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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

एकादशोऽध्यायः ६३

एकादशोऽध्यायः ६३

जो तपती नामक सूर्य की कनीयसी कन्या थी, वे राजा संवरण की मंगलमयी पत्नी हुईं॥६४॥

तपती नाम नद्येवं विन्ध्यपादाद् विनिस्सृता।
नित्यं पुण्यजला स्नानैर्मार्तण्डतनया शुभा॥६५॥

तपती नामक जो नदी विन्ध्य पर्वत के पाददेश से निकलती है, वे मार्तण्डतनया नित्य पुण्यसलिला तथा स्नान द्वारा मङ्गलदात्री हैं॥६५॥

अश्विनौ देववैद्यत्वं लब्धवन्तौ यशस्विनौ।
तयोः कर्मोपजीवन्ति लोकेऽस्मिन् भिषजः शुभाः॥६६॥

अश्विनी कुमारद्वय देववैद्यत्व लाभ करके यशस्वी हो गये। उनका कर्म इस जगत् के कुशल चिकित्सकगण ग्रहण करके जीवन-यापन करते हैं॥६६॥

रेवन्तो नाम योऽर्कस्य रूपेणाप्रतिमः सुतः।
सत्ववान् पावनः सोऽथ शीघ्रमेव प्रसीदति॥६७॥

रेवन्त नामक रूप में अतुलनीय जो सूर्यपुत्र हैं, वे सात्विक तथा पवित्रकारक हैं। वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं॥६७॥

क्षेमेण ब्रजते ध्यानं यस्तु पूजयते पथि।
सुखप्रसादो मर्त्यानामाख्यास्यति यथासुखम्॥६८॥

जो मंगलपूर्ण ध्यान करते हैं तथा कहीं जाते समय इनका ध्यान करते हैं, वे मर्त्यगण के (पृथ्वी के) यथेच्छ सुख प्रसन्नता पाते हैं॥६८॥

य इदं जन्म देवानां शृणुयाद्वा पठेत्तथा।
विवर्द्धयतोऽथ पुत्राणां सर्वेषामपि तैजसम्॥६९॥
आपदं प्राप्य मुच्येते प्राप्नुयाच्च महत्फलम्॥७०॥
इति श्रीसाम्बपुराणे सूर्यपुत्राणां विवरणं नामैकादशोऽध्यायः

जो इन देवता के जन्म-वृत्तान्त को सुनते हैं अथवा पाठ करते हैं, वे सभी पुत्रगण की तैजस कृपा (वृद्धि) को प्राप्त करते हैं एवं विपत्ति से मुक्त होकर महान् फल पाते हैं॥६९-७०॥

श्री साम्बपुराण में सूर्यपुत्र-विवरण नामक एकादश अध्याय समाप्त

द्वादशोऽध्यायः

(सूर्यस्य शरीरलिखनम्)

साम्ब उवाच

शरीरलिखनं भानोरुक्तं संक्षेपतस्त्वया ।
विस्तराच्छ्रोतुमिच्छामि तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ॥१॥

साम्ब कहते हैं—सूर्य के शरीर के मसृणता-सम्पादन के विषय में आपने संक्षेप में कहा है। मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ। हे सुव्रत! मुझसे कहिये॥१॥

नारद उवाच

पितृगृहे गतायां तु संज्ञायां यदुनन्दन ।
भास्करश्चिन्तयामास संज्ञां मद्रूपकाङ्क्षिणीम् ॥२॥
याता पितृगृहं यच्च तपस्तेपे यशस्विनी ।
तस्मान्मनीषितं तस्याः पूरयामि मनोरथम् ॥३॥

नारद कहते हैं—हे यदुनन्दन साम्ब! संज्ञा के पितृगृह चले जाने पर भास्कर चिन्ता करने लगे ‘संज्ञा मुझे रूपवान् देखना चाहती है। पिता के घर पर वह यशस्विनी तप कर रही है। अतएव मैं उसका मनोरथ पूर्ण करूँगा’॥२-३॥

एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा तत्रागत्य दिवाकरम् ।
ऊचे मधुरया वाचा रवेः प्रीतिकरं वचः ॥४॥

इस अवसर पर ब्रह्मा वहाँ आकर मधुर भाषा में प्रीतिकर वाक्यों द्वारा सूर्य से इस प्रकार कहने लगे॥४॥

आदिदेवोऽसि देवानां ज्ञातमेतत् स्वयं मया ।
श्वशुरो विश्वकर्मा ते रूपं निर्वर्त्तयिष्यति ॥५॥

तुम देवगण के आदिदेव हो, यह मैं स्वयं जानता हूँ। तुम्हारे श्वसुर विश्वकर्मा तुम्हारे रूप का परिवर्त्तन कर देंगे अर्थात् काट-छाँटकर मसृण तथा सुश्रीक कर देंगे॥५॥

एवमुक्त्वा रविं ब्रह्मा विश्वकर्माणमब्रवीत् ।
निवर्त्तयस्व रूपं तं मार्त्तण्डस्य तु शोभनम् ॥६॥

तदनन्तर ब्रह्मा ने रवि से ऐसा कहने के उपरान्त विश्वकर्मा से कहा—तुम मार्त्तण्ड को शोभन रूप से युक्त कर दो॥६॥

द्वादशोऽध्यायः
६५

ततो ब्रह्मसमादेशाद् भ्रमिमारोप्य भास्करम्।
रूपं निवर्त्तयामास विश्वकर्मा शनैः शनैः॥७॥

तदनन्तर भगवान् ब्रह्मा के आदेशानुसार विश्वकर्मा ने घूर्णचक्र पर भास्कर को स्थापित करके धीरे-धीरे उनके रूप को मसृणता प्रदान किया॥७॥

ततस्तुष्टाव तं ब्रह्मा सर्वैर्देवगणैः सह।
गुह्यैर्नानाविधैः स्तोत्रैर्वेदवेदाङ्गसम्मितैः ॥८॥

तदनन्तर ब्रह्मा सभी देवगण के साथ उनकी वेद-वेदांगसम्मत नानाविध गुह्य स्तोत्रों से स्तुति करने लगे॥८॥

स्वस्ति तेऽस्तु जगन्नाथ वर्षघर्महिमप्रभ।
शान्तिं जुषस्व लोकानां देवदेव दिवाकर! ॥९॥
ततो रुद्रश्च विष्णुश्च भक्त्या तुष्टुवतुस्तदा।
तेजस्ते वर्धतां देव खिल्यमानं दिवस्पते ॥१०॥
इन्द्रस्त्वागत्य तं देवं लिख्यमानमथास्तुवत्।
जय देव जयस्वेति शश्वज्जय जगत्पते ॥११॥
ऋषयश्च ततः सप्त विश्वामित्रपुरोगमाः।
तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः स्वस्तिस्वस्तीति वादिनः ॥१२॥

हे जगन्नाथ! आपका मंगल हो। वर्षा, ताप तथा दिन प्रदान करने वाले हे देवदेव दिवाकर! लोकों का शान्ति-विधान करिये। तदनन्तर रुद्र तथा विष्णु ने उनकी स्तुति किया—हे देव! हे दिवस्पति! आपका मसृण तेजवर्द्धित हो। तदनन्तर इन्द्र ने मसृणता-प्राप्त सूर्य की स्तुति की—जय हो! हे देव! आप जयलाभ करें। हे जगत्पते! आपकी सदा जय हो। तदनन्तर विश्वामित्र आदि सप्तर्षियों ने स्तुति की—'आपका मंगल हो'। यह कहकर वे सभी विविध स्तोत्रों को पढ़ने लगे॥९-१२॥

