सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
( ४० )
सकती, और जब तक व्याप्ति न हो तब तक अनुमान नहीं
हो सकता। जैसे जब बादल होता है, तभी वृष्टि होती है,
बिना बादल के कभी वृष्टि होती नहीं देखी ; इसलिये जिसका
तीन काल में प्रत्यक्ष न हो उसका अनुमान से ज्ञान नहीं
हो सकता।
प्र०—हम नियम-पूर्वक कार्य को बिना चेतन कर्ता के
नहीं देखते, इससे हम नियमित कार्य से चेतन का अनुमान
करते हैं। यह जगत् भी परिणामी होने से कार्य, और नियम
पूर्वक होने से अपने चेतन कारण के अनुमान का साधक होगा ?
उ०—मुक्तबद्धयोरन्यतराभावान्न तत्सिद्धिः। ६३
अर्थ—संसार में कोई चेतन मुक्त और बद्ध से भिन्न नहीं।
यदि तुम ईश्वर को बद्ध मानो तो वह सृष्टि करने की शक्ति
नहीं रखता। यदि मुक्त मानो तो इच्छा के अभाव से सृष्टि
उत्पन्न नहीं कर सकता, क्योंकि संसार में जितनी सृष्टि को
नियमित देखते हैं, वह कर्ता की इच्छा से होती है।
उभयथाप्यसत्करत्वम् ॥ ६४ ॥
इस प्रकार मुक्त, बद्ध दोनों प्रकार के चेतन से सृष्टि का
होना अनुमान से सिद्ध न होगा। इसलिये मानसिक प्रत्यक्ष
अवश्य मानना पड़ेगा। ईश्वर योगियों को समाधि अवस्था
में प्रत्यक्ष होते हैं, क्योंकि स्थिर मन के बिना ईश्वर का बोधक
कोई प्रमाण नहीं। ईश्वर को बद्ध और मुक्त दोनों प्रकार का
नहीं कह सकते, क्योंकि दोनों सापेक्ष हैं, अर्थात् जो पहिले बँधा
हो, वह ही बंध से छूटने से मुक्त कहला सकता है। ईश्वर इन
दोनों अवस्थाओं से पृथक् है। जगत् का करना उसका स्वभाव
है, इसलिये इच्छा की आवश्यकता नहीं।
( ४१ )
प्र०—एक वस्तु में दो विरुद्ध स्वभाव हो नहीं सकते ।
यदि रचना ईश्वर का स्वभाव मानोगे तो विनाश किसका
स्वभाव मानोगे ?
उ०—यह शङ्का परतन्त्र और अचेतन में हो सकती है,
क्योंकि कर्त्ता स्वतन्त्र होता है, और स्वतन्त्र उसे कहते हैं,
जिसमें करने न करने और उलटा करने की सामर्थ्य हो ।
मुक्तात्मनः प्रशंसा उपासासिद्धिस्य वा ॥ ६५ ॥
उपासना के सिद्ध होने से जो मुक्तात्मा की प्रशंसा की
जाती है, इससे प्रतीत होता है, कि ईश्वर है, जिसकी उपासना
से अविवेक की निवृत्ति और विवेक की प्राप्ति होकर आत्मा को
मुक्ति प्राप्त होती है ।
तत्सन्निधानादधिष्ठातृत्वं मणिवत् ॥ ६६ ॥
प्रकृति क्रिया रहित है। उसको क्रियाशक्ति ईश्वर की
समीपता से प्राप्त होती है, जैसे—मणि को काँच की समीपता से
सुरखी प्राप्त होती है, परमात्मा में इच्छा के न होने से उस
अकर्त्ता कहा जाता है, और बिना उसकी समीपता के प्रकृति
करने में असमर्थ है, जैसे—बिना हाथ के जीव उठा नहीं सकता,
इस वास्ते कहते हैं, उठाना जीव का धर्म नहीं, परन्तु हाथ में
जीव के बिना क्रियाशक्ति नहीं। इस वास्ते जीवात्मा को कर्ता
माना जाता है।
विशेषकार्येष्वपि जीवानाम् ॥ ६७ ॥
जो कार्य सामान्यरूप से जगत् में होते हैं, वह तो परमात्मा
की सत्ता से होते हैं, और जो कार्य विशेषरूप से प्रति शरीर में
भिन्न-भिन्न होतें हैं, वे जीव की सत्ता से होते हैं। संसार के आत्मा
को परमात्मा और शरीर के आत्मा को जीवात्मा कहते हैं।
( ४२ )
प्र०—यदि प्रत्यक्ष प्रमाण से व और प्रमाणों से ईश्वर की
सिद्धि हो गई, तो वेद का क्या प्रमाण माना जाय ? क्योंकि
अभौतिक पदार्थों का तो प्रत्यक्ष से ज्ञान हो ही जायगा, और
अभौतिक का योगियों के अवाह्य प्रत्यक्ष से हो जायगा।
उ०—सिद्धरूपबोद्धृत्वाद्वाक्यार्थोपदेशः ॥९८॥
अर्थ—अन्य प्रमाणों से ईश्वर के होने की तो सिद्धि हो
जायगी, परन्तु उसके स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं होगा, जैसे—
पुत्र को देखकर उसके पिता के होने का ज्ञान तो अनुमान से हो
सकता है, परन्तु उसके रूप और आयु आदि के ज्ञान के वास्ते
शब्द की आवश्यकता है। इस वास्ते वेद का अवश्य प्रमाण मानना
चाहिये।
