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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

( ११ )
अर्थ—इस आत्मा को अनादि-प्रवाह-रूप-वासना से बन्धन
होना भी असम्भव मालूम होता है, क्योंकि निम्नलिखित प्रमाण
से अशुद्ध प्रतीत होता है ।
न बाह्याभ्यन्तरयोरुपरज्योपरंजक भावोऽपि
देशव्यवधानात् स्रुघ्नस्थापाटलिपुत्रस्थयोरिव ॥२८॥
अर्थ—जो मनुष्य जीव-आत्मा को शरीर में एक देशी
मानते हैं, इस कारण जीव-आत्मा का कुछ भी सम्बन्ध बाह्य
विषयों से नहीं रहेगा, क्योंकि आत्मा और जड़ के बीच अति
देश का अन्तर है, जैसे—पटने का रहनेवाला बिना आगरे पहुँचे
वहाँ के रहनेवाले को नहीं बाँध सकता, इसी प्रकार बाह्य इंद्रियों
से उत्पन्न हुई वासना आभ्यन्तरस्थ आत्मा के बन्धन का हेतु
किस प्रकार हो सकती है ? और लोक में भी ऐसा ही देखा
जाता है कि जब रङ्ग और वस्त्र का सम्बन्ध बिना अन्तर के
होता है तब तो वस्त्र पर रङ्ग चढ़ जाता है । यदि उनके बीच कुछ
अन्तर हो तो रङ्ग कदापि नहीं चढ़ सकता, अतएव वासना से
बन्धन नहीं हो सकता, परन्तु जब लोग आत्मा और बाह्य
इन्द्रियों में अन्तर मानते हैं तो इन्द्रियकृत वासना से आत्मा
किसी प्रकार बन्धन में नहीं आ सकता । यदि यह कहा जाय
कि बाह्य इन्द्रियों का आभ्यन्तर इन्द्रिय मन आदि से सम्बन्ध
है और आभ्यन्तर इन्द्रियों का आत्मा से । इस परम्परा सम्बन्ध
से आत्मा भी विषय वासना से बद्ध हो सकता है, यह कहना
अयुक्त है; क्योंकि—
द्वयोरेकदेशलब्धोपरागान्नव्यवस्था ॥ २६ ॥
जब आत्मा और इन्द्रिय दोनों को विषय-वासना में बंधा
हुआ मानोगे तो मुक्त और बन्धन में रहनेवाले का पता भी

( १२ )
नहीं लगेगा। इसका आशय यह है कि जब आत्मा और इन्द्रिय
दोनों ही विषय-वासना से समान सम्बन्ध रखते हैं तो इन्द्रियों
का बन्धन न कहकर केवल आत्मा ही का बन्धन बतलाना
अयुक्त होगा। इस कारण वासना से भी बन्धन नहीं होता।
अदृष्टवशाच्चेत् ॥ ३० ॥
प्र०—तो क्या फिर अदृष्ट अर्थात् पूर्व किये धर्म अधर्म से
जो एक भोग-शक्ति पैदा होती है उससे बन्धन होता है ?
उ०—न द्वयोरेककालायोगादुप कार्य्योपका-
रक भावः ॥ ३१ ॥
अर्थ—जब तुम्हारा बन्धन और अदृष्ट एक काल में उत्पन्न
होते हैं तो उनमें कर्त्ता और कर्म नहीं हो सकता। जबकि
तुम्हारी दृष्टि में संसार प्रत्येक क्षण में बदलता है तो एक स्थिर
आत्मा के न होने से दूसरे आत्मा के अदृष्ट से दूसरे आत्मा
का बन्धन रूप दोष होगा।
प्र०—पुत्रकर्म्मवदिति चेत् ॥ ३२ ॥
अर्थ—जिस प्रकार उसी काल में तो गर्भाधान किया जाता
है और उसी समय उसका संस्कार किया जाता है, अतएव
एक काल में उत्पन्न होनेवाले पदार्थों में पूर्व कथित सम्बन्ध
हो सकता है ?
उ०—नास्ति हि तत्र स्थिर एकात्मा यो गर्भा-
धानादिना संस्क्रियते ॥ ३३ ॥
अर्थ—तुम्हारे मत में तो एक स्थिर जीवात्मा हा नहीं जिस
का गर्भाधानादि से संस्कार किया जावे, अतएव तुम्हारा पुत्र-

