साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
द्वितीयान्तश्चतुष्कश्च उत्तमश्च तथैव तु।
अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
(ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवः)
स्वरावाद्यौ चतुर्थाश्च ऊष्मा च प्रथमं तथा।
चत्वारश्चोत्तरं ज्ञेयास्तृतीयाः स्पर्शसंज्ञकाः ॥१॥
द्वितीयान्तश्चतुष्कश्च उत्तमश्च तथैव तु।
चतुर्थत्रयमेव स्यात्तृतीयो द्वौ तथैव च ॥२॥
द्वितीयाद्यस्य चत्वारस्तृतीयस्यानुनासिकम्।
पञ्चमः प्रथमश्च स्यात्तया स्यादनुनासिकम् ॥३॥
चतुर्थो ह्यष्टकश्चैव योनिः सा हि सुसृष्टये।
चत्वारो स्याद्द्विवर्णाः स्युर्दीपिता बिन्दुभिस्त्रिभिः ॥४॥
आद्यस्वर दो, चतुर्थ वर्णसमूह, ऊष्म वर्णसमूह तथा प्रथम वर्ण—इन चारो को परवर्ती जानना चाहिये। तृतीय वर्ण स्पर्शसंज्ञक हैं। द्वितीयान्त चार हैं, चतुर्थ तीन हैं तथा तृतीय में दो उत्तम हैं। द्वितीय के आद्य चार तथा तृतीय अनुनासिक हैं। इसी प्रकार पञ्चम एवं प्रथम अनुनासिक हैं। चतुर्थ एवं अष्टक सुसृष्टि के योनिरूप हैं और ये चार द्विवर्ण बिन्दुसमूह के साथ दीपित होते हैं॥१-४॥
दीपिनी बीजिनी ह्येषा पावनी स्वरसन्ततिः।
नित्यमेषानुजप्तव्या परं निर्वाणमिच्छता ॥५॥
आहावहवो हवाभवे चारिणी परमशक्तिना।
तन्त्र इति स्थितोभूमिमहाभूत इतरेतरचुम्बचुम्ब-
एषा सिद्धा चत्वारिंशदक्षरा योनिः ॥६॥
इति श्रीसाम्बपुराणे अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवे
पञ्चमं पटलम् समाप्तम्
•
ये स्वरसमूह दीपिनी, बीजिनी तथा पावनी हैं। परनिर्वाण के इच्छुक व्यक्ति को इनका नित्य जप करना चाहिये। अहो! इस संसार में परमशक्ति के साथ विचरणशील परस्पर भिन्न महाभूतों का समूह 'तन्त्र' नामक भूमि में स्थित है। इस प्रकार सिद्ध ४० अक्षरात्मिका योनि सिद्ध होती है॥५-६॥
श्रीसाम्बपुराणोक्त ज्ञानोत्तर बीजप्रसव नामक अट्ठावनवें अध्याय का पञ्चम पटल समाप्त
•
एकोनषष्टितमोऽध्यायः
(ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवः)
पञ्चविंशतिभिर्नाम सप्तधा क्रमशस्तथा।
प्रणवादिस्त्रिधा भिन्नं तस्मिन्नेव पदे उभे ॥१॥
प्रणवादिर्नमोऽन्तस्थः प्रसवः सप्तमस्तु सः।
एषामादिपदं यत्स्याद् द्वितीयां चैव योजयेत् ॥२॥
तथा चादिपदैस्तत्त्वं प्रतिलोमो विधीयते।
योनि मुख्यानि यानि स्युः सर्वसृष्टिप्रवृत्तये ॥३॥
इति श्रीसाम्बपुराणे एकोनषष्टितमोऽध्यायः ज्ञानोत्तरे बीजस्वरप्रसवे षष्ठं पटलं समाप्तम्
