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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् ।

त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(पूजाविधिनिरूपणम्)

नारद उवाच

प्रथमं चिन्तयेत् पद्ममष्टपत्रं सकर्णिकम् ।
तन्मध्ये चिन्तयेद्देवं भास्करं रश्मिविग्रहम् ॥१॥
सहस्रदिनसंस्कारं सूर्यकोटिसमप्रभम् ।
महातेजोमयं ध्यात्वा आदित्यं पूजयेद् बुधः ॥२॥
योऽयं हरितवर्णाभं रथे तिष्ठति वाजिनम्।
अरुणः सारथिर्यस्य रथवाहः स्वयं स्थितः ॥३॥
तमहं लोकशांत्यर्थमादित्यमाह्वयाम्यहम् ।
आयाहि भगवन्भानो तव यज्ञः प्रवर्तते ॥४॥

प्रथमतः कर्णिकायुक्त अष्टपत्र-विशिष्ट पद्म का चिन्तन करे। उसमें रश्मिस्वरूप सूर्यदेव का चिन्तन करना चाहिये। सहस्र दिनसंस्कारक (असंख्य दिनों को प्रकाशित करने वाले) कोटि सूर्य प्रभातुल्य महातेजोमय आदित्य का ध्यान करके पण्डितगण उनका पूजन करते हैं। जो हरित वर्ण वाले अश्वों के रथ पर स्थित हैं, रथ के सारथी अरुण जिस रथ पर हैं, लोक की शान्ति के लिये मैं उन आदित्य का आवाहन करता हूँ। हे भगवन् भानु! आप आईये। आपका यज्ञ प्रारम्भ होता है॥१-४॥

इदमर्घ्यं च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः।
आह्वानं सहस्रकिरणं स्वागतं स्वागतं स्वागतं ठः ठः।
ॐ धर धर अद्य ॥५॥

यह अर्घ्य तथा पाद्य ग्रहण करिये। आपको नमस्कार है, नमस्कार है। सहस्रकिरणों से युक्त आपका मैं आह्वान करता हूँ। आपका स्वागत है (मूल में लिखित मन्त्र से पाद्य अर्घ्य प्रदान करे, यथा—इदमर्घ्यञ्च पाद्यं च प्रतिगृह्य नमो नमः (यह अर्घ्य तथा पाद्य मन्त्र है)। आवाहन मन्त्र है—आह्वानं·······धर धर अद्य ।।५।।

वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्य उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वभूतानां प्रतिगृह्य नमो नमः ॥६॥

स्वाहा धूपः गन्य गन्यादि ठः ठः गन्यः। ॐ दीपपञ्जालिनि ठं ठं दीपः।

३०० || श्रीसाम्बपुराणम्

तृतीय प्राकार में—वज्र, शक्ति, दण्ड, खड्ग, शङ्ख, चक्र, गदा तथा परशु बनाये। ऐसे ही ऊपर पुर में पूर्व की ओर महामुद्रा लिखे। पूर्व से आवाहन प्रारम्भ करके लोकपालगण का आवाहन करे। चतुर्थ प्राकार (आवरण) में व्योमपुष्प, बलि तथा पूजोपहार ग्रहण करे। आदि में ॐकार, अन्त में स्वाहा का योग करना चाहिये। तदनन्तर अग्नि-स्थापना करे। आचार्य मस्तक पर पगड़ी पहने। भूमि रेखाङ्कित करके कुश-स्थापन करके दाहिनी ओर ब्राह्मण को बैठाये। तदनन्तर स्रुवपात्र का शोधन करके आज्य की प्रदक्षिणा करे (घृत की प्रदक्षिणा)। दाहिना जानु पृथ्वी पर रखे, स्रुव लेकर पात्र-परित्यागी न हो (अर्थात् पात्र लिये रहे)। दस आहुति प्रदान करे। तत्पश्चात् सन्निधिकरण करे। सम्भव होने पर इस प्रकार से अग्नि का चिन्तन करना चाहिये—छाग (मेष) के ऊपर आरूढ, प्रादेश मात्र, सप्त किरणयुक्त, कुण्डाक्ष धारणकारी, पिङ्गल श्मश्रु तथा नेत्रयुक्त अग्नि का ध्यान करके अपने मन्त्र से उनका आवाहन करे। तत्पश्चात् शिष्य-हेतु गर्भाधानादि पाँच-पाँच आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर दण्ड एवं मेखला की स्थापना करे। तदनन्तर पूर्व की ओर हृदय के द्वारा अभिमन्त्रित सूर्यभक्तों को प्रवेश कराये।

वस्त्रबद्धमुखान् कृत्वा त्रिधा भ्राम्यन्विचक्षणः।
जानुभ्यामवनीं गत्व शिरसा ते क्षमापयेत्॥१२१॥
तत्र तत्पतेः पुण्यं तस्य तल्लयमादिशेत्।
नाम तस्य स्वरूपेण कारयेद्रविपूर्वकम्॥१२२॥
षष्ठ्या चैव महाश्वेतां हृदि ध्यात्वा दिवाकरम्।
साधनं तु निरीक्षेत ततो दीक्षित उच्यते॥१२३॥

विचक्षण व्यक्ति मुख को कपड़े से बाँधकर तीन बार घुमाकर भूमि पर जानु रखकर मस्तक द्वारा क्षमापन कराये (प्रणाम की मुद्रा में क्षमापन कराये)। तदनन्तर वहाँ उसके अधिपति के पुण्यलय का चिन्तन करे। स्वरूप में रविपूर्वक उसका नामकरण करना पड़ता है। षष्ठी में महाश्वेता तथा हृदय में दिवाकर का ध्यान करे, साधन दर्शन करे। तदनन्तर उसे दीक्षित कहा जाता है॥१२१-१२३॥

ततः साधकोऽग्निस्थापनं कृत्वैकैकामाहुतिं जुहुयात्। ततोऽष्टपुष्पिकां दापयेत्॥१२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साधनरहस्यं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः


तदनन्तर साधक अग्नि-स्थापन करके एक-एक आहुति देकर होम करे। तत्पश्चात् अष्टपुष्पिका प्रदान करे॥१२४॥

श्री साम्बपुराणोक्त साधनरहस्य नामक बावनवाँ अध्याय समाप्त