छिलका और
एलुआ भुना हुआ सबको समान भाग लेकर बारीक पीसले
और नित्य घावके मुखपर भरा करै ।
आठवां नुसखा-जो घावपर बाल न जमते हों तो थूक में
कडवा तेल फेंटकर लगावै (२) साबुन और नील मिलाकर
मलै । (३) चमडाको जलाकर उसमें तेल, सिन्दुर और थोडा
साबुन मिलाकर लगावै ।
नवां नुसखा-जो घोडेको सांप काट खाय तो उसको जितनी
वह खा सकै उतनी नीमकी पत्ती खिलावै ।
दसवां नुसखा-जिस घोडेके कफ बहुत गिरता है उसको पीपल
अदरख और काली मिरच तीनों को पीसकर खिलावै ।
ग्यारहवां नुसखा-जिस घोडे की मनी झडती हो उसे कत्था,
केलेकी जड और कतीरा मिलाकर तीन दिन तक देवै ( २ )

शालिहोत्र। १०५
सोंफ, सफेद जीरा और मूलीके बीज नौ दिरम पीसकर सात
दिन तक खिलावै ।
बारहवां नुसखा-घोडेको पसीना बहुत आता हो तथा जो
थोडी मेहनत से ही घबरा जाता हो उसको दो दाम गेरू
शकर में मिलाकर खिलावै ।
तेरहवां नुसखा-जिस घोडे को डोमडे लोग गोली खिला
देते हैं वह बहुधा मर जाता है, क्योंकि उसका इलाज बहुत
मुश्किल से होता है किन्तु एक डाक्टर ने उसके लिये नुसखा
बतलाया है ।
( १ ) दो या चार गिरगिटों को पानीमें जोश देकर उस
पानीको नली द्वारा घोडे को पिलावै ।
( २ ) करण्डाकी पेडएक मंगाकर उसकी कड़ी लकड़ी दूर
करके शेष पत्ता, फूल कांटे और फल सबको औटाकर उसमें से
आध सेर पानी घोडे को पिलावै ॥
चौदहवां नुसखा-जिस घोडे की चोटी और दुमके बाल न
बढते हों उसके बालों को साठी चावलों के धोवन से धोवै
अथवा आंवला, कायफल और मेथी तीनों को कूटकर कपड
छन करके थोडे पानी में मिला कर गुनगुना कर सवेरे और
संध्या दोनों समय धोया करै ।
पन्द्रहवां नुसखा-जो घोडा दांत मारता है वह बुरा होताहै
क्योंकि वह बहुधा आदमी पर चोट करता है उसका यह इलाज
करै कि साईस लौकी या बेंगन खूब गरम करके तयार रक्खे
और जब वह घोडा किसी आदमी पर दांतमारै तभी उस लौकी

१०६ शालिहोत्र
या बैंगनको उसके मुखमें भरदे, ऐसा करने से उसकी आदत
छूट जाती है ।
सोलहवां नुसखा-जो घोडा पानीमें बैठ जाता हो उसका यह
इलाज है कि एक टुकडा बिना बुझे हुए चूनेका उसके तंगपर
रखकर तंगको खींचदे और घोडेको पानी में लेजाय । जब घो-
डा पानी में बैठेगा तब वह चूना पानीमें भीगने के कारण फूले-
गा और उसकी जलन से घोडा खडा होकर भागेगा, ऐसा करने
से घोडा पानी में बैठने की आदत भूल जाता है ।
सत्रहवां नुसखा-जो घोडा बाग पर फटता होवै उसका यह
इलाज करै कि उसकी बागकी मुहरी को आग में गरम करके
तीन बार इमली के रसमें बुझावै फिर मोहरी को घोडे के
मुख में दे ऐसा करने से उसकी आदत छूट जाती है ।
अठारहवां नुसखा-जो घोडा मुंह जोरी करता है उसका यह
इलाज करै कि मोहरी को पांच या छःबार चिड चिडाकी राख
डालकर इमली के रसमें बुझावै और इस मोहरी को घोडे के
मुंह में रक्खे ।
उन्नीसवां नुसखा-जो घोडा दो पैरोंसे खडा हो जावै उसका
यह इलाज है कि सवार हर समय पानीमें भिगोया हुआ कपडा
अपने पास रक्खे और घोडा खडा हो तभी उसके कानमें वह
कपडा निचोड देवै दो चार बार ऐसा करने से घोडा अपनी
आदत को छोड देता है ।
बीसवां नुसखा-जो घोडेके हाथ और पांव रंगने हों तो सूखी
मेंहदी पावभर, कत्था चार दामको घरके फूल पांच दाम सबको