अन्तः करणस्य तदुज्ज्वलितत्वाल्लोहवदधि-
ष्ठातृत्वम् ॥ ९९ ॥
अन्तःकरण भी चैतन्य के संयोग से उज्ज्वलित ( प्रकाशित )
है, अतएव संकल्प विकल्पादि कार्यों का अधिष्ठातृत्व अन्तःकरण
को है, जैसे—अग्नि से तपाये हुए लोहे में यद्यपि दाहशक्ति अग्नि
संयोग के कारण है तथापि अन्य पदार्थों के दाह करने को वह
लोहशक्ति भी हेतु हो सकती है।
प्रतिबन्धदृशः प्रतिबद्धज्ञानमनुमानम् ॥ १०० ॥
जो इन्द्रिय-ग्राह्य पदार्थ नहीं दीखता, उसके ज्ञान के साधन
को अनुमान कहते हैं; जैसे—अग्नि प्रत्यक्ष नहीं दीखती, किन्तु धूम
को देखकर उसका ज्ञान हो जाना, इसी का नाम अनुमान है।
यह अनुमान व्याप्ति और साहचर्य नियम के ज्ञान बिना नहीं
होता ; जैसे—जब तक कोई पुरुष पाकशाला आदि में धूम और
( ४३ )
अग्नि की व्याप्ति न समझ लेगा कि जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ
अग्नि अवश्य होती है, तब तक धूम को देखकर अग्नि का
अनुमान कदापि नहीं कर सकता। वह अनुमान जितने प्रकार
का है, इसका निर्णय आगे करेंगे। किन्तु प्रथम शब्द प्रमाण
का लक्षण करते हैं।
आप्तोपदेशः शब्दः ॥ १०१ ॥
यह सूत्र सब शास्त्रों में ऐसा ही है। जैसे तीनों वेदों में
गायत्री मन्त्र एक सम है, इसी भाँति इस सूत्र को भी जानना
चाहिये। जो पुरुष धर्मनिष्ठ वाह्य धर्म से धर्मी के ज्ञान को यथार्थ
रीति पर जानते हैं, तथा शुद्ध आचरणवान् हैं, उनका नाम
आप्त है। उनके उपदेश को शब्द प्रमाण कहते हैं। आप्ति का
अर्थ योग्यता है, इस कारण तत्वज्ञान से युक्त अपौरुष-वाक्य
वेद ही शब्द प्रमाण जानना चाहिये। अब अगले सूत्र से प्रमाण
मानने की आवश्यकता को प्रकट करते हैं।
उभयसिद्धिः प्रमाणात् तदुपदेशः ॥ १०२ ॥
जब तक मनुष्य को वस्तु का सामान्य ज्ञान हो, परन्तु
यथार्थ ज्ञान न हो, तब तक वह संशय कहाता है। संशय की
निवृत्ति बिना प्रमाण के हो नहीं सकती और संशय की निवृत्ति
के बिना प्रवृत्ति नहीं हो सकती। प्रमाण से आत्म, अनात्म, सद्,
असद्, दोनों प्रकार की सिद्धि होती है, इसी कारण प्रमाण का
उपदेश किया है।
सामान्यतोदृष्टादुभयसिद्धिः ॥ १०३ ॥
तीन प्रकार के अनुमान होते हैं—पूर्ववत्, शेषवत् और
सामान्यतोदृष्ट। पूर्ववत् अनुमान उसे कहते हैं, जैसे धूम को
देखकर अग्नि का अनुमान किया जाता है, क्योंकि पहिले पाक-
( ४४ )
शाला में धूम और अग्नि दोनों देखे थे, वैसे ही अन्यत्र होंगे,
इस प्रकार का अनुमान पूर्ववत् कहाता है। जो विषय कभी
प्रत्यक्ष नहीं किया उसका कारण द्वारा अनुमान करना शेषवत्
अनुमान कहाता है; जैसे—स्त्री और पुरुष दोनों को नीरोग और
हृष्ट-पुष्ट देखकर इनके पुत्रोत्पत्ति होगी यह अनुमान करना, वा
मेघ को देखकर जल बरसेगा, यह अनुमान करना शेषवत् का
उदाहरण है। जिस जातीय विषय को प्रत्यक्ष कर लिया है, उसके
द्वारा समस्त जाति मात्र के कार्य्य का अनुमान करना सामान्यतो-
दृष्ट कहाता है; जैसे—दो एक मनुष्य को देखकर यह बात निश्चय
करली कि मनुष्य के सींग नहीं होते, तो अन्य मनुष्य मात्र
के सींग न होंगे। यह सामान्यतोदृष्ट का उदाहरण है। इसी भाँति
सामान्यतोदृष्ट अनुमान में यह बात भी आसकती है, कि जैसे
बिना कारण के कार्य्य की अनुत्पत्ति सामान्यतोदृष्ट है। इससे यह
निश्चय कर लेना चाहिये कि जहाँ-जहाँ कार्य्य होगा, वहाँ-वहाँ
कारण भी अवश्य होगा।
चिदवसानो भोगः ॥ १०४ ॥
चैतन्यता का जो अवसान अर्थात् अभाव है, उसे भोग कहते
हैं। यहाँ पर महर्षि भोक्ता और भोग को पृथक्-पृथक् करते हैं,
क्योंकि जड़ पदार्थ भोग होते और चैतन्य भोक्ता होता है, तथा
भोग सदा परिणामी होता है, और भोक्ता एक रस और चैतन्य
होता है।
प्र०—क्या जड़, मन और इन्द्रियें भोक्ता नहीं ?
उ०—नहीं, यह तो भोग के साधन हैं।
प्र०—कर्म तो मन और इन्द्रियाँ करते हैं तो अकर्त्ता जीवात्मा
उसका फल क्यों भोगता है ?