२५ द्वारा क्रम-क्रम से सात प्रकार के नाम हैं। आदि में प्रणव है। तीन प्रकार से भिन्न रूप उसका उदय पद है। आदि में प्रणव, अन्त में नमः शब्द सप्तम उत्पत्ति है। उसका स्तव करता है। इसमें जो आदि पद है, उसमें द्वितीय का योग करे। इस प्रकार आदि पद द्वारा प्रतिलोम में तत्त्व की उत्पत्ति होती है। समस्त सृष्टि में प्रवृत्ति के कारण ये योनिमुख हैं॥१-३॥
श्री साम्ब पुराणोक्त उनसठवें अध्याय में ज्ञानोत्तर बीजस्वर प्रसव अध्याय का षष्ठ पटल समाप्त
षष्टितमोऽध्यायः
(सोमसूत्रम्)
ध्यातव्य एष यत्लाद्यः सेवते ह्यखिलं जगत्।
आहावहोहवाभवेचारिणि परमशक्तिरात्मातन्त्र इति स्थिते ॥१॥
जो इस वस्तु को धारण कर सकते हैं, वे समस्त जगत् की सेवा करते हैं। 'आहा अहो ह वा भवे चारिणि' परमशक्ति आत्मा है—यह तन्त्र है।
ॐ अं ॐ उं व्योमव्यापिने। अनुषङ्गेण सप्तानां यथासंख्येयन संपुटः। पादांतस्थ-बीजाख्या योनयः। ॐ अं व्योमव्यापिने ॐ इं आं व्योम। ॐ आं ईं ॐ व्योमव्यापिने भूतिवितर चुम्ब चुम्ब। वर्णायाः प्रभृतिः स्यान्मयोक्ता विस्तरतः॥२॥
ऊपर मूल में लिखे ‘ॐ अं’ से लेकर ‘भूतिवितर चुम्ब चुम्ब’ मन्त्र से व्योमव्यापी परमात्मा का ध्यान करे। अनुषङ्ग में सात यथासंख्य सम्पुट होगा। पाद के अन्तस्थ बीजादि योनि है। ‘ॐ अं व्योमव्यापिने’ इत्यादि मूल में अंकित मन्त्रों का विस्तार से वर्णन करता हूँ॥२॥
कालात्मनः प्रसूतिन्ते मन्त्रराजस्य मुक्त्यर्थं वक्ष्यन्तेऽथो यथाशास्त्रविनिश्चयः।
चक्रं त्रिनाभ्यं तत् सर्वं संवत्सरमिति प्रभुः ॥३॥
द्वादशारं तु तन्मनसो प्रत्ययश्चार्द्धमासिकः।
त्रीणि षष्टिशतान्याहुरहोरात्राणि संकरः ॥४॥
कला मुहूर्ता दण्डाश्च निमिषास्तु प्रतिष्ठिताः।
तदर्धंन्नातिविश्वात्माव्यञ्जयच्छब्देहिनाम् ॥५॥
सप्तकः पञ्चभिर्युक्तः परितो बिन्दुभिर्युतः।
पुनः षोडशभिर्नद्धा त्रिनाभीत्युच्यते बुधैः ॥६॥
कालात्मा के प्रसूति को आपके मन्त्रराज को मुक्ति के लिये यथाशास्त्र मैं कहता हूँ। चक्र-त्रिनाभि-पर्यन्त ये सभी संवत्सर हैं। ये प्रभु हैं। द्वादशार है—उनका मन। प्रत्यय है—अर्धमासिक तीन षष्टिशत अहोरात्र। कला, मुहूर्त, दण्ड, निमेष प्रतिष्ठित हैं। वे वर्धित होकर अतिविश्वात्मा शब्ददेहियों का प्रकाशन करते हैं। जो पाँच सप्तक से युक्त, चारो ओर बिन्दुओं के साथ मिलित, पुनः १६ के साथ बद्ध हुआ। उसे पण्डितगण त्रिनाभि कहते हैं॥३-६॥