( १३ )
कर्म वाला दृष्टांत ठीक नहीं । यह दृष्टांत एक स्थिर आत्मा
मानने वालों के मत में तो कुछ घट भी सकता है ।
प्र०—बन्धन भी ( क्षणिक ) एक क्षण भर रहनेवाला है,
इसलिये उसका कारण अर्थात् नियम नहीं, या अभाव ही उसका
कारण है, अथवा वह बिना कारण ही है ?
उ०—स्थिरकार्य्यासिद्धेः क्षणिकत्वम् ॥ ३४ ॥
अर्थ—यदि तुम बन्धन को ( क्षणिक ) एक क्षण रहनेवाला
मानो तो उसमें दीपशिखा अर्थात् दीपज्योति के समान दोनों
का कोई स्थिर कार्य उत्पन्न नहीं होगा। इस अगले सूत्र से
स्पष्ट करते हैं कि कार्य को क्षणिक मानने में क्या दोष होगा ।
न प्रत्यभिज्ञावाघात् ॥ ३५ ॥
अर्थ—लोक में कोई भी पदार्थ ( क्षणिक ) अर्थात् एकक्षण
रहनेवाला नहीं, क्योंकि यह ज्ञान के सर्वथा विरुद्ध है, क्योंकि
प्रत्येक मनुष्य यह कहता हुआ सुनाई देता है कि जिसको मैंने
देखा उसको स्पर्श किया। दृष्टांत यह है कि जैसे कि यदि एक
घोड़ा मोल लिया जावे तो क्षणिकवादी के मत में परीक्षा करके
मोल लेना असम्भव है ; क्योंकि जिस क्षण में घोड़े को देखा था
तब और घोड़ा था, जिस क्षण में हाथ लगाया तब और था,
दुबारा देखा तब और हुआ, इस कारण कोई कार्य हो ही नहीं
सकता। अतएव जिसके लिये दृष्टांत न हो वह ठीक नहीं ;
इसलिये बन्धनादि क्षणिक नहीं वरन् स्थिर हैं और प्रमाण
देते हैं—
श्रुतिन्यायविरोधाच्च ॥ ३६ ॥
अर्थ—यह कहना कि जगत् एकक्षण रहता है श्रुति अर्थात् वेद
और न्याय अर्थात् तर्क से सर्वथा विरुद्ध है, जैसा कि लिखा है—

( १४ )
‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’
अर्थ—हे सौम्य ! इस जगत् से पहिले भी सत् था अर्थात्
जगत् का कारण था ।
‘तम एवेदमग्र आसीत्’
अर्थ—इस सृष्टि से पहिले यह जगत् तमोरूप अर्थात् नाम-
रूपज्ञान जो कार्य में है इनसे पृथक् सत्रूप था और न्याय से
इसलिये विरुद्ध है कि असत् से सत् किसी प्रकार हो नहीं सकता,
इस कारण यह बन्धनरूप दुःख न तो क्षणिक है, बिना कारण
ही है । और प्रमाण लीजिये—
दृष्टान्तासिद्धेश्च ॥ ३७ ॥
अर्थ—क्षणिक में जो दीपशिखा का दृष्टांत दिया वह अयुक्त
है, क्योंकि क्षण ऐसा सूक्ष्म काल है कि जिसकी इयत्ता
( अन्दाज़ा ) नहीं हो सकती और न उसकी कुछ इयत्ता ( तादाद् )
है और प्रत्यक्ष में दीपशिखा कई क्षण तक एक-सी बराबर
रहती है, यह कथन भी सर्वथा अयुक्त है और क्षणिकवादियों
के मत में एक दोष यह भी होगा कि कारण और कार्यभाव
नहीं हो सकेगा और जब कार्य्य कारण का नियम न रहा तो
किसी रोग की औषध जो निदान अर्थात् कारण के ज्ञान
को जानकर उसके विरुद्ध शक्ति से की जाती है नहीं हो सकेगी
और संसार में जो घट कारण मृत्तिका को माना जाता है
सर्वथा न कह सकेंगे ; क्योंकि जिस क्षण में मृत्तिका घट का
कारण है वह क्षण अब नष्ट हो गया और यह कहना सर्वथा
अयुक्त है कि मृत्तिका घट का कारण नहीं ; क्योंकि बिना कारण
जाने घट बनाने में कुलाल की प्रवृत्ति नहीं होती और यदि दोनों
की अर्थात् मृत्तिका और घट की उत्पत्ति एक ही क्षण में मानें
तो दोष होगा—

( १५ )
युगपज्जायमानयोर्न कार्य्यकारणभावः ॥ ३८ ॥
अर्थ—जो पदार्थ एक साथ उत्पन्न होते हैं उनमें कार्य्य-कारण
भाव नहीं हो सकता ; क्योंकि ऐसा कोई दृष्टांत लोक में नहीं है,
जिसमें कार्य्य-कारण की उत्पत्ति एक साथ ही हो। यदि क्षणिक-
वादी यह कहें कि मृत्तिका और घटक्रम से हैं, पहिले मृत्तिका
कारण फिर घट कार्य्य उत्पन्न हो गया तो इसमें भी दोष है।
पूर्वापाये उत्तरायोगात् ॥ ३६ ॥
अर्थ—इस पक्ष में यह दोष होगा कि पूर्व क्षण में मृत्तिका
उत्पन्न हुई, दूसरे क्षण में नष्ट हुई, तब पीछे उससे कार्य्यरूप घट
क्योंकर उत्पन्न होसकता है ? इसलिये जबतक उपादान कारण न
माना जाय तबतक कार्य्य की उत्पत्ति नहीं होसकती। अतएव
कार्य्य-कारण भाव क्षणिकवादियों के मत से सिद्ध नहीं हो सकता।
उ०—तद्भावे तद्योगादुभयव्यभिचारादपि
न ॥ ४० ॥
अर्थ—कारण की विद्यमानता से और कार्य्य के साथ उसका
सम्बन्ध न मानने से दोनों दशाओं में व्यभिचार दोष होने
से कारण-कार्य्य का सम्बन्ध नहीं रहता। जब कार्य्य बनता था
तब तो कारण नहीं था और कारण हुआ तब कार्य्य बनाने का
विचार नहीं, अतएव क्षणिकवादियों के मत में कार्य्य-कारण का
सम्बन्ध किसी प्रकार हो नहीं सकता।
प्र०—जिस प्रकार घट का निमित्त कारण कुलाल पहिले से
ही माना जाता है, यदि इसी भाँति उपादान कारण भी माना जावे
तो क्या शङ्का है ?
उ०—पूर्वभावमात्रे न नियमः ॥ ४१ ॥

