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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

अष्टादशोऽध्यायः ९५

अष्टादशोऽध्यायः ९५

लोकोत्तरमथैकैकं ध्रुवादूर्ध्वं विधीयते ।
देवदानवगन्धर्वयक्षराक्षसपन्नगाः ।
भूता विद्याधराश्चैव अष्टौ ते देवयोनयः ॥६८॥
अस्मिन्व्योम्नि त्वमी लोकाः सप्तैव सम्प्रतिष्ठिताः ।
मरुतः पितरो छन्दास्तस्मिन्नेवाग्नयो ग्रहाः ॥६९॥
ये चाप्येते समाख्याता मयाष्टौ देवयोनयः ।
मूर्तयोऽमूर्तयश्चैव सर्वे ते व्योम्यवस्थिताः ॥७०॥
एवंविधमिदं व्योम सर्वदेवमयं स्मृतम् ।
सर्वभूतमयं चैव सर्वश्रुतिमयं तथा ॥७१॥
तस्माद् योऽर्चयते व्योम तेन सर्वेऽर्चिताः पुराः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन शुभार्थी व्योम पूजयेत् ॥७२॥

इति श्री साम्बपुराणे देवतोपाख्यापनं नामाष्टादशोऽध्यायः

ध्रुवलोक के ऊर्ध्व में एक लोक है। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पन्नग, भूत तथा विद्याधर—यह आठ देवयोनि है। उस व्योम में यह सप्तलोक प्रतिष्ठित हैं। मरुद्गण, पितृगण, मेघसमूह, अग्नि तथा सभी ग्रह वहाँ अवस्थित हैं।

इस प्रकार यह व्योम सर्वदेवमय है। यह सर्वभूतमय तथा सर्वश्रुतिमय है। अतएव जो व्योम की अर्चना करते हैं, वे समस्त देवों की अर्चना करते हैं। अतः मंगलकामी व्यक्ति को सर्वप्रयास के साथ व्योम का पूजन करना चाहिये॥६८-७२॥

श्री साम्बपुराण का देवतोपाख्यान नामक अष्टादश अध्याय समाप्त

एकोनविंशोऽध्यायः

(व्योमोत्पत्तिः)

नारद उवाच

आकाशं खं वियद्व्योम चान्तरिक्षं नभोऽम्बरम्।
पुष्करं गगनं चेति मेरुस्तत्रैव कीर्त्यते ॥१॥
मेरुश्च पृथिवीमध्ये समन्तात्तस्य मेदिनी।
भूमेर्द्वीपविभागस्तु प्रवक्ष्यामि समन्ततः ॥२॥

आकाश, खं, वियत्, व्योम, अन्तरिक्ष, नभ, पुष्कर तथा गगन—यह सब आकाश के पर्याय हैं। वहीं मेरु भी कीर्तित है। यह पृथिवी के मध्य में है। उसके चारो ओर मेदिनी (पृथिवी) है। चारो ओर भूमि का द्वीपविभाग है॥१-२॥

जम्बूशककुशद्वीपक्रौञ्चगोमेदकानि च।
शाल्मलीपुष्कराख्ये च सप्तद्वीपानि भागशः ॥३॥
लवणक्षीरदध्यम्बुघृतोदेक्षुरसोदकाः ।
स्वादूदकश्च सप्तैते समुद्राः परिकीर्तिता ॥४॥

जम्बू, शक, कुश, क्रौञ्च, गोमेध, शाल्मलि तथा पुष्कर नामक सात द्वीप कहे गये हैं। लवण, क्षीर, दध्यम्बु, घृतोद, इक्षु, रसोदक तथा स्वादूदक नामक सात समुद्र कहे गये हैं॥३-४॥

हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नील एव च।
श्वेतश्च शृङ्गवांश्चैव षडेते वर्षपर्वताः ॥५॥

हिमवान्, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत तथा शृङ्गवान्—ये छः वर्ष पर्वत कहे गये हैं॥५॥

मानसः सप्तमस्तेषां पुर्योऽष्टौ यत्र संस्थिताः ।
माहेन्द्री चाप्यथाग्नेयी याम्या च नैर्ऋती तथा ॥६॥
वारुणी वायवी चैव सौम्येशानी तथैव च।
मानसान्निर्जला भूमिलोंकालोकस्ततो गिरिः ॥७॥

तदनन्तर सप्तम है—मानस पर्वत। वहाँ आठ नगरी विद्यमान है। माहेन्द्री, आग्नेयी, याम्या, नैर्ऋती, वारुणी, वायवी, सौम्या तथा ईशानी—ये आठ नगरी हैं। मानस पर्वत से आगे निर्जला भूमि है और उसके आगे है—लोकालोक पर्वत॥६-७॥