सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
४४ | सर्वार्थसिद्धौ | [ १।८ § १०१ -
§ १०१. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनपरिहारविशुद्धिसूक्ष्मसांपराययथाख्यात-
शुद्धिसंयतानां संयतासंयतानामसंयतानां च चतुर्णां सामान्योक्तः कालः ।
§ १०२. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दशनिषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनां क्षीणकषायान्तानां
सामान्योक्तः कालः । अचक्षुर्दशनिषु मिथ्यादृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तः कालः ।
अवधिकेवलदर्शनिनोरवधिकेवलज्ञानिवत् ।
§ १०३. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्यासु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योः सामान्योक्तः कालः । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया
सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरोपमाणि
देशोनानि । तेजःपद्मलेश्ययोर्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं
प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योः सामान्योक्तः कालः । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तानां नाना-
जीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । शुक्ललेश्यानां
^१सागर है । तथा सासादनसम्यग्दृष्टिका सामान्योक्त काल है। अभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी,
अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानियोंका सामान्योक्त काल है।
§ १०१. संयम मार्गणाके अनुवादसे सामायिकसंयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहारविशुद्धि-
संयत, सूक्ष्मसाम्परायसंयत, यथाख्यातशुद्धिसंयत, संयतासंयत और चारों असंयतोंका सामान्योक्त
काल है ।
§ १०२. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवालोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल दो हजार सागर
है । तथा सासादन सम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है। अचक्षुदर्शन-
वालोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है। अवधिदर्शनवाले और
केवलदर्शनवाले जीवोंका काल अवधिज्ञानी और केवलज्ञानियोंके समान है।
§ १०३. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टिका
नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट
काल क्रमशः ^२साधिक तेतीस सागर, साधिक सत्रह सागर और साधिक सात सागर है । सासादन-
सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका सामान्योक्त काल है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त ओर उत्कृष्ट काल क्रमशः कुछ
कम तेतीस सागर, कुछ कम सत्रह सागर और कुछ कम सात सागर है। पीत और पद्मलेश्यावालों
में मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा
१. मिथ्यादृष्टि नारकी या देवके उत्पन्न होनेके बाद पर्याप्त होने पर ही विभंगज्ञान प्राप्त होता है ।
इसीसे यहाँ एक जीवकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टिके विभंगज्ञानका उत्कृष्ट काल कुछ कम तेतीस सागर कहा है ।
२. जो जिस लेश्यासे नरकमें उत्पन्न होता है उसके मरते समय अन्तर्मुहूर्त पहले वही लेश्या आ जाती है ।
इसी प्रकार नरकसे निकलनेपर भी अन्तर्मुहूर्त तक वही लेश्या रहती है । इसीसे यहाँ मिथ्यादृष्टिके कृष्ण,
नील और कापोत लेश्याका उत्कृष्ट काल क्रमसे साधिक तेतीस सागर, साधिक सत्रह सागर और साधिक सात
सागर बतलाया है ।
- ११८ § १०५ ] प्रथमोऽध्यायः ४९
मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सा-
गरोपमाणि सातिरेकाणि । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादिसयोगकेवल्यन्तानामलेश्यानां च सामान्योक्तः
कालः । किं तु संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः समयः ।
उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः ।
§ १०४. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवापेक्षया द्वौ ५
भङ्गौ-अनादिः सपर्यवसानः सादिः सपर्यवसानश्च । तत्र सादिः सपर्यवसानो जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः । सासादनसम्यग्दृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्योक्तः कालः ।
अभव्यानामनादिरपर्यवसानः ।
§ १०५. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टीनामसंयतसम्यग्दृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामा-
न्योक्तः कालः । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टीनां चतुर्णां सामान्योक्तः कालः । औपशमिकसम्यक्त्वेषु १०
असंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येय-
भागः । एकजीवं प्रति जघन्यश्चोत्कृष्टश्चान्तर्मुहूर्तः । प्रमत्ताप्रमत्तयोश्चतुर्णामुपशमकानां च
नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणान्तर्मुहूर्तः । सासादनसम्यग्दृष्टि-
सम्यङ्मिथ्यादृष्टिमिथ्यादृष्टीनां सामान्योक्तः कालः ।
जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल क्रमशः साधिक¹ दो सागर और साधिक² अठारह १५
सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका सामान्योक्त काल है । संयतासंयत,
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
काल³ एक समय है और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । शुक्ल लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना
जीवोंकी अपेक्षा सब काल है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल
साधिक इकतीस सागर है । सासादन सम्यग्दृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक प्रत्येकका और लेश्या- २०
रहित जीवोंका सामान्योक्त काल है । किन्तु संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है ।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है ।
§ १०४. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल
है । एक जीवकी अपेक्षा दो भंग हैं अनादि-सान्त और सादि-सान्त । इनमेंसे सादि-सान्त भंगकी
अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन है । सासादन- २५
सम्यग्दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है । अभव्योंका अनादि-अनन्त
काल है ।
§ १०५. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर
अयोगकेवली तक प्रत्येकका सामान्योक्त काल है । चारों क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टियोंका सामान्योक्त
काल है । औपशामिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि और संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा ३०
जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल पल्यका असंख्यातवाँ भाग है । एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और चारों उपशमकोंका नाना
जीव और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । तथा
सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टिका सामान्योक्त काल है ।
१. मिथ्यादृष्टिके पल्यका असंख्यातवाँ भाग अधिक दो सागर या अन्तर्मुहूर्त कम ढाई सागर और ३५
सम्यग्दृष्टिके अन्तर्मुहूर्त कम ढाई सागर । २. मिथ्यादृष्टिके पल्यका असंख्यातवाँ भाग अधिक अठारह सागर
और सम्यग्दृष्टिके अन्तर्मुहूर्त कम साढ़े अठारह सागर । ३. लेश्यापरावृत्ति और गुणपरावृत्तिसे जघन्य काल एक
समय प्राप्त हो जाता है ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
४६ सर्वार्थसिद्धी [ १।८ ९ १०६ –
§ १०६. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु मिथ्यादृष्टचाद्यनिवृत्तिबादरान्तानां पुंवेदवत् । शेषाणां
सामान्योक्तः । ^१असंज्ञिनां नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभव-
ग्रहणम् । ^२उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्ताः । तदुभयव्यपदेशरहितानां सामान्योक्तः ।
§ १०७. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं
प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणाङ्गुलासंख्येयभागः असंख्येयासंख्येया उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः ।
शेषाणां सामान्योक्तः कालः । अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सर्वः कालः । एकजीवं
प्रति जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण त्रयः समयाः । सासादनसम्यग्दृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टयोर्नाना-
जीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेणावलिकाया असंख्येयभागः । एकजीवं प्रति जघन्येनैकः
समयः । उत्कर्षेण द्वौ समयौ । सयोगकेवलिनो नानाजीवापेक्षया जघन्येन त्रयः समयाः । उत्कर्षेण
संख्येयाः समयाः । एकजीवं प्रति जघन्यश्चोत्कृष्टश्च त्रयः समयाः । अयोगकेवलिनां सामान्योक्तः
कालः । कालो वर्णितः ।
§ १०८. अन्तरं निरूप्यते । विवक्षितस्य गुणस्य गुणान्तरसंक्रमे सति पुनस्तत्प्राप्तेः
प्राङ्मध्यमन्तरम् । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावद् मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवा-
पेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे षट्षष्ठी देशोने सागरोपमा-
§ १०६. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अनिवृत्तिबादर तक
प्रत्येकका काल पुरुषवेदियोंके समान है। तथा शेष गुणस्थानोंका सामान्योक्त काल है । असंज्ञियों
का नाना जीवोंकी अपेक्षा सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है