( १६ )
अर्थ—यदि कारण को नियत न मानकर पूर्वभावमात्र ही माना
जावे तो यह नियम न रहेगा कि मृत्तिका ही से घट बनता है और
वायु से नहीं बनता; क्योंकि क्षणिकवादी किसी विशेष कारण को
भाव से तो मानते नहीं, किन्तु भाव ही मानेंगे। अतएव उपरोक्त
दोष बना रहेगा और निमित्त कारण और उपादान का अन्तर भी
मालूम नहीं होगा और लोक में उपादान कारण और निमित्त
कारण का भेद निश्चित है, इसलिये क्षणिकवाद ठीक नहीं।
प्र०—जो कुछ संसार में है, सब मिथ्या ही है, और संसार
में होने से बन्धन भी मिथ्या है, अतएव उसका कारण खोजने
की कोई आवश्यकता नहीं, वह स्वयम् नाशरूप है ?
उ०—न विज्ञानमात्रं बाह्यप्रतीतेः ॥ ४२ ॥
अर्थ—इस जगत् को केवल मिथ्याज्ञान या विज्ञानमात्र नहीं
कह सकते; क्योंकि ज्ञान आन्तरिक अर्थात् भीतर ही होता है
और जगत् बाहर और भीतर दोनों दशाओं में प्रकट है।
प्र०—जब हम बाहर किसी पदार्थ के भाव को मानते ही
नहीं केवल भीतर के विचार ही मनोराज्य का सृष्टि की भाँति
मालूम होते हैं ?
उ०—तद्भावे तद्भावाच्छून्यं तर्हि ॥ ४३ ॥
अर्थ—यदि तुम जगत् को बाह्य न मानो केवल भीतर ही
मानोगे तो इस दीखते हुए संसार में विज्ञान का भी अभाव
मानना पड़ेगा और जगत् को शून्य कहना पड़ेगा। इसका कारण
यह है कि प्रतीति विषय का साधन करने वाली होती है, इसलिये
यदि बाह्य प्रतीत जगत् का साधन न करे तो विज्ञान प्रतीत भी
विज्ञान को नहीं सिद्ध कर सकती, इस हेतु से विज्ञानवाद में
शून्यबाद होजायगा ।
प्र०—अब शून्यवादी नास्तिक अपनी दलील देता है?

( १७ )
शून्यं तत्वं, भावो विनश्यति वस्तुधर्मत्वाद्वि-
नाशस्य ॥ ४४ ॥
अर्थ—जितने पदार्थ हैं सब शून्य हैं, और जो कुछ भाव
हैं, वह सब नाशवान् हैं, और जो विनाशी है वह स्वप्न की
भांति मिथ्या है। इससे सम्पूर्ण वस्तुओं के आदि और अंत का
तो अभाव सिद्ध ही होगया। अब रहा केवल मध्यभाग सो यथार्थ
नहीं-तब कौन किस को बाँध सकता है ? और कौन छोड़ सकता
है ? इस हेतु से बन्ध मिथ्या ही प्रतीत होता है। विद्यमान
वस्तुओं का नाश इसलिये है कि नाश होना वस्तुमात्र का धर्म है।
इस शून्यवादी के पूर्वपक्ष का खण्डन करते हैं।
उ०—अपवादमात्रम बुद्धानाम् ॥ ४५ ॥
अर्थ—'जो कुछ भाव पदार्थ हैं वह सब नाशवान् हैं', यह
कथन मूर्खों का अपवादमात्र है; क्योंकि नाशमात्र वस्तु का
स्वभाव कहकर, नाश में कुछ कारण न बताने से जिन पदार्थों
का कुछ अवयव नहीं है उनका नहीं कह सकते। इसका हेतु
यह है कि कारण में लय हो जाने को ही नाश कहते हैं, और
जब निरवयव वस्तुओं का कुछ कारण न माना तो उनका लय
किसी में न होने से उनका नाश न हो सकेगा। इसके सिवाय
एक और भी दोष रहेगा कि हर एक कार्य का अभाव लोक में
नहीं कह सकते; जैसे—"घट टूट गया," इस कहने से यह ज्ञात
होगा, कि घट की दूसरी दशा हो गई; परन्तु घटरूपी कार्य तो
बना ही रहा। आकृति को इस हेतु से माना कि वह एक
घट के टूट जाने से दूसरे घटों में तो रहती है।
अब तीनों लक्षणों का खण्डन करते हैं, अर्थात्—विज्ञानवादी
क्षणिकवादी और शून्यवादी ।

