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साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा

स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)

DevanagariHindipublished424 पृष्ठ

प्रथमोऽध्यायः ३

प्रथमोऽध्यायः ३

पुराणमखिलं चात्र सर्वशास्त्रप्रतिष्ठितम्।
कथयस्व महाभाग यथावच्छ्रुतवानसि ॥१४॥

धीमान् साम्ब ने भास्कर से जिस पुराण की जिज्ञासा की थी, वह द्वादशाकार (विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र तथा उरुक्रम—यह द्वादश नामधारी सूर्य) अथवा पञ्चदश मूर्ति (तीस का आधा) से युक्त नहीं है। जिसमें समग्र पुराण तथा सर्वशास्त्र प्रतिष्ठित है, उसे मुझसे कहिये, जैसा कि आपने सुना था॥१३-१४॥

सूत उवाच
प्रश्नभारो महानेष यथा वदसि सुव्रत।
यन्महाभारताख्यानाद् बह्वर्थं श्रुतिविस्तरात् ॥१५॥

सूत कहते हैं—हे सुव्रत! आप जैसा कहते हैं, वह महत् विस्तृत प्रश्न है। यह विस्तार से श्रवण करने के योग्य है। यह महाभारत के आख्यान से भी अधिक अर्थयुक्त है॥१५॥

पुराणानां च सर्वेषां प्रवरः प्रश्न उत्तरः।
कथाश्च विविधाश्चित्राः पुराणाः सम्प्रतिष्ठिता ॥१६॥

समस्त पुराणों में श्रेष्ठ यह पुराण प्रश्नोत्तर तथा अनेक कथायुक्त है तथा अनेक प्रकार के विचित्र पुराण इसमें सम्प्रतिष्ठित हैं॥१६॥

वेदार्थस्मृतिसाराणि वर्णधर्माश्रयाणि च।
भूतं भव्यं भविष्यं च मन्त्रवादस्तथैव च ॥१७॥

इसमें वेदार्थ तथा स्मृति का सार है तथा वर्णाश्रम धर्म का आश्रय लिया गया है। अतीत-वर्त्तमान तथा भविष्यद् मन्त्रवाद भी इसमें समाहित हैं॥१७॥

वश्याकर्षणविद्वेषस्तम्भनोच्चाटनादिकम् ।
प्रतिमालक्षणञ्चैव पूजावासविधानकम् ॥१८॥
मण्डलानि क्रियायागाः सिद्धियागाश्च साधनम्।
महामण्डलयागाश्च सान्निध्यं द्वादशात्मनः ॥१९॥
भूमेर्वा तोषणं चैव पुष्पधूपविधिस्तथा।
सप्तमीकरणं चैव उपवासविधिस्तथा ॥२०॥
प्रोक्षणं यच्च दानस्य फलं यच्च प्रकीर्त्तितम्।
वेलाकालविधानञ्च यच्च धर्मविधिस्तथा ॥२१॥
धूपकर्मविधिश्चैव जयस्यापि तथा विधिः।
प्रयताप्रयतस्यैव तथा स्वप्नानुवर्णनम् ॥२२॥

४श्रीसाम्बपुराणम्

प्रायश्चित्तविधानञ्च तथाचार्यस्य लक्षणम्।
दीक्षां सर्वशिष्याणां मन्त्रेणापि विनिश्चयः ॥२३॥
स्तवाश्च विविधाश्चैवं यस्मिन् ग्रन्थे समासतः।
भविष्यन्ति यथान्यायमाधाय विविधाश्रयाः ॥२४॥

इति श्रीसाम्बपुराणे उद्देशानुक्रमणिकाकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः


वशीकरण, आकर्षण, विद्वेषण, स्तम्भन, उच्चाटनादि एवं प्रतिमालक्षण, पूजागृह-विधान, मण्डल, क्रियायाग, सिद्धियाग साधन, महामण्डल याग एवं द्वादशात्मक सूर्य का सान्निध्य, भूमि का तोषण, पुष्प तथा धूपविधि, सप्तमी की विशेष पूजाविधि तथा उपवासविधि कही गयी है। प्रोक्षण (यज्ञार्थ मन्त्रों से शुद्ध किया गया मांसादि) तथा दान का फल भी कहा गया है। वेलाकाल विधान (जिस काल में जिस कार्य को करना होता है) एवं धर्मविधि भी वर्णित है। धूपदान की विधि, जय-प्राप्ति का विधान, संयम, असंयम तथा स्वप्न-वृत्तान्त (स्वप्न-दर्शन का शुभा शुभ फल) भी वर्णित है।

प्रायश्चित्त-विधान, आचार्य-लक्षण, सकल शिष्य-दीक्षा तथा किसके लिये कौन-सा मन्त्र उपयोगी है? इसका निश्चय किया गया है। ग्रन्थ में विविध स्तव भी संक्षेप में कहे गये हैं। यथायथ रूप से भी नाना विधि से विषय का सन्निवेश किया गया है (ऐसा यह साम्बपुराण है)॥१८-२४॥

श्री साम्बपुराण का उद्देशानुक्रमणिका-कथन नामक प्रथम अध्याय समाप्त

द्वितीयोऽध्यायः

(आदित्यमहिमा)