और उत्कृष्ट अनन्त काल है जिसका प्रमाण असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है। संज्ञी और असंज्ञी
व्यवहारसे रहित जीवोंका सामान्योक्त काल है।
§ १०७. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
सब काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट काल अंगुलके असं-
ख्यातवें भागप्रमाण है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी है। शेष
गुणस्थानोंका सामान्योक्त काल है। अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा सब
काल है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल तीन समय है। सासादन-
सम्यग्दृष्टि और असंयत सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय है और
उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भागप्रमाण है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल तीन समय
और उत्कृष्ट काल दो समय है। सयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल तीन समय
और उत्कृष्ट काल संख्यात समय है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट काल तीन समय है।
अयोगकेवलियोंका सामान्योक्त काल है। इस प्रकार कालका वर्णन किया ।
§ १०८. अब अन्तरका निरूपण करते हैं। जब विवक्षित गुण गुणान्तररूपसे संक्रमित हो
जाता है और पुनः उसकी प्राप्ति होती है तो मध्यके कालको अन्तर कहते हैं। वह सामान्य और
विशेषकी अपेक्षा दो प्रकारका है। सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम ^४एकसौ
१. – ज्ञिनां मिथ्यादृष्टेर्नाना मु० । २. ग्रहणम् । तिण्णिसया छत्तीसा छावट्ठी सहस्साणि मरणाणि । अन्तो-
मुहुत्तमेत्ते तावदिया चेव होंति खुद्दभवा । ६६३३६ । उत्क-मु० । ३. -ख्येयाः संख्ये-मु० । ४. यदि
दर्शन मोहनीयका क्षपणा काल सम्मिलित न किया जाय तो वेदक सम्यक्त्वका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त कम
छयासठ सागर प्राप्त होता है। साथ ही यह भी नियम है कि ऐसा जीव मध्यमें अन्तर्मुहूर्तके लिए मिश्र
गुणस्थानमें जाकर पुनः अन्तर्मुहूर्त कम छयासठ सागर तक वेदक सम्यक्त्वके साथ रह सकता है। इसके
बाद वह या तो मिथ्यात्वमें चला जाता है या दर्शनमोहनीयकी क्षपणा करने लगता है। यहाँ मिथ्यात्वका
- ११८ ६ १०९ ] प्रथमोऽध्यायः ४७
णाम् । सासादनसम्यग्दृष्टेरन्तरं नानाजीवापेक्षया जघन्येनेकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येय-
भागः । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागः । उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टेरन्तरं नानाजीवापेक्षया सासादनवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्य-
न्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः । चतुर्णामुपशमकानां ५
नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः । चतुर्णां क्षपकाणामयोगकेवलिनां च नानाजीवापेक्षया
जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण षण्मासाः । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । सयोगकेवलिनां नानाजीवा-
पेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १०९. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ नारकाणां सप्तसु पृथिवीषु मिथ्यादृष्ट्यसंयत- १०
सम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण एक-त्रि-
सप्त-दश-सप्तदश-द्वाविंशति-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्या-
बत्तीस सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और
उत्कृष्ट अन्तर पल्यका असंख्यातवां भाग है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर पल्यका
असंख्यातवां भाग और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुद्गल परिवर्तन है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिका १५
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर सासादनसम्यग्दृष्टियोंके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन है । असंयत सम्यग्दृष्टिसे लेकर
अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येकका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन है । चारों उपशमकोंका नाना
जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है। एक जीवोंकी अपेक्षा २०
जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन है। चारों क्षपक और
अयोगकेवलियोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना
है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सयोगकेवलियोंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है ।
§ १०९. विशेषकी अपेक्षा गतिमार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें नारकियोंमें सातों २५
पृथिवियोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंको अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीव-
की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर क्रमशः कुछ कम एक सागर, कुछ कम
तीन सागर, कुछ कम सात सागर, कुछ कम दस सागर, कुछ कम सत्रह सागर, कुछ कम बाईस
उत्कृष्ट अन्तर लाना है इसलिए मिथ्यात्वसे लाकर अन्तमें पुनः मिथ्यात्वमें ही ले जाना चाहिए । इससे
मिथ्यादृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक सौ बत्तीस सागर प्राप्त हो जाता है । ३०
१. यदि सासादन सम्यग्दृष्टि न हों तो वे कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक पल्यके असंख्यातवें
भाग काल तक नहीं होते इसीसे इनका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें
भाग प्रमाण बतलाया है । २. सासादन गुणस्थान उपशम सम्यक्त्वसे च्युत होने पर ही प्राप्त हो सकता है ।
किन्तु एक जीव कमसे कम पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण कालके जाने पर ही दूसरी बार उपशम
सम्यक्त्वको प्राप्त हो सकता है । इसीसे यहाँ सासादन सम्यग्दृष्टिका जघन्य अन्तरकाल पल्यके असंख्यातवें ३५
भाग प्रमाण कहा है । ३. एक जीव उपशम श्रेणिसे च्युत होकर पुनः अन्तर्मुहूर्तके बाद उपशम श्रेणिपर चढ़
सकता है इसलिए चारों उपशामकोंका एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त बतलाया है ।
४८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ११० -
दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनेकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति
जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण एक-त्रि-सप्त-दश-सप्तदश-द्वाविंशति-त्रय-
स्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि ।
§ ११०. तिर्यग्गतौ तिर्यञ्चां मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनां चतुर्णां
सामान्योक्तमन्तरम् ।
§ १११. मनुष्यगतौ मनुष्याणां मिथ्यादृष्टेस्तिर्यग्वत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्यो-
र्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण
त्रीणि पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्वेनाभ्यधिकानि । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
सागर और कुछ कम तेतीस¹ सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना
जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यका असंख्यातवाँ भाग है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट
अन्तर सातों नरकोंमें क्रमशः कुछ कम एक सागर, कुछ कम तीन सागर, कुछ कम सात सागर,
कुछ कम दस सागर, कुछ कम सत्रह सागर, कुछ कम बाईस सागर और कुछ कम तेतीस ²सागर है ।
§ ११०. तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन ³पल्य है । तथा सासा-
दनसम्यग्दृष्टि आदि चारोंका सामान्योक्त अन्तर है ।
§ १११. मनुष्य गतिमें मनुष्योंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर तिर्यंचोंके ⁴समान है । सासादन-
सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है । उत्कृष्ट अन्तर पूर्व-
कोटिपृथक्त्व अधिक तीन ⁵पल्य है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
१. जिस नरककी जितनी उत्कृष्ट स्थिति है उसके प्रारम्भ और अन्तमें अन्तर्मुहूर्त तक मिथ्यात्वके साथ रखकर
मध्यमें सम्यक्त्वके साथ रखनेसे उस नरकमें मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अन्तर आ जाता है जिसका निर्देश मूलमें
किया ही है । २. नरकमें उत्कृष्ट स्थितिके साथ उत्पन्न होने पर अन्तर्मुहूर्तके बाद उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त
कराके सासादन और मिश्रमें ले जाय । फिर मरते समय सासादन और मिश्रमें ले जाय । इस प्रकार प्रत्येक
नरकमें सासादन और मिश्र गुण-स्थानका उत्कृष्ट अन्तर आ जाता है । इतनी विशेषता है कि सातवें नरकमें
मरनेके अन्तर्मुहूर्त पहले सासादन और मिश्रमें ले जाय । ३. जो तीन पल्यकी आयुके साथ कुक्कुट और मर्कट
आदि पर्यायमें दो माह रहा और वहाँसे निकलकर मुहूर्त पृथक्त्वके भीतर वेदक सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ ।
फिर अन्तमें मिथ्यात्वमें जाकर और सम्यक्त्वको प्राप्त होकर मरकर देव हुआ । उसके मुहूर्त पृथक्त्व और
दो माह कम तीन पल्य मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अन्तर होता है । ४. मनुष्य गतिमें मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अन्तर
१० माह १९ दिन और दो अन्तर्मुहूर्त कम तीन पल्य है । ५. मनुष्यकी उत्कृष्ट काय स्थिति सैंतालीस पूर्व-
कोटि अधिक तीन पल्य है । कोई एक अन्य गतिका जीव सासादनके कालमें एक समय शेष रहने पर मनुष्य