१०७ शालिहोत्रम् ।
पीसकर दे। एक दिन तक लगावै, ऊपर से अंजीर के पत्तों की
तह बांध दे, ।
इक्कीसवां नुसखां-जो घोडेका दम चढाना चाहे अर्थात् ऐसा
करना चाहे कि साठ सत्तर कोस चलकर भी घोडा न थके तौ
यह उपाय करें कि एक काले सर्पको अधमरा करले किन्तु इस
तरह से करै कि न तौ उसका रुधिर निकलै और न जहर बाहर
आवै, फिर उस सर्प के मुंह में सौ या कुछ कम चने भर एक
घडे में रखकर उसका मुख बन्द करदे और फिर उस घडे को
पृथ्वी में गाढ दे, चालीस दिन पीछे चनोंका निकाल कर साफ
रखले और जब दूर जाना हो तब उनमें से एक चना सत्तू या
रातिब में मिलाकर घोडे को खिलावै ।
इति अश्वचिकित्सा समाप्त ।

❀ श्रीहरिः ❀
रामायण की पुस्तकें
तर्ज
राधेश्याम
--:( ❀ ):--
नारद मोह ८) राम सुग्रीव मिलाप =)
राम जन्म =) अशोक वाटिका में सीता =)
पुष्प वाटिका =) हनुमान लङ्का दहन =)
धनुष यज्ञ =) विभीषण की शरणागति =)
परशुराम सम्बाद =) अंगद रावण सम्बाद =)
राम विवाह =) मेघनाद की शक्ति =)
दशरथ प्रतिज्ञा =) कुम्भकरण मेघनाद वध =)
कौशिल्या मातासे विदाई =) सुलोचना सती =)
राम वन गवन केवट सम्वाद =) रावण वध =)
दशरथ मरण =) राम रावण युद्ध =)
चित्रकूट में भरत आगमन =) राज तिलक =)
पंचवटी =) सीता वनवास =)
सीता हरण =) रामाश्वमेध =)
पुस्तक मिलने का पता—
किशनलाल द्वारकाप्रसाद,
बम्बई भूषणप्रेस, मथुरा

२६ अठवां भाग । १४१:
एक हफ्ते अन्दर जो तुम नहीं आओगी ॥
तो राहत को फिर जिन्दा नहीं पाओगी ॥
॥ कहना बांदी का ॥
लावनी--नाहकको रंज इस क़दर आप करती हो ॥
समझाने पर भी धीर नहीं धरती हो ॥
सब सखी सहेली संग की आप बुलाओ ॥
दो घड़ी साथ उनके तुम मन बहलाओ ॥
लो सलाम मेरा जाती हूं मैं प्यारी ॥
भगवान करै रहे तबियत शाद तुम्हारी ॥
रतनकुमारी बोली सुनो प्यारे बांदी इस तरह समझा
बुझाकर राहतजान के महलों से रुखसत हुई और अपने घर
जाकर जोगन का भेष बना लिया सींगी सेली गले में डाल
बड़े बड़े दानोंकी माला पहन सुन्दर लंबे लंबे वाले छोड सि-
तार हाथमें ले रातके बारह बजेके बाद अपने घरसे निकलशा-
ही बाग के दरवाज़े पर जो नीमक दरख्त लहलहा रहे थे उनके
नीचे मृगछाला बिछा लेटरही सितार को दरख्त से लटका
दिया सुबह होतेही बाग के माली ने फाटक खोला यह वहांसे
उठ बाग के अन्दर गई और जहां वादशाह आन कर बैठते
थे उनके सामनेही एक दरख्तों का बन था वहां आसन
लगादिया और सितार की गतें निकालने लगी सुबह के वक्त
जो यहां दस बीस रईस शहरके आया करतेथे आये और सितार
की गत सुनकर और इसके रूपको देखकर सब पास आन
कर हाथ जोर सिर नवा बैठ गये इनको बैठा देख जोगिन ने
ये ग़ज़ल गाना शुरू किया ॥

