सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ सर्वार्थसिद्धौ [ १।८ § ११० -
दृष्ट्योर्नानाजीवापेक्षया जघन्येनेकः समयः । उत्कर्षेण पल्योपमासंख्येयभागः । एकजीवं प्रति
जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण एक-त्रि-सप्त-दश-सप्तदश-द्वाविंशति-त्रय-
स्त्रिंशत्सागरोपमाणि देशोनानि ।
§ ११०. तिर्यग्गतौ तिर्यञ्चां मिथ्यादृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् । एकजीवं प्रति
जघन्येनान्तर्मुहूर्तः । उत्कर्षेण त्रीणि पल्योपमानि देशोनानि । सासादनसम्यग्दृष्ट्यादीनां चतुर्णां
सामान्योक्तमन्तरम् ।
§ १११. मनुष्यगतौ मनुष्याणां मिथ्यादृष्टेस्तिर्यग्वत् । सासादनसम्यग्दृष्टिसम्यग्मिथ्यादृष्ट्यो-
र्नानाजीवापेक्षया सामान्यवत् । एकजीवं प्रति जघन्येन पल्योपमासंख्येयभागोऽन्तर्मुहूर्तश्च । उत्कर्षेण
त्रीणि पल्योपमानि पूर्वकोटिपृथक्त्वेनाभ्यधिकानि । असंयतसम्यग्दृष्टेर्नानाजीवापेक्षया नास्त्यन्तरम् ।
सागर और कुछ कम तेतीस¹ सागर है । सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना
जीवोंकी अपेक्षा जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्यका असंख्यातवाँ भाग है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त तथा उत्कृष्ट
अन्तर सातों नरकोंमें क्रमशः कुछ कम एक सागर, कुछ कम तीन सागर, कुछ कम सात सागर,
कुछ कम दस सागर, कुछ कम सत्रह सागर, कुछ कम बाईस सागर और कुछ कम तेतीस ²सागर है ।
§ ११०. तिर्यंचगतिमें तिर्यंचोंमें मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है । एक
जीवकी अपेक्षा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम तीन ³पल्य है । तथा सासा-
दनसम्यग्दृष्टि आदि चारोंका सामान्योक्त अन्तर है ।
§ १११. मनुष्य गतिमें मनुष्योंमें मिथ्यादृष्टिका अन्तर तिर्यंचोंके ⁴समान है । सासादन-
सम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ओघके समान है । एक जीवकी
अपेक्षा जघन्य अन्तर क्रमशः पल्यका असंख्यातवाँ भाग और अन्तर्मुहूर्त है । उत्कृष्ट अन्तर पूर्व-
कोटिपृथक्त्व अधिक तीन ⁵पल्य है । असंयतसम्यग्दृष्टिका नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं है ।
१. जिस नरककी जितनी उत्कृष्ट स्थिति है उसके प्रारम्भ और अन्तमें अन्तर्मुहूर्त तक मिथ्यात्वके साथ रखकर
मध्यमें सम्यक्त्वके साथ रखनेसे उस नरकमें मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अन्तर आ जाता है जिसका निर्देश मूलमें
किया ही है । २. नरकमें उत्कृष्ट स्थितिके साथ उत्पन्न होने पर अन्तर्मुहूर्तके बाद उपशम सम्यक्त्वको प्राप्त
कराके सासादन और मिश्रमें ले जाय । फिर मरते समय सासादन और मिश्रमें ले जाय । इस प्रकार प्रत्येक
नरकमें सासादन और मिश्र गुण-स्थानका उत्कृष्ट अन्तर आ जाता है । इतनी विशेषता है कि सातवें नरकमें
मरनेके अन्तर्मुहूर्त पहले सासादन और मिश्रमें ले जाय । ३. जो तीन पल्यकी आयुके साथ कुक्कुट और मर्कट
आदि पर्यायमें दो माह रहा और वहाँसे निकलकर मुहूर्त पृथक्त्वके भीतर वेदक सम्यक्त्वको प्राप्त हुआ ।
फिर अन्तमें मिथ्यात्वमें जाकर और सम्यक्त्वको प्राप्त होकर मरकर देव हुआ । उसके मुहूर्त पृथक्त्व और
दो माह कम तीन पल्य मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अन्तर होता है । ४. मनुष्य गतिमें मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अन्तर
१० माह १९ दिन और दो अन्तर्मुहूर्त कम तीन पल्य है । ५. मनुष्यकी उत्कृष्ट काय स्थिति सैंतालीस पूर्व-
कोटि अधिक तीन पल्य है । कोई एक अन्य गतिका जीव सासादनके कालमें एक समय शेष रहने पर मनुष्य
हुआ और अपनी उत्कृष्ट कायस्थिति प्रमाण काल तक मनुष्य पर्यायमें घूमता हुआ अन्तमें उपशम सम्यक्त्व-
पूर्वक एक समयके लिए सासादनको प्राप्त हुआ और मरकर देव हो गया तो इससे मनुष्य गतिमें सासादनका
उत्कृष्ट अन्तर दो समय कम सैंतालीस पूर्व-कोटि और तीन पल्य प्राप्त हो जाता है । मिश्र गुणस्थानका उत्कृष्ट
अन्तर लाते समय मनुष्य पर्याय प्राप्त करनेपर आठ वर्षके बाद मिश्र गुणस्थान प्राप्त करावे । फिर कायस्थितिके
अन्तमें मिश्र गुणस्थान प्राप्त कराकर मिथ्यात्व या सम्यक्त्वमें ले जाकर मरण करावे । तो इस प्रकार मिश्र
गुणस्थानका उत्कृष्ट अन्तर तीन अन्तर्मुहूर्त और आठ वर्ष कम सैंतालीस पूर्वकोटि और तीन पल्य प्राप्त होता है ।