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शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)

Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra

महर्षि शालिहोत्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished130 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

२६ अठवां भाग । १४१:
एक हफ्ते अन्दर जो तुम नहीं आओगी ॥
तो राहत को फिर जिन्दा नहीं पाओगी ॥
॥ कहना बांदी का ॥
लावनी--नाहकको रंज इस क़दर आप करती हो ॥
समझाने पर भी धीर नहीं धरती हो ॥
सब सखी सहेली संग की आप बुलाओ ॥
दो घड़ी साथ उनके तुम मन बहलाओ ॥
लो सलाम मेरा जाती हूं मैं प्यारी ॥
भगवान करै रहे तबियत शाद तुम्हारी ॥
रतनकुमारी बोली सुनो प्यारे बांदी इस तरह समझा
बुझाकर राहतजान के महलों से रुखसत हुई और अपने घर
जाकर जोगन का भेष बना लिया सींगी सेली गले में डाल
बड़े बड़े दानोंकी माला पहन सुन्दर लंबे लंबे वाले छोड सि-
तार हाथमें ले रातके बारह बजेके बाद अपने घरसे निकलशा-
ही बाग के दरवाज़े पर जो नीमक दरख्त लहलहा रहे थे उनके
नीचे मृगछाला बिछा लेटरही सितार को दरख्त से लटका
दिया सुबह होतेही बाग के माली ने फाटक खोला यह वहांसे
उठ बाग के अन्दर गई और जहां वादशाह आन कर बैठते
थे उनके सामनेही एक दरख्तों का बन था वहां आसन
लगादिया और सितार की गतें निकालने लगी सुबह के वक्त
जो यहां दस बीस रईस शहरके आया करतेथे आये और सितार
की गत सुनकर और इसके रूपको देखकर सब पास आन
कर हाथ जोर सिर नवा बैठ गये इनको बैठा देख जोगिन ने
ये ग़ज़ल गाना शुरू किया ॥