सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’
अर्थ—हे सौम्य ! इस जगत् से पहिले भी सत् था अर्थात्
जगत् का कारण था ।
‘तम एवेदमग्र आसीत्’
अर्थ—इस सृष्टि से पहिले यह जगत् तमोरूप अर्थात् नाम-
रूपज्ञान जो कार्य में है इनसे पृथक् सत्रूप था और न्याय से
इसलिये विरुद्ध है कि असत् से सत् किसी प्रकार हो नहीं सकता,
इस कारण यह बन्धनरूप दुःख न तो क्षणिक है, बिना कारण
ही है । और प्रमाण लीजिये—
दृष्टान्तासिद्धेश्च ॥ ३७ ॥
अर्थ—क्षणिक में जो दीपशिखा का दृष्टांत दिया वह अयुक्त
है, क्योंकि क्षण ऐसा सूक्ष्म काल है कि जिसकी इयत्ता
( अन्दाज़ा ) नहीं हो सकती और न उसकी कुछ इयत्ता ( तादाद् )
है और प्रत्यक्ष में दीपशिखा कई क्षण तक एक-सी बराबर
रहती है, यह कथन भी सर्वथा अयुक्त है और क्षणिकवादियों
के मत में एक दोष यह भी होगा कि कारण और कार्यभाव
नहीं हो सकेगा और जब कार्य्य कारण का नियम न रहा तो
किसी रोग की औषध जो निदान अर्थात् कारण के ज्ञान
को जानकर उसके विरुद्ध शक्ति से की जाती है नहीं हो सकेगी
और संसार में जो घट कारण मृत्तिका को माना जाता है
सर्वथा न कह सकेंगे ; क्योंकि जिस क्षण में मृत्तिका घट का
कारण है वह क्षण अब नष्ट हो गया और यह कहना सर्वथा
अयुक्त है कि मृत्तिका घट का कारण नहीं ; क्योंकि बिना कारण
जाने घट बनाने में कुलाल की प्रवृत्ति नहीं होती और यदि दोनों
की अर्थात् मृत्तिका और घट की उत्पत्ति एक ही क्षण में मानें
तो दोष होगा—