( ४५ )
उ०—अकर्तुरपिफलोपभोगोऽन्नाद्यवत् ॥ १०५
जिस प्रकार किसानों के उत्पन्न किये अन्नादि का भोग राजा
करता है और सेना के हार जाने से राजा को दुःख होता है,
इसी प्रकार इन्द्रियों के किये कर्मों का फल आत्मा भोगता है ।
प्र०—पहिले मान चुके हो—अन्य के कर्म से दूसरे का
बंधन नहीं होता, अब कहते हो दूसरे का किया दूसरा
भोगता है ?
उ०—स्वतन्त्र कर्त्ता होता है । स्वतन्त्र के किये का फल
स्वतंत्र को नहीं मिलता । यह इन्द्रियें और मन स्वतंत्र नहीं, किन्तु
आत्मा के करने के साधन हैं, जैसे—खड्ग से काटने का कर्त्ता
मनुष्य कहलाता है, ऐसे ही इन्द्रियों के कर्मों का फल जीव को
होता है ।
प्र०—चैतन्य जीवात्मा को दुःखादि विकार कैसे होसक्ता है ?
उ०—अविवेकाद्वा तत्सिद्धेः कर्तुर्फलावगमः १०६
कर्त्ता को फल अविवेक से होता है, क्योंकि जीवात्मा
अल्पज्ञ है । वस्तु का यथार्थ ज्ञान विना नैमित्तिक ज्ञान के
नहीं रहता, इसलिये वह अविवेक से शरीरादि के विकारों
को अपने में मानता है, जिससे उसे दुःख-सुख प्रतीत होते हैं ;
जैसे—संसार में लोग प्राकृत धन को अपना मानकर उसके नाश
से दुःख मानते हैं, ऐसे ही अविवेक से शरीरनिष्ठ विकारों से
जीव अपने को दुःखी-सुखी अनुभव करता है ।
नोभयं च तत्त्वाख्याने ॥ १०७ ॥
जब पुरुष प्रमाणों से यथार्थ ज्ञान को प्राप्त हो जाता है,
तो सुख दुःख दोनों नहीं रहते ; क्योंकि जब हमें यह निश्चय
हो जाता है, हम शरीर नहीं और न यह शरीर हमारा है, किन्तु
( ४६ )
प्रकृति का विकार है, तो इसके दुःख सुख का हमें लेश भी नहीं
प्रतीत होता ।
प्र०-प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्राकृतिक ज्ञान नहीं होता, इसलिये
प्रकृति असिद्ध है ; क्योंकि वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं ?
उ०-विषयोऽविषयोऽप्यति दूरादेर्हानोपा-
दानाभ्यामिन्द्रियस्य ॥ १०८ ॥
इन्द्रियों के विषय अति दूरादि कारणों से अविषय हो जाते हैं,
इस वास्ते किसी इन्द्रिय का विषय न होने से प्रकृति की असिद्धि
नहीं हो सकती है, जैसे-अभी एक मनुष्य था, परन्तु थोड़े काल
में दूर चला गया, अब वह किसी इन्द्रिय का विषय नहीं रहा ।
प्र०-कितने कारण हैं जिनसे वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान
नहीं होता ?
उ०-अति दूर होने से, अति समीप होने से, इन्द्रिय के
बिगड़ जाने से, मन के अस्थिर न होने, या मन के दूसरे काम में
लगे होने से, अति सूक्ष्म होने से, बीच में परदा होने से इत्यादि,
और भी कई कारणों से प्रत्यक्ष का विषय अविषय होता है,
इसलिये किसी वस्तु के प्रत्यक्ष न होने से उसकी असिद्धि नहीं
हो सकती ।
प्र०-प्रकृति का प्रत्यक्ष न होने मैं क्या कारण है ?
सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिः ॥ १०६ ॥
उ०-प्रकृति और पुरुष का सूक्ष्म होने से प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं
होता, सूक्ष्म होने से अत्यन्त अणु होना अभिप्राय नहीं ; क्योंकि
प्रकृति और पुरुष सर्वत्र व्यापक हैं, इनका प्रत्यक्ष योगियों को ही
होता है ।
प्र०-प्रकृति के प्रत्यक्ष न होने से यह क्यों माना जावे, कि
अति सूक्ष्म होने से प्रकृति का प्रत्यक्ष नहीं होता, किन्तु प्रकृति का
( ४७ )
अभाव ही मानना चाहिये, नहीं शशशृङ्ग की अप्रतीति भी अति
सूक्ष्म होने से माननी पड़ेगी ?