( १८ )
उभयपक्षसमानक्षेमत्वादयमपि ॥ ४६ ॥
अर्थ—जिस प्रकार क्षणिकवादी और विज्ञानवादी का मत
प्रत्यभिज्ञादि दोष वाह्य प्रतीति से खण्डित हो जाता है, इसी प्रकार
शून्यवादी का मत भी खण्डित हो जाता है; क्योंकि उस दशा में
पुरुषार्थ का बिलकुल अभाव हो जाता है। यदि यह कहो कि
शून्यवाद करने पर भी पुरुषार्थ तो स्वीकार करते हैं, तो वह भी
मानना अयुक्त होगा।
अपुरुषार्थत्वमुभयथा ॥ ४७ ॥
अर्थ—शून्यवादी के मत में पुरुषार्थ अर्थात् मुक्ति नहीं हो
सकती, क्योंकि जब दुःख है ही नहीं केवल शून्य ही है तो
उसकी निवृत्ति का उपाय क्यों किया जावे और मुक्ति भी शून्य
हो होगी उसके लिये साधन भी शून्य ही होंगे, तो ऐसे शून्य
पदार्थ के लिये पुरुषार्थ भी शून्य ही होगा। अतएव शून्यवादी
का मत किसी प्रकार भी शान्तिदायक नहीं और न उससे मुक्ति
हो सकती है।
न गतिविशेषात् ॥ ४८ ॥
अर्थ—गति के ३ अर्थ हैं—ज्ञान, गमन, प्राप्ति। यह तीनों
बन्धन का हेतु नहीं होते। पहिले जब कहा जावे कि ज्ञान विशेष
से बन्धन होता है। ज्ञान तीन प्रकार का है—प्रातिभासिक, व्याव-
हारिक, पारमार्थिक। यदि कहा जावे कि प्रातिभासिक सत्ता के
ज्ञान से बन्धन होता है तो यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि
प्रातिभाविक सत्ता का ज्ञान इन्द्रिय और संस्कार-दोष से उत्पन्न
होता है, परन्तु आत्मा में न इन्द्रिय है न संस्कार है; इसलिये
जिसका कारण है ही नहीं उसका कार्य कैसे हो सकता है। और
रहा व्यावहारिक ज्ञान, सो तो बद्ध अवस्था को छोड़ रहता ही

( १६ )
नहीं, वह बन्ध का कारण किस प्रकार हो सकता है । और
पारमार्थिक ज्ञान तो मुक्ति का हेतु है, वह बन्ध का कारण क्योंकर
हो सकता है, अतएव ज्ञानविशेष से बन्ध नहीं होता । दूसरा
गमन शरीरादि में होता है, वह जीव का स्वाभाविक धर्म होने से
बन्ध का हेतु नहीं हो सकता ।
तीसरा प्राप्ति, सो प्राप्त होने वाले दो पदार्थ हैं—एक ब्रह्म,
दूसरी प्रकृति, सो यह दोनों व्यापक होने से जीव को सर्वदा
प्राप्त, सदैव रहनेवाली वस्तु से सदैव सम्बन्ध, उससे भी बद्ध
नहीं हो सकता, अतएव गतिविशेष से बन्ध नहीं होता ।
निष्क्रयस्य तदसम्भवात् ॥ ४६ ॥
अर्थ—क्रिया से शून्य जड़ प्रकृति में भी गति असम्भव है
और व्यापक ब्रह्म में भी गति असम्भव है, और यदि जीव की
गति पर विचार किया जावे तो प्रश्न यह उपस्थित होगा, कि
जीव विभु है अथवा मध्यम परिणामवाला है अथवा अणु है ?
यदि विभु मानलें तो गति हो नहीं सकती । यदि मध्यम परिणाम-
वाला मानलें तो यह दोष होगा ।
प्र०—क्या आत्मा अंगुष्ठमात्र नहीं है ? यदि अंगुष्ठमात्र
है तो उसमें गति इत्यादि सम्भव है। यदि विभु है तो जाना हो
ही नहीं सकते ?
उ०—मूर्तत्वाद् घटादिवत् समानधर्मापत्ता-
वपसिद्धान्तः ॥ ५० ॥
अर्थ—आत्मा के मूर्त्तिमान् होने से घटादिकों की भाँति
सावयव इत्यादि दोष आजायेंगे और सावयव होने से संयोग
वियोग अर्थात् उत्पत्ति और नाश भी मानना पड़ेगा । जोकि
आत्मा नित्य है, इसलिये मूर्त्तिवाला नहीं हो सकता और जब

( २० )
मूर्त्तिवाला नहीं तो उसमें इस प्रकार की गति भी नहीं मानी
जा सकती। अतएव आत्मा को मूर्त्तिवाला मानना सिद्धान्त
का खण्डन करना है।
गतिश्रुति रप्युपाधियोगादाकाशवत् ॥ ५१ ॥
अर्थ—शरीर के सब अवयवों में जो गति है अर्थात् दूसरे
शरीरों में जो गमन है वह सूक्ष्म शरीर रूप उपाधि के कारण
है, अर्थात् जब तक सूक्ष्म शरीर न हो तब तक एक शरीर
छोड़ कर दूसरे शरीर में नहीं जा सकता, जैसे—आकाश घट
की उपाधि से चलता है, क्योंकि घट में जो आकाश है जहाँ
घट जायगा साथ हो जायगा।
प्र०—सूक्ष्म शरीर किसे कहते हैं ?
उ०—पंच प्राण, पंच उपप्राण, पंच ज्ञानेन्द्रिय, मन, अहंकार ;
इन सबके समूह का नाम सूक्ष्म शरीर है।
प्र०—क्या यह जीव से बिलकुल पृथक् हैं ?
उ०—हाँ, बिलकुल पृथक् हैं।
प्र०—तो पहिले-पहल जीव किस प्रकार इस शरीर को
धारण करता है ?
उ०—पहिले सांकल्पिक सृष्टि में आता है, फिर उसका जब
सूक्ष्म शरीर से सम्बन्ध हो जाता है, तब दूसरे शरीरों में जाता
है। यदि सम्बन्ध न हो तो नहीं जाता।
न कर्म्मणाप्यतद्धर्मत्वात् ॥ ५२ ॥
अर्थ—कर्म्म से भी बन्धन नहीं होता, क्योंकि वह भी शरीर
सहित आत्मा में होता है और शरीर सुख दुःख भोगने से
होता है। इसलिये कर्म्म से पहिले शरीर का होना आवश्यक