हुआ और अपनी उत्कृष्ट कायस्थिति प्रमाण काल तक मनुष्य पर्यायमें घूमता हुआ अन्तमें उपशम सम्यक्त्व-
पूर्वक एक समयके लिए सासादनको प्राप्त हुआ और मरकर देव हो गया तो इससे मनुष्य गतिमें सासादनका
उत्कृष्ट अन्तर दो समय कम सैंतालीस पूर्व-कोटि और तीन पल्य प्राप्त हो जाता है । मिश्र गुणस्थानका उत्कृष्ट
अन्तर लाते समय मनुष्य पर्याय प्राप्त करनेपर आठ वर्षके बाद मिश्र गुणस्थान प्राप्त करावे । फिर कायस्थितिके
अन्तमें मिश्र गुणस्थान प्राप्त कराकर मिथ्यात्व या सम्यक्त्वमें ले जाकर मरण करावे । तो इस प्रकार मिश्र
गुणस्थानका उत्कृष्ट अन्तर तीन अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्ष कम सैंतालीस पूर्वकोटि और तीन पल्य प्राप्त होता है ।
- ११८ § ११३ ] प्रथमोऽध्यायः ४९
एकजीवापेक्षया जघन्येनान्तर्मुहूर्तः। उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिकानि ।
संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेण पूर्वकोटीपृथक्त्वानि । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटीपृथक्त्वानि । शेषाणां सामान्यवत् ।
§ ११२. देवगतौ देवानां मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण एकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्य-
ग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येय-
भागोऽन्तर्मुहूर्तंश्च । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि ।
§ ११३. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियाणां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवापेक्षया
जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणम् । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिके । विकलेन्द्रियाणां
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणम् । उत्कर्षेणानन्तः
कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्त्ताः । एवमिन्द्रियं प्रत्यन्तरमुक्तम् । गुणं प्रत्युभयतोऽपि नास्त्यन्तरम् ।
पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया
सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तंश्च। उत्कर्षेण सागरोपमसहस्रं
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटी पृथक्त्व अधिक तीन
१पल्य है । संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व २ है । चारों
उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर
अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व है । शेष गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ ११२. देवगतिमें देवोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है । एक जीवको अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इक-
तीस ३सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और
अन्तर्मुहूर्त है । तथा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है ।
§ ११३. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक
दो हजार ४सागर है । विकलेन्द्रियोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य अन्तर क्षुद्रभव ग्रहणप्रमाण और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है जिसका प्रमाण असंख्यात
पुद्गल परिवर्तन है । इस प्रकार इन्द्रियकी अपेक्षा अन्तर कहा। गुणस्थानकी अपेक्षा विचार करने
पर तो इनके नाना जीवोंकी अपेक्षा और एक जीवकी अपेक्षा दोनों अपेक्षाओंसे भी अन्तर नहीं
है या उत्कृष्ट और जघन्य दोनों प्रकारसे अन्तर नहीं है। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर
ओघके समान है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और
१. मनुष्य सम्यग्दृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर आठ वर्ष और दो अन्तर्मुहूर्त कम सैंतालीस पूर्वकोटि और तीन पल्य
है । २. भोगभूमिमें संयमासंयम या संयमकी प्राप्ति सम्भव नहीं, इसलिए सैंतालीस पूर्वकोटिके भीतर ही यह
अन्तर बतलाया है । ३. देवोंमें नौवें ग्रैवेयक तक ही गुणस्थान परिवर्तन सम्भव है। इसीसे यहाँ मिथ्यात्व
और सम्यक्त्वका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर बतलाया है । ४. त्रस पर्यायमें रहनेका उत्कृष्ट काल
पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक दो हजार सागर है। इसीसे एकेन्द्रियोंका उक्त प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर बतलाया है।
पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिकम् । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमसहस्रं पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिकम् ।
चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण
सागरोपमसहस्रं पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिकम् । शेषाणां सामान्योक्तम् ।
५ § ११४. कायानुवादेन पृथिव्यप्तेजोवायुकायिकानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणम् । उत्कर्षेणानन्तः कालोऽसंख्येयाः पुद्गलपरिवर्त्ताः ।
वनस्पतिकायिकानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवापेक्षया जघन्येन क्षुद्रभवग्रहणम् ।
उत्कर्षेणासंख्येया लोकाः । एवं कायं प्रत्यन्तरमुक्तम् । गुणं प्रत्युभयतोऽपि नास्त्यन्तरम् । त्रसकायिकेषु
मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
१० एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे पूर्वकोटी-
पृथक्त्वैरभ्यधिके १ । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं
प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे पूर्वकोटीपृथक्त्वैरभ्यधिके । चतुर्णामुप-
अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटीपृथक्त्व अधिक एक हजार सागर २ है । असंयतसम्य-
ग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक
१५ जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटीपृथक्त्व अधिक एक हजार
सागर है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटी पृथक्त्व अधिक एक हजार सागर
है । शेष गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ ११४. काय मार्गणाके अनुवादसे पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक और वायु-
२० कायिक जीवोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्षुद्र-
भवग्रहणप्रमाण और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है जिसका प्रमाण असंख्यात पुद्गल परिवर्तन है ।
वनस्पतिकायिकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर
क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण और उत्कृष्ट अन्तर असंख्यात लोकप्रमाण है । इस प्रकार कायकी अपेक्षा अन्तर
कहा । गुणस्थानकी अपेक्षा विचार करने पर तो नाना जीवोंकी अपेक्षा और एक जीवकी अपेक्षा
२५ इन दोनों अपेक्षाओंसे भी अन्तर नहीं है । या उत्कृष्ट और जघन्य इन दोनों अपेक्षाओंसे अन्तर
नहीं है । त्रसकायिकोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्य-
ग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर
क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटी पृथक्त्व अधिक
दो हजार सागर है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका नाना जीवों-
३० की अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर
१. —म्यधिके । चतुर्णा—मु० । २. सासादनोंका उत्कृष्ट अन्तर लाते समय पूर्वकोटि पृथक्त्व अधिक एक
हजार सागरमें-से आवलिका असंख्यातवां भाग और नौ अन्तर्मुहूर्त कम कर देना चाहिए । मिश्र गुणस्थानवालों-
का उत्कृष्ट अन्तर लाते समय बारह अन्तर्मुहूर्त कम कर देना चाहिए । असंयत सम्यग्दृष्टियोंका उत्कृष्ट अन्तर
लाते समय दस अन्तर्मुहूर्त कम कर देना चाहिए । संयतासंयतोंका उत्कृष्ट अन्तर लाते समय तीन पक्ष, तीन
३५ दिन और बारह अन्तर्मुहूर्त कम कर देना चाहिए । प्रमत्तसंयतों और अप्रमत्तसंयतोंका उत्कृष्ट अन्तर लाते
समय आठ वर्ष और दस अन्तर्मुहूर्त कम कर देना चाहिए । अपूर्वकरण आदि चार उपशमकोंका उत्कृष्ट अन्तर
लाते समय क्रमसे ३०, २८, २६ और २४ अन्तर्मुहूर्त अधिक आठ वर्ष कम कर देना चाहिए ।
- ११८ § ११६ ] प्रथमोऽध्यायः ५१
शमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपम-
सहस्रे पूर्वकोटीपृथक्त्वेनाभ्यधिके । शेषाणां पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ ११५. योगानुवादेन कायवाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टिसंयतासंयतप्रम-
त्ताप्रमत्तसयोगकेवलिनां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टि-
सम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । चतुर्णामुपशमकानां ५
नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । चतुर्णां क्षपकाणामयोगकेवलिनां च
सामान्यवत् ।
§ ११६. वेदानुवादेन स्त्रीवेदेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेण पञ्चपञ्चाशत्पल्योपमानि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मि-
थ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्त्त- १०
श्च । उत्कर्षेण पल्योपमशतपृथक्त्वम् । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया
नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेण पल्योपमशतपृथक्त्वम् । द्वयोरुपशमक-
योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्त्तः । उत्कर्षेण पल्योपमशत-
पृथक्त्वम् । द्वयोः क्षपकयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं
प्रति नास्त्यन्तरम् । १५