कार्य्यदर्शनात्तदुपलब्धेः ॥ ११० ॥
उ०-संसार में प्रकृति के कार्यों को देखने से प्रकृति का होना
सिद्ध होता है ; क्योंकि कार्य्य को देखने से कारण का अनुमान
होता है, और इन कार्यों को बिगाड़कर सूक्ष्म होकर कारण में
लय होने से कारण की सूक्ष्मता का अनुमान होता है ।
वादिविप्रतिपत्तेस्तदसिद्धिरिति चेत् ॥ १११ ॥
यदि संसार में वादी लोग प्रकृति की असिद्धि में यह हेतु दें
कि कोई ब्रह्म को जगत् का कारण मानते हैं, कोई परमाणुओं
को, कोई जगत् को अनुत्पन्न ही मानते हैं, तो इस जगत्-रूप
कार्य्य से प्रकृति के अनुमान करने में क्या हेतु है ? प्रथम तो
जगत् का कार्य होना साध्य है, दूसरे कारण ब्रह्म है, या प्रकृति
यह संशयात्मक है, इसलिये प्रकृति असिद्ध है ।
तथाप्येकतरदृष्ट्या एकतरसिद्धेर्नोपलापः ॥११२
जब एक कार्य को देखकर कारण का अनुमान होता है
और कारण को देखकर कार्य का अनुमान होता है, तो प्रकृति
को कारण सिद्ध मानना अनुचित नहीं, क्योंकि सब कार्य प्रकृति
में लय होते हैं । द्वितीय पुरुष जो अपरिणामी है उसको परिणामी
प्रकृति के अविवेक से बन्ध और विवेक से मुक्ति होती है ।
त्रिविधविरोधापत्तेश्च ॥ ११३ ॥
सब कार्य तीन प्रकार के होते हैं-अतीत अर्थात गुजरा
हुआ, दूसरे वर्त्तमान, तीसरे आनेवाला । यदि कार्य को सत न
माने तो यह तीन प्रकार का व्यवहार-जैसे, घट टूट गया, अथवा
( ४८ )
घट वर्तमान है, अथवा घट होगा, नहीं बन सकेगा । दूसरे
दुःख सुख मोहादि की उत्पति में विरोध होगा ; क्योंकि ब्रह्म तो
आनन्दस्वरूप होने से दुःखादि से शून्य है, और परमाणु और
प्रकृति में नाममात्र भेद है, इसलिए प्रकृति जगत् का कारण सिद्ध
है, अगले सूत्र में इसे और भी पुष्ट करते हैं—
नासदुत्पादो नृशृङ्गवत् ॥ ११४ ॥
असत् किसी वस्तु का कारण नहीं हो सकता, जैसे—मनुष्य
के सींग नहीं, इसलिये संसार में उसका कोई कार्य भी प्रतीत
नहीं होता, न उससे कोई कुछ बना सकता है ।
उपादाननियमात् ॥ ११५ ॥
संसार में सब बस्तुओं का उपादान नियत है, जैसे—मृत्तिका
से घट तो बन सकता है परन्तु पट नहीं बन सकता, या लोहे
से तलवार बन सकती है, रुई से नहीं बन सकती, जल से बर्फ
बनती है, घी से नहीं बनती, इसी प्रकार सब पदार्थों के उपादान
कारण नियत हैं, नियमित कार्य कारण भाव के सत् होने से
कार्य को भी सत् मानना पड़ेगा ।
सर्वत्र सर्वदा सर्व्वासम्भवात् ॥ ११६ ॥
यह कथन सर्वथा असम्भव है, क्योंकि संसार में ऐसे वाक्यों
का साधक कोई भी दृष्टांतादिक नहीं दीखता कि ( असतः
सज्जायते ) अर्थात् असत् से सत् होता है । अतः मानना
पड़ेगा कि ( सतः सज्जायते ) अर्थात् सत् से सत् ही उत्पन्न
होता है ।
शक्तस्य शक्यकरणात् ॥ ११७ ॥
कार्य में कारण का शक्तिमत्व होना ही उपादान कारण होता
है, क्योंकि जिस कारण द्रव्य में जो कार्यशक्ति वर्तमान ही नहीं
( ४६ )
है, उससे अभिलषित कार्य कदापि नहीं हो सकता ; जैसे कि
कृष्ण रंग से श्वेत रंग कदापि नहीं हो सकता । अब इससे यथार्थ
सिद्ध होगया कि जैसे कृष्ण रंग से श्वेत रंग उत्पन्न नहीं हो
सकता, इसी प्रकार असत् से सत् भी उत्पन्न नहीं हो सकता ।
कारणभावाच्च ॥ ११८ ॥
उत्पत्ति से पहिले हो कार्य का कारण से भेद नहीं है, क्योंकि
कार्य कारण के भीतर ही सदैव रहता है, जैसे कि तेल तिलों के
भीतर रहता है ।
न भावे भावयोगश्चेत् ॥ ११९ ॥
अब इसमें प्रश्न पैदा होता है कि कार्य तो नित्य है तो
भावरूप 'सत्' कार्य में भावरूप उत्पत्तियोग नहीं हो सकता,
असत् से सत् की उत्पत्ति के व्यवहार होने से । अब इस विषय
में सांख्य के आचार्य अपने मत को प्रकाश करते हैं।
नाभिव्यक्ति निबन्धनौ व्यवहारा व्यवहारौ । १२०
अब यहाँ पर सन्देह होता है कि यद्यपि उत्पत्ति से पहिले
सत् कार्य की किसी प्रकार उत्पत्ति हो, परन्तु अब कार्य सत्ता
अनादि है, तो उसका नाश क्यों हो सके । इसका उत्तर यह है,
कि कार्य की उत्पत्ति का व्यवहार और अव्यवहार अभिव्यक्ति
निमित्तक है, अर्थात् अभिव्यक्ति के भाव से कार्य की उत्पत्ति
होती है । अभिव्यक्ति के अभाव से उत्पत्ति का अभाव है। जो
पूर्व यह शंका की थी, कि यदि कारण में कार्य रहता है, तो
अमुक कार्य उत्पन्न हुआ, ऐसा कहना भी नहीं हो सकता । उसके
ही उत्तर में यह सूत्र है, कि अभिव्यङ्ग्यमान कार्य की उत्पत्ति का
व्यवहार अभिव्यक्ति निमित्तक है । पूर्व जो कार्य असत् नहीं
था उसकी अब उत्पत्ति हुई यह कथन ठीक नहीं है ।
( ५० )
नाशः कारण लयः ॥ १२१ ॥
"लीङ्" श्लेषणे धातु से लय शब्द बनता है। अति सूक्ष्मता
