सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- ११८ ६ १०९ ] प्रथमोऽध्यायः ४७
णाम् । सासादनसम्यग्दृष्टेरन्तरं नानाजीवापेक्षया जघन्येनेकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येय-
भागः । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागः । उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः ।
सम्यग्मिथ्यादृष्टेरन्तरं नानाजीवापेक्षया सासादनवत् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः । असंयतसम्यग्दृष्ट्याद्यप्रमत्तान्तानां नानाजीवापेक्षया नास्त्य-
न्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः । चतुर्णामुपशमकानां ५
नानाजीवापेक्षया जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण वर्षपृथक्त्वम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः ।
उत्कर्षेणार्द्धपुद्गलपरिवर्तो देशोनः । चतुर्णां क्षपकाणामयोगकेवलिनां च नानाजीवापेक्षया
जघन्येनैकः समयः । उत्कर्षेण षण्मासाः । एकजीवं प्रति नास्त्यन्तरम् । सयोगकेवलिनां नानाजीवा-
पेक्षया एकजीवापेक्षया च नास्त्यन्तरम् ।
§ १०९. विशेषेण गत्यनुवादेन नरकगतौ नारकाणां सप्तसु पृथिवीषु मिथ्यादृष्ट्यसंयत- १०
सम्यग्दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण एक-त्रि-
सप्त-दश-सप्तदश-द्वाविंशति-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्या-
बत्तीस सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और
उत्कृष्ट अन्तर पल्यका असंख्यातवां भाग है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर पल्यका
असंख्यातवां भाग और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुद्गल परिवर्तन है। सम्यग्मिथ्यादृष्टिका १५
नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर सासादनसम्यग्दृष्टियोंके समान है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन है । असंयत सम्यग्दृष्टिसे लेकर
अप्रमत्तसंयत तक प्रत्येकका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीवकी अपेक्षा जघन्य
अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन है । चारों उपशमकोंका नाना
जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व है। एक जीवोंकी अपेक्षा २०
जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन है। चारों क्षपक और
अयोगकेवलियोंका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना
है। एक जीवकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । सयोगकेवलियोंका नाना जीव और एक जीवकी अपेक्षा
अन्तर नहीं है ।
§ १०९. विशेषकी अपेक्षा गतिमार्गणाके अनुवादसे नरकगतिमें नारकियोंमें सातों २५
पृथिवियोंमें मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंको अपेक्षा अन्तर नहीं है। एक जीव-
की अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर क्रमशः कुछ कम एक सागर, कुछ कम
तीन सागर, कुछ कम सात सागर, कुछ कम दस सागर, कुछ कम सत्रह सागर, कुछ कम बाईस
उत्कृष्ट अन्तर लाना है इसलिए मिथ्यात्वसे लाकर अन्तमें पुनः मिथ्यात्वमें ही ले जाना चाहिए । इससे
मिथ्यादृष्टिका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एक सौ बत्तीस सागर प्राप्त हो जाता है । ३०
१. यदि सासादन सम्यग्दृष्टि न हों तो वे कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक पल्यके असंख्यातवें
भाग काल तक नहीं होते इसीसे इनका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यके असंख्यातवें
भाग प्रमाण बतलाया है । २. सासादन गुणस्थान उपशम सम्यक्त्वसे च्युत होने पर ही प्राप्त हो सकता है ।
किन्तु एक जीव कमसे कम पल्यके असंख्यातवें भाग प्रमाण कालके जाने पर ही दूसरी बार उपशम
सम्यक्त्वको प्राप्त हो सकता है । इसीसे यहाँ सासादन सम्यग्दृष्टिका जघन्य अन्तरकाल पल्यके असंख्यातवें ३५
भाग प्रमाण कहा है । ३. एक जीव उपशम श्रेणिसे च्युत होकर पुनः अन्तर्मुहूर्तके बाद उपशम श्रेणिपर चढ़
सकता है इसलिए चारों उपशामकोंका एक जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त बतलाया है ।