( २१ )
है और शरीर होने से बन्धन भी है, उसके उत्पन्न होने की
आवश्यकता नहीं ।
अतिप्रसक्तिरन्यधर्म्मत्वे ॥ ५३ ॥
अर्थ—यदि और के धर्म्म से और का बन्धन मान लें तो
नियम टूट जायेंगे; क्योंकि उस अवस्था में बद्ध पुरुष के पाप
से मुक्त बन्धन में आजायेंगे, जो असंगत है ।
निर्गुणादिश्रुतिविरोधश्चेति ॥ ५४ ॥
अर्थ—यदि उपाधि के बिना पुरुष का बन्धन माना जावे
तो जिन सूत्रों में जीव को साक्षिरूप और निर्गुण बतलाया
है उनमें दोष आ जायगा ; इसलिये जीव स्वभाव से बद्ध है,
न मुक्त है, वरन् यह दोनों औपाधिक धर्म हैं। प्रकृति संसर्ग
से बद्ध हो जाता है और परमात्मा के संसर्ग से मुक्त हो जाता
है। यथार्थ में जीव सुख दुःख से पृथक् और तीनों तापों से
किनारे साक्षिरूप है। इस सूत्र में इति शब्द कहने से बन्धन
के कारण परीक्षा समाप्त कर दी गई ।
प्र०—जब दुःख स्वाभाविक भी नहीं और नैमित्तिक भी
नहीं तो प्रतीत कैसे होता है ?
उ०—जीव को अल्पज्ञता और प्रकृति संसर्ग से बन्धन की
प्रतीति होती है। चूँकि संसर्ग नित्य है, इसलिये नैमित्तिक नहीं
कहला सकता, और बन्ध संसर्ग से उत्पन्न होनेवाले
अविवेक से प्रतीत होता है, इस कारण स्वाभाविक नहीं
कहला सकता । अतएव अविवेक ही इसका कारण है ।
प्र०—जब तुम प्रकृति के योग से बन्धन मानते हो और
प्रकृति भी काल और दशा की नाईं सर्वव्यापक है, तो उसके
योग से बन्धन किस प्रकार हो सकता है ?

( २२ )
उ०—तद्योगोऽप्यविवेकान्न समानत्वम् ॥ ५५ ॥
अर्थ—प्रकृति का योग भी अविवेक से होता है, इस-
वास्ते यह काल और दशा के समान नहीं ।
प्र०—अविवेक किसे कहते हैं ?
उ०—यह जानना कि यह वस्तु हमारे वास्ते लाभदायक है
अथवा हानिकारक, उसको अविवेक कहते हैं ।
प्र०—इस अविवेक का कारण क्या है ?
उ०—जीव की अल्पज्ञता ही अविवेक का कारण है ।
प्र०—क्या वह जीव की अल्पज्ञता जीव का स्वाभाविक गुण
है अथवा उसका भी कोई कारण है ?
उ०—उसका कोई कारण नहीं ।
प्र०—जब अल्पज्ञता स्वाभाविक गुण है, और स्वाभाविक का
नाश हो नहीं सकता, बस कारण रहा, तो कार्य-बन्धन सदैव
रहेगा ?
उ०—जिस प्रकार वायु स्वभाव से उष्ण, शीत से अलग है,
ऐसे ही जीव बन्धन मुक्ति से पृथक् है । यह दोनों गुण नैमित्तिक
हैं, इसलिये प्रवाह से अनादि हैं, और स्वरूप से सादि होते हैं ।
नियतकारणात्तदुच्छित्तिर्ध्वान्तवत् ॥ ५६ ॥
अर्थ—जिस प्रकार मन्द अन्धकार से जो सीप में चाँदी का
ज्ञान या रज्जु में सर्प का ज्ञान है, उसके नाश करने का नियत
उपाय है, अर्थात् प्रकाश का होना ; किन्तु प्रकाश के बिना किसी
अन्य उपाय से यह अज्ञान नष्ट नहीं हो सकता । इसी प्रकार
अविवेक से उत्पन्न होनेवाला जो बन्धन है, उसके नष्ट करने
के उपाय विवेक अर्थात् पदार्थ के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान है ।

