शालिहोत्रम्: अश्वशास्त्र (महर्षि शालिहोत्र - प्राचीन भारतीय अश्व-चिकित्सा एवं लक्षण विज्ञान)
Shalihotram Ashvashastra of Maharshi Shalihotra
महर्षि शालिहोत्र द्वारा
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या बैंगनको उसके मुखमें भरदे, ऐसा करने से उसकी आदत
छूट जाती है ।
सोलहवां नुसखा-जो घोडा पानीमें बैठ जाता हो उसका यह
इलाज है कि एक टुकडा बिना बुझे हुए चूनेका उसके तंगपर
रखकर तंगको खींचदे और घोडेको पानी में लेजाय । जब घो-
डा पानी में बैठेगा तब वह चूना पानीमें भीगने के कारण फूले-
गा और उसकी जलन से घोडा खडा होकर भागेगा, ऐसा करने
से घोडा पानी में बैठने की आदत भूल जाता है ।
सत्रहवां नुसखा-जो घोडा बाग पर फटता होवै उसका यह
इलाज करै कि उसकी बागकी मुहरी को आग में गरम करके
तीन बार इमली के रसमें बुझावै फिर मोहरी को घोडे के
मुख में दे ऐसा करने से उसकी आदत छूट जाती है ।
अठारहवां नुसखा-जो घोडा मुंह जोरी करता है उसका यह
इलाज करै कि मोहरी को पांच या छःबार चिड चिडाकी राख
डालकर इमली के रसमें बुझावै और इस मोहरी को घोडे के
मुंह में रक्खे ।
उन्नीसवां नुसखा-जो घोडा दो पैरोंसे खडा हो जावै उसका
यह इलाज है कि सवार हर समय पानीमें भिगोया हुआ कपडा
अपने पास रक्खे और घोडा खडा हो तभी उसके कानमें वह
कपडा निचोड देवै दो चार बार ऐसा करने से घोडा अपनी
आदत को छोड देता है ।
बीसवां नुसखा-जो घोडेके हाथ और पांव रंगने हों तो सूखी
मेंहदी पावभर, कत्था चार दामको घरके फूल पांच दाम सबको