वेदोक्ताभिस्तथाशीर्भिर्बालखिल्याश्च तुष्टुवुः।
त्वं नाथ मोक्षिणां मोक्षो ध्येयस्त्वं ध्यायिनां सदा ॥१३॥
स्वर्गतिः सर्वसत्त्वानां त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्।
शं प्रजाभ्योऽस्तु देवेश प्रसन्नोऽस्तु जगत्पते ॥१४॥

बालखिल्यादि वेदोक्त आशीर्वाद द्वारा उनकी स्तुति करने लगे। हे नाथ! आप मोक्षार्थी गण के मोक्ष तथा ध्यानकोविदों के सर्वदा ध्येय हैं। सकल प्राणिगण के आप स्वर्ग-प्रापक हैं। आप ही में सबकुछ प्रतिष्ठित है। हे देवेश! प्रजागण का मंगल हो। जगत्पति आप प्रसन्न होईये॥१३-१४॥

६६ श्रीसाम्बपुराणम्

यथा विद्याधरा नागा यक्षराक्षसपन्नगाः।
कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिः प्रणता रविम् ॥१५॥
ऊचिरे विविधा वाचो मनःश्रोत्रसुखावहाः।
सह्यं भवतु तेजस्ते भूतानां भूतभावन! ॥१६॥

विद्याधर, नाग, यक्ष, राक्षस, पन्नग सभी अञ्जलिबद्ध होकर रवि का मन तथा कानों को सुखावह लगने वाले विचित्र स्तोत्र पढ़ने लगे। हे भूतभावन! आपका तेज सभी प्राणीगण सहन कर सकें॥१५-१६॥

ततो हाहा हूहूश्चैव तुम्बुरुर्नारदस्तथा।
उपगायितुमारब्धा गन्धर्वकुशला रविम् ॥१७॥
षड्ज-मध्यम-गान्धार-ग्रामत्रय-विशारदाः ।
मूर्च्छनाभिश्च तालैश्च सम्यारितशकैशिकैः ॥१८॥

तदनन्तर हाहा, हूहू, तुम्बुरु तथा नारद स्तुति करने लगे। गन्धर्वकुशल गण रवि-सम्बन्धित गायन गाने लगे। षड्ज, मध्यम, गान्धार, ग्रामत्रय में जो विशारद थे, वे मूर्च्छना तथा ताल के संयोग से गायन करने लगे॥१७-१८॥

विश्वाची च घृताची च ह्युर्वशी च तिलोत्तमा।
मेनका च सुजन्या च रम्भा चाप्सरसां वरा ॥१९॥
उपनर्त्तितुमारब्धा लिख्यमानं विभावसुम्।
हावभावविलासैश्च कुर्वन्त्योऽभिनयान् बहून् ॥२०॥

विश्वाची, घृताची, उर्वशी, तिलोत्तमा, मेनका, सुजन्या तथा अप्सरागण में श्रेष्ठ रम्भा नृत्य आरम्भ करके मसृणता-प्राप्त विभावसु के उद्देश्य से हाव-भाव-विलास के द्वारा अनेक अभिनय करने लगीं॥१९-२०॥

ततः तीब्रलयं गेयं मधुरं चाभ्यवर्त्तत।
सर्वेषामेव देवानां मनःश्रोत्रसुखप्रदम् ॥२१॥

तत्पश्चात् अति मधुर अव्यक्त कलकल ध्वनि उत्थित होने लगी, जो सभी देवताओं के मन तथा कर्ण के लिये सुखप्रद थी॥२१॥

प्रवाद्यन्तः ततस्तन्त्री-वीणा-देवादिदर्दुरा।
पणवाः पुष्कराश्चैव मृदङ्गाः पटहास्तथा ॥२२॥
देवदुन्दुभयः शङ्खः शतशोऽथ सहस्रशः।
गायद्भिश्चैव गन्धर्वैर्नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः ॥२३॥
तूर्यवादित्रघोषैश्च सर्वं कोलाहलीकृतम् ॥२४॥