साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
एकादशोऽध्यायः ५७
एकादशोऽध्यायः ५७
भास्करो जनयामास पुत्रौ कन्यां च रूपिणीम् ।
पूर्वजस्य मनोस्तुल्यौ सादृश्येन च तावुभौ ॥१६॥
छाया को सूर्यदेव से दो पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई। उन पुत्रद्वय ने ज्येष्ठ भ्राता मनु का सादृश्यलाभ किया॥१६॥
श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ श्रुतकर्मा तथैव च ।
श्रुतकर्मा मनुस्ताभ्यां सावर्ण्यो भविष्यति ॥१७॥
श्रुतश्रवा स्वधर्मज्ञ एवं श्रुतकर्मा भी उसी प्रकार थे। श्रुतश्रवा तथा मनु से बहुत से सूर्यवंशीगणों का उद्भव हुआ। श्रुतश्रवा भविष्य में सावर्णि मनु होंगे॥१७॥
श्रुतकर्मा स विज्ञेयो ग्रहो यो वै शनैश्चरः ।
कन्या च तपती नाम्ना रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥१८॥
श्रुतकर्मा ग्रहरूप में अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। वे शनिग्रह नाम से प्रसिद्ध हैं और कन्या तपती रूप में अत्यन्त अपूर्व थी॥१८॥
संज्ञा तु पार्थिवी तेषामात्मजानां तथाकरोत् ।
स्नेहेन पूर्वजानां तु तथा कृतवती तु सा ॥१९॥
पृथिवी संज्ञा (अर्थात् छाया) अपने पुत्र से जितना स्नेह करती थी, वैसा पूर्वजात (पहले उत्पन्न हुये) संज्ञा के पुत्रों से नहीं करती थी॥१९॥
मनुस्तु क्षमते तस्या यमस्तस्या न च क्षमेत् ।
बहुशो शोच्यमानस्तु पितुः पत्न्या सुदुःखितः ॥२०॥
स वै कोपाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य गौरवात् ।
पादेन तर्जयामास छायां वैवस्वतो यमः ॥२१॥
वह मनु को जिस प्रकार प्रेम करती थी, उस प्रकार यम को प्रेम नहीं करती थी, इस कारण अत्यधिक शोक करते हुये अपने पिता की पत्नी से दुःखित उन वैवस्वत यम ने क्रोध से बाल्यवशात् तथा भावी दैवावेश के कारण पैर से छाया का तर्जन किया॥२०-२१॥
तं शशाप ततः क्रुद्धा संज्ञा सा पार्थिवी शुभा ।
यदा तर्जयसे यन्मां पितुर्भार्या गरीयसीम् ।
तस्मात्तवैष चरणः पतिष्यति न संशयः ॥२२॥
इससे क्रुद्ध होकर पार्थिवी संज्ञा (छाया) ने यम को अभिशाप दिया कि 'पिता की भार्या गरीयसी होती है; क्योंकि तुमने मेरा तर्जन किया है, अतएव तुम्हारा यह पैर (जिससे मुझ पर प्रहार किया है) गिर जायेगा'। यह निःसंदिग्ध है॥२२॥
५८ | श्रीसाम्बपुराणम्
यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः।
मनुना सह धर्मात्मा पृष्टः सर्वं न्यवेदयत्॥२३॥
स्नेहेन तुल्यं महता माता देव! न वर्त्तते॥२४॥
इससे धर्मात्मा यम ने उस शाप से अत्यन्त पीड़ित होकर मनु के साथ पिता के पास जाकर समस्त वृत्तान्त बताया। 'हे देव (पिता)! माँ के समान स्नेह की समता इसमें कहीं नहीं है॥२३-२४॥
सन्त्यज्य प्रायशोऽस्मान् सा कनीयांसो विधित्सति।
तस्यां मयोद्यतः पादो न च देहे निपातितः॥२५॥
प्रायः हमारा परित्याग करके वे छोटे भाइयों का अधिक यत्न करती हैं। मैंने उन्हें पैर दिखलाया था, किन्तु वह उनके शरीर से नहीं लगा॥२५॥
बालाद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् वक्तुमर्हसि।
शप्तोऽहमेव देवेश जनन्या तपसा वर।
तव प्रसादाच्चरणस्त्रायतां महतो भयात्॥२६॥
हे देवेश! बालक-स्वभाव से अथवा मोह से आप जो भी कहें, हे तपश्रेष्ठ! जननी द्वारा मैं अभिशप्त हो गया हूँ। उस महाभय से आपकी कृपा से मेरी रक्षा हो॥२६॥
रविरुवाच
असंशयं मरुत्पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम्।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं धर्मशालिनम्॥२७॥
रवि कहते हैं—हे पुत्र! इस व्यापार में निश्चय ही विशेष कारण है; क्योंकि धर्मज्ञ तथा धर्मशाली तुममें क्रोध ने प्रवेश किया है॥२७॥
सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातस्तु विद्यते।
न तु मात्राभिशप्तानां क्वचिन्मोक्षो भवेदिह॥२८॥
न शक्यमेतन्मिथ्या तु कर्तुं मातुर्वचस्तव।
क्वचित्तेऽहं विधास्यामि पुत्रस्नेहादनुग्रहम्॥२९॥
कृमयो मांसमादाय पतिष्यन्ति महीतले।
कृतमस्या वचः सत्यं त्वं च त्राता भविष्यसि॥३०॥
समस्त शाप का प्रतिकार है; किन्तु माता के अभिशाप को मिथ्या कर सकने में मैं भी समर्थ नहीं हूँ। किन्तु पुत्रस्नेह के कारण कुछ कृपा कर सकता हूँ। कृमिगण मांस लेकर भूमि पर पतित होंगे, इससे उनके वाक्य की सत्यता भी होगी और तुम भी त्राण पा जाओगे॥२८-३०॥