पूर्वकोटीपृथक्त्व अधिक दो हजार सागर है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटी-
पृथक्त्व अधिक दो हजार सागर है । तथा शेष गुणस्थानोंका अन्तर पंचेन्द्रियोंके समान है ।
§ ११५. योग मार्गणाके अनुवादसे काययोगी, वचनयोगी और मनोयोगियोंमें मिथ्यादृष्टि,
असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत, प्रमत्तसंयत, अप्रमत्तसंयत और सयोगकेवलीका नाना जीवों २०
और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना
जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । चारों उपशमकोंका
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । चारों क्षपक
और अयोगकेवलियोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ ११६. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदियोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर २५
नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचपन¹ पल्य
है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है ।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त है और
उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्य² पृथक्त्व है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुण
स्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और ३०
उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्य पृथक्त्व है । दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान
है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ पल्य पृथक्त्व है । दोनों
क्षपकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व³ है ।
एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
१. पाँच अन्तर्मुहूर्त कम पचपन पल्य । २. स्त्रीवेदका उत्कृष्ट काल सौ पल्य पृथक्त्व है उसमें से दो समय कम ३५
कर देनेपर स्त्रीवेदियोंमें सासादन सम्यग्दृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर आ जाता है और छह अन्तर्मुहूर्त कम
कर देनेपर सम्यग्मिथ्यादृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर आ जाता है । आगे भी इसी प्रकार आगमानुसार घटित
कर लेना चाहिए । ३. साधारणतः क्षपकश्रेणिका उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है । पर स्त्रीवेदकी अपेक्षा
उसका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व बतलाया है ।
५२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ११७ -
§ ११७. पुंवेदेषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नाना-
जीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तंश्च । उत्कर्षेण
सागरोपमशतपृथक्त्वम् । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एक-
जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । द्वयोरुपशमकयोर्नानाजीवापेक्षया
५ सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । द्वयोः
क्षपकयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण संवत्सरः सातिरेकः । एकजीवं प्रति
नास्त्यन्तरम् ।
§ ११८. नपुंसकवेदेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्ये-
नान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्ट्याद्यनिवृत्त्युपशम-
१० कान्तानां सामान्योक्तम् । द्वयोः क्षपकयोः स्त्रीवेदवत् । अपगतवेदेषु अनिवृत्तिबादरोपशमकसूक्ष्म-
सांपरायोपशमकयोर्नानाजीवापेक्षया सामान्योक्तम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः ।
उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । शेषाणां
सामान्यवत् ।
§ ११९. कषायानुवादेन क्रोधमानमायालोभकषायाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्त्युपशमकान्तानां
१५ मनोयोगिवत् । द्वयोः क्षपकयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण संवत्सरः सातिरेकः ।
§ ११७. पुरुषवेदियोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान है । सासादनसम्यग्दृष्टि और
सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट अन्तर सौ १सागर
पृथक्त्व है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका नाना जीवोंकी
२० अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जोवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ
सागर पृथक्त्व है । दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है । दोनों क्षपकों-
का नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर २साधिक एक वर्ष है ।
एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
२५ § ११८. नपुंसक वेदवालोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अम्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है । सासा-
दनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्ति उपशमक तक प्रत्येक गुणस्थानका सामान्योक्त अन्तर है । तथा
दोनों क्षपकोंका अन्तर स्त्रीवेदियोंके समान है । अपगतवेदवालोंमें अनिवृत्तिबादर उपशमक और
सूक्ष्मसाम्पराय उपशमकका नाना जोवोंकी अपेक्षा सामान्योक्त अन्तर है । एक जीवकी अपेक्षा
३० जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके
समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । शेष गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ ११९. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध, मान, माया और लोभमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अनिवृत्तिबादर उपशमक तक प्रत्येक गुणस्थानका अन्तर मनोयोगियोंके समान है । दोनों क्षपकोंका
नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर साधिक एक वर्ष है । लोभ
३५ १. सासादनके दो समय कम और सम्यग्मिथ्यादृष्टिके छह अन्तर्मुहूर्त कम सौ सागर पृथक्त्व यह अन्तर
जानना चाहिए । आगे भी इस प्रकार यथा 'योग्य अन्तर घटित कर लेना चाहिए । २. पुरुषवेदी अधिकसे
अधिक साधिक एक वर्ष तक क्षपक श्रेणिपर नहीं चढ़ता यह इसका भाव है ।
- १८ § १२० ] प्रथमोऽध्यायः ५३
केवललोभस्य सूक्ष्मसांपरायोपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्य-
न्तरम् । क्षपकस्य तस्य सामान्यवत् । अकषायेषु उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । शेषाणां त्रयाणां सामान्यवत् ।
§ १२०. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानश्रुताज्ञानविभङ्गज्ञानिषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया
एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति ५
नास्त्यन्तरम् । आभिनिबोधिकश्रुतावधिज्ञानिषु असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया
नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण
त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । १०
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण षट्षष्टिसागरोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णां क्षपकाणां
सामान्यवत् । किं तु अवधिज्ञानिषु नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कृष्टेण वर्षपृथक्त्वम् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । मनःपर्ययज्ञानिषु प्रमत्ताप्रमत्तसंयतयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कृष्टेण पूर्वकोटी देशोना । चतुर्णां क्षपकाणामवधिज्ञानिवत् । १५
द्वयोः केवलज्ञानिनोः सामान्यवत् ।
कषायमें सूक्ष्मसाम्परायिक उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक
जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सूक्ष्मलोभवाले क्षपकका अन्तर ओघके समान है । कषायरहित
जीवोंमें उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है । शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है । २०
§ १२०. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी और विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि-
का नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सासादन सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी
और अवधिज्ञानी जीवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक १पूर्वकोटी है । संयतासंयतका २५
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट
अन्तर साधिक छ्यासठ २सागर है । प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक तेतीस३ सागर
है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर साधिक छ्यासठ४ सागर है । चारों क्षपकोंका ३०
अन्तर ओघके समान है । किन्तु अवधिज्ञानियोंमें नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय
और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व५ है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । मनःपर्ययज्ञानियोंमें
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा
१. चार अन्तर्मुहूर्त कम पूर्व कोटि । २. आठ वर्ष और ग्यारह अन्तर्मुहूर्त कम तीन पूर्वकोटि अधिक छ्यासठ
सागर । किन्तु अवधिज्ञानीके ग्यारह अन्तर्मुहूर्तके स्थानमें १२ अन्तर्मुहूर्त कम करना चाहिए । ३. प्रमत्तके ३५
साढ़े तीन अन्तर्मुहूर्त कम पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागर उत्कृष्ट अन्तर है । और अप्रमत्तके दो अन्तर्मुहूर्त कम
पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागर उत्कृष्ट अन्तर है । ४. तीन या चार पूर्व कोटि अधिक छ्यासठ सागर । किन्तु
इसमें-से चारों उपशमकोंके क्रमसे २६, २४, २२ और २० अन्तर्मुहूर्त तथा आठ वर्ष कम कर देना चाहिए ।
