सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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युगपज्जायमानयोर्न कार्य्यकारणभावः ॥ ३८ ॥
अर्थ—जो पदार्थ एक साथ उत्पन्न होते हैं उनमें कार्य्य-कारण
भाव नहीं हो सकता ; क्योंकि ऐसा कोई दृष्टांत लोक में नहीं है,
जिसमें कार्य्य-कारण की उत्पत्ति एक साथ ही हो। यदि क्षणिक-
वादी यह कहें कि मृत्तिका और घटक्रम से हैं, पहिले मृत्तिका
कारण फिर घट कार्य्य उत्पन्न हो गया तो इसमें भी दोष है।
पूर्वापाये उत्तरायोगात् ॥ ३६ ॥
अर्थ—इस पक्ष में यह दोष होगा कि पूर्व क्षण में मृत्तिका
उत्पन्न हुई, दूसरे क्षण में नष्ट हुई, तब पीछे उससे कार्य्यरूप घट
क्योंकर उत्पन्न होसकता है ? इसलिये जबतक उपादान कारण न
माना जाय तबतक कार्य्य की उत्पत्ति नहीं होसकती। अतएव
कार्य्य-कारण भाव क्षणिकवादियों के मत से सिद्ध नहीं हो सकता।
उ०—तद्भावे तद्योगादुभयव्यभिचारादपि
न ॥ ४० ॥
अर्थ—कारण की विद्यमानता से और कार्य्य के साथ उसका
सम्बन्ध न मानने से दोनों दशाओं में व्यभिचार दोष होने
से कारण-कार्य्य का सम्बन्ध नहीं रहता। जब कार्य्य बनता था
तब तो कारण नहीं था और कारण हुआ तब कार्य्य बनाने का
विचार नहीं, अतएव क्षणिकवादियों के मत में कार्य्य-कारण का
सम्बन्ध किसी प्रकार हो नहीं सकता।
प्र०—जिस प्रकार घट का निमित्त कारण कुलाल पहिले से
ही माना जाता है, यदि इसी भाँति उपादान कारण भी माना जावे
तो क्या शङ्का है ?
उ०—पूर्वभावमात्रे न नियमः ॥ ४१ ॥