( २३ )
प्रधानाविवेकादन्याविवेकस्य तद्धाने हानम् ॥ ५७
अर्थ—जीव में प्रधान अर्थात् प्रकृति के अविवेक अर्थात्
पदार्थ ज्ञान के न होने से और कारण आदि से पदार्थों का
अज्ञान होता है। आशय यह कि बन्धन का कारण जीव की
अल्पज्ञता है, क्योंकि जीव अपनी स्वाभाविक अल्पज्ञता से
प्रकृति का विवेक नहीं रखता, जिससे प्राकृतिक पदार्थों में
मिथ्या ज्ञान उत्पन्न होता है, और मिथ्या ज्ञान से रागद्वेष
और राग-द्वेष से प्रवृत्ति उत्पन्न होती है, और उससे बन्धन
अर्थात् तीन प्रकार का दुःख उत्पन्न होता है, और जिस समय
प्रकृति का मिथ्या ज्ञान नष्ट हो जाता है तब प्रकृति के पदार्थों
का अविवेक दूर होकर दुःख रूप बन्धन से छूट जाता है।
वाङ्_मात्रं नतु तत्वं चित्तस्थितेः ॥ ५८ ॥
अर्थ—दुःखादि को चित्त में रहनेवाला होने से उनका पुरुष
में कथनमात्र ही है; जैसे—लाल डाँक के लगाने से अँगूठी का
हीरा लाल मालूम होता है, ऐसे जीव मन के दुःखी होने से दुःखी
मालूम होता है, और मन के सुखी होने से सुखी मालूम होता है,
वास्तव में सुख दुःख से पृथक् है।
प्र०—यदि इस भाँति दुःख कथनमात्र ही है, तो युक्ति से
भी दूर हो जायगा, उसके लिये विवेक की क्या आवश्यकता है,
इसका उत्तर अगले सूत्र में देते हैं ?
युक्तितोऽपि न बाध्यते दिङ्_मूढवदपरोक्षादृते ५६
अर्थ—इस केवल कथनमात्र दुःख का भी युक्ति से नाश
नहीं हो सकता, बिना अपरोक्ष ज्ञान के। जैसे किसी मनुष्य को
पूर्व दिशा में उत्तर का भ्रम हो जावे तो जब तक उसे पूर्व और

सूत्र में भी दिखलाया गया है, कि जब तक दिशा का प्रत्यक्ष

( २४ )
उत्तर दिशा का भली-भाँति ज्ञान न हो जावे, तब तक यह भ्रम
जा ही नहीं सकता ; इस कारण विवेक की आवश्यकता है, और
सूत्र में भी दिखलाया गया है, कि जब तक दिशा का प्रत्यक्ष
न हो जावे तब तक भ्रमन्निवृत्ति नहीं हो सकती ; इसलिये जब
तक प्रकृति और पुरुष के धर्म का ठीक निश्चय करके प्रकृति से
निवृत्ति और पुरुष की प्राप्ति न हो तब तक दुःख दूर भी
न होगा।
उ०—अचाक्षुषाणामनुमानेन बोधो धूमादि-
भिरिव वह्नेः ॥ ६० ॥
अर्थ—प्रकृति पुरुष अर्थात् जीवात्मा, परमात्मा और प्रकृति
का तो प्रत्यक्ष नहीं है, अनुमान से ज्ञान होता है।
प्र०—क्या यह प्रकृति प्रत्यक्ष नहीं ?
उ०—नहीं, प्रत्युत जो प्रत्यक्ष है वह विकृति है, अर्थात् प्रकृति
का परिणाम है।
प्र०—सूत्र में तो पुरुष शब्द है, तुम इससे जीवात्मा और
परमात्मा किस प्रकार लेते हो ?
उ०—शरीर में रहने से जीवात्मा और संसार में व्यापक
होने से परमात्मा पुरुष शब्द से लिये गये और न्याय में आत्मा
और सांख्य में पुरुष शब्द एक ही अर्थ के बतलानेवाले हैं।
सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था, प्रकृतिः प्रकृतेर्म-
हान्, महतोऽहंकारोऽहंकारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमि-
न्द्रियं तन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पंचविंश-
तिर्गणः ॥ ६१ ॥

( २५ )
अर्थ—सत्वगुण प्रकाश करनेवाला, रजोगुण न प्रकाश और
न आवरण करनेवाला, तमोगुण आवरण करनेवाला। जब यह
तीनों गुण समान रहते हैं, उस दशा का नाम प्रकृति है; क्योंकि
वर्तमान दशा में सत्वगुण, तमोगुण का परस्पर विरोध है। इस
समय जिस शरीर में सत्त्वगुण रहता है, वहाँ तमोगुण का वास
नहीं और इसी तरह जहाँ तमोगुण का निवास है वहाँ सत्वगुण
नहीं; परन्तु कारण अर्थात् परमाणु की दशा में एक दूसरे के
विरुद्ध नहीं कर सकते, उस समय पास ही पास रह सकते हैं।
अब उस प्रकृति से महत्तत्त्व अर्थात् मन उत्पन्न होता है और
मन से अहङ्कार और अहङ्कार से पंच सूक्ष्म तन्मात्रा या रूप
रस, गंध, स्पर्श और शब्द उत्पन्न होते हैं, उनसे पाँच ज्ञानेन्द्रिय
और पाँच कर्मेन्द्रिय उत्पन्न होते हैं, और पञ्चतन्मात्राओं से पाँच
भूत अर्थात् पृथिवी, अप, तेज, वायु, और आकाश होते हैं,
और जब इनसे पुरुष अर्थात् जीव और ब्रह्म मिल जाता है तो
२५ गुण कहलाते हैं।
प्र०—अनेक पुरुषों ने महत्तत्त्व का अर्थ बुद्धि किया है, तुम
'मन' किस प्रकार लेते हो ?
उ०—बुद्धि जीवात्मा का गुण है। जीव के सत्य होने से वह
नित्य है, वह प्रकृति का कार्य्य नहीं और मन सूक्ष्म अन्य का
विकार है, अतएव मन ही लेना चाहिये।
प्र०—मन की इन्द्रियों में गणना की जाती है, अतएव भिन्न
करने से बुद्धि का ही प्रयोजन प्रतीत होता है ?
उ०—यदि १० इन्द्रियों में ११ वां मन भी लिया जाय तो
तुम्हारी संख्या ही अशुद्ध हो जायगी, इस हेतु से महत्तत्त्व का
अर्थ मन ही है।

