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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

तृतीयोऽध्यायः १५

तृतीयोऽध्यायः १५

तासामथोत्थितानां तु वासुदेवस्त्वपश्यत।
भित्वा वासांसि शुक्लानि पत्रेषु पतितं मदम् ॥४४॥
तं दृष्ट्वा तु हरिः क्रुद्धस्तां शशाप तदा स्त्रियः।
यस्माद् गतानि चेतांसि मां मुक्त्वान्यत्र वः स्त्रियः ॥४५॥
तस्मात् पतिकृतांल्लोकान्नायुषोऽन्ते न यास्यथ।
पतिलोकात् परिभ्रष्टाः स्वर्गं चापि गते मयि।
भूत्वा ह्यशरणा यूयं दस्युहस्तं गमिष्यथ ॥४६॥

तब वासुदेव ने देखा कि उठने पर उनके शुक्ल वस्त्र को भेदकर पत्र के ऊपर (योनि के ऊपर) मद पतित हो रहा है। यह देखकर हरि ने क्रुद्ध होकर उन रमणीगण को अभि-
शाप दिया—हे स्त्रीगण! मेरा परित्याग करके तुम्हारा चित्त अन्यत्र धृत हो गया है, अतः परलोक में तुम्हें पतिलोक (आयु समाप्त होने पर) नहीं मिलेगा। मेरे स्वर्गारोहण के पश्चात् तुम परिभ्रष्ट होगी तथा अरक्षित होकर डाकुओं के हाथ में पड़ जाओगी।।४४-४६।।

वशिष्ठ उवाच

शापदोषात्ततस्तस्मात् स्त्रियः स्वर्गं गते हरौ।
हृताः पाञ्चनदैश्चौरैरर्जुनस्य तु पश्यतः ॥४७॥
ततस्तास्तुल्यशापत्वादेवं संदूषिताः स्त्रियः।
प्राप्तवत्यो महच्छापं मुक्त्वा तिस्रः पतिव्रताः ॥४८॥
रुक्मिणीं सत्यभामां च तथा जाम्बवतीमपि।
शप्त्वैवं ताः स्त्रियः कृष्णः साम्बमप्यशपत्ततः ॥४९॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं कि तदनन्तर अभिशाप के कारण ही जब हरि ने स्वर्गगमन कर लिया था तब अर्जुन के सामने ही उन स्त्रीगण को पञ्चनद प्रदेश में चोरों ने अपहृत कर लिया था। पतिव्रता रुक्मिणी, सत्यभामा तथा जाम्बवती के अतिरिक्त सभी को यह अभिशाप लगा था। इस प्रकार से इन स्त्रीगण को शाप देकर भगवान् कृष्ण ने साम्ब को भी इस प्रकार शाप दिया था।।४७-४९।।

वासुदेव उवाच

यस्मादतीव कान्तं ते दृष्ट्वा रूपमिमाः स्त्रियः।
क्षुब्धाः सर्वास्तु तस्मात्त्वं कुष्ठरोगमवाप्स्यसि ॥५०॥

वासुदेव कहते हैं—जिस कारण से सभी रमणीगण तुम्हारा अतीव सुन्दर रमणीय रूप देखकर क्षुब्ध हो गयीं, इसलिये तुम अब कुष्ठरोग से ग्रसित होगे।।५०।।

वशिष्ठ उवाच

यस्मिन् शप्तः क्षणे चासौ पित्रा पुत्रः स्वसम्भवः।
प्राप्तवान् कुष्ठरोगित्वं विरूपत्वं च दुःसहम् ॥५१॥

१६श्रीसाम्बपुराणम्

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—जब पिता ने अपने पुत्र को इस प्रकार शाप दिया, तभी उसे कुष्ठरोग हो गया तथा वह कुरूप हो गया।।५१।।

साम्बेन पुनरप्येवं दुर्वासां कोपिता मुनिः।
भाव्येनार्थेन चात्यर्थं पूर्वानुस्मरणेन वै ॥५२॥
प्राप्तवान् सुमहच्छापं साम्बो वै मनुजोत्तमः।
तच्छापान्मुसलं जातं कुलं येनाऽस्य पातितम् ॥५३॥

इसी प्रकार एक बार साम्ब से दुर्वासा मुनि कुपित हो गये थे और भवितव्यता के चलते पूर्व वृत्तान्त का स्मरण न रहने से नरश्रेष्ठ साम्ब ने सुमहत् शाप पाया था। उस शाप से उनके पेट से मूसल उत्पन्न हुआ था, जिसके द्वारा यदुवंश का संहार हो गया था।।५२-५३।।

श्रुत्वा दुर्विनयाद्दोषानेवमादीन् विपश्चिता।
नित्यं भाव्यं विनीतेन गुरुदेवद्विजातिषु ॥५४॥

दुर्विनय के इस प्रकार के दोष को सुनकर विज्ञजनों को गुरु, देवता तथा ब्राह्मणों के सम्मुख विनीत हो जाना चाहिये।।५४।।

ततः शापाभिभूतेन साम्बो नाराध्य भास्करम्।
पुनः सम्प्राप्य तद्रूपं स्वनाम्नार्को निवेशितः ॥५५॥
नारदो दर्शयित्वा तु स्त्रीणां भावविपर्ययम्।
साम्बं शापेन संयोज्य तत्रैवान्तरधीयत ॥५६॥

इति श्रीसाम्बपुराणे साम्बशापो नाम तृतीयोऽध्यायः

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तदनन्तर अभिशप्त साम्ब ने भास्कर की आराधना से पुनः अपना रूप प्राप्त किया और अपने नाम से सूर्य की स्थापना (चन्द्रभागा के तट पर) किया। इधर नारद भी स्त्रीगण के भावविपर्यय को दिखलाकर तथा साम्ब को शाप दिलवाकर वहाँ से अन्तर्धान हो गये।।५४-५६।।