५. अवधिज्ञानी प्रायः बहुत ही कम होते हैं, इसलिए इतना अन्तर बन जाता है ।
५४ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १२१ -
§ १२१. संयमानुवादेन सामायिकच्छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवा-
पेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । द्वयोरुपशमकयोर्नानाजीवापेक्षया
सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । द्वयोः क्षपकयोः
सामान्यवत् । परिहारशुद्धिसंयतेषु प्रमत्ताप्रमत्तयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतेषूपशमकस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । तस्यैव क्षपकस्य सामान्यवत् । यथाख्याते अकषायवत् । संयतासंयतस्त
नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् । असंयतेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्त-
रम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणत्रयंस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । शेषाणां-
त्रयाणां सामान्यवत् ।
§ १२२. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दर्शनिषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टि-
सम्यग्मिथ्यादृष्टयोर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येय-
भागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे देशोने । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त२ है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एक३ पूर्वकोटी है । चारों क्षपकोंका अन्तर अवधिज्ञानियोंके समान है। दोनों केवलज्ञानियोंका
अन्तर ओघके समान है ।
§ १२१. संयम मार्गणाके अनुवादसे सामायिक शुद्धिसंयत और छेदोपस्थापनशुद्धिसंयतोंमें
प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा
जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त४ है। दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एक५ पूर्वकोटी है। दोनों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है। परिहारशुद्धि संयतोंमें प्रमत्तसंयत
और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और
उत्कृष्ट ६ अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। सूक्ष्मसाम्परायशुद्धिसंयतोंमें उपशमकका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। तथा उसी सूक्ष्मसाम्पराय क्षपकका
अन्तर ओघके समान है। यथाख्यातमें अन्तर कषायरहित जीवोंके समान है। संयतासंयतका
नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। असंयतोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवको अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ
कम तेतीस सागर७ है। शेष तीन गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है।
§ १२२. दर्शनमार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवालोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान
है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा
१. —यमे उप-आ०, दि० १, दि० २, ता० । २. उपशमश्रेणि और प्रमत्त-अप्रमत्तका काल अन्तर्मुहूर्त होनेसे
मनःपर्ययज्ञानी प्रमत्त और अप्रमत्तका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त बन जाता है । ३. आठ वर्ष और
१२ अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि । ४. प्रमत्तको अप्रमत्तसे और अप्रमत्तको प्रमत्तसे अन्तरित कराके यह
अन्तर ले आना चाहिए। ५. आठ वर्ष और ग्यारह अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अपूर्वकरणका उत्कृष्ट
अन्तर है । अनिवृत्तिकरणका समयाधिक नौ अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्ष कम एक पूर्वकोटि उत्कृष्ट अन्तर है।
६. प्रमत्त और अप्रमत्तकी परस्पर अन्तरित करानेसे यह अन्तर आ जाता है। ७. यह अन्तर सातवें नरकमें
प्राप्त होता है।
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- ११८ § १२४ ] प्रथमोऽध्यायः ५५
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे
देशोने । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्योक्तम् १ । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेण द्वे सागरोपमसहस्रे देशोने । चतुर्णां क्षपकाणां सामान्योक्तम् । अचक्षुदर्शनिषु मिथ्या-
दृष्ट्यादिक्षीणकषायान्तानां सामान्योक्तमन्तरम् । अवधिदर्शनिनोऽवधिज्ञानिवत् । केवलदर्शनिनः
केवलज्ञानिवत् ।
§ १२३. लेश्यानुवादेन कृष्णनीलकापोतलेश्येषु मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवा-
पेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरो-
पमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं
प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सप्तदशसप्तसागरोपमाणि
देशोनानि ।
§ १२४. तेजःपद्मलेश्ययोर्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एक-
जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन
उत्कृष्ट अन्तर कुछ २ कम दो हजार सागर है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक
गुणस्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त
और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो हजार सागर ३ है । चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ
कम दो हजार ४ सागर है । चारों क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है । अचक्षुदर्शनवालोंमें मिथ्या-
दृष्टिसे लेकर क्षीणकषायतक प्रत्येक गुणस्थानका सामान्योक्त अन्तर है । अवधिदर्शनवालोंका
अवधिज्ञानियोंके समान अन्तर है । तथा केवल दर्शनवालोंका केवलज्ञानियोंके समान अन्तर है ।
§ १२३. लेश्या मार्गणाके अनुवादसे कृष्ण, नील और कापोत लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि
और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर क्रमशः कुछ कम तेतीस सागर, कुछ कम सत्रह सागर और
कुछ कम सात सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर दोनों गुणस्थानोंमें क्रमशः पल्यका
असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट अन्तर तीनों लेश्याओंमें क्रमशः कुछ कम तेतीस
सागर, कुछ कम सत्रह सागर और कुछ कम सात सागर है ।
§ १२४. पीत और पद्म लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर दोनों
लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागर और साधिक अठारह सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और
सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
१. सामान्यवत् । एव-मु० । २. चक्षुदर्शनवालोंमें सासादनके नौ अन्तर्मुहूर्त और आवलिका असंख्यातवां भाग
कम सम्यग्मिथ्यादृष्टिके बारह अन्तर्मुहूर्त कम दो हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है । ३. चक्षुदर्शनवालोंमें अविरत-
सम्यग्दृष्टिके १० अन्तर्मुहूर्त कम संयतासंयतके ४८ दिन और १२ अन्तर्मुहूर्त कम, प्रमत्तसंयतके ८ वर्ष १०
अन्तर्मुहूर्त कम और अप्रमत्त संयतके भी ८ वर्ष और १० अन्तर्मुहूर्त कम दो हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है ।
४. चक्षुदर्शनवालोंमें चारों उपशामकोंका क्रमसे २९, २७, २५ और २३ अन्तर्मुहूर्त तथा आठ वर्ष कम दो
हजार सागर उत्कृष्ट अन्तर है ।
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पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण द्वे सागरोपमे अष्टादश च सागरोपमाणि साति-
रेकाणि । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १२५. शुक्ललेश्येषु मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्य-
ग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येय-
भागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेणैकत्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । संयतासंयतप्रमत्तसंयतयोस्तेजो-
लेश्यावत् । अप्रमत्तसंयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं
चान्तर्मुहूर्तः¹ । त्रयाणामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं
चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
चतुर्णां क्षपकानां सयोगकेवलिनामलेश्यानां च सामान्यवत् ।
§ १२६. भव्यानुवादेन भव्येषु मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । अभव्यानां
नानाजीवापेक्षया एवजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १२७. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम्।
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां
नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्साग-
रोपमाणि सातिरेकाणि । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं
अन्तर दोनों गुणस्थानोंमें क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट अन्तर
दोनों लेश्याओंमें क्रमशः साधिक दो सागर और साधिक अठारह सागर है। संयतासंयत, प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
§ १२५. शुक्ल लेश्यावालोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम
एकतीस सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
ओघके समान है और एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवां भाग और
अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम इकतीस सागर है। संयतासंयत और प्रमत्तसंयतका
अन्तरकथन पीतलेश्याके समान है । तथा अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कुट अन्तर ²अन्तर्मुहूर्त है । तीन उपशमकोंका नाना जीवोंकी
अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जोवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर ³अन्तर्मुहूर्त है ।
उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है तथा एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । चारों क्षपक, सयोगकेवली और लेश्यारहित जीवोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ १२६. भव्यमार्गणाके अनुवादसे भव्योंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक
गुणस्थानका अन्तर ओघके समान है । अभव्योंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है ।
§ १२७. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना
जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर
कुछ⁴ कम एक पूर्वकोटी है । संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा
१. —हूर्तः । अयदो त्ति छ लेस्साओ सुहतिय लेस्सा हु देसविरदतिये । तत्तो दु सुक्कलेस्सा अजोगिठाणं
अलेस्सं तु ।। त्रयाणा—मु० । २. उपशमश्रेणिसे अन्तरित कराके जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त
करना चाहिए । ३. अप्रमत्तसंयतसे अन्तरित कराके यह अन्तर प्राप्त करना चाहिए । ४. आठ वर्ष और दो
अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि ।
- ११८ § १२९ ] प्रथमोऽध्यायः ५७
प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि । शेषाणां सामान्यवत् ।
§ १२८. क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं
प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण पूर्वकोटी देशोना । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया नास्त्य-
न्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण षट्षष्टिसागरोपमाणि देशोनानि । प्रमत्ता-
प्रमत्तसंयतयोर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिं- ५
शत्सागरोपमाणि सातिरेकाणि ।
§ १२९. औपशमिकसम्यग्दृष्टिष्वसंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः। उत्कर्षेण
सप्त रात्रिंदिनानि । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । संयतासंयतस्य नानाजीवापेक्षया
जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण चतुर्दश रात्रिंदिनानि । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः ।
प्रमत्ताप्रमत्तसंयतयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पञ्चदश रात्रिंदिनानि । एक- १०
जीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । त्रयाणामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः ।
उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः । उपशान्तकषायस्य नानाजीवा-
अन्तर नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर २साधिक तैंतीस
सागर है। चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर ३साधिक तैंतीस सागर है। तथा शेष गुण- १५
स्थानोंका अन्तर ओघके समान है।
§ १२८. क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ४ कम एक पूर्व-
कोटी है । संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर
अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम छ्यासठ५ सागर है। प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतका २०
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट
अन्तर साधिक६ तैंतीस सागर है।
§ १२९. औपशमिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयत सम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर सात दिन रात है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट
अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । संयतासंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट २५
अन्तर चौदह दिन रात्रि है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयतका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर
पन्द्रह दिन रात है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। तीन उप-
शमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है। एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। उपशान्तकषायका नाना जीवोंको अपेक्षा ३०
१. -दिनानि । एक—मु० । २. संयतासंयतके आठ वर्ष और चौदह अन्तर्मुहूर्त कम दो पूर्वकोटि अधिक
तैंतीस सागर । प्रमत्तसंयत के एक अन्तर्मुहूर्त और एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर । अथवा साढ़े तीन
अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर । अप्रमत्त संयतके साढ़े पाँच अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि
अधिक तैंतीस सागर । ३. चारों उपशमकोंके आठ वर्ष और क्रमसे २७, २५, २३ और २१ अन्तर्मुहूर्त
कम दो पूर्व कोटी अधिक तैंतीस सागर । ४. चार अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्व कोटि । ५. तीन अन्तर्मुहूर्त कम ३५
छ्यासठ सागर । ६. प्रमत्तके सात अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर और अप्रमत्तके आठ
अन्तर्मुहूर्त कम एक पूर्वकोटि अधिक तैंतीस सागर ।
८
५८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १३० -
पेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्योर्नाना-
जीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् ।
मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १३०. संज्ञानुवादेन संज्ञिषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्या-
दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तञ्च ।
उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्य-
न्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानां
नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथ-
क्त्वम् । चतुर्णां क्षपकानां सामान्यवत् । असंज्ञिनां नानाजीवापेक्षयैकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
तदुभयव्यपदेशरहितानां सामान्यवत् ।
§ १३१. आहारानुवादेन आहारकेषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्-
मिथ्यादृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्त-
र्मुहूर्तञ्च । उत्कर्षेणाङ्गुलासंख्येय भागोऽसंख्येयासंख्येया¹ उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः । असंयतसम्यग्दृष्ट्य-
प्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणाङ्गुला-
ऽसंख्येयभागोऽसंख्येया² उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यः । चतुर्णामुपशमकानां नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् ।
अन्तर ओघके समान है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर³ नहीं है। सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्य-
ग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यका
असंख्यातवाँ भाग है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा
और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है।
§ १३०. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान है।
सासादन सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है। एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट
अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है। असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट
अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है। चारों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है।
एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है। चारों
क्षपकोंका अन्तर ओघके समान है। असंज्ञियोंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं
है। संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंका अन्तर ओघके समान है।
§ १३१. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान है।
सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तरं ओघके समान है। एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट
अन्तर अंगुलका असंख्यातवाँ भाग है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी
है। असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर अंगुलका असंख्यातवाँ
भाग है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी है। चारों उपशमकोंका
१. -भागा असंख्येया उत्स- मु० । २. क्योंकि उपशमश्रेणिसे उतर कर उपशम सम्यक्त्व छूट जाता है।
यदि अन्तर्मुहूर्त बाद पुनः उपशमश्रेणिपर चढ़ता है तो वेदकसम्यक्त्व पूर्वक दूसरी बार उपशम करना पड़ता
है। यही कारण है कि उपशम सम्यक्त्वमें एक जीवकी अपेक्षा उपशान्तकषायका अन्तर नहीं प्राप्त होता।
- ११८ § १३३ ] प्रथमोऽध्यायः ५९
एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणाङ्गुलासंख्येयभागोऽसंख्येयासंख्येया १ उत्सर्पिण्यवस-
र्पिण्यः । चतुर्णां क्षपकाणां सयोगकेवलिनां च सामान्यवत् ।
§ १३२. अनाहारकेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
सासादनसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं
प्रति नास्त्यन्तरम् । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण मासपृथक्त्वम् । ५
एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । सयोगकेवलिनः नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण
वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । अयोगकेवलिनः नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः ।
