शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ
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१०७ शालिहोत्रम् ।
पीसकर दे। एक दिन तक लगावै, ऊपर से अंजीर के पत्तों की
तह बांध दे, ।
इक्कीसवां नुसखां-जो घोडेका दम चढाना चाहे अर्थात् ऐसा
करना चाहे कि साठ सत्तर कोस चलकर भी घोडा न थके तौ
यह उपाय करें कि एक काले सर्पको अधमरा करले किन्तु इस
तरह से करै कि न तौ उसका रुधिर निकलै और न जहर बाहर
आवै, फिर उस सर्प के मुंह में सौ या कुछ कम चने भर एक
घडे में रखकर उसका मुख बन्द करदे और फिर उस घडे को
पृथ्वी में गाढ दे, चालीस दिन पीछे चनोंका निकाल कर साफ
रखले और जब दूर जाना हो तब उनमें से एक चना सत्तू या
रातिब में मिलाकर घोडे को खिलावै ।
इति अश्वचिकित्सा समाप्त ।