श्री साम्बपुराण का साम्बशाप नामक तृतीय अध्याय समाप्त

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चतुर्थोऽध्यायः

(द्वादशमूर्त्युपाख्यानम्)

बृहद्वल उवाच
स्थापितो यदि साम्बेन सूर्यश्चन्द्रसरित्तटे।
तस्मान्नाद्यमिदं स्थानं यथैतद् भाषितं त्वया ॥१॥

राजा बृहद्वल पूछते हैं—यदि साम्ब ने चन्द्रभागा नदी के तट पर सूर्य के मूर्त्ति की स्थापना की थी, तब उसे आपने जिस प्रकार कहा है (उससे प्रतीत होता है कि) यह सूर्य का आद्य स्थान नहीं है॥१॥

वशिष्ठ उवाच
आद्यं स्थानमिदं भानोः पश्चात् साम्बेन निर्मितम्।
विस्तरेणास्य चाद्यत्वं कथ्यमानं निबोध मे ॥२॥

ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—यही सूर्य का आद्य स्थान है। बाद में साम्ब ने यहाँ निर्माण कराया। मैं विस्तार से इस आद्यत्व का वर्णन करता हूँ, तुम सुनो॥२॥

अनाद्यो लोकनाथः स विश्वमाली जगत्पतिः।
मित्रत्वेऽवस्थितो देवस्तपस्तेपे नराधिपः ॥३॥

अनादि लोकनाथ जगत्पति नरगण के अधिपति मित्ररूपेण अवस्थित देवता ने पूर्व में एक बार तपस्या किया था॥३॥

अनादिनिधनो ब्रह्मा नित्यश्चाक्षर एव च।
सृष्ट्वा प्रजापतीन् सर्वान् सृष्ट्वा च विविधाः प्रजाः ॥४॥

जिनकी उत्पत्ति तथा विनाश नहीं है, ऐसे नित्य अक्षररूप (क्षररहित) ब्रह्मा ने समस्त प्रजापतियों एवं विविध प्रजा की सृष्टि की॥४॥

ततः स च सहस्त्रांशुरव्यक्तपुरुषः स्वयम्।
कृत्वा द्वादशधात्मानमदित्यमुदपद्यत ॥५॥

तदनन्तर उन अव्यक्त पुरुष सहस्त्रांशु (सूर्य) स्वयं द्वादश रूपों में देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुये॥५॥

इन्द्रो धाताथ पर्जन्यः पूषा त्वष्टाऽर्यमा भगः।
विवस्वान् विष्णुरंशुश्च वरुणो मित्र एव च ॥६॥

१८ | श्रीसाम्बपुराणम्

आभिर्द्वादशभिस्तेन सूर्येण परमात्मना।
सर्वं जगदिदं व्याप्तं मूर्त्तिभिस्तु नराधिपः॥७॥

इन्द्र, धाता, पर्जन्य, पूषा, त्वष्टा, अर्यमा, भग, विवस्वान्, विष्णु, अंशु, वरुण तथा मित्र। हे नराधिप! परमात्मा सूर्य अपनी इन द्वादश मूर्तियों से समस्त जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं॥६-७॥

तस्या या प्रथमा मूर्त्तिरादित्यस्येन्द्रसंज्ञिता।
स्थिता सा देवराजत्वे देवानामनुशासिनी ॥८॥

आदित्य की प्रथम मूर्त्ति इन्द्र के नाम से विख्यात है। यह मूर्त्ति देवगण के शासक देवराजरूप में वर्त्तमान है॥८॥

द्वितीयार्कस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना धातेति कीर्त्तिता।
स्थिता प्रजापतित्वे सा विविधाः सृजते प्रजाः ॥९॥

सूर्य की द्वितीय मूर्त्ति का नाम है—धाता। यह प्रजापति रूप से नानाविध प्रजा की सृष्टि करती है॥९॥

तृतीयार्कस्य या मूर्त्तिः पर्जन्य इति विश्रुता।
मेघे व्यवस्थिता सा तु वर्षते च गभस्तिभिः ॥१०॥

सूर्य की तृतीय मूर्त्ति पर्जन्य के नाम से ख्यात है। यह मेघमण्डल में स्थित होकर अपनी किरणों से वर्षा करती है॥१०॥

चतुर्थी तस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना पूषेति विश्रुता।
अन्ने व्यवस्थिता सा तु प्रजाः पुष्णाति नित्यशः ॥११॥

इनकी चतुर्थ मूर्त्ति पूषा नाम से विख्यात है। यह अन्न में स्थित होकर नित्य समस्त प्रजा का पोषण करती है॥११॥

पञ्चमी तस्य या मूर्त्तिर्नाम्ना त्वष्टेति विश्रुता।
स्थिता वनस्पतौ सा तु ओषधीषु च सर्वशः ॥१२॥

इनकी पञ्चम मूर्त्ति त्वष्टा के नाम से प्रसिद्ध है। यह वनस्पति तथा औषधियों में सर्वतोभावेन स्थित है॥१२॥

मूर्त्ति षष्ठी रवेर्या तु अर्यमा इति विश्रुता।
वायोः सञ्चरणार्था सा देहेष्वेव समाश्रिता ॥१३॥

इनकी षष्ठ मूर्त्ति को अर्यमा कहते हैं। यह वायु के संचरण के कारण सभी देह में स्थित है॥१३॥