के साथ कार्य्य का कारण में मिल जाना, इसी का नाम नाश है।
कार्य्य की व्यतीत अवस्था अर्थात् जो अवस्था कार्य्य की उत्पत्ति
से पूर्व थी, उसी को धारण कर लेना और जो नाश भविष्यत्
में होनेवाला है, उसी का नाम प्रागभाव नामक नाश है। कोई
कोई यह कहते हैं कि जो वस्तु नाश हो जाती है उसकी
पुनरुत्पत्ति नहीं होती, परन्तु यह कहना सर्वथा अयोग्य है,
क्योंकि इस कथन से प्रत्यभिज्ञा में दोष होगा, अर्थात् जिस
पदार्थ को दो वर्ष पहले देखा था, उसको ही इस समय देखने से
यह ज्ञान होता है कि जो पदार्थ पहिले देखा था उसीको इस समय
देखता हूँ। इस ज्ञान में यह दोष होगा कि जो ज्ञान पूर्व हुआ था
वह इतने दिन तक नष्ट रहा और फिर भी समयानुसार उत्पन्न
होगया। यदि नष्ट हुये कार्य्य की दूसरी बार अनुत्पत्ति ही ठीक
होती तो इसमें अनुत्पत्ति का लक्षण पाया भी जाता। अतएव
यही कहना ठीक है कि नाश को प्राप्त कार्य्य फिर भी उत्पन्न हो
सकता है। अब यह सन्देह होता है कि यदि पहिले कहा हुआ ही
पक्ष ठीक है, तो अपने कारण में कार्य्य का नाश होता क्यों नहीं
दीखता, जैसे—तन्तु कपास से पैदा होते हैं, परन्तु नाश के समय
वह मिट्टी में मिल जाते हैं। इसका उत्तर यह है कि कार्य्य का
कारण में लय होजाना विवेकी पुरुषों को दीखता है और
अविवेकियों को नहीं दीखता, जैसे—तन्तु मिट्टी के रूप होजाते
हैं और मिट्टी कपास के वृक्षरूप होजाती है और वह वृक्ष फूल,
फल, कपास आदि रूप से परिणाम को प्राप्त होता है और जब
कार्य्य का नाम और उसीके समान कुछ बदला हुआ रूप संसार
में मौजूद है, तब नाश, ऐसा कहना भी योग्य नहीं। यही
( ५१ )
सिद्धान्त महाभाष्यकार महर्षि पतञ्जलिजी का भी है, कि
आकृति नित्य है। अब यहाँ यह सन्देह होता है कि अभिव्यक्ति
कार्य की उत्पत्ति के पूर्व भी थी या नहीं थी ? यदि थी तो कारण
के यत्न से पूर्व अभिव्यक्ति को स्वकार्य-जनकता दोष होगा
और उत्पत्ति के लिए जो कारण द्वारा यत्न किया जाता है वह
व्यर्थ होगा। यदि कार्य की उत्पत्ति से पहिले अभिव्यक्ति नहीं
थी तो सत्कार्य पक्ष में हानि होगी ; क्योंकि जब यह कह चुके
हैं कि जो कार्य पूर्व था, उसी की इस समय उत्पत्ति होती है,
किन्तु असत् की उत्पत्ति नहीं होती, तो अभिव्यक्ति का पूर्व में
अभाव कहने में दोष होगा। यदि यह कहा जाय कि अभिव्यक्ति
तो पूर्व भी थी लेकिन एक अभिव्यक्ति से दूसरी अभिव्यक्ति कारण
द्वारा होती जाती है, इसीलिये कारण व्यापार है, ऐसा कहने पर
अनवस्था दोष होगा ; क्योंकि एक से दूसरी, दूसरी से तीसरी,
इसी तरह कहते जाओ, लेकिन कहीं भी विश्राम नहीं हो सकता,
इस कारण यह अनवस्था दोष हो गया। इन पूर्व कहे दोषों के
उत्तर यह हैं—प्रथम तो कारण व्यापार से सब कार्यों की उत्पत्ति
होती है, इस प्रकार पूर्वोक्त शंका ही नहीं हो सकती। दूसरे यदि
यह भी मान लिया जाय कि अभिव्यक्ति पहिले नहीं थी, तो भी
कारण व्यापार द्वारा उसकी सत्ता प्रकाश करने के वास्ते सदैव
आवश्यक है, तब कोई दोष नहीं हो सकता। तीसरे यह भी है कि
जब कार्य्य की अनागत अवस्था में ( जबतक कार्य उत्पन्न नहीं
हुआ ) सत् कार्य्यवाद की कोई हानि नहीं हो सकती, तब दोष भी
नहीं हो सकता ; क्योंकि जबतक घट पैदा ही नहीं हुआ, उससे
पहिले भी सत् कार्य्यवादी मिट्टी में घट को मानते हैं, इसी प्रकार
अभिव्यक्ति को भी समझना चाहिये। यदि कोई ऐसा सन्देह करे
कि कार्य का प्रागभाव “पहिले न होना” ही नहीं मानते तो घट
पहिले नहीं था, किन्तु अब पैदा हुआ है, ऐसा कहना भी नहीं
( ५२ )
बन सकता। इसका उत्तर यह है, कि कार्य की अवस्थाओं का ही
भाव अभाव कहते हैं न कि कार्य का और जो अनवस्था दोष
दिया उसका उत्तर यह है:—
पारम्पर्यतोऽन्वेषणा बीजांकुरवत् ॥ १२२ ॥
बीज और अंकुर के समान अर्थात् जब विचार किया
जाता है कि पहिले बीज था या वृक्ष, इस विषय में परम्परा
मानी गई है। इसी तरह अभिव्यक्ति मानो गई है, सिर्फ
भेद इतना ही है, कि उसमें क्रमिक परम्परा दोष उत्पन्न
होता है, अर्थात् पहिले कौन था, और इसमें एक-कालिक
एक ही समय में एक का दूसरे से उत्पन्न होना यह दोष होगा,
लेकिन यह दोष इस कारण माना जाता है, कि पातञ्जलभाष्य
में भी व्यासजी ने कार्यों को स्वरूप में नित्य और अवस्थाओं
से विनाशी माना है, वहां अनवस्था दोष को प्रामाणिक माना
है। यह बीजाङ्कुर का दृष्टान्त केवल लौकिक है, वास्तव में यहाँ
जन्म और कर्म का दृष्टान्त दिया जाता तो श्रेष्ठ था ; जैसे—जन्म
से कर्म होता है या कर्म से जन्म, क्योंकि बीजाङ्कुर के झगड़े