सूत उवाच
वसिष्ठं स्वस्थमासीनं मुनिराजं बृहद्वलः।
रघुवंशोद्भवोऽपृच्छद् गुरुं निःश्रेयसं परम्॥१॥

सूत कहते हैं—रघुवंशोद्भूत राजा बृहद्वल आसन पर आसीन ऋषिश्रेष्ठ अपने गुरु वशिष्ठ से परम निःश्रेयस् की जिज्ञासा करते हैं॥१॥

भगवन् श्रोतुमिच्छामि परं ब्रह्म सनातनम्।
यस्मिन्न पुनरावृत्तिं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः॥२॥

हे भगवन्! सनातन परब्रह्म की बात सुनने की इच्छा करता हूँ; जहाँ जाने पर मनीषीगण पुनः जन्मग्रहण नहीं करते॥२॥

गृहस्थो ब्रह्मचारी वा वानप्रस्थोऽथ भिक्षुकः।
य इच्छेन्मोक्षमास्थातुं देवतां कां यजेत्तु सः॥३॥

गृहस्थ, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ अथवा भिक्षुक (संन्यासी) इत्यादि को मोक्षाभिलाषी होने पर किस देवता की अर्चना करनी चाहिये?॥३॥

कुतो ह्यस्य ध्रुवः स्वर्गः कुतो निःश्रेयसं परम्।
स्वर्गतश्चैव किं कुर्याद् येन न च्यवते पुनः॥४॥
देवतानां हि को देवः पितृणामपि कः पिता।
यस्मात् परतरं नास्ति तस्मै ब्रूहि महामुने॥५॥

मोक्ष चाहने वालों का स्थिर स्वर्ग कहाँ है? परम मंगल कहाँ है? स्वर्ग जाने हेतु क्या करना चाहिये, जिससे कि वहाँ से पतन न हो। देवताओं का कौन देव है? पितृगणों का कौन पिता है, जिससे पर (श्रेष्ठ) कोई नहीं है, हे महामुने! वह मुझसे कहिये॥४-५॥

कुतः सृष्टमिदं ब्रह्मन् विश्वं स्थावरजङ्गमम्।
प्रलयश्च कमभ्येति तद्भवान् वक्तुमर्हसि॥६॥

हे ब्रह्मन्! कहाँ से यह स्थावर-जंगम विश्व सृष्ट हुआ है तथा प्रलय के समय किसका आश्रय लेकर स्थित रहता है? यह आप बतायें॥६॥

६ श्रीसाम्बपुराणम्

वशिष्ठ उवाच

उद्यन् पश्यन् हि कुरुते जगद् वितिमिरं करैः ।
नातः परतरो देवः कश्चिदन्यो नराधिपः ॥७॥

वशिष्ठदेव कहते हैं—जो उदित होकर देखते-देखते ही अपने कर से (किरणों से) जगत् को वितिमिर (अन्धकाररहित) कर देते हैं, हे नराधिप! उनसे परतर कोई भी देवता नहीं है।।७।।

अनादिनिधनो ह्येष पुरुषः शाश्वतोऽव्ययः ।
तापयत्येष लोकांस्त्रीन् भ्रमन् रश्मिभिरुल्बणैः ॥८॥

यह पुरुष आदि-अन्तरहित है। शाश्वत तथा अव्यय है। ये भ्रमण करते-करते अपनी तीक्ष्ण रश्मियों से त्रिभुवन को तापित कर देते हैं।।८।।

सर्वदेवात्मको ह्येष तपसां चानुभावनः ।
सर्वस्य जगतो नाथः कर्मसाक्षी विभावसुः ॥९॥

ये ही सर्वदेवात्मक, तपस्या के अनुभावक, जगत् के नाथ, कर्म के साक्षी तथा प्रभा से युक्त हैं।।९।।

संक्षिपत्येष भूतानि तथा विसृजते पुनः ।
एको भाति तपत्येष कर्षते च गभस्तिभिः ॥१०॥
एष धाता विधाता च भूतानिर्भूतभावनः ।
न ह्येष क्षयमायाति नित्यमक्षयमण्डलः ॥११॥

ये ही समस्त प्राणियों का विनाश करते हैं और पुनः उनकी सृष्टि करते हैं। अकेले प्रकाशित होते हैं, ताप देते हैं तथा रश्मियों द्वारा आकर्षण करते हैं। ये ही धारणकर्त्ता तथा सृष्टिकर्त्ता हैं। समस्त प्राणियों के आदि तथा सभी के उत्पादक हैं। इनका कोई क्षय नहीं है। ये नित्य अक्षय (अविनश्वर) मण्डल में अवस्थित हैं।।१०-११।।

पितॄणां हि पिता ह्येष देवानामेष देवता ।
ध्रुवं स्थानं भजन्नेष यस्मान्न च्यवते पुनः ॥१२॥
सर्गकाले जगत् कृत्स्नमादित्यात् सम्प्रसूयते ।
प्रलये च तमे भाति आदित्यं दीप्ततेजसम् ॥१३॥

ये ही पितृगण के पिता एवं देवताओं के भी देवता हैं। ये ध्रुव (स्थिर) स्थान में अवस्थान करते हैं। उससे इनकी विच्युति नहीं होती। सृष्टिकाल में समस्त जगत् आदित्य से ही उत्पन्न होता है और प्रलय में यह दीप्ततेजा आदित्य में ही प्रवेश कर जाता है।।१२-१३।।