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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

षष्ठि रथ्योत्तरा ज्ञेया व्योमव्याप्य तथा स्थिताः।

३१८श्रीसाम्बपुराणम्

षष्ठि रथ्योत्तरा ज्ञेया व्योमव्याप्य तथा स्थिताः।
अर्चिषो देवदेवस्य व्योमव्यापीति चाक्षरः ॥१९३॥
दश कोट्योऽथ लोकेभ्यो मन्त्राणाञ्जज्ञिरे प्रभो।
तुल्यायते तु विज्ञेया शिवेन परमात्मना ॥१९४॥
भुवने शान्तयः कार्य्या शिवयोनिप्रसूतिजः।
पातालदिशि विन्यस्य वारयंति स्वशक्तितः ॥१९५॥
शरीरं देवदेवस्य गृह्यमेतच्छिवात्मकम्।
ज्ञेयं ध्येयं तथा पूज्यं योज्यं स्यात्पञ्चविंशकम् ॥१९६॥

रथोत्तरा ६० जानना चाहिये, जो आकाश को व्याप्त करके स्थित है। देवदेव सूर्य की किरणें आकाशव्यापी एवं क्षयहीन हैं। लोकमंगलार्थ दस करोड़ मन्त्र उत्पन्न हुये। हे प्रभु! इन्हें परमात्मा शिव के समान जानना चाहिये। भुवनों में शिवयोनि से उत्पन्न शान्ति कार्य पाताल दिक् में विन्यस्त होकर अपनी शक्ति से उसका वरण करता है। देवदेव के इस शिवात्मक शरीर को अत्यन्त गोपनीय जानना चाहिये। वैसे ही वह ध्येय, पूज्य तथा योजनीय है। वह २५ है।।१९३-१९६।।

योज्यमेकरसद्धर्मं प्रोक्तं योगे मनीषिभिः।
एतज्ज्ञात्वा सुखात्सिद्धिं सन्दिग्धा त्वन्यथा भवेत्।
बीजार्थं वपुषो ह्येतत्प्रोक्तं तव पितामह ॥१९७॥
इति श्रीसाम्बपुराणे मण्डलकथनं नाम पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः तृतीयं पटलम्

मनीषीगण योग में एकरसात्मक कर्म का योग करने के लिये कहते हैं। यह जानकर सुख से सिद्धि मिलती है। इसमें संदिग्ध होने पर सिद्धि नहीं मिलती। हे पितामह! शरीर के बीज के लिये आपसे यह सब कहा।।१९७।।

श्रीसाम्ब पुराणोक्त पचपनवें अध्याय में मण्डलकथन नामक तृतीय पटल समाप्त

षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(ज्ञानोत्तरम्)

तत्र तत्त्वानि बीजतत्त्वं वर्णतत्त्वं योनितत्त्वं चेति ॥१॥
निष्कलं सकलं सिद्धाश्चत्वारः पदार्थाः सिद्धाः पञ्चविंशकभावाः॥२॥
अथास्य हृदयं वक्ष्ये गुह्याद्गुह्यतरं विभोः।
ऊर्ध्वं च सप्तस्रोतांसि नालं द्वादशकं तथा ॥३॥
पञ्जिका कर्णिका तस्य मकरः पञ्चधा स्मृतः।
केसरं षोडशन्तस्य पद्मद्वादशभिर्दलैः ॥४॥
सप्तशृङ्गं तथा पारं मेरुमन्दरभूषितम्।
योनयो द्वादशाख्याताः प्रतियन्त्रं प्रतिष्ठिताः ॥५॥
एकाक्षरपरो देवो वर्णेभ्यो बीजवान्प्रभुः।
तत्त्वनिर्मन्थनाज्ज्ञेया कला साध्यर्द्धमात्रिका ॥६॥
बीजबिजादमुं प्राहुः षोडशार्द्धं च यः क्रमात्।
आत्मा सार्धकला तस्य हृदि स्थितस्य सप्तधा ॥७॥