( २६ )
स्थूलात् पञ्चतन्मात्राय ॥ ६२ ॥
अर्थ—इन पांच प्रकाशवान् तत्त्वों से उन सूक्ष्म तन्मात्रों का
अनुमान होता है, जिस प्रकार कार्य्य को देखकर कारण का
अनुमान होता है ; जैसे लिखा है—
कारणगुणपूर्वकं कार्य्य गुणो दृष्टः ॥
अर्थ—कार्य्य के गुणों के अनुसार कारण और कारण के
अनुसार कार्य्य के गुणों का अनुमान होता है ।
इसी प्रकार यहां कार्य्य तत्त्वों को देख कर कारण तन्मात्रा
का ज्ञान हो जाता है ।
बाह्याभ्यन्तराभ्यां तैश्चाहङ्कारंस्य ॥ ६३ ॥
अर्थ—बाहर की और आभ्यन्तर्रीय इन्द्रियों से पञ्च तन्मात्रा
रूप कार्य का ज्ञान होकर उसके कारण अहङ्कार का भी ज्ञान
होता है, क्योंकि स्पर्शादि विषयों का ज्ञान समाधि और सुषुप्ति
अवस्था में जबकि अहङ्कार रूप वृत्ति का अभाव होता है नहीं
होता, इससे अनुमान होता है कि यह इस वृत्ति से उत्पन्न होते
हैं, अर्थात् अहङ्कार के कार्य्य हैं और अहङ्कार इनका कारण
है ; क्योंकि यह नियम है कि जो जिसके बिना पैदा न हो सके
वह उसका कारण होता है, और भूत विना अहङ्कार के सुषुप्ति
अवस्था में दृष्टिगत नहीं होते, अतएव यही उनका कारण
अनुमान से प्रतीत होता है ।
तेनान्तःकरणस्य ॥ ६४ ॥
अर्थ—और अहङ्काररुपी कार्य्य से उसके कारण अन्तःकरण
का अनुमान होता है, क्योंकि प्रथम मन में वस्तु की अस्तित्व का
निश्चय करके उसमें अहङ्ककार किया जाता है, अर्थात् उसे अपना

( २७ )
मानते हैं। जिस समय तक वस्तु की अस्तित्व का निश्चय न हो
तब तक उसमें अभिमान नहीं होता है, अर्थात् मैं हूँ, और यह
मेरा है, यह ज्ञान जबतक अपने-अपने और चीज़ की अस्तित्व
का ज्ञान न हो, किस तरह हो सकता है ?
ततः प्रकृतेः ॥ ६५ ॥
अर्थ—और उस मन से प्रकृति, जो मन का कारण है, उसका
अनुमान होता है, क्योंकि मन मध्यम परिणाम वाला होने से
कार्य्य है और प्रत्येक कार्य का कारण अवश्य होता है ; अब मन
का कारण प्रकृति के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता । क्योंकि
पुरुष तो परिणाम रहित है, और मन का शरीर की तरह मध्यम
परिणामवाला होना श्रुति, स्मृति और युक्ति से सिद्ध है ; क्योंकि
मन, सुख-दुःख और मोह धर्मवाला है, इस वास्ते उसका कारण
भी मोह धर्मवाला होना चाहिये । दुःख परतन्त्रता का नाम है,
और पुरुष की परतन्त्रता हो नहीं सकती । परतन्त्रता केवल जड़
प्रकृति का धर्म है और उसका कार्य्य मन है ।
संहतपरार्थत्वात् पुरुषस्य ॥ ६६ ॥
अर्थ—प्रकृति के अवयवों की संहति सर्वदा दूसरे के वास्ते
होती है, अपने लिये नहीं । इससे पुरुष का अनुमान होता है ;
क्योंकि मन आदिक जो प्रकृति के कार्य्य हैं, उन से पुरुष को लाभ
होता है । मन आदिक अपने लिये कुछ भी नहीं कर सकते,
और जितने शरीर से लेकर अन्न, वस्त्र, पात्रादि प्रकृति के विकार
हैं, उन से दूसरों का ही उपकार होना है, और पुरुष की क्रिया
का भोग पदार्थ नहीं है ; क्योंकि उपनिषद् में लिखा है "नवाअरे
सर्वस्य कामाय सर्वंप्रियंभवति नतुकामायसर्वंप्रियंभवति”—अर्थात्
सम्पूर्ण वस्तुओं के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी नहीं,