॥ तरजी अबंद ॥
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है।
कफस में कब तलक तडफूं निहायत बेकरारी है ॥
दोहा-विरह रोग तनमन दहै, कल न पड़े दिनरैन ।
विधना काहूके कहीं, लागें हाय न नैन ॥
नहीं ज़खमी बचा इसका यह वह पैनी कटारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥
दोहा--प्रीत रीत तुम अगली, सबै दई बिसराय ।
ऐसी कोऊ करत है, जैसी तुम की हाय ॥
नहीं मालूम क्या हम से हुई तकसीर भारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥
दोहा-प्रीतम प्रीत लगाय तुम, छिपे कौन से देश ।
विरह रोग तनमें बसा, जटा जूट भये केश ॥
तरस आता है देखे से कि जो हालत हमारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है।
दोहा-हमतौ तज कुलकान सब, कीनी तुमसंग प्रीत ।
तुम निर मोही निठुरहो, करन लगे विपरीत ॥
इसीका नाम उल्फत है यही क्या शर्ते यारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥४॥
दोहा-कहा न माना किसीका, कीनी तुनसन प्रीत ।
सोई फल पायो हमन, दैनलगे दुख मीत ॥
न कुछ तकसीर है उनकी ये सब किस्मतहमारी है।
रिहा करदे अरे सैयाद अब फसले बहारी है ॥५॥
दोहा-प्रीत करी सुख के लिये, तन मन धन बिसराय ।
सो लागी दुख दैन अब, कीजे कौन उपाय ॥
निहायत ऐसे जीने से हमारी जान आरी है।

... २४७
वक्त मौजूद हुये और वजीर लोग जोगनजी को लिवाने ग-
ये और कहा जोगनजी महाराज आपको बादशाह सलामत-
ने याद किया है ।।
जोगन-बाबा हम फकीर लोगों से बादशाह को क्या काम
अटका है ?
वजीर-काम की कोई बात नहीं है आपके मुख से कुछ गाना
सुनने की दरकार है ।।
जोगन-हम लोग गाना बजाना क्या समझें योंही अपनेतन-
ना रीरी कर दो घड़ी दिल बहलाते हैं
वजीर-आप का कहना दुरुस्त है मगर हमारी खादिमी पर
भी नजर करना चाहिये ।
जब इस कदर वजीर अहल्करों ने अर्ज गुजारिश की तौ
जोगनजी उनके साथ चलने को तयार हुईं और सवारी में बै-
ठ शाही बाग में जो कदम दिया तो वही खलकत बल्कि उ-
स से जियादह आलम पाया यह अपने आसन पर जा बैठी
अहलकारों ने यथोचित आदर सत्कार किया बाद आदरहो-
ने के इसने अपना सितार मिलाना शुरू किया कुछ बाजापखा-
वज किनारी वगैरा शाही भी मौजूद हुआ पहले तो जोगनजी
ने सितारमेंही वहगत निकाली कि अच्छे २ जो कामिल उस्ताद
लोग बैठेथे सब चकित होगये पखावज और किन्नारी इस कदर
मिली हुई बज रही थी कि अजब समां दरस रहाथा फिर जोगन
जीने यह राग गाना शुरू किया ॥
(खेमटा)
मोहन प्यारे आन दिखा दीदार ॥ तेरे कारन घर दर छांडा
छोड दिया परिवार । अब मोहन प्यारे आन दिखा दीदार ॥