तत्त्व तीन हैं—बीजतत्त्व, वर्णतत्त्व तथा योनितत्त्व। (ये त्रितत्त्व तथा) निष्कल, सकल तथा सिद्ध—ये चार पदार्थ हैं (यहाँ बीजतत्त्व, वर्णतत्त्व तथा योनितत्त्व को एक में ही गिना गया है)। उनमें २५ सिद्ध भाव पदार्थ हैं। अब इनका हृदय कहूँगा, जो विभु का गुप्त से गुप्त तत्त्व है। ऊर्ध्व में सात स्रोत तथा १२ नाल हैं। उसकी पंजिका है—कर्णिका और मकर पाँच प्रकार का कहा गया है। उसके १६ केशर तथा १२ दल विशिष्ट हैं। उसके सात शृङ्ग एवं मेरु तथा मन्दर भूषित हैं। १२ योनि प्रसिद्ध है। वह प्रतियन्त्र में प्रतिष्ठित है। एकाक्षर परदेवता है। वर्णों के निमित्त बीजयुक्त प्रभु विराजित हैं। तत्त्व-निर्मन्थन करके ऊर्ध्वमात्रिका कला उत्पन्न हो सकी है। उसके प्रति बीज से क्रम को षोडशार्ध कहते हैं। उसके हृदयस्थ सात प्रकार की आत्मा है—अर्धकला॥१-७॥

सप्तशृङ्गकृतैश्चैव सप्त तस्य कलात्मकम्।
तत्त्वविद् बीजमेतत्स्यान्रान्यद्वीजमतः परम् ॥८॥
आदौ पञ्चदशं यत्तु संज्ञात्मा तदयन्त्र तत्।
सबिन्दुकाः प्लुता ज्ञेया विसर्गाश्च यथाक्रमम् ॥९॥
ओंकारान्ता अकाराद्या प्रथमे केसरे स्थिताः।
ककारादिहकारान्ता द्वितीये केसरे स्थिताः ॥१०॥

३२० श्रीसाम्बपुराणम्

सप्तशृङ्ग-कृत वह सात कलात्मक है। यह तत्त्व ज्ञान का बीज है। इसके अनन्तर (परे) कोई बीज नहीं है। प्रथम जो १५ है, वह संज्ञारूप है। बिन्दु के साथ प्लुत (दीर्घ) स्वर जानना चाहिये तथा यथाक्रम से विसर्ग जानना चाहिये। प्रथम केसर में अ से ॐ पर्यन्त अवस्थित है। द्वितीय में 'क' से 'ह' पर्यन्त स्थित है।।८-१०।।

अकारादिक्षकारान्ताः पञ्चाशद्यंत्रसंख्यया।
एतद्धृदयपद्मं स्याद्बीजयोनिकृतं प्रभो ॥११॥
ध्यात्वैतन्मुच्यते सर्वो बीजनिर्दग्धकल्मषः।
विधिना दीक्षितश्चास्मिन्मण्डले बीजयोनिजे ॥१२॥
निष्कलं सकलं चैव तथा सकलनिष्कल।
ध्यानं ज्ञेयं च योगश्च सर्वमेतस्य कीर्तितम् ॥१३॥

इति श्रीसाम्बपुराणे ज्ञानोत्तरे षट्पञ्चाशत्तमेऽध्याये तृतीयं पटलम्

•

'अ' से 'क्ष' पर्यन्त ५० यन्त्र संख्या है। हे प्रभु! बीजयोनिकृत यही है—हृदयपद्म। बीजयोनि से उत्पन्न इस मण्डल में यथाविधि दीक्षित सब व्यक्ति बीज के द्वारा पापयुक्त होते हैं तथा ध्यान के फल से मुक्त हो जाते हैं। निष्कल-सकल एवं सकल-निष्कल ध्यान तथा योग को जानना चाहिये।।११-१३।।

श्री साम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर छप्पनवें अध्याय में तृतीय पटल समाप्त

•

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

(बीजोत्तरम्)

तत्त्वज्ञानमहं वक्ष्ये बीजान्येतान्यतः परम्।
अनादिनिधनं ज्ञानं गुह्याद्गुह्यतरं च यत्॥१॥
आसीदिदं समग्रं च ततानेतैदजायत।
तस्माद्धर्म वशी कामो जज्ञे व्याहार संप्रति ॥२॥
विवक्षितं त्वहं श्रेष्ठं विवृतं न च संवृतम्।
प्रादुरासीदवर्णेऽस्मात्तस्य संहारमिच्छतः॥३॥
स तमागाच्च जिह्वायां मध्ये प्रकृतिसम्भवः।
इवर्णोवर्णसंहारादुवर्णोऽभून्मनस्ततः ॥४॥

अब तत्त्वज्ञान का वर्णन करता हूँ। तदनन्तर इन बीजों का वर्णन करूँगा। अनादि-निधन ज्ञान गुह्य से भी गुह्यतर है। यह समग्र था, उससे विस्तृत होकर उत्पन्न हुआ (अर्थात् पहले एक में ही निहित था, तदनन्तर उससे विविक्त होकर अनेक रूप में विस्तृत हुआ), उससे धर्म वशीकामना का व्यवहार उत्पन्न होने लगा। बलवान इच्छा का मैंने प्रकाश किया; किन्तु संवृत का नहीं किया। संहार की इच्छा से यह 'अवर्ग' आविर्भूत हुआ। प्रकृति से उत्पन्न होकर उसने जिह्वा में प्रवेश किया। वर्णसंहार से 'इ' वर्ण तथा 'उ' वर्ण उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् मन की उत्पत्ति कही गयी है॥१-४॥

तदन्ते बिन्दुसम्भूतिः सर्वान्तः प्रभु शाश्वतः।
वायोर्निर्धारणात्कण्ठे हकारः सविसर्गकः॥५॥

उसके अन्त में बिन्दु की उत्पत्ति है, जो सबके अन्तर के प्रभु तथा नित्य हैं। वायु-धारणार्थ कण्ठ से विसर्ग के साथ 'ह'कार की उत्पत्ति हुई है॥५॥

अहये चोत्तरे ज्ञेयो वर्णानां सम्भवः स्वयम्।
अवर्णो परयोगे स्यादेकारस्त्वनुलोमतः॥६॥
विलोमतो यकारः स्यात्तधोकारवकारयोः।
तृतीयो योगतो ज्ञेयो व्योकारस्य तु सिद्धये ॥७॥

'अ ह' को उत्तर में जानो (?)। वर्णों की उत्पत्ति अपने-आप होती है। 'अ' वर्ण परयोग से उत्पन्न है, किन्तु 'ए'कार अनुलोम क्रम में एवं विलोम 'ष'कार, 'उ'कार तथा 'व'कार उत्पन्न है। तृतीय योग से व्योकार (वि-उकार) की उत्पत्ति जाननी चाहिये॥६-७॥

३२२ श्रीसाम्बपुराणम्

ह्रस्वदीर्घप्लुता होते न चोङ्कारसमानजाः ।
ऋकारक्कवरिवलकाराः स्वरा जिह्वाग्रकारिताः ॥८॥

ये ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुतवर्ण हैं। ये ॐकार के समान उत्पन्न नहीं होते। ऋ, ॠ तथा लृ जिह्वा के अग्रभाग से उत्पन्न हैं॥८॥

इष्टावीषत्प्रविष्टो च संहतो च हनुं यदा।
जिह्वा मध्यस्थनानाभ्यां हन्वोरन्तरदर्शनात् ॥९॥

ईषत् प्रविष्ट २ इष्ट जब हनु से बाधा प्राप्त होते हैं, तब जिह्वा के मध्यस्थ तथा नाना (?) से लेकर हनु के मध्य में दर्शन मिलता है॥९॥

ताल्वोरेकारसम्भूतिरकाराद्दग्धसिद्धये ।
आकारैकारयोरादिरीकाराद्धं च पूर्वशः।
तथोङ्कारपरा शेषा एतद्विस्तारलक्षणम्।
स्पर्शांश्चाथ प्रवक्ष्यन्ते विद्यातत्त्वस्य सिद्धये ॥१०॥

तालु से ‘ए’कार की उत्पत्ति होती है। यह होती है ‘अ’कार की दग्ध-सिद्धि के लिये (?)। ‘आ’ तथा ‘ऐ’ के आदि तथा पूर्व से ‘ई’कार अर्ध है (?)। इसी प्रकार अवशिष्ट ॐकार के पर है (पश्चात् है), यह है विस्तार का लक्षण। अब विद्या तत्त्व की सिद्धि के लिये स्पर्श वर्ण की बात कहूँगा॥१०॥

जिह्वामूले च हन्वोः स्यात्स्पर्शनं कादिके गणे।
मध्ये तालुं स्पृशेद्यञ्च वेष्टयित्वा तृतीयकाः ॥११॥

जिह्वा के मूल में तथा हनुद्वय के मध्य में ककारादि वर्णों का स्पर्श होता है। तृतीय वर्ण ‘ट’ वर्ग में तालु का वेष्टन करके स्पर्श करता है॥११॥

मूर्धन्ये देवतानां च चतुर्थे शिवमूलतः।
ओष्ठाभ्यां पञ्चमस्याथ तत्त्वस्पर्शः सबीजकः ॥१२॥

मूर्धन्य का देवताओं तथा शिवमूल से चतुर्थ वर्ग (तवर्ग) का स्पर्श होता है। ओष्ठद्वय से पञ्चम वर्ग (पवर्ग) का स्पर्श होता है। यह है—बीजों के साथ तत्त्व का स्पर्श॥१२॥

करवन्द्यापात्तस्याहेकैकावद्ववेत्ततः ।
दन्तमूल्यो लकारः स्याच्चतुर्थश्चोष्ठदन्तगः ॥१३॥
ऊष्माणश्च गतास्ता वै प्रथमा मध्यमास्तथा ।
नपुंसका भवन्त्येते नासिकाश्च भवन्ति हि ॥१४॥

सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ३२३

दाँतों के मूल से लकार तथा चतुर्थ वर्ग (तवर्ग) ओष्ठ तथा दाँतों से उत्पन्न हैं। प्रथम तथा मध्यम (?) ऊष्मवर्ण हैं। ये नपुंसक तथा नासिका से उत्पन्न होते हैं।।१३-१४।।

एते अनादिनिधनस्य सिसृक्षोश्चाव्ययं महत्।
विद्यातन्त्रविवृद्ध्यर्थमेभ्यो योनिं चकार सः॥१५॥

ये सब अनादि निधन सृष्टिकर्त्ता के महत् अव्यय हैं। विद्यातन्त्र की वृद्धि के लिये वे इनसे सृष्टि करते हैं।।१५।।

अ आ इ ई उ ऊ ऋ ॠ ऌ ॡ ए ऐ ओ औ अं अः—षोडशस्वराः। क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म—एते स्पर्शाः। य र ल वा अन्तःस्थाः। श ष स हा एते ऊष्माणः। क ख ग घ एते यमाः। नपुंसकाश्च तृतीयेऽध्याये एतत् सिद्धम्।

इति श्रीसाम्बपुराणे सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः बीजोत्तरे चतुर्थपटलं समाप्तम्

मूल में लिखित अ से अः तक १६ स्वरवर्ण हैं। ककार से मकार-पर्यन्त स्पर्श वर्ण हैं। य र ल व अन्तःस्थ वर्ण हैं। श ष स—ऊष्म वर्ण हैं। क ख ग घ—यम वर्ण तथा नपुंसक हैं। तृतीय अध्याय में ये सिद्ध हैं।

श्री साम्बपुराणोक्त सत्तावनवें अध्याय में बीजोत्तर का चतुर्थ पटल समाप्त