उत्कर्षेण षण्मासाः । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । अन्तरमवगतम् ।
§ १३३. भावो विभाव्यते । स द्विविधः सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत् मिथ्या-
दृष्टिरित्योदयिको भावः । सासादनसम्यग्दृष्टिरिति पारिणामिको भावः । सम्यङ्मथ्यादृष्टिरिति १०
क्षायोपशमिको भावः । असंयतसम्यग्दृष्टिरिति औपशमिको वा क्षायिको वा क्षायोपशमिको वा
भावः । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतः प्रमत्तसंयतोऽप्रमत्तसंयत इति क्षायोपशमिको
भावः । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । चतुर्षु क्षपकेषु सयोगायोगकेवलिनोश्च क्षायिको
भावः ।
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और १५
उत्कृष्ट अन्तर अंगुलका असंख्यातवां भाग है जिसका प्रमाण असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी और
अवसर्पिणी है । चारों क्षपक और सयोगकेवलियोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ १३२. अनाहारकोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यका
असंख्यातवां भाग है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी २०
अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर मासपृथक्त्व है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर
नहीं है । सयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर
वर्षपृथक्त्व है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । अयोगकेवलीका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । इस
प्रकार अन्तरका विचार किया । २५
§ १३३. अब भावका विचार करते हैं । वह दो प्रकारका है—सामान्य और विशेष ।
सामान्यकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि यह औदयिकभाव है । सासादनसम्यग्दृष्टि यह पारिणामिक२ भाव है ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि यह क्षायोपशमिक३ भाव है । असंयतसम्यग्दृष्टि यह औपशमिक, क्षायिक या
क्षायोपशमिक भाव है । किन्तु इसमें असंयतपना औदयिक भावकी अपेक्षा है । संयतासंयत, प्रमत्त-
संयत और अप्रमत्तसंयत यह क्षायोपशमिक भाव है । चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव है । ३०
चारों क्षपक, सयोगकेवली और अयोगकेवलीके क्षायिक भाव है ।
१. भावः । उक्तं च-मिच्छे खलु ओदइओ विदिाए पुण पारिणामिओ भावो । मिस्से खओवसमिओ अविरद-
सम्मम्मि तिण्णेव ॥ १ ॥ असं—मु० । २. सासादनसम्यक्त्व यह दर्शनमोहनीय कर्मके उदय, उपशम, क्षय
और क्षयोपशमसे नहीं होता इस लिए निष्कारण होनेसे पारिणामिक भाव है । ३. सम्यग्मिथ्यात्वकर्मका उदय
होने पर श्रद्धानाश्रद्धानात्मक मिला हुआ जीव परिणाम होता है । उसमें श्रद्धानांश सम्यक्त्व अंश है । ३५
सम्यग्मिथ्यात्व कर्मका उदय उसका अभाव करनेमें असमर्थ है इस लिए सम्यग्मिथ्यात्व यह क्षायोपशमिक
भाव है ।
६० सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § १३४ -
§ १३४. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ प्रथमायां पृथिव्यां नारकाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयत-
सम्यग्दृष्ट्यन्तानां सामान्यवत् । द्वितीयादिष्वा सप्तम्या मिथ्यादृष्टिसासादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्या-
दृष्टीनां सामान्यवत् । असंयतसम्यग्दृष्टेरौपशमिको वा क्षायोपशमिको वा भावः । असंयतः पुनरौद-
यिकेन भावेन । तिर्यग्गतौ तिरश्चां मिथ्यादृष्ट्यादिसंयतासंयतान्तानां सामान्यवत् । मनुष्यगतौ
५ मनुष्याणां मिथ्यादृष्ट्याद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । देवगतौ देवानां मिथ्यादृष्ट्याद्यसंयत-
सम्यग्दृष्ट्यन्तानां सामान्यवत् ।
§ १३५. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियविकलेन्द्रियाणामौदयिको भावः । पञ्चेन्द्रियेषु मिथ्यादृष्ट्य-
योगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् ।
§ १३६. कायानुवादेन स्थावरकायिकानामौदयिको भावः । त्रसकायिकानां सामान्यमेव ।
१० § १३७. योगानुवादेन कायवाङ्मनसयोगिनां मिथ्यादृष्ट्यादिसयोगकेवल्यन्तानां च सामा-
न्यमेव ।
§ १३८. वेदानुवादेन स्त्रीपुन्नपुंसकवेदानामवेदानां च सामान्यवत् ।
§ १३९. कषायानुवादेन क्रोधमानमायालोभकषायाणामकषायाणां च सामान्यवत् ।
§ १४०. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिविभङ्गज्ञानिनां मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवल-
१५ ज्ञानिनां च सामान्यवत् ।
§ १४१. संयमानुवादेन सर्वेषां संयतानां संयतासंयतानामसंयतानां च सामान्यवत् ।
§ १३४. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरक गतिमें पहली पृथिवी में नार-
कियोंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि तक ओघके समान भाव है। दूसरी से लेकर सातवीं
पृथिवी तक मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि नारकियोंके ओघके समान भाव
२० है। असंयतसम्यग्दृष्टिके औपशमिक या क्षायोपशमिक भाव है। किन्तु इसमें असंयतपना औदयिक
भावकी अपेक्षा है। तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर संयतासंयत तक ओघके समान भाव
है। मनुष्यगतिमें मनुष्योंके मिथ्यादृष्टि से लेकर अयोगकेवली तक ओघके समान भाव है। देव-
गतिमें देवोंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर असंयत सम्यग्दृष्टि तक ओघके समान भाव है।
§ १३५. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रियोंके औदयिक भाव है। पंचेन्द्रियोंमें मिथ्या-
२५ दृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक प्रत्येक गुणस्थानका ओघके समान भाव है।
§ १३६. कायमार्गणाके अनुवादसे स्थावरकायिकोंके औदयिक भाव है। त्रसकायिकोंके
ओघके समान भाव है।
§ १३७. योगमार्गणाके अनुवादसे काययोगी, वचनयोगी और मनोयोगी जीवोंके मिथ्या-
दृष्टिसे लेकर सयोगकेवली तक और अयोगकेवलीके ओघके समान भाव है।
३० § १३८. वेद मार्गणाके अनुवादसे स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी और वेदरहित जीवोंके
ओघके समान भाव है।
§ १३२. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध कषायवाले, मान कषायवाले, माया कषायवाले,
लोभ कषायवाले और कषाय रहित जीवोंके ओघके समान भाव है।
§ १४०. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभंगज्ञानी, मतिज्ञानी, श्रुत-
३५ ज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जोवोंके ओघके समान भाव हैं।
§ १४१. संयम मार्गणाके अनुवादसे सब संयतोंके, संयतासंयतोंके और असंयतोंके ओघके
समान भाव हैं।
- ११८ § १४६ ] प्रथमोऽध्यायः ६१
§ १४२. दर्शनानुवादेन चक्षुर्दशनाचक्षुर्दशनावधिदर्शनकेवलदर्शिनां सामान्यवत् ।
§ १४३. लेश्यानुवादेन षड्लेश्यानामलेश्यानां च सामान्यवत् ।
§ १४४. भव्यानुवादेन भव्यानां मिथ्यादृष्टचाद्ययोगकेवल्यन्तानां सामान्यवत् । अभव्यानां
पारिणामिको भावः ।
§ १४५. सम्यक्त्वानुवादेन क्षायिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेः क्षायिको भावः । क्षायिकं ५
सम्यक्त्वम् । असंयतत्वमौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः ।
क्षायिकं सम्यक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । क्षायिकं सम्यक्त्वम् । शेषाणां सामान्य-
वत् । क्षायोपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेः क्षायोपशमिको भावः । क्षायोपशमिकं सम्य-
क्त्वम् । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपशमिको भावः ।
क्षायोपशामिकं सम्यक्त्वम् । औपशमिकसम्यग्दृष्टिषु असंयतसम्यग्दृष्टेरौपशमिको भावः । औप- १०
शमिकं सम्यक्त्वम् । असंयतः पुनरौदयिकेन भावेन । संयतासंयतप्रमत्ताप्रमत्तसंयतानां क्षायोपश-
मिको भावः । औपशमिकं सम्यक्त्वम् । चतुर्णामुपशमकानामौपशमिको भावः । औपशमिकं
सम्यक्त्वम् । सासादनसम्यग्दृष्टेः पारिणामिको भावः । सम्यङ्मथ्यादृष्टेः क्षायोपशमिको भावः ।
मिथ्यादृष्टेरौदयिको भावः ।
§ १४६. संज्ञानुवादेन संज्ञिनां सामान्यवत् । असंज्ञिनामौदयिको भावः । तदुभयव्यपदेश- १५
रहितानां सामान्यवत् ।
§ १४२. दर्शन मार्गणाके अनुवादसे चक्षुदर्शनवाले, अचक्षुदर्शनवाले, अवधिदर्शनवाले और
केवलदर्शनवाले जीवोंके ओघके समान भाव हैं।
§ १४३. लेश्यामार्गणाके अनुवादसे छहों लेश्यावाले और लेश्या रहित जीवोंके ओघके
समान भाव हैं। २०
§ १४४. भव्य मार्गणाके अनुवादसे भव्योंके मिथ्यादृष्टिसे लेकर अयोगकेवली तक ओघके
समान भाव हैं। अभव्योंके पारिणामिक १ भाव हैं।
§ १४५. सम्यक्त्व मार्गणाके अनुवादसे क्षायिकसम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिके क्षायिक
भाव है। क्षायिक सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और
अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायिक सम्यक्त्व है। चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव २५
है। क्षायिक सम्यक्त्व है। शेष गुणस्थानोंका ओघके समान भाव है। क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें
असंयतसम्यग्दृष्टिके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायोपशमिक सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औद-
यिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके क्षायोपशमिक भाव है। क्षायोपशमिक
सम्यक्त्व है। औपशमिक सम्यग्दृष्टियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिके औपशमिक भाव है। औपशमिक
सम्यक्त्व है। किन्तु असंयतपना औदयिक भाव है। संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयतके ३०
