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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 558 में से

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पृष्ठ 164

५२ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ११७ -
§ ११७. पुंवेदेषु मिथ्यादृष्टेः सामान्यवत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्योर्नाना-
जीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तंश्च । उत्कर्षेण
सागरोपमशतपृथक्त्वम् । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एक-
जीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । द्वयोरुपशमकयोर्नानाजीवापेक्षया
५ सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण सागरोपमशतपृथक्त्वम् । द्वयोः
क्षपकयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण संवत्सरः सातिरेकः । एकजीवं प्रति
नास्त्यन्तरम् ।
§ ११८. नपुंसकवेदेषु मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्ये-
नान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्ट्याद्यनिवृत्त्युपशम-
१० कान्तानां सामान्योक्तम् । द्वयोः क्षपकयोः स्त्रीवेदवत् । अपगतवेदेषु अनिवृत्तिबादरोपशमकसूक्ष्म-
सांपरायोपशमकयोर्नानाजीवापेक्षया सामान्योक्तम् । एकजीवं प्रति जघन्यमुत्कृष्टं चान्तर्मुहूर्तः ।
उपशान्तकषायस्य नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । शेषाणां
सामान्यवत् ।
§ ११९. कषायानुवादेन क्रोधमानमायालोभकषायाणां मिथ्यादृष्ट्याद्यनिवृत्त्युपशमकान्तानां
१५ मनोयोगिवत् । द्वयोः क्षपकयोर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण संवत्सरः सातिरेकः ।
§ ११७. पुरुषवेदियोंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर ओघके समान है । सासादनसम्यग्दृष्टि और
सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है तथा उत्कृष्ट अन्तर सौ १सागर
पृथक्त्व है । असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येक गुणस्थानका नाना जीवोंकी
२० अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक जोवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ
सागर पृथक्त्व है । दोनों उपशमकोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर सौ सागर पृथक्त्व है । दोनों क्षपकों-
का नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर २साधिक एक वर्ष है ।
एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
२५ § ११८. नपुंसक वेदवालोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अम्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तेतीस सागर है । सासा-
दनसम्यग्दृष्टिसे लेकर अनिवृत्ति उपशमक तक प्रत्येक गुणस्थानका सामान्योक्त अन्तर है । तथा
दोनों क्षपकोंका अन्तर स्त्रीवेदियोंके समान है । अपगतवेदवालोंमें अनिवृत्तिबादर उपशमक और
सूक्ष्मसाम्पराय उपशमकका नाना जोवोंकी अपेक्षा सामान्योक्त अन्तर है । एक जीवकी अपेक्षा
३० जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । उपशान्तकषायका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके
समान है । एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । शेष गुणस्थानोंका अन्तर ओघके समान है ।
§ ११९. कषाय मार्गणाके अनुवादसे क्रोध, मान, माया और लोभमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर
अनिवृत्तिबादर उपशमक तक प्रत्येक गुणस्थानका अन्तर मनोयोगियोंके समान है । दोनों क्षपकोंका
नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर साधिक एक वर्ष है । लोभ
३५ १. सासादनके दो समय कम और सम्यग्मिथ्यादृष्टिके छह अन्तर्मुहूर्त कम सौ सागर पृथक्त्व यह अन्तर
जानना चाहिए । आगे भी इस प्रकार यथा 'योग्य अन्तर घटित कर लेना चाहिए । २. पुरुषवेदी अधिकसे
अधिक साधिक एक वर्ष तक क्षपक श्रेणिपर नहीं चढ़ता यह इसका भाव है ।