( २८ )
किन्तु आत्मा के उपयोगी होने से सब वस्तुएँ प्यारी प्रतीत
होती हैं ।
प्र०—क्या प्रकृति का कोई कारण नहीं है, ब्रह्म को कारण
सुना जाता है ?
उ०—ब्रह्म जगत् का निमित्त-कारण है । प्रकृति का उपादान
कारण नहीं ।
प्र०—प्रकृति को क्यों अकारण मानते हो ?
उ०—मूले मूला भावादमूलं मूलम् ॥ ६७ ॥
अर्थ—२२ तत्त्वों का मूल उपादान कारण प्रकृति है, और
मूल अर्थात् जड़ की जड़ नहीं होती, इसवास्ते मूल बिना मूल के
ही होता है ।
प्र०—प्रकृति को मूल क्यों मानते हो ?
उ०—यदि मूल का मूल मानोगे, तो उसके मूले की भी आ-
वश्यकता होगी । इस प्रकार अनवस्था आजायगी ।
प्र०—जैसे घट का कारण मृत्तिका है, और मृत्तिका का
कारण परमाणु है ?
उ०—पारम्पर्येऽप्येकत्र परिनिष्ठेति संज्ञा-
मात्रम् ॥ ६८ ॥
कारणों की परम्परा के विचार से परमाणु ही घट का कारण
है, मृत्तिका तो नाममात्र है ।
समानः प्रकृतेर्द्वयोः ॥ ६६ ॥
घट और मृत्तिका के साथ प्रकृति का समान सम्बन्ध है,
अर्थात् परम्परा से प्रकृति ही घट और मृत्तिका का कारण है,
और निरवयव होने से नित्य है, उसका कोई कारण नहीं ।

( २६ )
अधिकारित्रैविध्यान्ननियमः ॥ ७० ॥
यद्यपि प्रकृति सबका उपादान कारण है; परन्तु प्रत्येक
कार्य्य में जो तीन प्रकार के कारण माने जाते हैं अर्थात् ☸ १
उपादान, २ निमित्त, और ३ साधारण—इन की भी व्यवस्था न
रहेगी, क्योंकि जब कुम्हार मिट्टी दण्डादि का कारण प्रकृति ही
ठहरी, तो इन तीन कारणों की अनावश्यकता होने से बहुत
गोलमाल हो जायगा। इस में हेतु यह है, कि फिर कोई भी किसी
का निमित्त व असाधारण कारण न रहेगा, अतएव जहाँ-जहाँ
कारणत्व कहा जाय, वहाँ-वहाँ प्रकृति को छोड़कर कहना चाहिये,
क्योंकि प्रकृति तो सबका कारण है ही, उसके कहने की कोई
भी आवश्यकता नहीं है; जैसे—कुम्हार के पिता को घट का कारण
कहना अनावश्यक है, क्योंकि वह तो अन्यथा सिद्ध है। यदि
वही न होता तो कुलाल कहां से आता ? परन्तु घट के बनने में
कुलाल के पिता की कोई भी आवश्यकता नहीं है, ऐसा ही नवीन
नैयायिक भी मानते हैं, कि कारणत्व प्रकृति को छोड़कर कहना
चाहिये।
☸ १ उपादान कारण, जैसे घट का मृत्तिका। २ निमित्त
कारण, जैसे घट का कुलाल। ३ साधारण, जैसे घट के दण्ड आदि।
महदाख्यमाद्यं कार्य्यं तन्मनः ॥ ७१ ॥
अर्थ—प्रकृति का पहिला कार्य महत् है, और वह मन
कहलाता है। मन से अहङ्कारादि उत्पन्न होते हैं, मन की
उत्पत्ति ६१ सूत्र में कहचुके हैं।
चरमोऽहङ्कारः ॥ ७२ ॥
अर्थ—और प्रकृति का दूसरा कार्य अहङ्कार है। इन
तीनों सूत्रों का अभिप्राय यह है कि यदि प्रकृति को कारणत्व

सूत्रों से स्पष्ट करते हैं।

( ३० )
कहा जावे, तो केवल इन्हीं दो कार्यों का कहना अन्य कार्यों
का कारण महदादि को कहना चाहिये। इसी बात को अगले
सूत्रों से स्पष्ट करते हैं।
तत्कार्यत्वमुत्तरेषाम् ॥ ७३ ॥
अर्थ—महत् और अहङ्कार को छोड़ बाक़ी सब प्रकृति
के कार्य नहीं, किन्तु उनके कारण महदादि हैं।
प्र०—जब तुमने पहिले इसको प्रकृति का कार्य कहा,
अब उसे अलग करते हो, कि औरों को महदादिकों का कार्य
कहना चाहिये। अब यहाँ यह सन्देह होता है, कि पहिले प्रकृति
को सबका कारण कहचुके। अब महदादिकों को क्यों कारण
कहते हैं ? तो इसका उत्तर यह है कि—
उ०—आद्यहेतुता तद्द्वारा पारम्पर्येऽप्यणुवत् ७४
अर्थ—जिस प्रकार परम्परा सम्बन्ध से घटादि के कारण
अणु माने थे, उसी भाँति परम्परा सम्बन्ध से महदादिकों का
कारण भी प्रकृति ही है, अतएव कुछ दोष न रहेगा।
पूर्वभावित्वे द्वयोरेकतरस्य हानेऽन्यतरयोगः ७५
अर्थ—पहिले होने में एक यह भी युक्ति है, कि कार्य नाश
होकर कारण में मिल जाता है, और अन्त में सब कार्य पदार्थ
प्रकृति में लय हो जाते हैं।
यदि कोई शङ्का करे कि जब प्रकृति और पुरुष दोनों कार्य
जगत् से पहिले थे, तो अकेली प्रकृति को क्यों कारण माना
जावे ? इसका उत्तर यह है कि पुरुष परिणामी नहीं और उपादान
कारण का परिणाम ही कार्य कहलाता है, और पुरुष के
अपरिणामी होने में १५-१६ के सूत्र प्रमाण हैं। यदि प्रकृति