में कोई-कोई आदि सर्ग में वृक्ष के बिना ही बीज की उत्पत्ति मानते
हैं, वास्तव में अवस्था कोई वस्तु नहीं है, इसको कहते हैं:—
उत्पत्तिवद्वादोषः ॥ १२३ ॥
जैसेकि घट की उत्पत्ति के स्वरूप को ही वैशेषिकादि
असत् कार्यवादी कमी के सबब मानते हैं, अर्थात् यह उत्पत्ति
किस से उत्पन्न हुई, ऐसा सन्देह नहीं करते, केवल एक ही
उत्पत्ति को मानते हैं। इसी तरह अभिव्यक्ति की उत्पत्ति किस
से हुई, यह विवाद नहीं करना चाहिये। केवल अभिव्यक्ति को
ही मानना चाहिये। सत्कार्यवादी और असत् कार्यवादी इन
दोनों में केवल इतना ही भेद है, कि असत् कार्यवादी कार्य
( ५३ )
उत्पत्ति की पूर्व दशा को प्रागभाव और कार्य के कारण में लय
होजाने को ध्वंस कहते हैं, और इन दोनों अवस्थाओं में कार्य
का अभाव मानते हैं, और इसी प्रकार सत्कार्यवादी कही हुई
दोनों अवस्थाओं को अनागत और अतीत कहते हैं, तथा उन
अवस्थाओं में कार्य का भाव मानते हैं, कार्य से कारण का
अनुमान कर लेना चाहिए ।
प्र०-किस-किस को कार्य कहते हैं ?
उ०-हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रित
लिङ्गम् ॥ १२४ ॥
हेतुमान् अर्थात् कारणवाला, अनित्य अर्थात् हमेशा एकसा
जो न रहे, अव्यापि अर्थात् एक देश में रहनेवाला, सक्रिय
क्रिया की अपेक्षावाला, अनेक जिसके अलग-अलग भेद मालूम
होवें, आश्रित कारण के अधीन इसको लिङ्ग अर्थात् कार्य के
पहिचानने का चिह कहते हैं ।
प्र०-जिसमें हेतुमत्वादिक होते हैं वही प्रधान के लिङ्ग कहे
जाते हैं ?
उ०-तुम्हारा यह कहना सर्वथा असंगत है ; क्योंकि प्रथम
तो इस सूत्र में वा पूर्व सूत्र में प्रधान का नाम ही नहीं है, दूसरे
सांख्यकार ने प्रधान शब्द को रूढ़ि नहीं माना, इसी कारण
इसको पुरुषवाचक भी कह सकते हैं; किन्तु प्रकृतिवाचक है ।
तीसरे यदि उनके तात्पर्यानुसार ( मतलब के माफ़िक़ ) यह लिङ्ग
पुरुष के ही मान लिये जावें तो भी ठीक नहीं, क्योंकि सांख्यकार
के मत में कार्यमात्र की उत्पत्ति प्रकृति से है, एवं प्रकृति और
पुरुष का भेद भी माना है, एवं परस्परानपेक्षा भी कपिलाचार्य का
सिद्धांत है, तो प्रकृति से पुरुष का अनुमान नहीं हो सकता।
( ५४ )
हेतुमत्वादि विशेषण देने से कार्य कारण में भेद मालूम होता है,
इसी कारण उस भेद की प्रतीति में प्रमाण देते हैं—
आञ्जस्याद् भेदतो वा गुण सामान्यादेस्तत्सिद्धिः
प्रधानव्यपदेशाद्वा ॥ १२५ ॥
अर्थ—आञ्जस्य ( प्रत्यक्ष ) से, वा कारण के सामान्य
गुण कार्य में पाये जाते हैं। विशेष गुणों में भेद रहता है,
इससे प्रधान व्यपदेश से अर्थात् यह कारण है, यह कार्य है। इस
लौकिक व्यवहार से कार्य कारण के भेद की सिद्धि होती है।
त्रिगुणचेतनत्वादि द्वयोः ॥ १२६ ॥
अब कार्य कारण का भेद कहकर कार्य कारण का साधर्म्य,
अर्थात् बराबरीपन कहते हैं—कि सत्, रज, तम यह तीनों गुण
अचेतनत्वादि धर्म दोनों के समान ही हैं, आदि शब्द से
परिणामित्वादि का ग्रहण होता है।
प्रीत्य प्रीति विषादाद्यैर्गुणा नामन्योन्य
वैधर्म्यम् ॥ १२७ ॥
अर्थ—अब कार्य कारण का परस्पर ( आपस में ) वैधर्म्य
कहते हैं—सत्व, रज, तम, इन गुणों का सुख दुःख मोह इनमें
अन्योऽन्य वैधर्म्य ( एक ही कारण से अनेक-अनेक प्रकार के
कार्य की उत्पत्ति होना ) दिखाई पड़ता है। इस सूत्र में आदि
शब्द से जिनका ग्रहण होता है, उनका वर्णन पञ्चशिखाचार्य
ने इस प्रकार किया है कि सत्वगुण से प्रीति, तितिक्षा, सन्तोष
आदि सुखात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं।
इस ही रीति से रजोगुण से अप्रीति शोक आदि दुःखात्मक
अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य पैदा होते हैं, एवं तम से विषाद,
निद्रा ( नींद ) आदि मोहात्मक अनन्त अनेक धर्मवाले कार्य
( ५५ )
पैदा होते हैं। घटरूप कार्य में केवल मिट्टी से रूपमात्र का ही
वैधर्म्य है।
लघ्वादिधर्मैः साधर्म्यं वैधर्म्यञ्चगुणानाम् ॥१२८॥
अर्थ—लघुत्वादि धर्मों से सत्त्वादि गुणों का साधर्म्य और
वैधर्म्य है; जैसे लघुत्व के साथ सर्व सत्वव्यक्तियों का ( सतोगुण
के पदार्थों का साधर्म्य है, रज और तम का वैधर्म्य है, एवं
चंचलत्वादि के साथ रजो व्यक्तियों का ( रजोगुण के पदार्थों का )
साधर्म्य है, और सत्व तम का वैधर्म्य है, इस ही प्रकार
गुरुत्व आदि के साथ तमोव्यक्तियों का ( तमोगुण के पदार्थों
का ) साधर्म्य है, और सत्व, रज से वैधर्म्य है।
प्र०—यद्यपि महदादि स्वरूप से सिद्ध हैं तो भी प्रत्यक्ष से
उनकी उत्पत्ति नहीं दीखती, इसी कारण महदादिकों के कार्य
होने में कोई भी प्रमाण नहीं ?