क्षायोपशमिक भाव हैं। औपशमिक सम्यक्त्व है। चारों उपशमकोंके औपशमिक भाव है।
औपशमिक सम्यक्त्व है। सासादनसम्यग्दृष्टिके पारिणामिक भाव है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिके क्षायोप-
शमिक भाव है। मिथ्यादृष्टिके औदयिक भाव है।
§ १४६. संज्ञा मार्गणाके अनुवादसे संज्ञियोंके ओघके समान भाव हैं। असंज्ञियोंके औदयिक
भाव हैं। तथा संज्ञी और असंज्ञी व्यवहारसे रहित जीवोंके ओघके समान भाव हैं। ३५
१. यों तो ये भाव दर्शनमोहनीय और चारित्र मोहनीयके उदयादिकी अपेक्षा बतलाये गये हैं। किन्तु अभव्योंके
'अभव्यत्व भाव क्या है' इसकी अपेक्षा भावका निर्देश किया है। यद्यपि इससे क्रम भंग हो जाता है तथापि
विशेष जानकारीके लिए ऐसा किया है।
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६२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ ६ १४७ -
§ १४७. आहारानुवादेन आहारकाणामनाहारकाणां च सामान्यवत् । भावः परिसमाप्तः ।
§ १४८. अल्पबहुत्वमुपवर्ण्यते । तद् द्विविधं सामान्येन विशेषेण च । सामान्येन तावत् सर्वतः
स्तोकाः त्रय उपशमकाः स्वगुणस्थानकालेषु प्रवेशेन तुल्यसंख्याः । उपशान्तकषायास्तावन्त एव ।
त्रयः क्षपकाः संख्येयगुणाः । क्षीणकषायवीतरागच्छद्मस्थास्तावन्त एव । सयोगकेवलिनोऽयोगकेवलि-
नश्च प्रवेशेन तुल्यसंख्याः । सयोगकेवलिनः स्वकालेन समुदिताः संख्येयगुणाः । अप्रमत्तसंयताः
संख्येयगुणाः । प्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । संयतासंयता असंख्येयगुणाः । सासादनसम्यग्दृष्टयोऽ-
संख्येयगुणाः । सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मिथ्यादृष्ट-
योऽनन्तगुणाः ।
§ १४९. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ सर्वासु पृथिवीषु नारकेषु सर्वतः स्तोकाः सासा-
दनसम्यग्दृष्टयः । सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मिथ्या-
दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । तिर्यग्गतौ तिरश्चां सर्वतः स्तोकाः संयतासंयताः । इतरेषां सामान्यवत् ।
मनुष्यगतौ मनुष्याणामुपशमकादिप्रमत्तसंयतान्तानां सामान्यवत् । ततः संख्येयगुणाः संयतासंयताः ।
सासादनसम्यग्दृष्टयः संख्येयगुणाः । सम्यग्मिथ्यादृष्टयः संख्येयगुणाः । असंयतसम्यग्दृष्टयः संख्येय-
गुणाः मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । देवगतौ देवानां नारकवत् ।
§ १५०. इन्द्रियानुवादेन एकेन्द्रियविकलेन्द्रियेषु गुणस्थानभेदो नास्तीत्यल्पबहुत्वाभावः ।
पञ्चेन्द्रियाणां सामान्यवत् । अयं तु विशेषः मिथ्यादृष्टयोऽसंख्येयगुणाः ।
§ १४७. आहार मार्गणाके अनुवादसे आहारक और अनाहारक जीवोंके ओघके समान
भाव हैं । इस प्रकार भाव समाप्त हुआ ।
§ १४८. अब अल्पबहुत्वका कथन करते हैं। वह दो प्रकारका है— सामान्य और विशेष ।
सामान्यकी अपेक्षा तीनों उपशमक सबसे थोड़े हैं जो अपने-अपने गुणस्थानके कालोंमें प्रवेशकी
अपेक्षा समान संख्यावाले हैं । उपशान्तकषाय जीव उतने ही हैं। इनसे तीन गुणस्थानके क्षपक
संख्यात गुणे हैं। क्षीणकषायवीतराग छद्मस्थ उतने ही हैं। सयोगकेवली और अयोगकेवली प्रवेश-
की अपेक्षा समान संख्यावाले हैं । इनसे अपने कालमें समुदित हुए सयोगकेवली संख्यातगुणे हैं।
इनसे अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे संयतासंयत असंख्यात-
गुणे हैं। इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं ।
इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं ।
§ १४९. विशेषकी अपेक्षा गति मार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें सब पृथिवियोंमें नारकियों-
में सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे थोड़े हैं । इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं । इनसे असंयतसम्य-
ग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं । तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंमें संयतासंयत
सबसे थोड़े हैं। शेष गुणस्थानवाले तिर्यंचोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है । मनुष्यगतिमें मनुष्यों-
के उपशमकोंसे लेकर प्रमत्तसंयत तकका अल्पबहुत्व ओघके समान है। प्रमत्तसंयतोंसे संयतासंयत
संख्यातगुणे हैं । इनसे सासादनसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं। इनसे सम्यग्मिथ्यादृष्टि संख्यातगुणे हैं ।
इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि संख्यातगुणे हैं । इनसे मिथ्यादृष्टि असंख्यातगुणे हैं। देवगतिमें देवोंका
अल्पबहुत्व नारकियोंके समान है ।
§ १५०. इन्द्रिय मार्गणाके अनुवादसे एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियोंमें गुणस्थान भेद न होनेसे
१. -संयता संख्ये-मु० । २. -दृष्टयः असंख्ये-मु० । ३. भावः । इन्द्रियं प्रत्युच्यते । पञ्चेन्द्रियाद्येकेन्द्रियान्ता
उत्तरोत्तरं बहवः । पञ्चवे- मु० । ४. कमसे कम एक और अधिकसे अधिक चौवन । ५. कमसे कम
एक और अधिकसे अधिक एक सौ आठ ।
– ११८ § १५४ ] प्रथमोऽध्यायः ६३
§ १५१. कायानुवादेन स्थावरकायेषु गुणस्थानभेदाभावादल्पबहुत्वाभावः। त्रसकायिकानां
पञ्चेन्द्रियवत् ।
§ १५२. योगानुवादेन वाङ्मनसयोगिनां पञ्चेन्द्रियवत् । काययोगिनां सामान्यवत् ।
वेदानुवादेन स्त्रीपुंवेदानां पञ्चेन्द्रियवत् । नपुंसकवेदानामवेदानां च सामान्यवत् ।
§ १५३. कषायानुवादेन क्रोधमानमायाकषायाणां पुंवेदवत् । अयं तु विशेषः मिथ्यादृष्टयोऽ- ५
नन्तगुणाः । लोभकषायाणां द्वयोरुपशमकयोस्तुल्या संख्या । क्षपकाः संख्येयगुणाः । सूक्ष्मसांपराय-
शुद्ध्युपशमकसंयता विशेषाधिकाः । सूक्ष्मसांपरायक्षपकाः संख्येयगुणाः । शेषाणां सामान्यवत् ।
§ १५४. ज्ञानानुवादेन मत्यज्ञानिश्रुताज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाः सासादनसम्यग्दृष्टयः ।
मिथ्यादृष्टयोऽनन्तगुणाः२। विभङ्गज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाः सासादनसम्यग्दृष्टयः । मिथ्यादृष्टयोऽ-
संख्येयगुणाः । मतिश्रुतावधिज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाश्चत्वार उपशमकाश्चत्वारः क्षपकाः संख्येयगुणाः । १०
अप्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । प्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । संयतासंयताः ३असंख्येयगुणाः । असंयत-
सम्यग्दृष्टयः४ असंख्येयगुणाः । मनःपर्ययज्ञानिषु सर्वतः स्तोकाश्चत्वार उपशमकाः । चत्वारः
क्षपकाः संख्येयगुणाः । अप्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । प्रमत्तसंयताः संख्येयगुणाः । केवलज्ञानिषु
अयोगकेवलिभ्यः सयोगकेवलिनः संख्येयगुणाः ।
अल्पबहुत्व नहीं है। पंचेन्द्रियोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। किन्तु इतनी विशेषता है कि १५
असंयत सम्यग्दृष्टि पंचेन्द्रियोंसे मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय असंख्यातगुणे हैं।
§ १५१. काय मार्गणाके अनुवादसे स्थावरकायिकोंमें गुणस्थान भेद न होनेसे अल्पबहुत्व
नहीं है। त्रसकायिकोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है।
§ १५२. योग मार्गणाके अनुवादसे वचनयोगी और मनोयोगी जीवोंका अल्पबहुत्व
पंचेन्द्रियोंके समान है। काययोगियोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है। वेद मार्गणाके अनुवादसे २०
स्त्रीवेदी और पुरुषवेदी जीवोंका अल्पबहुत्व पंचेन्द्रियोंके समान है। नपुंसकवेदी और वेदरहित
जीवोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है।
§ १५३. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोधकषायवाले, मानकषायवाले और मायाकषायवाले
जीवोंका अल्पबहुत्व पुरुषवेदियोंके समान है। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें असंयत सम्यग्दृ-
ष्टियोंसे मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं। लोभ कषायवालोंमें दोनों उपशमकोंकी संख्या समान है। इनसे २५
क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे सूक्ष्मसाम्पराय उपशमक विशेष अधिक हैं। इनसे सूक्ष्मसाम्पराय
क्षपक संख्यातगुणे हैं। आगे शेष गुणस्थानवालोंका अल्पबहुत्व ओघके समान है।
§ १५४. ज्ञान मार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानियोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि सब-
से थोड़े हैं। मिथ्यादृष्टि अनन्तगुणे हैं। विभंगज्ञानियोंमें सासादनसम्यग्दृष्टि सबसे थोड़े हैं। मिथ्या-
दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। मतिज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानियोंमें चारों उपशमक सबसे थोड़े हैं। ३०
इनसे चारों क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे अप्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। इनसे प्रमत्तसंयत संख्यात-
गुणे हैं। इनसे संयतासंयत असंख्यातगुणे हैं। इनसे असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातगुणे हैं। मनःपर्यय-
ज्ञानियोंमें चारों उपशमक सबसे थोड़े हैं। इनसे चारों क्षपक संख्यातगुणे हैं। इनसे अप्रमत्तसंयत
संख्यातगुणे हैं। इनसे प्रमत्तसंयत संख्यातगुणे हैं। केवलज्ञानियोंमें अयोगकेवलियोंसे सयोगकेवली
संख्यातगुणे हैं। ३५
१. -भावः । कायं प्रत्युच्यते । सर्वतस्तेजःकायिका अल्पाः । ततो बहवः पृथिवीकायिकाः । ततोऽप्यप्कायिकाः ।
ततो वातकायिकाः । सर्वतोऽनन्तगुणा वनस्पतयः । त्रस–मु० । २. दृष्टयोऽसंख्येयगुणाः । मति–मु० ।
३. —यताः संख्ये-मु० । ४. –ष्टयः संख्ये-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri