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सर्वकोश
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 424 में से

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पृष्ठ 68

५८ | श्रीसाम्बपुराणम्

यमस्तु तेन शापेन भृशं पीड़ितमानसः।
मनुना सह धर्मात्मा पृष्टः सर्वं न्यवेदयत्॥२३॥
स्नेहेन तुल्यं महता माता देव! न वर्त्तते॥२४॥

इससे धर्मात्मा यम ने उस शाप से अत्यन्त पीड़ित होकर मनु के साथ पिता के पास जाकर समस्त वृत्तान्त बताया। 'हे देव (पिता)! माँ के समान स्नेह की समता इसमें कहीं नहीं है॥२३-२४॥

सन्त्यज्य प्रायशोऽस्मान् सा कनीयांसो विधित्सति।
तस्यां मयोद्यतः पादो न च देहे निपातितः॥२५॥

प्रायः हमारा परित्याग करके वे छोटे भाइयों का अधिक यत्न करती हैं। मैंने उन्हें पैर दिखलाया था, किन्तु वह उनके शरीर से नहीं लगा॥२५॥

बालाद्वा यदि वा मोहात् तद्भवान् वक्तुमर्हसि।
शप्तोऽहमेव देवेश जनन्या तपसा वर।
तव प्रसादाच्चरणस्त्रायतां महतो भयात्॥२६॥

हे देवेश! बालक-स्वभाव से अथवा मोह से आप जो भी कहें, हे तपश्रेष्ठ! जननी द्वारा मैं अभिशप्त हो गया हूँ। उस महाभय से आपकी कृपा से मेरी रक्षा हो॥२६॥

रविरुवाच
असंशयं मरुत्पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम्।
येन त्वामाविशत् क्रोधो धर्मज्ञं धर्मशालिनम्॥२७॥

रवि कहते हैं—हे पुत्र! इस व्यापार में निश्चय ही विशेष कारण है; क्योंकि धर्मज्ञ तथा धर्मशाली तुममें क्रोध ने प्रवेश किया है॥२७॥

सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातस्तु विद्यते।
न तु मात्राभिशप्तानां क्वचिन्मोक्षो भवेदिह॥२८॥
न शक्यमेतन्मिथ्या तु कर्तुं मातुर्वचस्तव।
क्वचित्तेऽहं विधास्यामि पुत्रस्नेहादनुग्रहम्॥२९॥
कृमयो मांसमादाय पतिष्यन्ति महीतले।
कृतमस्या वचः सत्यं त्वं च त्राता भविष्यसि॥३०॥

समस्त शाप का प्रतिकार है; किन्तु माता के अभिशाप को मिथ्या कर सकने में मैं भी समर्थ नहीं हूँ। किन्तु पुत्रस्नेह के कारण कुछ कृपा कर सकता हूँ। कृमिगण मांस लेकर भूमि पर पतित होंगे, इससे उनके वाक्य की सत्यता भी होगी और तुम भी त्राण पा जाओगे॥२८-३०॥