उ०—उभयान्यत्वात् कार्यत्वं महदादेर्घटा-
दिवत् ॥ १२९ ॥
प्रकृति और पुरुष इन दोनों से महदादिक और ही हैं, इस
सबब उन्हें कार्य मानना चाहिये, जैसे—घट मट्टी से अलग है
इसी सबब कार्य है, क्योंकि मट्टी कहने से न तो घट का बोध
होता है, और न घट कहने से मिट्टी का ही ज्ञान होता है।
इसी प्रकार प्रकृति और पुरुष कहने से महदादिकों का भी ज्ञान
नहीं होता। इस कारण महदादिकों को प्रकृति और पुरुष से
भिन्न कार्य मानना चाहिये; क्योंकि प्रकृति और पुरुष कारण
हैं, किन्तु कार्य नहीं हैं।
परिणामात् ॥ १३० ॥
अर्थ—प्रकृति और पुरुष परिमित भाव से रहते हैं, कभी घटते
बढ़ते नहीं। इसी सबब उनको कार्य नहीं कह सकते; क्योंकि—
( ५६ )
समन्वयात् ॥ १३१ ॥
अर्थ—मन को आदि लेके जोकि महदादिकों का अवान्तर भेद
हैं, सो अन्नादिकों के मिलने से बढ़ते रहते हैं, और भूखे रहने से
क्षीण होते हैं । इस पूर्वोक्त समन्वय से भी महदादिकों को कार्यत्व
मालूम होता है ; क्योंकि जो नित्य पदार्थ होता है वह अवयव
( टुकड़ा ) रहित होता है, अतः उसका घटना-बढ़ना नहीं हो
सकता । इसका अर्थ यह हुआ कि घटना-बढ़ना आदि कार्य में
हो सकता है, कारण में नहीं हो सकता । मन आदि अन्न के
मिलने से बढ़ते हैं, और न मिलने से घटते हैं। इसी से महदादिकों
का कार्यत्व सिद्ध होता है ।
शक्तितश्चेति ॥ १३२ ॥
अर्थ—महदादिक पुरुष के कारण हैं, इसी में महदादिकों को
कार्यत्व है, क्योंकि इनके बिना पुरुष कुछ नहीं कर सकता,
जैसेकि नेत्रों के बिना कुछ नहीं कर सकता, अर्थात् देख नहीं
सकता, और पुरुष के बिना नेत्र में देखने की शक्ति नहीं हो
सकती ; क्योंकि नेत्र तो जड़ हैं, इस कारण मनुष्य दर्शन रूप
क्रिया को नेत्ररूपी कारण के बिना नहीं कर सकता, इस ही
सबब से नेत्रादिकों को कार्यत्व माना है । इस सूत्र में इति शब्द
से यह जानना चाहिये कि प्रत्येक कार्य की सिद्धि में इतने ही
प्रमाण होते हैं ।
तद्धाने प्रकृतिः पुरुषो वा ॥ १३३ ॥
अर्थ—महदादिकों को कार्य नहीं मानें तो महत्तत्त्व को प्रकृति
वा पुरुष इन दोनों से एक अवश्य माना जायगा ; क्योंकि जो
महदादि परिणामी हों तो प्रकृति, और महदादि अपरिणामी ही
को पुरुष मानना पड़ेगा ।
( ५७ )
प्र०-प्रकृति और पुरुष से भिन्न अर्थात् दूसरा और कोई
पदार्थ मान लिया जाय तो क्या हानि है ?
उ०-तयोरन्यत्वे तुच्छत्वम् ॥ १३४ ॥
अर्थ-हाँ ! हानि है, तुच्छत्व दोष की प्राप्ति होती है; क्योंकि
लोक में प्रकृति और पुरुष के सिवाय अन्य को अवस्तु माना है
अर्थात् प्रकृति और पुरुष यह दोही वस्तु हैं और सब अवस्तु
हैं ; अतएव इसको प्रकृति का कार्य मानना चाहिये । यदि दूसरा
मानें तो इसके कारण भी दूसरे ही मानने पड़ेंगे । इस प्रकार
महदादिकों को कार्यत्व सिद्ध हुआ । अब उनके द्वारा प्रकृति का
अनुमान सिद्ध करते हैं ।
कार्यात् कारणानुमानं तत्साहित्यात् ॥ १३५ ॥
अर्थ-कार्य से कारण का अनुमान होता है ; क्योंकि जहाँ-
जहाँ कार्य होता है, वहीं-वहीं कारण भी होता है, और महदादिक
भी अपने कार्यों के उपादान कारण हैं, जैसेकि तिलरूप कार्य
स्वगत ( अपने में रहने वाले ) तेल का उपादान कारण है । इस
कथन से महदादिकों के कार्यत्व में किसी प्रकार की हानि नहीं है ।
अव्यक्तं त्रिगुणाल्लिङ्गात् ॥ १३६ ॥
अर्थ-महत्तत्वादिकों की अपेक्षा भी मूल कारण प्रकृति
अव्यक्त अर्थात् सूक्ष्म है ; क्योंकि महत्तत्त्व के कार्य सुखादिकों
का प्रत्यक्ष होता है, और सूक्ष्मता के कारण प्रकृति का कोई
गुण प्रत्यक्ष नहीं होता है ।
प्र०-प्रकृति तो परम सूक्ष्म है, अतः उसका न होना ही
सिद्ध होता है ?
उ०-तत्कार्यतस्तत्सिद्धेर्नापलापः ॥१३७॥
अर्थ-प्रकृति का अभाव ( न होना ) नहीं हो सकता ;
क्योंकि प्रकृति की सिद्धि ( होना ) मालूम पड़ती है । उसके
( ५८ )
कार्य्य महदादिक उसको सिद्ध कर रहे हैं। यहाँ तक प्रकृति का
अनुमान समाप्त हुआ। अब अध्याय की समाप्ति तक पुरुष का
अनुमान कहेंगे।
सामान्येन विवादाभावाद्धर्म वन्न साधनम् ॥१३८॥
अर्थ--जिस वस्तु में सामान्य ही से विवाद नहीं है उसकी
सिद्धि में साधनों की कोई अपेक्षा नहीं, जैसे-प्रकृति में सामान्य
ही से विवाद है, उसकी सिद्धि के वास्ते साधनों की अपेक्षा
आवश्यकता है, वैसे पुरुष में नहीं है; क्योंकि बिना चेतन के
संसार में अँधेरा प्रतीत ( मालूम ) होगा, यहाँ तक कि बौद्ध भी
सामान्यतः कर्म भोक्ता अहं पदार्थ को पुरुष मानते हैं, तो उसमें
किसी प्रकार का विवाद नहीं हो सकता। उदाहरण, धर्मवत्-
धर्म की तरह, जैसे कि धर्म को सभी बौद्ध नास्तिक आदि मानते
हैं, वैसे ही एक चेतन को सभी मानते हैं।
प्र०--पुरुष किसको कहते हैं ?
उ०--शरीरादिव्यतिरिक्तः पुमान् ॥ १३६ ॥
अर्थ--शरीर को आदि से लेकर प्रकृति तक जो २३ पदार्थ
हैं उनसे जो पृथक् है उसका नाम पुरुष है।
प्र०--शरीरादि से जो भिन्न है उसका ही नाम पुरुष है।
इसमें क्या हेतु है ?
उ०--संहतपदार्थत्वात् ॥ १४० ॥
जैसे शय्या आदिक संहत पदार्थ दूसरे के वास्ते सुख के
देने वाले होते हैं, अपने वास्ते नहीं। इसी प्रकार प्रकृत्यादिक
पदार्थ भी दूसरे के वास्ते हैं। स्पष्ट आशय यह है, कि प्रकृति
आदि जितने संहत पदार्थ हैं, वह किसी दूसरे के वास्ते हैं, और
जो वह दूसरा है, उसी का नाम पुरुष है, और संहत देहादि से
( ५६ )
भिन्न का नाम पुरुष है। यह पहले भी कह आये हैं, फिर यहाँ
कहना हेतुओं की केवल गिनती बढ़ानी है।
प्र०—पुरुष को प्रकृति ही क्यों न माना जाय, इसमें क्या
कारण है ?
उ०—त्रिगुणादिविपर्ययात् ॥ १४१ ॥
अर्थ—त्रिगुण अर्थात् सत्, रज, तम, मोह आदि शब्द से
जड़त्वादि, इनसे विपरीत होने से पुरुष प्रकृति नहीं हो सकता,
अर्थात् वह प्रकृति से भिन्न है; क्योंकि त्रिगुणत्व विशिष्ट का
नाम प्रकृति है, अर्थात् सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण; इन से
जिसका सम्बन्ध है, उसका ही नाम प्रकृति माना है, और जिसमें
नित्यत्व, शुद्धत्व, बुद्धत्व मुक्तत्व, यह धर्म हैं, उसका ही नाम
पुरुष है, तो विचारना चाहिये प्रकृति और पुरुष में कितना भेद
है। इस ही कारण पुरुष को प्रकृति नहीं मान सकते हैं।
अधिष्ठानाच्चेति ॥ १४२ ॥
अर्थ—और भी कारण है, पुरुष अधिष्ठान होने से प्रकृति
से जुदा ही है। अधिष्ठान अधिष्ठेय संयोग से मालूम पड़ता है,
कि दो के बिना संयोग हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ
कि पुरुष प्रकृति से भिन्न है। आशय यह है कि जब प्रकृति को
आधार कहते हैं, तब उसमें आधेय भी अवश्य होना चाहिये वह
आधेय पुरुष है।
प्र०—अधिष्ठान किसको कहते हैं ?
उ०—आधार को।
प्र०—आधार शब्द का क्या अर्थ है ?
उ०—रखने की जगह, जैसे पात्र।
प्र०—अधिष्ठेय किसको कहते हैं ?
उ०—आधेय को।